‘गंगा कोई नैचुरल फ्लो नहीं’ : स्वामी सानंद

Submitted by RuralWater on Sun, 01/17/2016 - 15:58

स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद- प्रथम कथन


सन्यासी बाना धारण कर प्रो जीडी अग्रवाल जी से स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी का नामकरण हासिल गंगापुत्र का संकल्प किसी परिचय के मोहताज नहीं। जानने वाले, गंगापुत्र स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद को ज्ञान, विज्ञान और संकल्प के एक संगम की तरह जानते हैं। माँ गंगा के सम्बन्ध में अपनी माँगों को लेकर स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद द्वारा किये कठिन अनशन को करीब सवा दो वर्ष हो चुके हैं और ‘नमामि गंगे’ की घोषणा हुए करीब डेढ़ बरस, किन्तु माँगों को अभी भी पूर्ति का इन्तजार है। इसी इन्तजार में हम पानी, प्रकृति, ग्रामीण विकास एवं लोकतांत्रिक मसलों पर अत्यन्त संवेदनशील लेखक व पत्रकार श्री अरुण तिवारी जी द्वारा स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी से की लम्बी बातचीत को सार्वजनिक करने से हिचकते रहे, किन्तु अब स्वयं बातचीत का धैर्य जवाब दे गया है। अब समय आ गया है कि इस बातचीत को सार्वजनिक करें। इण्डिया वाटर पोर्टल (हिन्दी), प्रत्येक रविवार आपको इस शृंखला का अगला कथन उपलब्ध कराता रहेगा; यह पोर्टल टीम का निश्चय है।

 

इस बातचीत की शृंखला में पूर्व प्रकाशित संवाद परिचय को पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें...


पहला कथन आपके समक्ष पठन, पाठन और प्रतिक्रिया के लिये प्रस्तुत है :


.तारीख 01 अक्टूबर, 2013: देहरादून का सरकारी अस्पताल। समय सुबह के 10.36 बजे हैं। न्यायिक मजिस्ट्रेट श्री अरविंद पांडे आकर जा चुके हैं। लोक विज्ञान संस्थान से रोज कोई-न-कोई आता है। श्री रवि चोपड़ा भी आये थे। मैं पहुँचा, कमरे में दो ही थे, नर्स और स्वामी सानंद जी। 110 दिन के उपवास के पश्चात भी चेहरे पर वही तेज, वही दृढ़ता! ताज्जुब हुआ कि वजन जरूर घटा है, किन्तु न मानसिक, न शारीरिक.. किसी कमज़ोरी का कोई लक्षण नहीं। मैंने प्रणाम किया; स्वामी जी नेे भी उठकर अपना स्नेहाशीष दिया। हिण्डन नदी के कार्यकर्ता श्री विक्रांत शर्मा और हिन्दू अखबार के लिये लिखने वाली उनकी परिचित एक पत्रकार बहन भी मेरे साथ आई हैं; परिचय हुआ। जब तक वेे स्वामी सानंद से बातचीत कर वापस गए, मैंने नित्य कर्म निपटाया और वापस लौटकर पास रखी बेंच पर डट गया। बगल में निगाह गई; तीन किताबें देखी - 1. दौलत रास की दृष्टि में साहिबे कमाल - गुरू गोविंद सिंह। (प्रकाशक: गुरुमति साहित्य चैरिटेबल ट्रस्ट, बाज़ार माई सेघं, अमृतसर)

2. गुरू तेगबहादुर की जीवनी (लेखक : महन्त जगतराम एम.ए. हरिद्वार), प्रकाशक : गुरुद्वारा हेमकुण्ठ साहिब मैनेजमेंट ट्रस्ट, ऋषिकेश।

3. प्रकाशन विभाग, अद्वैत आश्रम, 5, डिही एण्टाली रोड, कोलकोता - 700014 द्वारा प्रकाशित ‘विवेकानन्द साहित्य (पाँचवाँ खण्ड)।

मैंने देखा कि तीसरी पुस्तक के पेज नम्बर 374 की कोर मुड़ी हुई है। सम्भवतः स्वामी जी यहाँ तक पढ़ चुके हैं। वह समझ गए; बोले- “आजकल विवेकानन्द साहित्य का हिन्दी वर्जन पढ़ रहा हूँ। एनर्जी कई माध्यमों से दी जाती है। मातृसदन आश्रम (कनखल, हरिद्वार) में गंगा से मिली। इसीलिये 110 दिन पूर्व मेरा वजन 55 किलो था; आज 110 दिन बीतने पर 45 किलो पर बना हुआ है।

