क्रेकाटोआ ज्वालामुखी का भीषण कहर

Submitted by Hindi on Fri, 01/08/2016 - 13:29
Source
राष्ट्रीय सहारा, 03 जनवरी 2016

क्रेकाटोआ ज्वालामुखी का विस्फोट आधुनिक समय का सबसे बड़ा विस्फोट था। इसकी तीव्रता टीएनटी के दो सौ मेगा टन के बराबर थी। इस विस्फोट से वातावरण में इतनी तीव्र तरंगे पैदा हुई थी कि उन्होंने पूरी दुनिया के सात चक्कर लगाये और आसमान पर इतनी धुँध छा गई थी कि बहुत दिनों तक सूरज दिखाई नहीं दिया...

इंडोनेशिया क्रेकाटोआ द्वीप पर सुंडास्ट्रेट में एक ऐसा भीषण ज्वालामुखी सोया हुआ है, जिसने बार-बार जागकर महाविनाश का इतिहास रचा है। इसमें सबसे खतरनाक विस्फोट अगस्त, 1883 में हुआ था। इस ज्वालामुखी का नाम ‘क्रेकाटोआ’ है, इंडोनेशिया में इसे ‘क्रेकोआऊ’ कहा जाता है। इस ज्वालामुखी के फटने से लगभग पच्चीस क्यूबिक किलोमीटर आयतन की चट्टान राख और लावा धरती के गर्भ से बाहर आ गया। ज्वालामुखी फटने से जो विस्फोटक ध्वनि हुई थी, उसे आस्ट्रेलिया के दूसरे छोर पर स्थित पर्थ में भी सुनी गई। मॉरिशस के निकट रोड्रिग्यू, द्वीप तक इस ध्वनि की गूँज पहुँची थी। पूरी पृथ्वी पर विस्फोट की तरंगे महसूस की गई। क्रेकोटोआ के चारों ओर दूर-दूर तक बसे 165 गाँव एवं नगर नष्ट हो गए, लगभग साढ़े छत्तीस हजार लोगों की जाने चली गई जिनमें कुछ यूरोपीय भी थे। असंख्य जीव-जन्तु एवं पशु-पक्षी भी काल-कवलित हो गये थे। विस्फोट के बाद निकटवर्ती क्षेत्र पर सुनामी का कहर टूटा-जिसमें हजारों लोग हताहत हुए।

क्रेकाटोआ द्वीप का दो-तिहाई भाग इस विस्फोट में नष्ट हो गया। 1883 से पहले क्रेकाटोआ चार द्वीपों से मिलकर बना था। ये चार द्वीप के-लेंग, बरलेटन, पोलिश हैट और क्रेकाटोआ। क्रेकाटोआ द्वीप में तीन ज्वालामुखी समूह थे-27 सौ फुट ऊँचा ‘रकाटा’, 1460 फुट ऊँचा ‘डानन’ तथा 400 फुट ऊँचा ‘परबोवाटन’। क्रेकाटोआ ज्वालामुखी दो सौ वर्षों तक शांत पड़ा रहा। 1883 में इसके फट पड़ने से अनेक वर्षों तक भूचाल आते रहे, जिनकी कंपन आस्ट्रेलिया तक महसूस की गई थी।

20 मई 1883 को क्रेकाटोआ ज्वालामुखी के मुख से भाप निकलनी शुरू हुई जो अगले तीन माह तक जारी रही। 11 अगस्त 1883 को ज्वालामुखी ने फटना शुरू किया। द्वीप समूह में तीनों स्थानों- रकाटा, डानन और परबोवाटन-पर ज्वालामुखी सक्रिय हुआ। समुद्र की लहरें ऊँची उठने लगीं। दूर स्थित घरों के खिड़की-दरवाजें खड़खड़ाने लगे। समुद्रतटों पर खड़े जहाज डगमगाने लगे। तेज हवा के साथ ज्वालामुखी के मुख से राख निकलनी शुरू हुई ज्वालामुखी में ग्यारह स्थानों पर छेद हो गए थे, जिनसे तीव्र गति से राख बाहर निकल रही थी। 26 अगस्त 1883 तक यह क्रम जारी रहा। ज्वालामुखी से निकलने वाली राख के बादल आसमान में छा कर घने होते जा रहे थे। 26 अगस्त को ये राख के बादल 36 किलोमीटर की ऊँचाई तक पहुँच गये थे। इस समय सुनामी सक्रिय हो गई।

27 अगस्त 1883 को सुबह ज्वालामुखी की दीवारों में चौड़ी-चौड़ी दरारें पड़ गई। इन दरारों के फटने से भयानक आवाजें हुई और समुद्र का पानी इन दरारों से होता हुआ ज्वालामुखी के गर्भ में चला गया और खौलते हुए लावे में मिल गया। हजारों डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर खौलते हुए लावे में जब समुद्र का पानी गिरा तो उच्च तापमान वाली अथाह भाप एक साथ ज्वालामुखी के मुख से निकली और उस भाप का तापमान इतना ऊँचा था कि द्वीप समूह का दो-तिहाई हिस्सा उसके दुष्प्रभाव से नष्ट हो गया। केवल दक्षिणी हिस्सा बचा, जिसे अब रकाटा द्वीप कहा जाता है। भाप के बादलों के साथ जब ज्वालामुखी फटा तो इतनी तेज आवाजें हुई कि वे 48 सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित मॉरिशस में भी सुनाई पड़ी। विश्व के इतिहास में अब तक जितने भी ज्वालामुखी फटे किसी की भी आवाज इतनी तेज नहीं थी।

