उन्हें मुझसे सहानुभूति है, लेकिन गंगाजी से नहीं - स्वामी सानंद

Submitted by RuralWater on Mon, 02/01/2016 - 10:45
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स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद का तीसरा कथन आपके समक्ष पठन-पाठन और प्रतिक्रिया के लिये प्रस्तुत है :


.30 सितम्बर, 2013 : हित तीन तरह के होते हैं : एक-भौतिक पक्ष, दूसरा-दैविक पक्ष, जो मन, इच्छा...थिंकिंग से जुड़ा और तीसरा आध्यात्मिक पक्ष; यह सुप्रीम होता है। जैसे जब मैं जेल के हॉस्पिटल वार्ड में था, तो कुछ कैदी, स्वयं को रोगी बताकर भर्ती हो जाते थे। डॉक्टर जानते थे कि दर्द नापने का कोई थर्मामीटर नहीं है। यह दर्द, एक मानसिक पक्ष है।

आध्यात्मिक पक्ष..जैसे आत्मा के बारे में क्लियरिटी.. भारतीय दर्शन में जैसा है, वह आध्यात्मिक पक्ष है। गंगाजी का भौतिक पक्ष - इसमें जो गंगा जी का रोगनाशक पक्ष है, इसे कौन कोई समझता है; आजीविका को समझते हैं। इसीलिये गंगाजी का दोहन करना चाहते हैं।

 

नदी दोहन का पर्याय बना नदी विकास


आज का विकास, दोहन है। ग्राउंड वाटर डेवलपमेंट... पानी के एक्सप्लॉयटेशन को पानी विकास कहते हैं! नदी के एक्सप्लॉयटेशन को नदी विकास कहते हैं! डेवलपमेंट शब्द का मतलब ही एक्सप्लॉयटेशन हो गया है। दोहन, प्रकृति का विकास नहीं हो सकता। भारतीय संस्कृति, व्यावसायिक दोहन के पक्ष में कभी नहीं थी; बाकी लोग, सभी नदियों को एक तराजू पर रखना चाहते हैं। जितनी ज्यादा नदियों को जोड़े, उतनी ज्यादा मुश्किल बढ़ती जाएगी।

 

सब ग्रेड से ऊपर गंगाजी


सिंधु, नर्मदा, यमुना, कावेरी,............सात प्रमुख नदियाँ हैं। नदियों का भी ग्रेडेशन है; किन्तु हम यह कैसे भूल जाते हैं कि गंगाजी तो सब ग्रेड से ऊपर हैं। गंगा घाटी में रहने वाले कावेरी का जल लाने नहीं जाते, किन्तु गंगाजी का जल लेने के लिये लोग पूरी दुनिया से आते हैं। फिल्म में भी गीत है- ‘मैं उस देश का वासी हूँ, जिस देश में गंगा बहती है।’ ऐसे ही एक गीत है- छोरा गंगा किनारे वाला..’। ऐसा किसी और नदी को लेकर नहीं है।

 

उन्हें गंगाजी से कोई सहानुभूति नहीं


मैंने बहुत विचारा और लगा कि शासन-प्रशासन के लोग, ग्रेडिंग नहीं करना चाहते। स्थानीय लोगों का इंट्रस्ट भी गंगाजी की पवित्रता में नहीं, बल्कि गंगाजी से आमदनी में है। यदि ऐसा न होता, तो गंगाजी के किनारे होटल बनाने.. ऊँची-ऊँची इमारत बनाने से लोगों को कष्ट होता; किन्तु लोगों को कोई कष्ट नहीं है; क्यों?

