चुनौती को अवसर बना देने की गुंजाईश

Submitted by RuralWater on Thu, 01/28/2016 - 12:41
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 23 जनवरी, 2016

 

भारत में निरन्तर बढ़ते कूड़े के ढेर एक विकराल समस्या बनकर उभरे हैं। इसके लिये सिर्फ प्रणालीगत समस्या जिम्मेदार नहीं वरन वो तमाम पहलू हिस्सेदार हैं, जिनकी ओर पूर्ववर्ती सरकारों का ध्यान बमुश्किल गया था। आईआईटी के एक अध्ययन के अनुसार लोगों के बीच जागरुकता की कमी होना, लैंडफिल की जगह की कमी और जागरुकता के लिये मीडिया का पूर्ण इस्तेमाल ना होना भी इस समस्या के बढ़ने के कारण हैं। सन 1990 के बाद के दशकों में शहरीकरण तेजी से बढ़ा है। शहरों के रिहायशी इलाकों में बढ़ता अतिरिक्त बोझ, अव्यवस्थित शहरी विकास और बढ़ते उद्योगों का आलम यह है कि 2007 से 2015 तक आते-आते कूड़े का अम्बार 3,32,976 मीट्रिक टन हो गया।

भारत सरकार ने पिछले महीने एक घोषणा की जिसके तहत 4 जनवरी से देश के 75 शहरों में एक सर्वेक्षण कराया जाएगा जिससे स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबन्धन का संज्ञान लिया जा सके।

गौरतलब है कि यह सर्वेक्षण स्वच्छ भारत अभियान के तहत किया जा रहा है और भारतीय गुणवत्ता परिषद के मार्गदर्शन में हो रहा है। इसके परिणाम 25 जनवरी को घोषित किये जाएँगे।

यह स्वच्छ भारत अभियान की उस प्रतिबद्धता का द्योतक है, जिसमें 2019 तक देश के 83,000 शहरी वार्ड के हर घर से कूड़ा समेटने और उसके सही निपटारे की बात की गई है।

कूड़े की समस्या


भारत में निरन्तर बढ़ते कूड़े के ढेर एक विकराल समस्या बनकर उभरे हैं। इसके लिये सिर्फ प्रणालीगत समस्या जिम्मेदार नहीं वरन वो तमाम पहलू हिस्सेदार हैं, जिनकी ओर पूर्ववर्ती सरकारों का ध्यान बमुश्किल गया था।

आईआईटी के एक अध्ययन के अनुसार लोगों के बीच जागरुकता की कमी होना, लैंडफिल की जगह की कमी और जागरुकता के लिये मीडिया का पूर्ण इस्तेमाल ना होना भी इस समस्या के बढ़ने के कारण हैं।

सन 1990 के बाद के दशकों में शहरीकरण तेजी से बढ़ा है। शहरों के रिहायशी इलाकों में बढ़ता अतिरिक्त बोझ, अव्यवस्थित शहरी विकास और बढ़ते उद्योगों का आलम यह है कि 2007 से 2015 (महज आठ साल) तक आते-आते कूड़े का अम्बार 3,32,976 मीट्रिक टन हो गया।

यही स्थिति रही तो 2025 तक यह आँकड़ा 18 लाख मीट्रिक टन के पार हो जाएगा। सरकारी उदासीनता ही है कि इस कचरे का 70% हिस्सा लैंडफिल में सड़ने के लिये छोड़ दिया जाता है, जिससे मिथेन गैस पैदा होती है, जो ग्रीनहाऊस गैसों में शुमार है।

जैविक कचरे को अजैविक कचरे से अलग नहीं करने पर जमींदोज होने के कारण अजैविक रसायन भूजल को भी दूषित करता है।

यह तो रही ठोस अवशेष की बात। अगर इसमें रासायनिक कूड़ा, चिकित्सिकीय अपशिष्ट और इलेक्ट्रॉनिक कूड़े को शामिल कर दिया जाये तो एक ऐसी भयावह तस्वीर उमड़कर सामने आती है, जिसे अगर समय रहते सकारात्मक प्रयास रूपी रंगों से ना भरा गया तो देर हो जाएगी।

पाठकों को ज्ञात हो कि संयुक्त राष्ट्र की 2014 में एक रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट उत्पादक है।

यही नहीं भारत, चीन और पाकिस्तान आर्थिक फायदे की वजह से पूरे विश्व से आयात होने वाले जहरीले जहाजी मलबे के कब्रगाह हैं।

अफसोस कि तकनीक के अभाव में यह कूड़ा कुबेर नहीं बन पाता। उल्टा पर्यावरण को नुकसान जरूर पहुँचा जाता है।

कूड़ा या कुबेर


इन सारी विकट परिस्थितियों के बीच एक स्वाभाविक-सा प्रश्न उठता है कि जो कूड़ा या अपशिष्ट, तज्य योग्य है, बदबूदार है और जाति विशेष से जुड़ा है, को लोग आर्थिक लाभ का यंत्र क्यों मानें?