आज भारतीय भी वेस्टर्नाइज्ड हो गया है। इसीलिये वह गंगा को नहीं समझ पा रहा। इफ यू वांट टू अंडरस्टैंड, तो विवेकानंद साहित्य पढ़ें; समझ जाएँगे कि वेद और उपनिषदों में भारत क्या है।

द वेस्टर्न पीपुल्स आर वैरी.....खैर, मैं कहता हूँ कि मत किसी को आरोप करो; खुद करके देखो। लोग तरह-तरह की बातें करते हैं। मुझे आवेश आ जाता है। द रिलेशन बिटविन मी एंड माई मदर एंड दैट वाज....दरअसल, मैं किसी को भी माँ और अपने बीच में नहीं लाना चाहता।’’

 

उत्तराखण्ड में जो हुआ, उसके लिये हम डिज़र्व करते हैं


मैंने बातचीत को स्वामी जी के दर्द से हटाकर, उत्तराखण्ड के दर्द की तरफ मोड़ा। उत्तराखण्ड में हुई तबाही पर उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही।

स्वामी जी इसे प्राकृतिक आपदा मानने को तैयार नहीं हैं। बोल उठे- “उत्तराखण्ड में जो हुआ, उसके लिये हम डिज़र्व करते हैं। लोग, केदारनाथ जी के दर्शन करने हेलीकॉप्टर में जाते हैं। पालकी और लम्बी-लम्बी गाड़ियों में जाते हैं। भागीरथी, अलकनन्दा में पिकनिक करने जाते हैं। यदि आप तीर्थयात्री हैं, तो पैदल क्यों नहीं जाते? गंगा-हिमालय ऊर्जा लेने जाएँ।’’

“अमरनाथ की यात्रा श्रावण प्रतिपदा में होती थी। सिर्फ एक महीने के लिये होती थी; अब आषाढ़ में होती है। बगल ही ढाल में लंगर और लंगर में चाउमिन दिया गया। यही सब खेल है, तो क्या हो? यही खेल, अमरनाथ शिवलिंग टूटने के दोषी हैं। दोषियों को सजा मिलनी चाहिए।’’

 

गंगा कोई नैचुरल फ्लो नहीं


बात घूमकर गंगा पर आई, तो स्वामी जी बोल उठे - “हरेक को समझना चाहिए कि गगा कोई नैचुरल फ्लो नहीं है। यह दुनिया की एकमात्र नदी है, जो कि इंसान के प्रयासों से आई। यह एक जीवित धारा है। रोगं, शोकं, तापं, पापं, हरै भगत कुमति कलापं।... अर्थात गंगा, एक ऐसा प्रवाह है, जो शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक बीमारी को हर लेता है। यदि आइसोटोप यानी रेडियोएक्टिव थेरेपी करनी हो, तो गंगाजल पीएँ।’’

 

यूनिक और स्ट्रेंज स्ट्रक्चर है बैक्टीरियोफॉज


मैंने जानना चाहा कि स्वामी जी, बाँध-बैराजों के खिलाफ क्यों हैं? पारिस्थितिकीय दृष्टि से भागीरथी मूल के क्षेत्र को संवेदनशील घोषित किये जाने के खिलाफ स्थानीय स्तर पर विरोध-प्रदर्शन किये गए हैं; बावजूद स्वामी जी अब आगे अलकनन्दा और मन्दाकिनी क्षेत्र को भी पारिस्थितिकी की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की माँग पर क्यों अड़े हैं? क्यों चाहते हैं कि उन पर भी कोई निर्माण न हो?

स्वामी सानंद का उत्तर था- “भागीरथी, मन्दाकिनी और अलकनन्दा के कारण ही गंगा का एक नाम तृपथा है। तीनों में एक सी गुणवत्ता मिली। यदि आगे गंगा में वही गुणवत्ता बनाए रखनी हो, तो अलकनन्दा और मन्दाकिनी क्षेत्र को भी इको सेंसिटिव घोषित करना होगा। जब तक सन्देह है, तो उसका निराकरण किये बगैर, तीनों धाराओं पर कोई निर्माण नहीं होना चाहिए। मैं कहता हूँ कि अलकनन्दा-मन्दाकिनी पर कोई सिद्ध करके मुझे दिखा दे कि बाँध से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

 

देखो, समझो कि बाँध से कैसे फर्क पड़ेगा।


गंगा में बैक्टीरियोफॉजेज पाये जाने के बारे में आपने सुना होगा। बैक्टीरियोफॉज, हिमालय में जन्मा एक अत्यन्त यूनिक...स्ट्रेंज स्ट्रक्चर है। बैक्टीरियोफॉज न साँस लेता है, न भोजन करता है और न रेपलिकेट करता है। उसके नेचर में ही नहीं है। बैक्टीरियोफॉज, अपने होस्ट में घुसकर क्रिया करता है। अब यदि उसे टनल में डाल दें या बैराज में बाँध दे, तो क्या वह प्रॉपर्टी बचेगी?’’

