यूकाॅस्ट जल सम्बन्धित शोध परियोजनाएँ

Submitted by Hindi on Fri, 01/15/2016 - 13:26
Source
जल चेतना तकनीकी पत्रिका, जनवरी, 2013

River Filtrationउत्तराखण्ड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकाॅस्ट) की स्थापना वर्ष 2005 में देहरादून में हुई थी। इसके मुख्य उद्देश्य हैं - 1) शोध एवं विकास 2) विज्ञान लोकव्यापीकरण 3) उद्यमिता विकास कार्यक्रम तथा 4) हिमालयन सिस्टम साइंस आदि का राज्य में प्रचार-प्रसार करना। विगत 7 वर्षों से परिषद, विज्ञान लोकव्यापीकरण हेतु विभिन्न संगोष्ठियों, कार्यशालाओं, कान्फ्रेंसेज, समर स्कूल के माध्यम से वैज्ञानिक सोच उत्पन्न करने हेतु प्रयासरत है। परिषद राज्य के कोने-कोने में कार्यक्रमों का आयोजन करती है जिससे आम जनमानस को विज्ञान से रू-ब-रू कराया जा सके। परिषद द्वारा राज्य में शोध एवं विकास परियोजनाओं का संचालन विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रों में किया जा रहा है। परिषद राज्य में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डी.एस.टी.), भारत सरकार, नई दिल्ली की नोडल संस्था भी है। इस क्रम में परिषद डी.एस.टी., नई दिल्ली द्वारा वित्त पोषित परियोजनाओं का संचालन राज्य के अन्य विभागों जैसे उत्तराखण्ड जल संस्थान, देहरादून, उत्तराखण्ड अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण, देहरादून, उत्तराखण्ड पर्यावरण प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड, देहरादून, राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की, जी.बी. पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपने जर्मन सहयोगी, यूनिवर्सिटी आॅफ अप्लाईड साइंसेस, ड्रेस्डन, जर्मनी के साथ मिलकर कर रही है। परियोजना कार्यो में मुख्यतः पेयजल गुणवत्ता परीक्षण, पर्यावरण संरक्षण, ऊर्जा आदि विषयों पर कार्य किये जा रहे हैं। परियोजना के अतिरिक्त आम जन मानस तक परियोजना के कार्यों को पहुँचाने हेतु विभिन्न सेमिनार, संगोष्ठी, कार्यशालाओं का भी आयोजन किया जाता है। परिषद द्वारा संचालित, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित, राज्य हित में संचालित जल सम्बन्धी शोध परियोजनाओं का योजनावार संक्षिप्त विवरण इस लेख में समाहित है।

परिचय एवं उद्देश्य


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद एवं उत्तराखण्ड जल संस्थान द्वारा सम्पादित परियोजना में रिवर बैंक फिल्ट्रेशन आधारित तकनीक से नदी के सतही जल का प्राकृतिक शोधनकर शुद्ध पेयजल को प्राप्त किया जाता है। इससे पेयजल के पुनः शोधन की आवश्यकता नहीं रहती है क्योंकि इस जल में कोई जैविक एवं रासायनिक अशुद्धता नहीं पायी जाती है। इस तकनीक से पेयजल की गुणवत्ता के समाधान के साथ-साथ पेयजल योजनाओं को स्थायित्व भी प्रदान किया जाता है।

दिनांक 02 मार्च, 2010 को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा प्रथम चरण के अन्तर्गत चार माह की अवधि हेतु परियोजना की स्वीकृति दी गई थी। तत्पश्चात द्वितीय चरण हेतु परियोजना को तीन वर्ष हेतु 790.50 लाख की वित्तीय स्वीकृति दी गई।

उपरोक्त परियोजना हेतु यूनिवर्सिटी आॅफ एप्लाईड साइंसेस, ड्रेसडेन, जर्मनी से तकनीकी सहयोग प्राप्त किया जा रहा है व परियोजना के प्रथम व द्वितीय चरणों के अन्तर्गत पाँच स्थलों यथा: श्रीनगर, कर्णप्रयाग, सतपुली, अगस्तमुनि तथा रुद्रप्रयाग में उक्त तकनीकी का प्रयोग किया जा रहा है।

उद्देश्य


1. पर्वतीय क्षेत्रों में रिवर बैंक फिल्ट्रेशन तकनीक से जल की टर्बिडिटी व माइक्रोबियल्स, पैथोजैन्स को कम लागत से शोधन कर शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना।
2. राज्य में आर.बी.एफ. तकनीक से पेयजल योजनाओं के निर्माण हेतु उपयुक्त स्थल चयन के लिये आवश्यक जानकारी (तकनीकी ज्ञान) अर्जित करना।
3. पर्वतीय क्षेत्रों में आर.बी.एफ. तकनीक के प्रयोग से प्राप्त परिणामों को पूरे देश में व्यापक रूप से अपनाने हेतु नीति तैयार करना।

परियोजना के अन्तर्गत सम्पादित कार्य एवं उपलब्धियाँ


River Bank1. रिवर बैंक फिल्ट्रेशन आधारित तकनीक से कम लागत में सतपुली में 1400 LPM, अगस्तमुनि में 300 LPM, श्रीनगर में 576 LPM, कर्णप्रयाग में 800 LPM स्वच्छ पेयजल क्षेत्रवासियों को उपलब्ध कराया जा रहा है।
2. आर.बी.एफ. तकनीक से सतपुली में 7937, श्रीनगर में 31505, अगस्तमुनि में 5721 एवं कर्णप्रयाग में 8693 लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है।
3. परियोजना के पाँच स्थलों पर ग्रीष्म, वर्षा एवं शरद ऋतु में पम्पिंग व रिकवरी परीक्षण तथा पेयजल गुणवत्ता के जीवाणु व रासायनिक परीक्षण के परिणामों का डाटा बैंक तैयार कर आर.बी.एफ. तकनीक आधारित पेयजल योजनाओं हेतु रूपरेखा तैयार की गई है व इसमें पाया गया है कि आर.बी.एफ. तकनीक से प्राप्त जल की गुणवत्ता ब्यूरो आॅफ इंडियन स्टैण्डर्ड (BIS) के मानकों के अनुसार है।
4. परियोजना के अन्तर्गत परिषद, उत्तराखण्ड जल संस्थान एवं यूनिवर्सिटी आॅफ एप्लाइड साइंसेस, ड्रेसडेन, जर्मनी द्वारा शुद्ध पेयजल हेतु आर.बी.एफ. तकनीक पर दो इंडो-जर्मन कार्यशाला का आयोजन वर्ष 2009 एवं 2011 में किया गया। कार्यशालाओं में जर्मनी, थाईलैंड, नीदरलैंड एवं कनाडा तथा आई.आई.टी. रुड़की, राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की, आई.आई.टी. मद्रास से आए वैज्ञानिकों ने प्रतिभाग किया व शोध सारांशों को ‘‘ड्रिकिंग वाटरः सोर्स, ट्रीटमेन्ट एण्ड डिस्ट्रीब्यूशन’’ नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित भी किया गया है।

इस (आर.बी.एफ.) तकनीक को राज्य के हित में प्रयोग कर पहाड़ी क्षेत्रों जहाँ पर शुद्ध पेयजल की किल्लत बनी रहती है, को शुद्ध पेयजल मुहैया कराया जा सकता है। आर.बी.एफ. तकनीक के माध्यम से राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल की समस्या को दूर किया जा सकता है व इससे पलायन को रोकने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जा सकती है।

Jerman Vaigyanikपरियोजना की सफलता से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली तृतीय चरण में आर.बी.एफ. तकनीक को राज्य के 100 से अधिक स्थलों पर स्थापित करने के लिये सहमत हो गया है व देश के अन्य क्षेत्रो में भी इस तकनीक को अपनाये जाने हेतु कदम उठाये जा रहे हैं।

परिचय एवं उद्देश्य


यूकाॅस्ट के निर्देशन में शुद्ध पेयजल को उत्तराखण्ड के जनमानस को उपलब्ध कराने के लिये विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा संचालित ‘जल तकनीकी पहल’ कार्यक्रम के अन्तर्गत शोध एवं अनुसंधान परियोजना में उत्तराखण्ड जल संस्थान, देहरादून तथा डी.ए.वी. महाविद्यालय, देहरादून द्वारा कार्य किया जा रहा है। इसके मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं-

1) राज्य स्तरीय जल गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशाला की देहरादून में स्थापना।
2) जल आपूर्ति स्रोतों में प्रदूषक तत्वों की आधुनिक उपकरणों से जाँच।
3) उत्तराखण्ड के ‘जल गुणवत्ता मानचित्र’ (Water Quality Map) का निर्माण।