क्रेकाटोआ ज्वालामुखी की आवाज को सुनकर निकटवर्ती लोगों के कानों के पर्दे फट गये थे, लेकिन अभी तक किसी के मरने की सूचना नहीं मिली थी। इसी समय सुनामी की एक सौ बीस फुट ऊँची लहरें द्वीप के निकटवर्ती नगरों और गाँवों पर टूट पड़ी। ये लहरें इतनी तेज थीं कि पहले ही बहाव में लगभग छत्तीस हजार लोगों को अपने साथ लपेटे ले गर्इं। इस सुनामी के बाद ज्वालामुखी से भयानक लपटें, अथाह धुआँ और राख निकली। इस सबके कारण एक हजार लोग मारे गये। दक्षिण अफ्रीका, जो कई हजार किलोमीटर की दूरी पर है, के समुद्र में खड़े जहाज उस समय पलट गये जब इतनी लम्बी यात्रा करके दक्षिण अफ्रीका पहुँची लहरों ने उन पर चोट मारी। जहाज में मौजूद लोगों के शव इस दुर्घटना के बाद कई सप्ताह तक समुद्र के पानी में तैरते रहे। हिन्द महासागर में भी सैकड़ों मानव शरीर के ढाँचे तैरते हुए पाये गये थे। जावा और सुमात्रा द्वीपों के बड़े हिस्से गायब हो गये थे। जावा द्वीप का एक हिस्सा तो इतनी बुरी तरह नष्ट हो गया था कि वहाँ दोबारा से कोई बसा ही नहीं। वहाँ घने जंगल उग आये और अब वहाँ जंगली जानवरों के लिये उजंग कुलोन नेशनल पार्क बना दिया गया है।

क्रेकाटोआ ज्वालामुखी का विस्फोट आधुनिक समय का सबसे बड़ा विस्फोट था। इसकी तीव्रता टीएनटी के दो सौ मेगा टन के बराबर थी इस विस्फोट से वातावरण में इतनी तीव्र तरंगें पैदा हुई थी कि उन्होंने पूरी दुनिया के सात चक्कर लगाये और आसमान पर इतनी धुँध छा गई थी कि बहुत दिनों तक सूरज दिखाई नहीं दिया। जिस द्वीप पर ज्वालामुखी फटा था, वह पूरा का पूरा समुद्र में डूब गया था, उसका एक अल्पांश भाग बचा था। इस द्वीप के निकट समुद्र का तल पूरी तरह बदल गया था। बैरलेटन और लैंग द्वीपों में जमीन का धरातल ऊँचा उठ गया था। पालिशहैट नामक द्वीप पूरी तरह गायब हो गया था, उसकी केवल एक छोटी सी चट्टान बची थी जिसे ‘बूट्सपैन्स्ट्रॉट’ कहा जाता है। ज्वालामुखी फटने के बाद जब राख आसमान से गिरी तो रेत के इतने ऊँचे टीले बन गए कि वे देखने में पहाड़ से लगते थे, उनको ‘स्टीयर्स’ और ‘कालमीयर’ नाम दिया गया। परन्तु ये हमेशा नहीं रह सके, सागर की लहरों ने कालांतर में इन्हें बहाकर खुद में मिला लिया।

जावा द्वीप उत्तरी मैदान में सुंडा स्ट्रेट से लगे क्षेत्र में सुनामी ने भारी तबाही की थी। सुनामी ने इस क्षेत्र पर एक-एक दिन के अन्तराल पर तीन बार हमला किया था। अंतिम हमला सबसे अधिक विनाशकारी था, जिसने टैलकबेटंग में भारी तबाही मचाई थी। क्रेकाटोओ ज्वालामुखी 121 दिन तक सक्रिय रहा। मई से लेकर 28 अगस्त 1883 तक इसने कभी कम कभी ज्यादा नुकसान पहुँचाया। इसके बाद सब कुछ सामान्य हो गया। क्रकाटोआ द्वीप के उत्तरी भाग को पूरी तरह नष्ट करके यह जवालामुखी अब शांत हो गया था।

डानन और परबोवाटन (परबुआटन) ज्वालामुखी भी पूरी तरह नष्ट हो गए थे। उस स्थान पर एक विशाल क्रेटर बन गया था, जिसकी राख उड़ती हुई पूरी दुनिया में पहुँच गई थी। अक्टूबर 1883 तक यह राख पूरी दुनिया में फैल चुकी थी। विस्फोट के केवल दो दिन बाद ही इस राख ने पूरे अफ्रीकन महाद्वीप को कोहरे के रूप में ढक लिया था। 30 नवम्बर 1883 को यह कोहरा आइसलैंड जा पहुँचा कोहरे में तरह-तरह की रोशनियाँ बन-बिगड़ रही थीं। कभी प्रकाश पुंज चमकने लगता था, कभी रंग-बिरंगी रोशनियाँ हो जाती थीं। सूरज-चाँद भी अनेक रंगों में रंगे दिखाई दिए थे। क्रेकाटोआ ज्वालामुखी विस्फोट के छह महीने बाद दक्षिण अमेरिका के मिसौरी के निवासियों को सूरज का रंग पीला दिखाई दिया, जिसकी पृष्ठभूमि में हरा आसमान था। क्रेकाटोआ ज्वालामुखी के विस्फोट की तीव्रता 21.428 परमाणु बमों के बराबर आँकी गई थी। कहते हैं कि इस ज्वालामुखी के विस्फोट की वजह से 9 सितम्बर 1883 को भारत में सूर्य का रंग नीला दिखा।

Disqus Comment

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा