तलछटीकरण एक चुनौती

Submitted by Hindi on Fri, 01/15/2016 - 14:55
Source
जल चेतना तकनीकी पत्रिका, जनवरी, 2013

तलछटीकरणआधुनिक युग में विश्व की सबसे महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय समस्याओं में से एक है - तलछटीकरण। विश्व की विभिन्न नदियों के रास्ते प्रतिवर्ष लगभग 13.5 खरब टन तलछट बहकर समुद्र में चले जाते हैं। नदियों में तलछट की यह मात्रा भू-अपरदन का परिणाम है। भू-अपरदन अनाच्छादन की वह प्रक्रिया है, जिसमें मृदा की ऊपरी सतह सामग्री अलग होकर प्रवाहित होती है।

भारत भी तलछटीकरण की समस्या से अछूता नहीं है। भारतीय नदियाँ, चाहे वह हिमालयी क्षेत्र से निकलती हो या प्रायद्वीपीय पठार से, तलछटीकरण की समस्या से ग्रस्त हैं। भारतीय नदियों में विश्व की सभी नदियों का लगभग 5 प्रतिशत जल बहता है परन्तु भारतीय नदियों के रास्ते विश्व के कुल तलछटों का 35 प्रतिशत भाग महासागरों तक जाता है। गंगा व ब्रह्मपुत्र नदी प्रतिवर्ष एक अरब टन तलछटों को महासागरों तक ढोती हैं जो महासागरों तक अन्य नदियों द्वारा ढोये गए कुल तलछट का लगभग 8 प्रतिशत है और विश्व के किसी भी नदी तन्त्र द्वारा ढोयी गई सबसे अधिक तलछट की मात्रा है। भारतीय नदियों में होने वाला यह तलछटीकरण यहाँ स्थित विभिन्न जलाशयों, सिंचाई प्रणालियों व जल विद्युत परियोजनाओं के लिये एक गम्भीर चुनौती के रूप में उभरा है।

.नदियों में तलछट की उत्पत्ति प्राकृतिक व मानवीय कारणों से होती है, परन्तु यह कह पाना मुश्किल है कि कितने प्रतिशत तलछटों की उत्पत्ति प्राकृतिक कारणों से और कितने प्रतिशत तलछटों की मानवीय कारणों से होती है। प्राकृतिक कारणों में मुख्यतः जलवायु, मृदा संगठन, धरातल, वनस्पति आदि कारक हैं, जो नदियों में तलछट की मात्रा बढ़ाने में सहायक हैं। भारत की हिमालयी क्षेत्र की नदियों और प्रायद्वीपीय भारत की नदियों में तलछट की मात्रा में अन्तर का एक मुख्य कारण प्राकृतिक सक्रियता है। हिमालयी क्षेत्र की नदियों में तलछट की मात्रा और अपरदन की दर से कहीं अधिक है। प्रायद्वीपीय भारत की कोई भी नदी ऐसी नहीं है जिसमें तलछट की मात्रा 1000 टन/वर्ग कि.मी. /वर्ष हो, जबकि हिमालयी क्षेत्र की अधिकतर नदियाँ ऐसी हैं जो 1000 टन/वर्ग कि.मी. /वर्ष की दर से भी अधिक तलछट उत्पन्न करती हैं। इसका मुख्य कारण हिमालयी क्षेत्र का अपेक्षाकृत नया होना और अभी भी उसका निर्माण की प्रक्रिया से गुजरना है। दूसरा, हिमालय क्षेत्र का अधिक भाग बलुआ पत्थर, शिस्ट और कोगंलोमरेट आदि चट्टानों से बना हुआ है जो भूगर्भ विज्ञान की दृष्टि से कमजोर और अस्थिर है। तीसरा, हिमालयी क्षेत्र विवर्तनिक क्रियाओं में भी अधिक सक्रिय है, जिसके कारण शैल खिसकाव, भूकम्प, भ्रंश आदि की सम्भावनाएँ बनी रहती हैं और जब भी ये क्रियाएँ घटित होती हैं तो नदियों में तलछट की मात्रा को निश्चित तौर पर बढ़ा देती हैं। चौथा, हिमालय पर्वतमाला विश्व की सबसे ऊँची पर्वतमालाओं में से एक है और अधिक ऊँचाई की वजह से अधिकतर क्षेत्र बर्फ से ढका रहता है, जिससे नदियाँ पूरे साल बहती हैं व अधिक मात्रा में तलछट प्रसारित करती हैं। दूसरी ओर प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ अपेक्षाकृत स्थिर भूगर्भिक दशाओं में बहती हैं। साथ ही वर्षा की कम तीव्रता और कम तापान्तर की वजह से इस क्षेत्र की नदियों में तलछट की मात्रा अपेक्षाकृत कम है। इस क्षेत्र में तलछट की मात्रा से जुड़ी अन्य विशेषताएँ, जैसे कि नदी विसर्प और तट-अपरदन आदि, सामान्यतः लुप्त हैं।