परियोजना के अतंर्गत सम्पादित कार्य


1) भारतीय मानक ब्यूरो (बी.आई.एस.) द्वारा निर्धारित 26 जल गुणवत्ता मानकों द्वारा लगभग 500 स्रोतों की जाँच की जा चुकी है।
2) परियोजना के अन्तर्गत एटोमिक एब्जॉर्प्शन स्पेक्ट्रोफोटोमीटर तथा यू.वी. विजिबिल स्पेक्ट्रोफोटोमीटर की सहायता से पी.पी.एम. तथा पी.पी.बी. स्तर पर जल गुणवत्ता परीक्षण किये जा रहे हैं।
3) परियोजना में कार्यरत मानव संसाधन को प्रादेशिक व राष्ट्रीय स्तर पर जल गुणवत्ता मानकों व परीक्षणों हेतु आधुनिक प्रशिक्षण दिलाया गया है।
4) चिन्हित जल स्रोतों से वर्ष में दो बार प्री-मानसून व पोस्ट-मानसून सत्र में जल के नमूने एकत्र कर अन्तरराष्ट्रीय ए.पी.एच.ए. मानकों व विश्लेषण के तरीकों का प्रयोग किया जा रहा है।
5) प्रदेश के सभी 13 जिलों के कच्चे जल तथा सप्लाई जल के अत्याधुनिक परीक्षण हेतु सुविधा उपलब्ध करा दी गई है।
6) परियोजना के अन्तर्गत स्थापित प्रयोगशाला में रंग, गंध, स्वाद, टर्बिडिटी, पी.एच., टोटल हार्डनेस, आयरन, क्लोराइड्स, रेसिड्यूअल फ्री क्लोरीन, डिसोल्वड सॉलिड्स, कैल्शियम, कॅापर, मैग्निशियम, मैंगनीज, सल्फेट, नाईट्रेट, फ्लोराइड, फीनोलिक कम्पाउंड, कैडमियम, आर्सेनिक, लेड, जिंक, क्रोमियम, एल्केलिनिटी, एलुमीनियम तथा कॉलीफार्म बैक्टिरिया सहित कुल 26 जल गुणवत्ता मानकों का नवीनतम उपकरणों से परीक्षण किया जा रहा है।
7) परियोजना के द्वितीय चरण में गैस क्रोमेटोग्राफ तथा सहायक उपकरणों द्वारा कच्चे जल में मौजूद कीटनाशकों का परीक्षण शुरू किया जा रहा है। इसके साथ ही पेयजल में घुले हुये आॅक्सीजन तथा बायो कैमिकल आॅक्सीजन डिमांड जैसे कुछ अन्य जल गुणवत्ता मानकों का परीक्षण भी प्रारम्भ होने जा रहा है।

उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में परियोजना की मुख्य उपलब्धियाँ


1) राज्य स्तरीय जल गुणवत्ता परीक्षण व शोध प्रयोगशाला की स्थापना उत्तराखण्ड जल संस्थान, देहरादून के परिसर में की गई।
2) उत्तराखण्ड के 13 जिलों के जल स्रोतों की 28 मानकों हेतु अत्याधुनिक उपकरणों से द्विवार्षिक जाँच तथा जाँच के परिणामों का विश्लेषण कर शुद्ध पेयजल की उपलब्धता हेतु उत्तराखण्ड जल संस्थान द्वारा आवश्यक कार्यवाही की जा रही है।
3) परियोजना कार्य उत्तराखण्ड के जल गुणवत्ता मानचित्र की तैयारी की ओर अग्रसर है। अब तक किसी भी प्रादेशिक या केन्द्रीय संस्थान द्वारा ऐसा मानचित्र नहीं बनाया गया है।
4) स्वच्छ जल हेतु उत्तराखण्ड के 241 जल प्रबंधकों तथा अनुसंधानकर्ता के लिये अन्तरराष्ट्रीय तथा 2 राज्य स्तरीय जागरूकता तथा प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है।

परिचय एवं उद्देश्य


.यूकाॅस्ट एवं उत्तराखण्ड अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (उरेडा), देहरादून के संयुक्त तत्वाधान में इस लघु जल विद्युत परियोजना का निर्माण केदारनाथ, जिला रुद्रप्रयाग में किया जा रहा है। इस परियोजना के अन्तर्गत केदारनाथ में 100 किलोवाट क्षमता के दो लघु हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट स्थापित किये जा रहे हैं जिससे केदारनाथ धाम एवं उसके समीप के गाँवों तक बिजली पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।

