सम-विषम का सामाजिक प्रदूषण

Submitted by RuralWater on Sat, 01/23/2016 - 12:16
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 23 जनवरी 2016

दिल्ली की आबादी के हिसाब से मोटे तौर पर एक-चौथाई से कुछ अधिक लोगों के पास ही गाड़ियाँ हैं। लेकिन वे सड़कों पर सबसे अधिक स्थान घेरते हैं। गली और मोहल्ले की सड़कें तो उनकी गाड़ियों के लिये पार्किंग स्थल में तब्दील हो ही गए हैं, मुख्य सड़कों को जाम से निजात दिलाने के लिये लगातार चौड़ा किया जाता है। पहले दिल्ली की कई सड़कों पर फुटपाथ और साइकिल चलाने वालों के लिये अलग जगह हुआ करती थी, धीरे-धीरे वे भी खत्म कर दी गई हैं। सड़क किनारे पेड़ तो लगातार काटे ही जा रहे हैं, जो हमारी हवा को कुछ शुद्ध करने में योगदान करते हैं। महात्मा गाँधी ने कहा था, ‘यह धरती हर किसी की जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन लालच नहीं।’ राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण की जानलेवा स्थिति से निबटने के लिये सड़क पर निकलने वाली गाड़ियों को नियन्त्रित करने के उपाय से क्या हासिल हुआ, इस पर विवाद की गुंजाईश है।

वायु प्रदूषण घटने नहीं, बल्कि बढ़ने के आँकड़े ही उपलब्ध हैं। हालांकि प्रदूषण पर नजर रखने वाले सुनीता नारायण के एनजीओ सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरनमेंट ने ज़रूर आँकड़ों से साबित करने की कोशिश की है कि जनवरी के पहले हफ्ते में प्रदूषण का स्तर जिस भयावह स्तर पर जाता रहा है, इस बार उससे अपेक्षाकृत कम बढ़ा।

लेकिन दिल्ली के लोगों ने फिर भी राहत महसूस की। उन्हें इसके एक दूसरे पहलू का शिद्दत से एहसास हुआ। राजधानी में वर्षों बाद सड़कों पर चलना सुगम हो गया। एक जगह से दूसरी जगह जाने का समय लगभग आधा हो गया। पैदल और साइकिल से चलने वालों को आसानी हो गई। बसों की रफ्तार बढ़ गई।

ऑटो और टैक्सी वाले भी खुश हो गए कि सड़कों पर जाम न होने से उनकी कमाई बढ़ गई और ईंधन की खपत कम हो गई। यह बिन माँगा वरदान जैसा था। लिहाजा, इस ओर भी ध्यान गया कि निजी वाहनों को बढ़ावा देना लोगों को सहूलियत और सुविधाजनक जीवन दिलाने का एकमात्र विकल्प नहीं है।

सार्वजनिक वाहनों पर ही हर हाल में जोर देना होगा, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोग अपने गन्तव्य तक पहुँच जाएँ और सड़कों पर वे ज्यादा जगह भी न घेरें।

इसके विरोध में भी आवाजें उठीं लेकिन अधिकांश उनकी ओर से जो अपनी गाड़ियों में चलने के आदी हो गए हैं, या जिन्हें अपनी गाड़ियों में न चलना हैसियत कम होने का एहसास दिला जाता है।

ऐसे लोग अदालतों में भी गए लेकिन सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने पहले ही इसकी उपयोगिता भाँप ली थी, और अपने साथी जजों के साथ गाड़ियाँ साझा करने की पहल शुरू कर दी थी।

शायद उनके रुख को देखकर ही दिल्ली हाईकोर्ट ने भी दिल्ली सरकार की सम-विषम अंकों पर खत्म होने वाले नम्बरों वाली गाड़ियों के लिये सड़कों पर अलग-अलग दिन उतरने के एक पखवाड़े के पायलट प्रोजेक्ट में दखल देना उचित नहीं समझा।

बाद में योजना के विरोधी सुप्रीम कोर्ट में भी पहुँचे मगर वहाँ भी उन्हें यही सुनना पड़ा कि लोगों की जान जा रही है, आपको अपनी सहूलियत की पड़ी है।

यह भी दलील दी गई कि इससे लोग दो-दो गाड़ियाँ खरीदने पर मजबूर हो जाएँगे और गाड़ियों की संख्या घटने के बजाय बढ़ जाएगी। इसकी मिसालें चीन के बीजिंग में दिख चुकी हैं।

कुछ वर्षों पहले जब वहाँ प्रदूषण घटाने के मकसद से यही सम-विषम फार्मूला लागू किया गया तो जाली नम्बरों से लेकर दूसरी गाड़ियाँ खरीदने तक के उपाय अपनाए गए।

वहाँ गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन पर भी एक तरह की पाबन्दी कारगर नहीं हुई तो आखिर में यह प्रयोग छोड़ देना पड़ा। इसी तरह लन्दन में भी जब सड़कें और सार्वजनिक स्थल पार्किंग स्थलों में बदलने लगे, लोगों का सड़कों पर पैदल चलना दूभर हो गया तो वहाँ इसके विरोध में ‘अकुपाय पब्लिक स्पेस’ जैसा आन्दोलन शुरू हुआ।