इसके अलावा मानव के विभिन्न क्रियाकलापों जैसे प्राकृतिक संसाधनों (जल, वन, खनिज) के दोहन व कुप्रबंधन ने भी नदी घाटी क्षेत्रों व जलाशयों में तलछटीकरण की समस्या को बढ़ावा दिया है। भारतीय हिमालयन क्षेत्र एक सघन आबादी वाला क्षेत्र है। जब कोई क्षेत्र सघन आबादी वाला होता है तो उस क्षेत्र की जनसंख्या का वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव भी अत्यधिक रहता है। इसलिये इस क्षेत्र की सघन आबादी ने यहाँ के वनों, कृषि क्षेत्रों, जल संसाधनों व घास के मैदानों का भरपूर दुरुपयोग किया है। इसके अतिरिक्त आधुनिक निर्माण प्रक्रियाओं जैसे बाँध निर्माण, सड़क निर्माण, खानें खोदना आदि ने भी विस्तृत स्तर पर वन क्षेत्रों और मृदा का विनाश किया है। इन सभी क्रियाओं ने इस क्षेत्र की नदियों में तलछट की मात्रा को बढ़ाया है। हिमालयन क्षेत्र में प्रति 10 मीटर सड़क के निर्माण में लगभग 1.99 टन तलछट प्रतिवर्ष उत्पन्न होते हैं। हिमालय के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में लोग स्थानांतरित कृषि करते हैं, जिसके कारण यहाँ लगभग 30,000 वर्ग कि.मी. भूमि बुरी तरह से अपरदित है। हाल ही के वर्षो में पूर्वी हिमालयन क्षेत्र में जनसंख्या की अत्यधिक वृद्धि और निर्माणकारी क्रियाओं ने यहाँ के वन संसाधनों को काफी क्षति पहुँचाई है, जिसने मृदा की जल सोखने की क्षमता को काफी सीमा तक प्रभावित किया है व नदियों में जल प्रवाह व तलछट की मात्रा को बढ़ाया है। उत्तराखण्ड के कुमायुँ हिमालय में रामगंगा की सहायक गौला नदी की तलछट मात्रा अन्य कई नदियों से काफी अधिक है, जिसका मुख्य कारण है - मानव हस्तक्षेप । इस नदी के जलग्रहण क्षेत्र में 1963 से 1985 के 22 वर्षों में 13.1 प्रतिशत वनों का ह्रास हुआ जिससे अपरदन की दर 170.3 से.मी./1000 वर्ष की दर तक बढ़ गई। इससे यह पता चलता है कि मानवीय सक्रियता नदियों व जलाशयों में तलछटीकरण बढाने वाले मुख्य कारकों में से एक है।

भारतीय नदियों से उत्पादित तलछट की मात्रा के परिणाम भयावह हैं। तलछटों के निम्नीकरण से भारत की औसतन ऊँचाई 22 मि.मी. प्रति शताब्दी की दर से कम हो रही है। कई नदियाँ तलछटीकरण की वजह से अपना रास्ता बदल लेती हैं और जान माल की हानि पहुँचाती है। नदी मार्ग में तलछट जमा होने के कारण बिहार की कोसी नदी बार-बार अपना रास्ता बदलती है जिसके कारण उसे ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है। नदियों में तलछट की अधिक मात्रा जल विद्युत परियोजनाओं के लिये भी एक खतरा है। नदी जल में तलछट की अधिक मात्रा टरबाईनों को हानि पहुँचाती है व विद्युत उत्पादन को प्रभावित करती है। भारतीय नदी घाटियों में प्रति वर्ष आने वाली बाढ़ों का एक मुख्य कारण भी नदी मार्ग में अत्यधिक मात्रा में जमा होने वाले तलछट ही हैं। अधिक तलछट से नदी की गहराई कम हो जाती है व चौड़ाई अधिक। ऐसी स्थिति में जब अधिक वर्षा होती है तो नदियों में पानी अधिक हो जाता है और आस-पास के क्षेत्रों में बाढ़ के रूप में फैल जाता है। तलछट का प्रभाव यहीं तक सीमित नहीं रहता, जब बाढ़ आती है तो उपजाऊ भूमि की ऊपरी परत पानी के साथ बह जाती है। भारत के कुल 329 मिलियन हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्रफल में से लगभग 127 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल भू-अपरदन का शिकार है।

