जलवायु परिवर्तन : सूचना व जनसंचार तंत्र की भूमिका

Submitted by RuralWater on Sat, 01/16/2016 - 10:10


. विदित हो कि गत दो माह के दौरान जलवायु परिवर्तन के भिन्न पहलुओं पर मैंने कुछ अध्ययन, मनन और लेखन किया है, किन्तु मौसम विभाग के महानिदेशक डाॅ. लक्ष्मण सिंह राठौर एवं भारतीय कृषि अनुसन्धान केन्द्र के वैज्ञानिक डाॅ. एस. नरेश कुमार से हुई आकाशवाणी चर्चा के बाद मन बहुत उद्वेलित भी है और उत्साहित भी। इन्हीं भावों में विचरते रात भर नींद नहीं आई।

उद्वेलित इसलिये हूँ कि जलवायु परिवर्तन, जितने बदलावों का कारण बनने जा रहा है, वे इतने दुष्प्रभावपूर्ण तथा तेजी से व्यापक होने वाले हैं कि हमने यदि अभी से उपाय नहीं किये, तो सम्भलना मुश्किल हो जाएगा।

मैं स्पष्ट देख पा रहा हूँ कि जलवायु परिवर्तन, सिर्फ मौसम विज्ञानियों और पर्यावरणविदों की चिन्ता और चिन्तन का विषय नहीं रहने वाला; जल्द ही यह हमारे भूगोल, हमारी सेहत, वनस्पति, खेती, जैव विविधता, जलसंसाधन, उद्योग, व्यापार, रोज़गार, जीडीपी, सामाजिक विन्यास, उपभोग, विकास और अपराध नियन्ताओं की चिन्ता का विषय बनने वाला है।

आपदाएँ, कब क्या कर जाएँगी; आगे यह कहना मुश्किल होता जाएगा। जलवायु परिवर्तन के इतने विविध आयामों को सोचकर ही मैं हैरान-परेशान हूँ। इसका हर आयाम, एक विस्तृत तथा विशेषज्ञ शिक्षण की माँग करता है।

दुखद होगा कि सबसे ज्यादा दुष्प्रभावित हमारे गाँव, गरीब, उसका जल, खेती, मवेशी, चारा, रोज़गार, आर्थिकी और सामाजिक स्थिरता ही होंगे। पलायन, एक नई चुनौती बनकर उभरेगा। प्रकृति के दोस्त के रूप में कार्य करने वाली न मालूम कितनी जीवन प्रजातियाँ, इससे नष्ट हो जाएँगी; सिर्फ-और-सिर्फ मानव की कारगुजारियों केे कारण! ओह! हमारे कृत्यों का यह कैसा दुखद परिणाम होगा।

मेरा मानना है कि हमें जलवायु परिवर्तन को प्रकृति द्वारा मानव कृत्यों के नियमन कदम के रूप में लेना चाहिए और उसके नियमन आदेशों की पालना करनी चाहिए।

 

कृपया, इस दृष्टि से मेरे निवेदन पर विचार करें।


‘बदलती जलवायु: हम भी बदलें’ - इस विचार बिन्दु को केन्द्र में रखकर जलवायु परिवर्तन विषय पर एक चिन्तन/लेखन/प्रकाशन/संवाद की शृंखला शुरू करने के बारे में सोचें। शीर्षक क्या हो? शृंखला, किस रूप-स्वरूप में हो? यह तय करने के लिये आप स्वतंत्र हैं ही।

शृंखला को निम्नलिखित उप विषयों के अनुसार सुनिश्चित किया जा सकता है:
1. पृथ्वी और पृथ्वी की जलवायु।
2. जलवायु परिवर्तन - संकेतक, सम्भावित बदलाव, मानक और आकलन की तकनीक और सम्बन्धित विभाग।

(ऋतुओं की संख्या, अवधि, वर्षा का वितरण, गर्मी और सर्दी के बढ़ने-घटने की सम्भावनाएँ, तापमान में अधिकता व अचानक गिरावट की सम्भावना, हवाओं के वेग, आर्द्रता आदि पहलू)

3. जलवायु परिवर्तन के कारण?
(तीन मानव गतिविधियाँ: उत्सर्जन बढ़ोत्तरी, उपभोग का बढ़ना और अवशोषण का घटना। क्या हैं इनके लिये जिम्मेदार प्रमुख गतिविधियाँ, तकनीक, देश व वर्ग?)

