पानी : अनोखा यात्री

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Source
जल चेतना तकनीकी पत्रिका, जनवरी, 2013

लम्बी-लम्बी यात्रा करता,
रिसता बहता रहता है।

पानी एक अनोखा यात्री,
हरदम चलता है रहता।।

सागर से यह भाप रूप में,
बादल बनकर उड़ जाता।

और वायु के साथ-साथ ही,
दूर देश तक है जाता।

बर्फ, ओस, कहीं वर्षा बनकर,
जगह-जगह जमता गिरता।

और कहीं कुहरा सा बनकर,
इधर-उधर भागा फिरता।

कुछ उड़ता बन भाप धरा से,
बादल बनता है रहता।

पानी एक अनोखा यात्री,
हरदम चलता है रहता।।

कभी बिखरता आटा जैसा,
घास-फूस और आँगन में।

रूई के फाहे सा उड़ता,
फिरता हैवन-उपवन में।

घाटी-चोटी पर पर्वत की,
अथवा ठण्डे जल-थल में।

बन जाते हिमखण्ड बहुत से,
तैरें ये सागर जल में,
और पिघलता गर्मी पाकर,
धाराओं में है बहता।

पानी एक अनोखा यात्री,
हरदम चलता है रहता।।

छोटी-छोटी धाराओं से,
बनती नदिया छोटी सी।

छोटी-छोटी सी नदियों से,
बन जाती बड़ी नदी।

झरना बन घाटी से होकर,
मैदानों में फिर बहती।

सिंचित करके तटक्षेत्रों को,
सागर में जाकर मिलती।

जीवधारियों, हरियाली को,
जीवन देता है रहता।

पानी एक अनोखा यात्री,
हरदम चलता है रहता।।

झीलों, तालों और नदियों से,
धरती में रिसता जाता।

और वहाँ भी तरह-तरह से,
अपने करतब दिखलाता।

भू के भीतर रिसता बहता,
धारायें भी बन जाता।

आता जब अवरोध सामने,
फव्वारे सा फट जाता।।

विविध तरह से काम सभी के,
ऊपर आता है रहता।

पानी एक अनोखा यात्री,
हरदम चलता है रहता।।

आस-पास पेड़-पौधों के,
मिट्टी में मिलजुल रहता।

जल से लेकर पत्तों तक,
सारे पौधों में बहता।

धूप, खनिज, ऑक्सीजन से मिल,
बनता पौधों का भोजन।

इससे ही हरियाली रहती,
और इसी से ही जीवन।

पत्तों के रन्ध्रों से होकर,
बाहर उड़ता है रहता।।

पानी एक अनोखा यात्री,
हरदम चलता है रहता।।

सारे जग में होता क्रम से,
पानी का यूं बँटवारा।

विविध काम लोगों के आता,
मीठा और कहीं खारा।

पानी है भरपूर जहाँ पर,
ऐसे हैं अनगिनत स्थान।

जहाँ नहीं पानी जा पाता,
वहाँ हैं सूखे रेगिस्तान।

बूँद-बूँद पानी कहीं दुर्लभ,
और कहीं बहता रहता।

पानी एक अनोखा यात्री,
हरदम चलता है रहता।।

दिनेश चन्द शर्मा
साभार: विपनेट न्यूज़ (विज्ञान प्रसार)