सम-विषम, कहें तो फौरी खुशफहमी

Submitted by RuralWater on Sat, 01/23/2016 - 11:26
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 23 जनवरी 2016

पर्यावरण का संकट मानव सभ्यता के विकास से सम्बन्धित है। आधुनिक जीवन पद्धति और विकास की दिशा मनुष्य केन्द्रित है, जबकि मनुष्य असभ्य था, तो वह अपेक्षाकृत अधिक प्रकृतिस्थ था। असभ्य मनुष्य स्वयं को प्रकृति का हिस्सा मानता था। भारतीय दर्शन में इसे ही पंच महाभूत कहा गया। मनुष्य इसी पंच महाभूत का अंश है। किन्तु आधुनिक मानव प्रकृति को स्वयं के उपयोग के लिये उपलब्ध संसाधन मानता है।

पर्यावरण को लेकर पूरी दुनिया परेशान है। दिल्ली तो बेदम हुई जा रही है। साँस लेना दूभर हो रहा है। लेकिन दिल्ली ही क्यों, पूरा देश ही पर्यावरण प्रदूषण की चपेट में है।

शोध रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया के सर्वाधिक 25 शहरों में 13 शहर भारत के हैं। राजधानी दिल्ली इन 13 शहरों में अव्वल है। साँस से जुड़ीं अनेक समस्याओं के कारण जिन्दगी कठिन और मृत्यु आसान हो गई है। मरता क्या न करता। इसलिये दिल्लीवासी अब हवा को शुद्ध करने की जुगत लगा रहे हैं।

प्रदूषित हवा से बचने के लिये मास्क और शुद्ध हवा के लिये एयर प्योरिफायर लगा रहे हैं। पर्यावरण के नाम पर बहुत कुछ किया जा रहा है। जितना करते हैं, उससे ज्यादा प्रयास शेष रह जाता है। पानी सर के ऊपर आने के बाद लोटे से पानी उलीचा जा रहा है।

इससे पानी कम होने, जान बचने की गलतफहमी तो हो सकती है। इसी तरह का एक तात्कालिक उपाय दिल्ली सरकार ने निजी वाहनों को सम-विषम नम्बर प्लेट के आधार पर एक-एक दिन चलाने का नियम बनाया। लेकिन यह भी ढाक के तीन पात ही सिद्ध हुआ।

तकनीकी ख़ामियों की वजह से इस फार्मूले से कुछ खास लाभ होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। दरअसल, इससे प्रतिदिन चलने वाले वाहनों की संख्या भले कम हो गई हो, लेकिन वाहनों की तय की जाने वाली दूरी बढ़ गई।

और भी ऐसे कारण हैं, जो सम-विषम फार्मूले को निष्प्रभावी सिद्ध करने के लिये काफी हैं। फिर भी इसे केजरीवाल सरकार का एक तात्कालिक उपाय तो माना ही जा सकता है।

जब तक निजी वाहनों (कारों) का उत्पादन, कार ऋण योजना और नए वाहनों के पंजीयन आदि पर लगाम नहीं लगेगी तब तक सम-विषम योजना का यह प्रयोग टोटका ही सिद्ध होगा।

पर्यावरण के प्रति जब तक हमारी नीतियाँ प्रकृतिपरक नहीं होंगी, तब तक हमारा कोई भी प्रयास टोना-टोटका ही सिद्ध होगा। हमारे हर प्रयास से धरती या प्रकृति का नुकसान या कम नुकसान ही होगा।

जब तक समाज और सरकार की नीतियाँ मनुष्य के विकास पर केन्द्रित नहीं रहेंगी तब तक हम विनाश की ओर ही बढ़ते जाएँगे। पर्यावरण सम्बन्धी हमारी कोशिशों का असर सिर्फ इतना हो सकता है कि विनाश की ओर बढ़ने की हमारी गति थोड़ी कम-ज्यादा हो जाये। हम कार्बन का उत्सर्जन करते जाएँगे, ओजोन परत को नुकसान पहुँचाएँगे, धरती और वायुमंडल को कचरे का पात्र बना देंगे, विभिन्न प्रयोगों द्वारा अजैविक पदार्थों की बढ़ोत्तरी करते जाएँगे तो फिर पर्यावरण की कितनी ही बातें क्यों न करें, सब बेमानी होंगी।

अकेले दिल्ली में प्रतिदिन 800 टन प्लास्टिक कचरा उपयोग कर फेंक दिया जाता है। इसमें सिर्फ 5 प्रतिशत प्लास्टिक का ही पुनर्चक्रण हो पाता है। यही खिलवाड़ हवा के साथ भी हो रहा है।

धूल और निर्माण कार्य, कूड़ा जलाने, मोटर वाहन, वातानुकूलन के लिये उपयोग किये जाने वाले, डीजल जेनरेटर, फ़ैक्टरियों व कारख़ानों से उत्सर्जित वायु, कचरा और घरेलू उपकरणों से होने वाले प्रदूषण से दिल्ली सहित अन्य नगरों की फिजाँ बिगड़ रही है।