4. जलवायु परिवर्तन: वैश्विक समझौता और भारत के लक्ष्य
यह लक्ष्य कैसे हासिल होगा? किस पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा? कारण और निवारण की दृष्टि से किसकी क्या भूमिका है? कारणों में कमी तथा दुष्प्रभावों से सुरक्षा के लिये क्या उपाय जरूरी है? इसके लिये किसकी क्या तैयारी है? क्या तैयारी और करने की जरूरत है? वह कैसे होगी? यह समझने-समझाने की दृष्टि से प्रथम चार कड़ियों के पश्चात आगे की कड़ियों को विशेषज्ञ कड़ियों के रूप में प्रस्तुत करना बेहतर होगा।

5. जलवायुु परिवर्तन और ईंधन
6. जलवायु परिवर्तन और बिजली
7. जलवायु परिवर्तन और कचरा प्रबन्धन व प्रदूषण उन्मूलन
8. जलवायु परिवर्तन और भूगोल (हिम क्षेत्र, मैदान, पहाड़, पठार, रेत, हवा और मृदा)
9. जलवायु परिवर्तन और जलसंसाधन (समुद्र, मेघ, भूजल, ग्लेशियर, नदियाँ तथा अन्य सतही जलस्रोत - प्रदूषण, मात्रा व समाधान के पहलू)
10. जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता (जैवविविधता पर प्रभाव तथा जैव विविधता घटोत्तरी का अन्य पर प्रभाव)
11. जलवायु परिवर्तन और कृषि-वानिकी (तापमान बढ़ोत्तरी में कृषि का योगदान, जलवायु परिवर्तन के कृषि-वानिकी पर दुष्प्रभाव, दुष्प्रभाव के कारण, दुष्प्रभाव से बचने के तौर-तरीके तथा किसानी व विज्ञानी स्तर पर अनुसन्धान, जनजागरण, शिक्षण, प्रशिक्षण व क्षमता विकास की तैयारी)
12. जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबन्धन
(आपदाओं का सम्भावित चित्र, जरूरी सावधानियाँ, तैयारी और सम्बन्धित कार्यतंत्र)
13. जलवायु जलवायु परिवर्तन और आर्थिकी (जीडीपी में योगदान करने वाले क्षेत्रों पर असर, महंगाई, ई बिजनेस, खुदरा व्यापार पहलू)
14. जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य (सम्भावित कुपोषण, महामारियाँ, प्रतिरोधक क्षमता और जरूरी तैयारी सम्बन्धी पहलू)
15. जलवायु परिवर्तन के सामाजिक दुष्प्रभाव-1 (बेरोजगारी, पलायन, जनसंख्या वितरण में बदलाव, वर्ग संघर्ष, अपराध में बढ़ोत्तरी तथा शिक्षा, नारी, आदिवासी, गरीब आदि पर असर का आकलन।)
16. जलवायु परिवर्तन के सामाजिक दुष्प्रभाव-2 (बेरोजगारी, पलायन, जनसंख्या वितरण में बदलाव, वर्ग संघर्ष, अपराध में बढ़ोत्तरी तथा शिक्षा, नारी, आदिवासी, गरीब आदि पर असर का आकलन।)
17. जलवायु परिवर्तन और भारतीय विकास माॅडल। (भारतीय प्राथमिकताएँ, शहरी विकास, ग्रामीण विकास, विकास की ऊर्जा व अन्य जरूरी संसाधन सम्बन्धी माँग तथा पूर्ति का सवाल तथा माॅडल में अपेक्षित बदलाव।)
18. जलवायु परिवर्तन: वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिये चुनौतियों के बिन्दु।19. जलवायु परिवर्तन: शासकीय भूमिका और तैयारी। (नीतिगत, आर्थिक और क्रियान्वयन की जरूरी तैयारियाँ कैसे हों)
20. जलवायु परिवर्तन: उपभोग घटाने और सदुपयोग घटाने में नागरिक भूमिका।
21. जलवायु परिवर्तन: सूचना व जनसंचार तंत्र की भूमिका, तकनीक व तैयारी।

आदरणीय, यदि नीतिगत तौर पर आप इस विषय पर थोड़ा भी काम करने का मन बना पाएँ, तो विस्तृत चर्चा हेतु यदि मेरा समय अपेक्षित होगा; मैं प्रस्तुत हो जाऊँगा।

आपके निर्णय की प्रतीक्षा रहेगी।

 

 

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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