एक समय पर मुझसे बात होती थी; अनुपम भाई से भी पूछा, तो कहा- ‘हाँ, गंगा में श्रद्धा तो है’, किन्तु अनुपम भाई नेे राजेन्द्र को भी कहा- ‘तुम भूजल पर काम कर रहे हो; कहाँ फँस गए जी डी के चक्कर में; गंगाजी में?’ इस सब से मुझे जो निराशा थी, वह वैज्ञानिकों से, पर्यावरणविदों से, सामाजिक कार्यकर्ताओं से.. निष्कर्ष में मैंने यह पाया कि मित्र के नाते उन्हें मुझसे सहानुभूति है, लेकिन गंगाजी के प्रति उनकी कोई सहानुभूति नहीं है।

 

पुख्ता हुई एक धारणा


यह निराशा मुझमें भरती गई। कई कहते थे कि जनान्दोलन होना चाहिए। वह मेरी सामर्थ्य नहीं है। मैं जानता था कि पहले तो उन संगठनों से जनान्दोलन खड़ा होना ही मुश्किल था; यदि हो भी गया, तो गंगा के उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा। इस तरह 2008 के शुरू में ही यह धारणा, मेरे मन में पुख्ता हो गई कि लोग मानसिक पक्ष को नकारकर, केवल फिजीकल पक्ष की बात देखते हैं। जब लोगों ने विवेकानंद जी तक से पूछ लिया था कि धर्म से क्या फायदा होगा, तो मैं क्या बताता? कोर्ट से भी कोई उम्मीद नहीं थी।

 

गाँधी विचार ने दिखाया अनशन मार्ग


आईआईटी आन्दोलनों में देखा था 100-150 की रैली का कोई प्रभाव नहीं होता। ज्यादा-से-ज्यादा घेराव कर सकते हैं; प्रदर्शन कर सकते हैं। मैंने देखा कि मेरे साथ तो इतने लोग भी नहीं। अन्ततः गाँधी जी का विचार मन में आया; अनशन -अकेले आदमी का हथियार; तो फिर मैंने रामनवमी, 2008 को चित्रकूट में संकल्प लिया कि मेरा बचा हुआ सब जीवन गंगाजी के लिये है। संकल्प लिया कि यदि परियोजनाएँ निरस्त नहीं होती हैं, तो गंगा दशहरा, 2008 यानी 13 जून को अनशन पर बैठ जाऊँगा।

इसी संकल्प के समय मैंने गंगा जी की समस्या और उपाय पर दो पेज लिखे। राहुल देव (दूरदर्शन) और संजय देव को दिये भी। मैं चाहता था कि इंडियन एक्सप्रेस के सभी एडिशन में छपे। मैं सोचता था कि साउथ इण्डिया के लोग मेरी बात को ज्यादा समझेंगे, उसमें खर्च की बात आई, तो मैंने नहीं किया।

 

आशा के आधार


अनशन के पीछे की पहली आशा थे- गिरधर आचार्य जी। 13 जून, 2008 का उत्तरकाशी का अनशन मैं, गिरधर आचार्य जी की प्रेरणा से कर रहा था। उनका कथन था कि मणिकर्णिका घाट पर न करूँ, विश्वनाथ मन्दिर पर करूँ। लेकिन वहाँ कोई शौचालय नहीं था। मणिकर्णिका के पास सुलभ शौचालय था; सो, मणिकर्णिका का स्थान तय किया। इस बात से गिरधर महाराज जी नाराज हो गए।

दूसरा बिन्दु था कि अनशन के पीछे एक इंस्टीट्युशन बन गया - ‘भागीरथी बचाओ संकल्प’; इण्डियन काउंसिल फॉर एन्वायरो लीगल एसोसिएशन थी....तो रवि चोपड़ा, राजेन्द्र, मेहता आदि को मिलाकर एक कोर कमेटी बना ली गई थी। इससे गिरधर महाराज और नाराज हो गए। वे चाहते थे कि वह खुद, प्रिया और मेहता की कमेटी बने। हालांकि उनके भक्त वहाँ रहे, लेकिन मेरे एक सप्ताह के अनशन के दौरान गिरधर महाराज जी उत्तरकाशी नहीं आये।

 