परियोजना के अन्तर्गत सम्पादित कार्य


इस परियोजना के अन्तर्गत स्वदेशी तकनीक से बिजली बनाने के लिये दो क्रास फ्लो टरबाइन का इस्तेमाल किया जा रहा है। केदारनाथ में इस परियोजना से प्राप्त बिजली को केदारनाथ धाम एवं आस-पास के गाँवों में वितरित किया जाएगा। परियोजना हेतु स्थल के चिन्हीकरण का कार्य शुरू कर दिया गया है।

उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में परियोजना का महत्त्व


उपरोक्त परियोजना से कम लागत में केदारनाथ मंदिर, दुकानों, भवनों एवं ऊखीमठ तहसील के गाँवों को बिजली उपलब्ध कराना एक महत्त्वपूर्ण कदम है। सुदूर क्षेत्र होने के कारण इस परियोजना का विशेष महत्त्व है। परियोजना संयंत्र के स्थापित हो जाने के बाद यूरेडा द्वारा श्री केदारनाथ मंदिर समिति के कर्मचारियों को परियोजना के संचालन संबंधी प्रशिक्षण दिया जायेगा जिसके उपरान्त समिति द्वारा परियोजना का रख-रखाव व संचालन किया जायेगा। वर्तमान में वहाँ के लोगों को उपलब्ध हो रही विद्युत आपूर्ति में सुधार होगा।

परिचय एवं उद्देश्य


.यूकाॅस्ट एवं उत्तराखण्ड अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (उरेडा), देहरादून के संयुक्त तत्वाधान में इस लघु जल विद्युत परियोजना का निर्माण रांग कांग, जिला पिथौरागढ़ में किया जा रहा है। इसके अन्तर्गत रांग कांग में 50 किलोवाट क्षमता का एक लघु हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट स्थापित किया जा रहा है जिससे इस सीमांत जनपद के सुदूर क्षेत्र रांग कांग एवं नावी गाँवों को विद्युत सुविधा से लाभान्वित किया जा सके।

परियोजना के अन्तर्गत सम्पादित कार्य


इस परियोजना के अन्तर्गत स्वदेशी तकनीकों से बिजली की निरन्तरता बनाने के लिये दो क्रास फ्लो टरबाइन का इस्तेमाल किया जायेगा। परियोजना में हाईड्रो पावर द्वारा प्राप्त बिजली से पाँच गाँव लाभान्वित होंगे। परियोजना हेतु स्थल का चिन्हीकरण हो चुका है। परियोजना स्थल 6-7 माह, बर्फ से ढके होने के कारण परियोजना का कार्य वर्ष में केवल 5-6 माह तक किया जा सकता है। परियोजना में टेंडर, एग्रीमेंट एवं वर्क आर्डर का कार्य पूर्ण हो चुका है।

उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में परियोजना का महत्त्व


.रांग कांग के सुदूर क्षेत्र होने के कारण उपरोक्त परियोजना विशेष स्थान रखती है जिसके अन्तर्गत धारचुला ब्लॉक के पाँच गाँव को बिजली उपलब्ध हो सकेगी। रांग कांग परियोजना से कम लागत में बिजली उपलब्ध हो पायेगी जिससे वहाँ के क्षेत्रवासियों को लाभ होगा तथा क्षेत्र में वर्तमान विद्युत आपूर्ति की स्थिति में सुधार होगा।

परिचय एवं उद्देश्य


यूकाॅस्ट, सरदार भगवान सिंह पोस्ट ग्रैजुएट संस्थान, बालावाला, देहरादून तथा डी.ए.वी. महाविद्यालय, देहरादून के संयुक्त तत्वाधान में उपरोक्त परियोजना का संपादन राज्य की फार्मास्यूटिकल औद्योगिक इकाईयों के अपशिष्ट जल को उत्तराखण्ड के कृषि व औद्योगिक इकाईयों के उपयोग हेतु उपलब्ध कराने हेतु किया जा रहा है। परियोजना के मुख्य उद्देश्य निम्नवत हैं-

1) उत्तराखण्ड के सेलाकुई औद्योगिक क्षेत्र में पाँच फार्मास्युटिकल इकाईयों के अपशिष्ट जल के नमूने एकत्र करना तथा उनका विश्लेषण करना।
2) जटिल औद्योगिक निकासी जल के अपघटन हेतु सूक्ष्मजीवी (बैक्टीरियल व फंगल) की पहचान, पृथक्करण तथा क्रियात्मकता का अध्ययन करना।
3) फार्मास्यूटिकल औद्योगिक अपशिष्ट जल में जमा प्रदूषक तत्वों को दूर करने हेतु जैविक अपघटन प्रक्रिया तथा जैविक छलनियों (बायोफिल्टर) का प्रयोग।
4) केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के मानकों के अनुरूप औद्योगिक अपशिष्ट जल के शोधन/उपचार द्वारा सिंचाई योग्य तथा औद्योगिक इकाईयों में पुनः चक्रण में प्रयोग करने लायक जल के विकास हेतु कम कीमत/लागत की प्रक्रिया का विकास करना।