अपरदन की दर अधिक होने से तलछट के जमाव की दर भी अधिक होती है जो जलाशयों के जीवन को अत्यधिक प्रभावित करती है। एक अनुमान है कि भारत में प्रतिवर्ष 5334 हजार मीट्रिक टन मृदा सतह से अलग होती है जिसके 10 प्रतिशत तलछटों का जमाव विभिन्न जलाशयों में होता है। जलाशयों में तलछट का जमाव उनकी जल भण्डारण क्षमता को, उनके जीवन काल और जल विद्युत क्षमता को प्रभावित करता है। सन 2050 तक भारत के कुल बाँधों में से 80 प्रतिशत बाँध ऐसे होंगे जो अपनी क्षमता का 50 प्रतिशत या इससे भी अधिक नष्ट कर चुके होंगे। भारतीय जलाशयों में तलछटीकरण की दर इनकी अनुमानित दर से अधिक रही है। मैथन बाँध जो 1956 में बना था, तब अनुमान लगाया गया था कि इसमें 163.38 टन/वर्ग कि.मी./वर्ष की दर से तलछट का जमाव होगा। परन्तु किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि इसमें जमा कुल तलछट 110206673.50 टन हैं जोकि 1321.45 टन/वर्ग कि.मी./वर्ष के हिसाब से जमा हो रहे हैं, जो अनुमानित तलछट के जमाव की दर का 8 गुणा से भी अधिक है। इसी तरह अन्य जलाशयों में देखी गई जमाव की दर उनकी अनुमानित जमाव की दर से कहीं अधिक है। निजामसागर बाँध में तलछट जमाव की दर उसकी अनुमानित जमाव की दर का 15 गुणा से भी अधिक है। इसके अतिरिक्त श्रीराम सागर जो 1970 में बना था, 1998 तक मात्र 28 वर्षों में ही अपनी आधी क्षमता तलछटीकरण के कारण खो चुका है। हिमालय के गिरीपद में स्थापित भाखड़ा बाँध में प्रतिवर्ष 35.8X106 मी3 तलछट जमा होते हैं, जिससे इस बाँध में 50 से.मी. तलछटों की मोटी परत प्रति वर्ष जमा हो जाती है।

.जिन जलाशयों का अपवाह क्षेत्र अधिक परन्तु आयतन कम है उनका जीवन काल भी छोटा है। इसके विपरीत जिन जलाशयों का आयतन अधिक होता है, उनका जीवनकाल भी लम्बा होता है। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र के कोयना बाँध में तलछटीकरण की दर भी अधिक है परन्तु आयतन इतना अधिक है कि इसका जीवनकाल 2553 वर्ष आँका गया है। इस प्रकार जलाशयों का जलसंग्रहण क्षेत्र कम हो या अधिक उसका आयतन और उसमें तलछटीकरण की दर कम हो या अधिक - तलछटीकरण निश्चित तौर से जलाशयों के जीवन काल को और उनकी क्षमता को प्रभावित करता है।

जलाशय न केवल पानी के विशाल स्रोत का भण्डार बनाये रखते हैं बल्कि यहाँ एकत्रित पानी के जरिये समूचे वर्ष पेयजल, सिंचाई, जल विद्युत और उद्योगों को भी गति प्रदान करते हैं, जो किसी भी राष्ट्र के आर्थिक विकास के लिये महत्त्वपूर्ण हैं। जलाशयों की वजह से जहाँ एक और अनाज का उत्पादन बढ़ा है वही दूसरी और कुछ क्षेत्रों में सूखे व बाढ़ों से निपटने में भी मदद मिली है। अतः इन जलाशयों का रख-रखाव करना और इन्हें अच्छी हालत में रखना एक बड़ी चुनौती है। भारतीय जलाशयों में तलछटीकरण के भयावह परिणामों से बचने के लिये कुछ ऐसा करने की जरूरत है जिससे कि नदियों व जलाशयों में तलछट की मात्रा कम हो सके। अतः इसके लिये आवश्यक है तलछटीकरण को सीमित करने के प्रयास किए जाएँ। तलछटीकरण की समस्या को पूरी तरह से समझने के लिये और इसके समाधान के लिये सततपोषणीय विकास जरूरी है। इसके लिये पहले उन क्षेत्रों को जानने की जरूरत है जहाँ अपरदन और तलछटीकरण की समस्या अधिक प्रबल है। ये जानने के लिये विभिन्न नदी घाटियों का निरन्तर सर्वेक्षण जरूरी है। तलछटीकरण की इस समस्या से निपटने के लिये मृदा संरक्षण परिमापों और बाँध संचालित परियोजनाओं को लागू किया जाना जरूरी है। तलछट की समस्या को कम करने के लिये जलागम प्रबंधन कार्यक्रमों को विस्तृत स्तर पर लागू करने की भी जरूरत है। जलागम प्रबंधन में मानव भूमि और जल संसाधनों को अधिक बुद्धिमता से उपयोग करता है व जल के प्रवाह को नियंत्रित करता है, जिससे जल की अपरदन करने की क्षमता कम हो जाती है। जलागम प्रबंधन कार्यक्रम अगर सुव्यवस्थित ढंग से लागू किए जाएँ तो निश्चित तौर पर नदियों में तलछट की मात्रा को नियन्त्रित किया जा सकता है।