आखिर, सरकार को निजी गाड़ियाँ रखने को इतना ख़र्चीला बनाना पड़ा कि लोग खरीदने से बाज आएँ। यूरोप के कई देशों में ‘अकुपाय पब्लिक स्पेस’ जैसे आन्दोलन चलाए गए। यानि निजी वाहन और उनके जरिए अपनी अमीरी का प्रदर्शन बड़ी समस्या बनता जा रहा है।

इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाए बिना समस्याओं से निजात नहीं पाया जा सकता। वाहनों से वायु प्रदूषण तो बढ़ता ही है, अब यह एहसास भी गहराने लगा है कि निजी वाहनों से सामाजिक प्रदूषण में भयानक इज़ाफा होता है। इससे सार्वजनिक जगहों को ज्यादा-से-ज्यादा घेर लेन की प्रवृत्ति भी बढ़ी है।

सारी जगहों को घेरा गाड़ियों ने


दिल्ली में हमारे बाकी महानगरों के कुल योग से अधिक कारें हैं। फिर भी दिल्ली की आबादी के हिसाब से मोटे तौर पर एक-चौथाई से कुछ अधिक लोगों के पास ही गाड़ियाँ हैं। लेकिन वे सड़कों पर सबसे अधिक स्थान घेरते हैं।

गली और मोहल्लों की सड़कें तो उनकी गाड़ियों के लिये पार्किंग स्थल में तब्दील हो ही गए हैं, मुख्य सड़कों को जाम से निजात दिलाने के लिये लगातार चौड़ा किया जाता है।

पहले दिल्ली की कई सड़कों पर फुटपाथ और साइकिल चलाने वालों के लिये अलग जगह हुआ करती थी, धीरे-धीरे वे भी खत्म कर दी गई हैं। सड़क किनारे पेड़ तो लगातार काटे ही जा रहे हैं, जो हमारी हवा को कुछ शुद्ध करने में योगदान करते हैं।

इस समस्या से निजात दिलाने के लिये पिछले ढाई दशकों में दिल्ली को बाईपास नगरी बनाने का बड़ा अभियान शुरू हुआ है। ग़ौरतलब है कि दिल्ली की हवा में प्रदूषण का एक बड़ा कारण निर्माण गतिविधियाँ हैं और इनमें एक बड़ी वजह बाईपास और अण्डरपास वगैरह बनाने की परियोजनाएँ हैं।

दशकों से ये चल रही हैं और दिल्ली को जाम से निजात नहीं मिल सकी है। मतलब यह कि यह दिशा गलत है। वाहनों पर अंकुश लगाना ही असली विकल्प है।

दूसरा तर्क वाहन निर्माताओं का है। उन पर कोई अंकुश नहीं है। वे कारें बनाने और तरह-तरह विलासित वाली कारों में बढ़ोत्तरी करने को हमेशा तैयार रहते हैं, लेकिन बस और सार्वजनिक यात्री वाहनों के निर्माण से परहेज करते हैं।

पिछले वर्षों में जब दिल्ली सरकार बसें खरीदने को तैयार थी, तो कम्पनियों ने हाथ खड़े कर दिये कि ज्यादा बसों की आपूर्ति उनके बस में नहीं है। लेकिन इसी दौरान लगभग हर कम्पनी ने एसयूवी और तरह-तरह की लग्जरी गाड़ियों का निर्माण बढ़-चढ़कर किया।

आप अगर गौर करें तो पहले यह रवायत थी कि पेट्रोल तो निजी वाहनों के लिये होगा और डीजल सार्वजनिक वाहनों या किसानों के काम के लिये होगा। इसी मकसद से सरकार डीजल पर अधिक सब्सिडी भी दिया करती थी। लेकिन वाहन निर्माताओं ने डीजल गाड़ियाँ बनाकर लोगों को लुभाना शुरू कर दिया।

आज डीजल की एसयूवी को सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने का दोषी माना जा रहा है। सरकार भी इस पर मूक बनी रही। यही क्यों, डीजल का उद्योगों और शहरों में जेनरेटरों और मोबाइल टॉवरों में अधिक इस्तेमाल बढ़ गया। सरकार को पता था कि उसकी सब्सिडी का लाभ गलत जगहों पर जा रहा था।

हालांकि बाद में डीजल और पेट्रोल के दाम का अन्तर कम किया गया लेकिन इसका भी बोझ ज्यादा आम आदमी को झेलना पड़ा। दरअसल उदारीकरण के बाद ही निजी वाहनों और निजी समृद्धि के दिखावे की प्रवृत्ति बढ़ी है और सरकारी नीतियों ने ही इसे बढ़ाया है।

दिल्ली में एक वक्त बसों की व्यवस्था बिगाड़ने की कई कोशिशें हुई और लोगों को निजी वाहन खरीदने की ओर प्रवृत्त किया गया। लेकिन यह ऐसा लालच है जिसका बोझ, बकौल गाँधी जी, यह धरती बर्दाश्त नहीं कर सकती।

गाँधी ने जब ये बातें कही थीं, तब शायद इसका दंश उतना न दिख रहा होगा, लेकिन आज तो इसके लक्षण जलवायु परिवर्तन से लेकर कई रूपों में दिखाने लगी है। इसलिये इस प्रवृत्ति पर अंकुश के उपाय तलाशने से ही समस्याएँ मिटेंगी।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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