इस प्रश्न का जवाब शायद सफाई जगत से जुड़े उन उद्यमियों के उत्साह में मिल सकता है, जो स्वच्छ भारत अभियान की सकारात्मकता को 4,500 करोड़ रुपए के सफाई व्यापार और उद्योग में नई जान फूँकने वाला मानते हैं।

भारत में कूड़े का अर्थशास्त्र बतलाता है कि कूड़ा प्रबन्धन और रिसाइकिलिंग से जुड़े ज्यादातर लोग अनौपचारिक क्षेत्र से आते हैं। यह वह तबका है, जो नौकरी या घोर गरीबी के अभाव में यह काम करने को मजबूर होता है।

मौजूदा सरकार इस तबके के अनुभव को निजी सामाजिक भागीदारी के तहत सही रूप में दोहन करने में कामयाब होती है, तो यह कई लोगों की इज्जत की जिन्दगी प्रदान करेगा।

स्टार्टअप इण्डिया को इस योजना के साथ बखूबी जोड़ा जा सकता है। इससे एक तो नई नौकरियाँ पैदा होंगी। दूसरा, जैसे हर उत्पाद अपना बाजार तलाशता है, वैसे ही रिसाइकिल किये हुए उत्पाद भी अपना बाजार बनाने की ओर अग्रसर होंगे।

भारत में मौजूद दुनिया का सबसे अच्छा अनौपचारिक कूड़ा प्रबन्धन तंत्र है, मगर कार्य का सही मूल्य ना मिल पाने के कारण यह तंत्र निष्क्रिय-सा दिखाई जान पड़ता है।

अगर प्रत्यक्ष बाजार मुहैया करा दिया जाये तो किसी का कूड़ा किसी का संसाधन बन सकता है। दूसरी बात जैविक खाद को सरकार को अपना पुरजोर समर्थन देना होगा।

गाँवों में यह प्रयोग नया नहीं है। जैविक खाद से खाद और गैस का निर्माण आम बात है। हमें शहरों को इसके लिये तैयार करना पड़ेगा।

जैविक और अजैविक कूड़े को उसके स्रोत से ही अलग करने एकत्रित करने और सही ढंग से खाद बनाने के तमाम तंत्रों को दुरुस्त कर खाद का सही मूल्य तय करना होगा। सिक्किम के जैविक राह पर चलने का अनुसरण किया जा सकता है।

तीसरा सबसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु है, जो अपशिष्ट प्रबन्धन के दीर्घकालिक फायदों में शुमार है। कूड़े का ढेर बीमारियों के मुख्य कारणों में शुमार है।

अगर हम कूड़ा कम करने में कामयाब हो जाते हैं, तो ऐसी कई सारी बीमारियों में कमी आ जाएगी जिन पर हम मजबूरन खर्च करते हैं और जो लोगों को गरीबी रेखा से नीचे ढकेलने का मुख्य कारण हैं।

यह कोई आश्चर्य नहीं कि हर साल 6.3 करोड़ लोग स्वास्थ्य कारणों से गरीबी का दंश झेलने को मजबूर हो जाते हैं। अपशिष्ट प्रबन्धन से हम स्वच्छ भारत से स्वस्थ भारत की कल्पना कर सकते हैं।

आज नार्वे जैसे विकसित देश दुनिया भर से कचरा आयात करवा रहा है क्योंकि उसे कचरे को ईंधन के रूप में बदलने के आर्थिक फायदों पर यकीन हो चला है।

पूरे यूरोप में ‘यूरो ट्रैश’ नामक उद्योग को पंख लगाने यूरोपीय देश मैदान में कूद चुके हैं। प्रश्न है कि क्या हम तैयार हैं? कूड़ा प्रबन्धन के आर्थिक, स्वास्थ और पर्यावरणीय फायदों की सुनहरी आभा का एहसास कराने के पहले हमें जातीय जड़ता, समाजिक असमानता और सरकारी उदासीनता की लम्बी गहरी रात से होकर गुजरना पड़ेगा।

पेरिस में गत दिनों हुए समझौते के बाद शहरीकरण और औद्योगिकरण में और तेज़ी आएगी। इसलिये ये जरुरी हो जाता है कि कूड़ा प्रबन्धन की चाक चौबन्दी बढ़ा दी जाये।

शायद केन्याई नोबल पुरस्कार विजेता वांगरी मथाई के शब्दों में खजाने की चाभी छुपी हो पर्यावरण और अर्थव्यवस्था एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, अगर हम एक को नहीं बचा सके तो दूसरा भी नहीं बचेगा।

लेखिका, जेएनयू की शोधार्थी हैं।

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