परियोजना के अन्तर्गत सम्पादित कार्य


सेलाकुई औद्योगिक क्षेत्र देहरादून की पाँच फार्मास्यूटिकल इकाईयों से निकलने वाले अपशिष्ट जल के निकटतम जल धाराओं में मिलने वाले स्थान का चिन्हीकरण कर लिया गया है, जहाँ से वर्तमान में प्रदूषित/अपशिष्ट जल के नमूने एकत्रित किये जा रहे हैं।

उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में परियोजना का महत्त्व


1) सेलाकुई, देहरादून स्थित फार्मास्यूटिकल औद्योगिक इकाईयों के अपशिष्ट जल में विभिन्न प्रकार के हानिकारक एवं जहरीले प्रदूषक तत्व जैसे फिनोलिक्स, साईनाइड, कार्बनिक विनायक, मरकरी, आर्सेनिक, क्रोमियम, लैड एवं भेषजीय सक्रिय यौगिक उपस्थित होने की प्रबल सम्भावना है, जोकि जल स्रोतों तथा मृदा प्रदूषण के लिये जिम्मेदार हैं। परियोजना के अन्तर्गत इसकी प्रमाणिक जानकारी एकत्रित कर उसका उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।

2) इन प्रदूषक तत्वों की फार्मास्यूटिकल औद्योगिक अपशिष्ट जल के नमूनों में उपस्थिति की उत्तराखण्ड में कोई भी प्रमाणिक जानकारी अथवा शोध सन्दर्भ उपलब्ध नहीं है। परियोजना से इस क्षेत्र में शोध एवं विकास को प्रोत्साहन मिलेगा।

3) उपचार की उपलब्ध तकनीकों में प्रमुख रूप से रसायनिक विधियाँ प्रयोग की जाती है, जोकि अन्य प्रकार के प्रदूषण उत्पन्न करती है। परियोजना के अन्तर्गत जैविक तकनीकीयों का प्रयोग कर उनके प्रयोग का परीक्षण किया जा रहा है जिससे कि शोधन प्रक्रिया से होने वाले प्रदूषण की समस्या उत्पन्न न हो सके।

परिचय एवं उद्देश्य


भारत सरकार की जलमणि परियोजना के अन्तर्गत यूकाॅस्ट द्वारा उपरोक्त परियोजना का सम्पादन किया जा रहा है। इस परियोजना के अन्तर्गत राज्य के चिन्हित 20 विद्यालयों में जल शोधक संयंत्र (वाटर प्यूरिफायर) लगाकर शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जाना है जिससे पानी से होने वाली बीमारियों से निजात पाई जा सकेगी। इस परियोजना में राज्य के गढ़वाल एवं कुमांऊ क्षेत्र के चयनित 20 विद्यालयों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के साथ ही वहाँ के जल की गुणवत्ता एवं शुद्धता के आँकड़े एकत्रित किये जायेंगे जिससे शोध एवं नियोजन कार्य हेतु उपयोग किया जायेगा।

परियोजना के अन्तर्गत सम्पादित कार्य


उपरोक्त परियोजना में प्रथम चरण का कार्य सम्पन्न हो चुका है जिसमें एस.सी.ई.आर.टी., नरेन्द्रनगर द्वारा चिन्हित 20 विद्यालयों में प्रदूषण नियन्त्रण अनुसंधान संस्थान, बी.एच.ई.एल. हरिद्वार द्वारा जल गुणवत्ता एवं शुद्धता का डाटा तैयार किया गया है। परियोजना के द्वितीय चरण की स्वीकृति भी परिषद को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा मिली है जिसमें विद्यालयों में जल शोधक संयंत्र (वाटर प्यूरिफायर) को स्थापित किए गए हैं। 20 विद्यालयों में प्यूरिफायर से डाटा एकत्रित करने हेतु प्रत्येक विद्यालय से एक शिक्षक को चिन्हित किया गया है।

उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में परियोजना का महत्व


. राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में पानी की शुद्धता एवं गुणवत्ता हेतु उपरोक्त परियोजना का राज्य की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप विशेष महत्त्व है। इस परियोजना में राज्य के गढ़वाल एवं कुमांऊ क्षेत्र के 20 विद्यालयों में विद्यार्थियों को शुद्ध पीने का पानी उपलब्ध हो पाएगा। इस परियोजना के परिणामों के आधार पर राज्य के अन्य विद्यालयों एवं संस्थानों में भी वाटर प्यूरीफायर स्थापित किये जा सकते हैं। इस परियोजना से पता चल सकेगा कि कौन से जल शोधक संयंत्र तकनीक किस क्षेत्र के लिये सहायक है तथा जल की गुणवत्ता कैसी है।

परिचय एवं उद्देश्य


एन.सी.एस.टी.सी., विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार द्वारा स्वीकृत इस अभियान को देश के अलग-अलग राज्यों में संचालित किया जा रहा है। उत्तराखण्ड राज्य में परिषद द्वारा इको वाटर लिटरेसी अभियान के तहत विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया गया जिसका उद्देश्य आम जन मानस को जल संरक्षण, स्वच्छता, कूड़ा प्रबन्धन, जल शुद्धिकरण सम्बन्धी जानकारी देना एवं उन्हें इस ओर जागरूक करना है ताकि लोग अपने संसाधनों को संरक्षित कर उनका सही तरीके से उपयोग कर सकें।

परियोजना के अन्तर्गत सम्पादित कार्य


यूकाॅस्ट द्वारा इस अभियान के अन्तर्गत विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन राज्य भर के विभिन्न स्थानों में किया गया। कार्यक्रमों के अन्तर्गत विभिन्न विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिये गोष्ठी, निबन्ध, पोस्टर आदि प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। जल प्रदूषणः दुष्प्रभाव एवं नियन्त्रण, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता प्रबन्धन, जल संरक्षण, जल/जैव विविधता आदि विषयों पर लोकप्रिय व्याख्यानों का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के आयोजनों में पीपुल्स एसोशिएसन आॅल हिल एरिया लान्चर्स (पहल), पिथौरागढ़, सोसाइटी आॅफ पाॅल्यूशन एण्डएन्वायरन्मेंट कंसर्वेशन सांइटिस्ट (स्पैक्स), देहरादून एवं विज्ञान प्रसार केन्द्रों द्वारा सराहनीय योगदान दिया जा रहा है।

उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में परियोजना का महत्त्व


उत्तराखण्ड देश के नवगठित राज्यों में से एक है जिसमें प्रचुर जल संसाधन उपलब्ध हैं। राज्य की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि प्रदेश की ज्यादातर जनता पहाड़ों में निवास करती है एवं यहाँ के आम जन मानस को जल संबंधी वैज्ञानिक तत्थों की अधिक जानकारी नहीं है। इस हेतु भारत सरकार का वाॅश, इको वाटर लिटरेसी अभियान अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। कार्यक्रम के अन्तर्गत पहाड़ों में निवास करने वाली जनता जिसमें विद्यार्थी, ग्रामीणों एवं आम जन का जल संरक्षण, जल प्रदूषण, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता प्रबन्धन, जैव विविधता आदि विषयों पर जागरूक करना है जिससे अपने सीमित संसाधनों को संरक्षित किया जा सके तथा उनका उचित दोहन भी हो सके।

पेयजल की गुणवत्ता के परीक्षण जल शोधन तकनीकों के प्रयोग व परीक्षण तथा इस दिशा में बहुआयामी शोध, जल गुणवत्ता एवं स्वच्छ व शुद्ध पेयजल के महत्त्व एवं उपयोगिता को लेकर जन चेतना के प्रचार प्रसार आदि कार्य उपरोक्त परियोजनाओं के अन्तर्गत परिषद द्वारा नियोजित अभियान के रूप में सहयोगी संस्थाओं व संगठनों के सहयोग से चलाये जा रहे हैं। आशा है कि राज्य के जनमानस को स्वच्छ, शुद्ध पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में इन प्रयासों के सार्थक व आशातीत परिणाम प्राप्त होंगे।

आभार


हम, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली का विशेष आभार व्यक्त करते हैं जिन्होंने उपरोक्त शोध एवं विकास परियोजनाओं हेतु वित्तीय सहयोग एवं आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान किया।

सम्पर्क
डा. राजेन्द्र डोभाल (महानिदेशक) एवं डा. डी.पी. उनियाल (वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी) उत्तराखण्ड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकाॅस्ट) 6, वसंत विहार, फेस-1, देहरादून, उत्तराखण्ड

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