अकेले दिल्ली पर कड़ाई नहीं सुधरेगी राजधानी की सेहत

Submitted by RuralWater on Thu, 01/14/2016 - 12:41

दिल्ली में बढ़ते जहरीले धुएँ के लिये आमतौर पर इससे सटे इलाकों में खेत में खड़े ढूँठ को जलाने से उपजे धुएँ को दोषी ठहराया जाता है। हालांकि ऐसा साल भर में केवल कुछ ही दिनों के लिये होता है। जबकि इससे कई हजार गुना ज्यादा धुआँ राजधानी की सीमा से सटे सैंकड़ों ईंट भट्टों से चौबीसों घंटे उपजता है। एनसीआर में तेजी से बढ़ रही आवास की माँग या रियल एस्टेट के व्यापार ने ईंटों की माँग को बेलगाम कर दिया है।

पूरी दुनिया में हल्ला हो रहा है कि दिल्ली की हवा ज़हरीली है और सरकार भी उसके इलाज के माकूल तरीके तलाश रही है। हवा के जानलेवा बनने की वजह पार्टिकुलेट मैटर या पीएम हैं।

कहने को तो इसके मानक तय हैं कि पीएम 2.5 की मात्रा हवा में 50 पीपीएम और पीएम-10 की मात्रा 100 पीपीएम से ज्यादा नहीं होना चाहिए। लेकिन दिल्ली का कोई भी इलाक़ा ऐसा नहीं है जहाँ यह मानक से कम-से-कम चार गुणा ज्यादा ना हो।

इस हल्ले के बीच पूरे महानगर में इसकी सबसे अधिक मात्रा दिल्ली के आनन्द विहार में है - पूरी 900। आनन्द विहार है तो दिल्ली में लेकिन बिल्कुल चिपका हुआ है उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद से।

यह बानगी है कि अकेले दिल्ली में कानून कड़े करने से आबोहवा सुधरने से रही। दिल्ली में तो पहले से कई कानून हैं जिनका पालन ठीक से नहीं हो रहा है। असल में दिल्ली को दूषित करने वाले कारक उससे सटे एनसीआर से ज्यादा उपज रहे हैं।

आनन्द विहार में रेलवे स्टेशन, मेट्रो के साथ-साथ बड़ा अन्तरराज्यीय बस टर्मिनल भी है। सड़क के इस पार दिल्ली है व दूसरे पर उत्तर प्रदेश का गाज़ियाबाद। यहाँ छह लेन की चौड़ी सड़क हैं जहाँ, सुबह सात बजे से जाम लग जाता है। कारण है दिल्ली की सीमा में स्थित फ्यूल पम्प पर उ.प्र. रोडवेज की बसों की लम्बी कतार।

ये बसें तीन चौथाई रास्ता रोके लेती हैं व इस व्यस्ततम सड़क पर सुबह से ही एक किलोमीटर तक का जाम लगता है। कहने को सड़क के पार कौशाम्बी में उ.प्र का बस टर्मिनल है, लेकिन उ.प्र रोडवेज की डीजल चालित बसें दिल्ली के आनन्द विहार बस अड्डे से भी सवारी उठाती है। अन्दाज है कि यहाँ पूरे दिन में 10 हजार से अधिक बसें व भारी वाहन आते हैं व फँसते हैं।

सड़क पार उ.प्र वाले इलाके में तो कानून-कायदे चलते ही नहीं हैं। वहाँ सैंकड़ों निजी बसें डीजल की धुआँ उड़ाती रहती हैं। यही नहीं दिल्ली के दिलशाद गार्डन से सटे शालीमार गार्डन, डीएलएफ व कई ऐसी कालोनियाँ है। जहाँ तीन लाख से अधिक लोग रहते हैं, लेकिन वहाँ सड़कों का दूर-दूर तक नाम नहीं हैं।

सार्वजनिक परिवहन की कोई सरकारी व्यवस्था है नहीं। दिलशाद गार्डन से शून्य किलोमीटर के ज्ञानी बार्डर पर स्थित ट्रांसपोर्ट नगर में हर दिन पाँच से सात हजार ट्रक आते हैं। यही नहीं दिल्ली में तो सड़क पर ट्रक आने का समय रात 11 बजे तय है, लेकिन यहाँ पर पूरे दिन ट्रक बेराकेटोक चलते हैं।

सड़कों पर उड़ने वाली धूल उसके धुएँ में मिलकर आनन्द विहार, या विवेक विहार ही नहीं, गाजीपुर, मयूर विहार तक की हवा की सेहत खराब करती है।