नदियों में तलछट की उत्पत्ति भू-अपरदन का परिणाम है। मानवीय क्रियाकलाप तलछटीकरण की समस्या को अधिक जटिल बनाते हैं। मृदा और जल को मनुष्य प्रकृति का मुफ्त में दिया गया उपहार समझता है और इसी कारण से वह समझ ही नहीं पाता कि इन संसाधनों का दुरुपयोग करके वह कितनी बड़ी गलती कर रहा है। पहाड़ी प्रदेशों में मानव वर्षा के जल को व्यर्थ में ही बहने देता है, यह बहता जल मृदा की उपजाऊ ऊपरी परत को भी बहा ले जाता है। मानव की मृदा अपरदन को रोकने की और कम करने की पुरजोर कोशिश निश्चित तौर पर नदियों और जलाशयों में तलछटीकरण की समस्या से राहत देगी, परन्तु इस समस्या को जड़ से मिटा पाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। मानव की लाख कोशिशें प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न तलछट को कम तो कर सकती हैं परन्तु पूर्णतया समाप्त नहीं। साथ ही तलछटों की उत्पत्ति, प्रवाह, जमाव, मापन, विश्लेषण और समाधान से सम्बन्धित विज्ञान अभी विकासशील अवस्था में है, जिसमें लगातार सुधार लाने की जरूरत है। मृदा और जल संसाधनों को संरक्षित करने के लिये जन-साधारण को निम्नलिखित पंक्तियों को ध्यान में रखना अति आवश्यक है-

‘‘अपने खेत का जल अपने खेत में, अपने खेत की मिट्टी अपने खेत में ।।’’

हम में से अगर प्रत्येक इन पंक्तियों को ध्यान में रखे तो निश्चित तौर पर भारत में तलछटीकरण की चुनौती को आसानी से रौंदा जा सकता है।

सारणी 1 हिमालय की नदियों में तलछट की मात्रा (टन/वर्ग कि.मी./वर्ष)

नदी का नाम

स्थान का नाम

तलछट मात्रा (टन/वर्ग कि.मी./वर्ष)

नदी का नाम

स्थान का नाम

तलछट मात्रा (टन/वर्ग कि.मी./वर्ष)

अरूण

त्रिवेणी

1201.32

भागीरथी

दौकारणी हिमनद मुख

2800

करनाली

चीसापानी

2897.59

भागीरथी

टिहरी

1946

सप्तकोसी

सोनाकुम्भी

1667.44

गौला

काठगोदाम

3703

सनकोसी

त्रिवेणी

2743.82

गंगा

फरक्का

1235

तमूर

त्रिवेणी

6121.94

यमुना

ताजेवाला

2128

त्रिशूली

टी.ब्रिज

2825.51

यमुना

दिल्ली

1035

बुड़ी

दिहांग

रोवांग

1758.74

मरूसुदर

तिलर

1177

दिबांग

तैगांव

2657.33

ऊज

पंचतिर्थी

8020

डिकरोग

डिकरंग घाट

2618.88

सपिती

खाब

1334

लोहित

ढिगरू घाट

3440.59

किन्नौर

वांगट

1597

मानस

मथौगूरी

775.46

गिरी

दद्हू

957

नौधींग

नमसाई

1499.25

चेनाब

बेंजवार

1597

सुबनश्री

भीमपुर ब्रिज

1100.41

चेनाब

प्रेमनगर

1363

तिस्ता

एंडरसन ब्रिज

9927.73

चेनाब

धमकुण्ड

1900

दिहांग

रंग घाट

802.48

चेनाब

सिरसी

939

चेनाब

कंठन

5242.00

चेनाब

कुरिया

878

 