दोपहिया, तिपहिया और चौपहिया वाहन भारी तादाद में हैं, जबकि बसों की संख्या इनकी तुलना में बहुत ही कम है। जाहिर है कि प्रदूषण में बसों की हिस्सेदारी भी कम ही होगी। लेकिन यहाँ यह उल्लेखनीय है कि बसों की संख्या बढ़ने पर ही छोटे और निजी वाहनों की संख्या कम हो सकती है।

जब तक वाहन के लिये तेल का उपयोग होता रहेगा तब तक प्रदूषण को एक सीमित अवधि के लिये कम किया सकता है, लेकिन रोका नहीं जा सकता।

विकास की रूपरेखा से प्रदूषण बढ़ना तय


दरअसल, पर्यावरण का संकट मानव सभ्यता के विकास से सम्बन्धित है। आधुनिक जीवन पद्धति और विकास की दिशा मनुष्य केन्द्रित है, जबकि मनुष्य असभ्य था, तो वह अपेक्षाकृत अधिक प्रकृतिस्थ था। असभ्य मनुष्य स्वयं को प्रकृति का हिस्सा मानता था। भारतीय दर्शन में इसे ही पंच महाभूत कहा गया।

मनुष्य इसी पंच महाभूत का अंश है। किन्तु आधुनिक मानव प्रकृति को स्वयं के उपयोग के लिये उपलब्ध संसाधन मानता है। इसीलिये वर्तमान सरकारें प्राकृतिक संसाधनों के विकास के नाम पर, सभ्यता के विकास के नाम पर, मानव कल्याण के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन-शोषण कर रही हैं।

सभ्यता और संस्कृति के विकास के नाम पर मनुष्य उन पंच महाभूतों को ही नष्ट और प्रदूषित कर रहा है, जिससे वह निर्मित हुआ है। प्रकारान्तर से मनुष्य स्वयं के विनाश की ओर बढ़ रहा है। नीति-निर्माताओं ने विकास की रूपरेखा ऐसी तैयार की है, जिससे प्रदूषण बढ़ना तय है।

नीतियाँ वाहनों के अधिकाधिक उपयोग, कारखानों की स्थापना, आधुनिक उद्योगों की स्थापना, अपव्यय, अधिकाधिक संसाधनों के उपयोग को प्रश्रय देने वाली हैं। ऊर्जा का ज्यादा उपयोग विकसित होने का द्योतक है। विकास के अधिकांश द्योतक प्रकृति के विरुद्ध हैं। ग्रामीण और वनवासी अंचलों में प्रदूषण की समस्या कम है, तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि वहाँ का जीवन प्रकृति थोड़ा-बहुत निकट है।

आधुनिक विकास वहाँ कम है। तात्पर्य यह है कि जहाँ आधुनिक विकास अधिक है, वहाँ पर्यावरणीय संकट ज्यादा है। आधुनिक विकास ने सभ्यता के विनाश के बीज भी बो दिये हैं।

दिल्ली हो या कोई और नगर! अगर सभ्यता के विनाश को रोकना है, पर्यावरण प्रदूषण को रोकना है, तो एक ही उपाय है कि सभ्यता के विकास को प्रकृति केन्द्रित किया जाये।

मानवीय जीवन शैली प्रकृतिस्थ हो। मनुष्य प्रकृति से जितना ले, प्रकृति को उससे अधिक दे। विकास के नाम पर हम विनाश की ओर इतना आगे बढ़ गए हैं कि पीछे मुड़ना बहुत कठिन प्रतीत हो सकता है। लेकिन पीछे मुड़ने, वापस चलने के अलावा और कोई मार्ग नहीं है। भारत के प्राचीन शास्त्रों ने एक अविनाशी जीवन पद्धति दी है। इसमें प्रकृति के साथ तादात्म्य है।

परस्पर सामंजस्य है। एक-दूसरे के रक्षण की प्रतिबद्धता है। लेकिन यह आधुनिक विकास पद्धति, जीवनशैली को स्वीकार्य नहीं। दिल्ली की भी वही समस्या है, जो दुनिया की है। देश की राजधानी का पर्यावरण संकट भी आधुनिक विकास की देन है। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की सम-विषम योजना, समस्या का तात्कालिक और राजनीतिक समाधान है।

यह खुशफहमी पैदा करने वाली है। लेकिन पर्यावरण को सन्तुलन देने वाला समाधान तो सिर्फ भारतीय दर्शन में ही है। इन्द्र, सूर्य, धरती, वायु आदि की पूजा के बहाने पंचभूतों की आराधना ही पर्यावरणीय संकट का समाधान है।

लेखक मीडिया एक्टिविस्ट हैं।

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