बागपत जिले की सीमा पर स्थित लोनी हो या फिर गुड़गाँव वाला बिजवासन या नोएडा की सीमा या फिर नांगलोई के करीब बहादुरगढ़ की सीमा, हर जगह हालात कुछ ऐसे ही हैं।

यह भी जान लें कि दिल्ली से सटी सीमाओं पर सैंकड़ों ऐसे कारखाने चल रहे हैं जो दिल्ली में की गई कड़ाई के कारण उस तरफ गए। जाहिर हैं कि वहाँ से निकलने वाले धुएँ या गन्दे पानी को भूगोल की परवाह तो होती नहीं हैं कि उसे दिल्ली में प्रवेश नहीं करना है।

दिल्ली में बढ़ते जहरीले धुएँ के लिये आमतौर पर इससे सटे इलाकों में खेत में खड़े ढूँठ को जलाने से उपजे धुएँ को दोषी ठहराया जाता है। हालांकि ऐसा साल भर में केवल कुछ ही दिनों के लिये होता है। जबकि इससे कई हजार गुना ज्यादा धुआँ राजधानी की सीमा से सटे सैंकड़ों ईंट भट्टों से चौबीसों घंटे उपजता है।

एनसीआर में तेजी से बढ़ रही आवास की माँग या रियल एस्टेट के व्यापार ने ईंटों की माँग को बेलगाम कर दिया है। दिल्ली की गली-गली में घूमकर हर तरह का कूड़ा, कबाड़ा जुटाने वाले जानते हैं कि पानी की बेकार बोतल से लेकर फटे जूते तक को किस तरह ट्रकों में भरकर इन भट्टों में फूँका जाता है।

उल्लेखनीय है कि इन दिनों भट्टे में जलाने के लिये कोयला या लकड़ी बेहद महंगी है जबकि प्लास्टिक का यह कबाड़ा अवांछित सा दर-दर पड़ा होता है। इस पर कागज़ों में भले ही कानून हों, लेकिन कभी भी जहर उगलने वाले भट्टों पर कोई कार्यवाही नहीं होती।

दिल्ली के सेहत सुधारने के लिये यहाँ पहले से लागू कानून कायदों को कड़ाई से लागू करवाना भी जरूरी है। दिल्ली में डीटीसी व क्लस्टर बसें कभी भी अपनी लेन में नहीं चलतीं, उनमें लगे स्पीड गवर्नर हटा दिये गए हैं, ओवरलोड तिपहिए, ग्रामीण सेवा और छोटे भारवाहक वाहन पर कोई रोक नहीं है।

इसके भी अपने कारण हैं- बसों के लिये तय बाई लेन में कालोनियाँ व सड़क के बाजारों की पार्किंग बनी है, सो बस चाहकर भी उस लेन में नहीं चलती, बसों के टाईम टेबल पर ध्यान देने वाला कोई नहीं हैं, सो एक ही रुट की बसें कई बार आगे-पीछे एक दूसरे से रेस लगाती हैं।

फिर लो फ्लोर बसों के चालक ठीक से प्रशिक्षित नहीं है और वे बस स्टाप से सटकर बस लगाने में अक्षम है, वहीं अधीर जनता भी बस स्टाप से पदो मीटर आगे खड़ी होकर बस का इन्तजार करती है। यही सब सड़कों पर जाम के कारण हैं व बीएस- 5 या 5 मानक के वाहन यदि क्षमता से अधिक भार या कम गति में चलते हैं तो उससे तिगुना प्रदूषण होता है। यानि वाहनों से निकले प्रदूषण को कम करने के लिये उनको कम-से-कम 40 की गति निर्बाध देने भी जरूरी है।

अकेले दिल्ली शहर में सम-विषम संख्या की कारों का संचालन सीमित करने, दुपहिया वाहनों पर कोई रोक ना होने, ढेर सारे वाहनों को छूट मिलने से यह तो तय है कि इस कदम से प्रदूषण कम हो या ना हो लेकिन आटो रिक्शा, टैक्सी वालों की मौज होगी। बसों व अन्य वाहनों में ओवरलोडिंग बढ़ेगी। इसका सीधा असर दुगने प्रदूषण के तौर पर सामने आएगा।

अभी तक दिल्ली में साँस लेने लायक हवा बनाने के प्रयास बेहद तात्कालिक व गैरदूरदर्शी हैं। हकीक़त में यदि हवा सुधारना है तो दिल्ली से सटे कम-से-कम पचास किलोमीटर के दायरे में वही कानून कड़ाई से लागू करने होंगे जो दिल्ली शहर के लिये हों। इसके लिये एक गुमनाम सी सरकारी संस्था ‘एनसीआर डेवलपमेंट बोर्ड’ को सक्रिय, जवाबदेह बनाना जरूरी है।

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