सारणी 2 प्रायद्वीपीय पठार की नदियों से तलछट की मात्रा (टन/वर्ग कि.मी./वर्ष)

नदी का नाम

स्थान का नाम

तलछट मात्रा (टन/वर्ग कि.मी./वर्ष)

नदी का नाम

स्थान का नाम

तलछट मात्रा (टन/वर्ग कि.मी./वर्ष)

नर्मदा

जमातरा

648.71

झांजी

तातालगुरी

634.30

नर्मदा

गुरूदेश्वर

831.32

नर्मदा

ब्रह्माघाट

451.50

बराक

लक्खीपुर

461.31

नर्मदा

संडिया

343.65

गोदावरी

मनीचेरियल

144.16

नर्मदा

होसंगाबाद

534.40

गोदावरी

पोलावरम

129.74

नर्मदा

हांडिया

575.57

भीमा

ताकली

288.32

नर्मदा

मण्डेश्वर

499.76

तुंगभद्रा

बावापुरम

105.72

नर्मदा

राजघाट

533.90

कृष्णा

देवोसुगुर

533.39

बूरनेर

मोहगांव

952.60

पैनगंगा

पैनगंगा ब्रिज

355.59

बंजर

ह्रदयनगर

229.17

वैनगंगा

पौनी

538.19

शक्कर

गद्वाडा

701.25

वर्धा

बामनी ब्रिज

384.42

छोटा तवा

गिन्नौर

545.91

टोंस

पुरुवा प्रपात

197.02

औरसंग

चन्दवाड़ा

407.50

दिसांग

नौगलामारा घाट

759.24

दिक्खू

शिवसागर

629.49

 



सारणी 3 भारत के प्रमुख जलाशयों में तलछट की मात्रा

जलाशय का नाम

निर्माण वर्ष

अनुमानित तलछट जमाव की वार्षिक दर (टन/वर्ग कि.मी.)

जाँची गई तलछट जमाव की वार्षिक दर (टन/वर्ग कि.मी.)

भाखड़ा नांगल

1959

432.48

605.40

हीराकुण्ड

1956

254.68

360.73

मैथून

1956

163.38

1321.45

पंचेत

1956

249.88

1009.11

तुंगभद्रा

1953

432.48

658.32

म्यूराक्षी

1955

360.40

1657.82

गांधीसागर

1960

360.40

3370.01

रामगंगा

1974

432.48

1835.81

गोड

1966

360.40

1537.69

कंगसाबली

1965

326.76

374.81

दन्तीवाडा

1965

360.40

456.50

ब्यास इकाई-II

1974

432.48

1441.59

माताटिला

1958

144.16

442.09

निजामसागर

1931

28.83

660.73

ऊकाई

1971

148.96

1105.22

तवा

1974

360.40

1124.44

 



सारणी 4 भारत के प्रमुख जलाशयों में तलछट जमाव और उनकी क्षमता

जलाशय

निर्माण वर्ष

जलग्रहण क्षेत्र (वर्ग.कि.मी.)

जमाव की दर (मी.मी./वर्ष)

आधी क्षमता समाप्त (वर्ष)

जलाशय का जीवन (वर्ष)

श्रीरामसागर

1970

91750

0.62

1998

56

निजामसागर

1930

21694

0.64

1960

61

माताटिला

1956

20720

0.44

2018

124

हिराकुण्ड

1956

83395

0.66

2030

147

गिमा

1965

4729

0.80

2045

161

तुंगभद्रा

1953

28179

1.01

2019

132

पंचेतहिल

1956

10966

1.05

2021

130

भाखड़ा

1958

56980

0.60

2101

287

निम्न भवानी

1953

4200

0.44

2205

504

म्यूराक्षी

1954

1860

1.63

2054

201

मैथून

1955

6294

1.43

2031

152

गांधीसागर

1960

23025

0.96

2135

350

कोयनाबांध

1961

776

1.52

3228

2533

उपरोक्त सारणियों में दिए गए आंकड़े लेखकों द्वारा संकलित किए गए हैं।

 


सम्पर्क : डाॅ. ओमवीर सिंह
एसोसिएट प्रोफेसर, भूगोल विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र-136119, ई-मेलः ovshome@yahoo.com ; ovshome@gmail.com

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