 

सिल्ट की प्रॉपर्टी को न भूलें


तपन चक्रवर्ती, नीरी के एक्स डायरेक्टर हैं। नीरी - जुलाई, 2011 की रिपोर्ट जो इस्टेबलिश करती है, वह है गंगा की बैक्टीरिया प्रॉपर्टी। पानी रखें, तो फाइन सिल्ट (अच्छी गाद) नीचे बैठती है। जो कॉपर और क्रोमियम से रिलीज होकर अलग हो जाता है; यह उस सिल्ट की प्रॉपर्टी है। डैम-बैराज के पीछे यह सिल्ट बैठ जाती है। इसलिये आगे के गंगाजल में यह प्रॉपर्टी नहीं रहेगी।

 

गंगासागर तक पहुँचे गंगा मूल का जल


स्वामी जी की बाँधों से जल छोड़ने के प्रश्न पर तर्क दिया- “आगे देखिए। हरिद्वार से गंगा का 90 प्रतिशत जल तो कैनाल में चला जाता है; शेष 10 प्रतिशत जो आगे जाता है, वह बिजनौर और नरोरा, राजघाट से सब डाइवर्ट हो जाता है। गंगोत्री से आई एक बूँद भी प्रयाग नहीं पहुँचती। यदि यह नहीं मालूम, तो काहे की गंगा पुत्र! भगीरथ तो गंगा को गंगासागर तक मिलाने ले गए थे; हम यूपी, बिहार, बंगाल तक भी न ले जा पाये; यह ठीक नहीं। गंगा में से नहर के लिये कितना पानी निकालें; ताकि एक फेयर पार्ट गंगासागर तक पहुँचे। यह तय करना जरूरी है।’’

 

गंगा के तीर्थ


प्रश्न था कि गंगा मार्ग के केवल कुछ स्थान ही तीर्थ क्यों हैं?

स्वामी सानंद का कथन- “सूर्य और ग्रहों की स्थिति का खास समय, खास क्षेत्र और खास कोण पर खास प्रभाव होता है। एक बड़ा कारण यह कि ऊपर से आई सिल्ट, टोपोग्राफी के हिसाब से कुछ खास लोकेशन पर जमा होती है। इन स्थानों पर जल की गुणवत्ता भी खास होगी।’’

 

आर्सेनिक का प्रश्न


“इसी तरह यदि बात करें कि गंगा घाटी में आर्सेनिक के मिलने की, तो प्रश्न है कि गंगा में आर्सेनिक कहाँ से आया? स्पष्ट है कि गंगा ही लाई होगी। डेल्टा में जमा होगा। नीचे की लेयर से ऊपर आया होगा। आर्सेनिक, यदि ऑक्सीडाइज्ड है, तो पानी में नहीं घुलता। यदि ऑक्सीडाइज्ड फॉर्म में नहीं है, तो पानी में घुल जाता है।

अब इसे समझिए। बंगाल में जूट-धान की खेती होती थी; होती थी न? जूट-धान की खेती में पानी खूब भरा रहता था; वह ऑक्सीजन के सम्पर्क में ऊँचाई तक। वही नीचे बैठता था। ग्राउंड में ऑक्सीजन रहती नहीं। अतः आर्सेनिक, पानी में घुलता नहीं था। मिट्टी में पड़ा रहता था; नीचे कार्बन के सम्पर्क में, रिड्युश्ड फॉर्म में। अब खेती बदली, तो खींचकर ऊपर आ गया; डवार्फ की जगह, लम्बे धान.. यही सब वजह बनी कि अब पेयजल में भी आर्सेनिक मिल रहा है।’’

“तिवारी जी, अब ऐसा करो कि तुम खा-पी आओ। लौटकर आओ, तो आगे बात करेंगे।’’ मैंने कलम जेब में रखी और बाहर निकल गया।

संवाद जारी...

अगले सप्ताह दिनांक 24 जनवरी, 2016 को पढ़िए श्री अरुण तिवारी की कलम से स्वामी सानंद गंगा संवाद यात्रा का दूसरा कथन


प्रस्तुति : अरुण तिवारी

 

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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