मिला समर्थन


हालांकि, मैं किसी ग्रुप के बन्धन में नहीं था; ज्योतिषपीठ के माधवाश्रम जी का लैटर पैड पर लिखा हुआ समर्थन आया। 15 को शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी का समर्थन आया। मुझे पता था कि वह, हरिद्वार में कैम्प कर रहे हैं। समर्थन पर बातचीत को लेकर राजेन्द्र जी के साथ बहनोई वहाँ गए। 17 जून को लौटे, तो स्वयं शंकराचार्य स्वरूपानंद जी आ गए। हर्ष था कि हरिद्वार से सिर्फ समर्थन देने वह स्वयं आये। उन्होंने सभा कर समर्थन दिया और अपने सन्यासी परिपूर्णानन्द को छोड़ गए। सुन्दरलाल बहुगुणा जी, पत्नी के साथ चार दिन तक आते रहे। बागपत के मशहूर भगतजी बालूशाही वाले देेवेन्द्र भगत भी अनशन पर साथ रहे।

 

देहरादून शिफ्ट कराने की शासकीय योजना


उधर 11 जून को खंडूरी जी ने उत्तरकाशी में पाला-मनेरी का शिलान्यास कर दिया था। उत्तराखण्ड में उस वक्त के चीफ सेक्रेट्री - एस.के. दास थे। उनसे मेरा, 1990 से सम्पर्क था। वह कभी सिर्फ मुझसे मिलने के लिये ही चित्रकूट आये थे। शासन, प्रशासन और डॉक्टर सब रेस्पेक्टफुल्ली आते थे। तीसरे दिन से कहने लगे कि पेशाब में टॉन्ट बॉडी आने लगी है। मेरी भतीजी डॉक्टर थी। उसने कहा- ‘मेरे सामने टेस्ट करो’, तो डॉक्टरों ने कहा कि उनसे कहा गया है कि देहरादून शिफ्ट कराना है।

 

खंडूरी जी का यू टर्न


15 जून को एस. के. दास का फोन आया; कहा कि खंडूरी जी मिलना चाहते हैं। मैंने मना कर दिया। 17 जून को हंसदेवाचार्य व परमार्थ निकेतन से चिदानन्द मुनि आये और चर्चा की। एक तरह से ये खंडूरी जी के भेजे हुए थे। 17 की ही रात को चिदानंद जी का मैसेज आया कि पाला-मनेरी और भैरोघाटी प्रोजेक्ट स्टेट के हैं, तो राज्य सरकार निरस्त करने को तैयार है।

( इसे यू टर्न कहना इसलिये उचित होगा, चूँकि अनशन की पूर्व चेतावनी के बावजूद, तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री खंडूरी जी ने अनशन शु्रू होने से चन्द दिन पूर्व ही वहाँ एक पनबिजली परियोजना का शिलान्यास किया था। - अ.ति.)

मैंने कहा कि इससे हमारा उद्देश्य पूरा नहीं होता। लोहारी नागपाला तो फिर भी बनेगा। उन्होंने कहा कि वह तो केन्द्र का है। मैंने कहा कि मैं उपवास खत्म नहीं कर सकता। हाँ, यदि राज्य सरकार मुझे पाला-मनेरी और भैरोघाटी प्रोजेक्ट निरस्त करने का पत्र भेजती है, तो मैं उन्हें धन्यवाद दूँगा और यह भी कर सकता हूँ कि आगे का उपवास दिल्ली में करूँ।

इसके पीछे एक वजह यह भी थी कि गिरधर महाराज की नाराजगी के कारण मैं अनकम्फर्ट फील कर रहा था। दूसरी वजह यह कि मेरा पूरा परिवार व साथी वहाँ पड़े थे और मैं कभी नहीं चाहता था कि अनशन की वजह से औरों को कष्ट हो। हालांकि मुझे उनके रहने-सहने का इन्तजाम नहीं करना था, फिर भी मुझे इसका कष्ट था। इस वजह से भी मैंने दिल्ली जाने के बारे में सोचा।

संवाद जारी...

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अगले सप्ताह दिनांक 07 फरवरी, 2016 को पढ़िए स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद शृंखला का चौथा कथन

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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