जल के उपयोग एवं प्रदूषण में उद्योगों की भूमिका (The role of industry in water use and pollution)

Submitted by Hindi on Mon, 02/01/2016 - 14:41
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Source
जल चेतना तकनीकी पत्रिका, जनवरी, 2014

जल समाचारदुनिया की बेतहाशा बढ़ती आबादी ने सम्पूर्ण विश्व में जल पर गहरा संकट उत्पन्न कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार यदि समय रहते हुए इस सम्पदा को बचाने के ‘भागीरथ’ प्रयास न किए गए तो अन्ततः इसके भंयकर परिणाम भोगने होंगे। ऐसे में यदि जल प्रदूषण को न रोका गया तो वह दिन दूर नहीं जब मानव जल की एक-एक बूँद को तरसेगा। ‘जल-पुरुष’ के नाम से प्रसिद्ध एवं वर्ष 2001 के मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित श्री राजेन्द्र सिंह जी का कहना है कि भारत के दो तिहाई भूजल के भण्डार खाली हो चुके हैं एवं जो बचे हैं वे प्रदूषित हो रहे हैं। नदियों का जल पीने योग्य नहीं बचा है। ऐसा ही चलता रहा तो आर्थिक विकास, प्रगति एवं समृद्धि जैसे फलसफे धरे के धरे रह जाएँगे।

जल की उपलब्धता एवं उपभोक्ता


नीला ग्रह कहे जाने वाली इस धरती पर तीन चौथाई भाग जल है। इसमें से 97.4 प्रतिशत जल खारे पानी के रूप में समुद्रों में तथा केवल 2.6 प्रतिशत जल ही शुद्ध रूप में हिमनदों एवं सतही तथा भूजल के रूप में विद्यमान है। इस 2.6 प्रतिशत जल का 1.984 प्रतिशत हिमनदों के रूप में है तथा केवल 0.616 प्रतिशत जल ही शुद्ध, स्वच्छ, तरल एवं सतही भूजल के रूप में उपयोग के लिये उपलब्ध है।

भारत में प्रतिवर्ष जल की उपलब्धता 1869 घन कि.मी. है तथा इसमें से 1123 घन कि.मी. जल ही विभिन्न कार्यों के प्रयोग में लाया जा सकता है। भारत का क्षेत्रफल विश्व के क्षेत्रफल का 2.5 प्रतिशत है तथा भारत में विश्व की 16 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है एवं भारत के पास जल संसाधन विश्व के जल संसाधन का 4 प्रतिशत ही है। अतः भारत में जल के प्रबंधन के लिये आवश्यक है कि उसकी विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ती माँग तथा प्रदूषण का आकलन कर उचित प्रबन्धन किया जाए। सिंचाई उद्योग जल का प्रमुख उपभोक्ता है। 87.9 प्रतिशत जल सिंचाई में, 4 प्रतिशत जल औद्योगिक क्षेत्र में तथा शेष जल घरेलू एवं अन्य कार्यों के उपयोग में लाया जाता है।

उद्योगों में जल का उपयोग


नए-नए तकनीकी विकास के कारण बढ़ते उद्योगों ने स्वच्छ जल की माँग बढ़ा दी है। उद्योगों में जल विभिन्न क्रियाओं में प्रयोग होता है जैसे, कच्चे माल की धुलाई में, कच्चे माल को तैयार करने में, उत्पादित माल की ढुलाई करने में, अपशिष्ट पदार्थ की निकासी के लिये एवं अन्य कार्यों के लिये। उद्योगों में जल की खपत का अभी तक सही-सही आकलन नहीं हुआ है। केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अनुसार भारत में औद्योगिक इकाइयाँ कुल उपयोग में आने वाले जल का 6 प्रतिशत भाग प्रयोग करती हैं जबकि केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के अनुसार यह आँकड़ा 8 प्रतिशत है। विश्व बैंक के अनुसार भारत के औद्योगिक क्षेत्र में 13 प्रतिशत जल प्रयोग में लाया जाता है। आँकड़े कुछ भी हों परन्तु जल की माँग प्रतिवर्ष 5.3 प्रतिशत की दर से औद्योगिक क्षेत्र में बढ़ने की सम्भावना है। जल संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार यह माँग वर्ष 1990 में बढ़कर 34 बिलियन घनमीटर हो गई तथा इसकी सम्भावना 2050 तक 143 घन मीटर होने की है। भारत में सिंचाई एवं उद्योगों में जल की खपत के आकलन को सारणी-1 मे दर्शाया गया है।

सारणी 1 :  भारत में सिंचाई एंव उद्योगों में जल की खपत का आकलन

वर्ग

वर्ष 1990 (अरब घन मीटर)

वर्ष 2010 (अरब घन मीटर)

वर्ष 2025 (अरब घन मीटर)

वर्ष 2050 (अरब घन मीटर)

सिंचाई

460

536

688

1008

उद्योग और ऊर्जा

34

41.4

80

143

स्रोत : विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सी.एस.ई.) (2004)

 


विभिन्न उद्योगों में जल की माँग अलग-अलग है। वर्ष 2004 के लिये विभिन्न औद्योगिक इकाइयों द्वारा जल की खपत को सारणी-2 में दर्शाया गया है।

सारणी 2 : वर्ष 2004 के लिये विभिन्न औद्योगिक इकाइयों द्वारा जल की खपत

औद्योगिक इकाइयाँ

उद्योगों में जल की खपत (प्रतिशत)

थर्मल पॉवर एवं ऊर्जा उद्योग

87.87

इंजीनियरिंग उद्योग

5.05

कागज उद्योग

2.26

कपड़ा उद्योग

2.07

इस्पात उद्योग

1.29

चीनी उद्योग

0.49

उर्वरक उद्योग

0.18

अन्य

0.78

कुल

100

स्रोत : विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र (सी.एस.ई.) (2004)

 


औद्योगिक इकाइयों की जल स्रोतों पर निर्भरता


विभिन्न औद्योगिक इकाइयाँ, विभिन्न स्रोतों जैसे भूजल, सतही जल एवं नगरपालिका के जल पर निर्भर रहती हैं। कुल औद्यौगिक इकाईयों का 41 प्रतिशत भाग भूजल पर तथा 35 प्रतिशत भाग सतही जल, जैसे झीलों, नदियों एवं तालाबों, पर एवं 24 प्रतिशत इकाइयाँ शहरी क्षेत्र के पास होने के कारण नगरपालिका से खरीदे जल पर निर्भर करती है। भारत में केवल 70 प्रतिशत औद्योगिक इकाइयों को जल सुगमता से एवं 17 प्रतिशत को कीमत चुकाकर तथा 13 प्रतिशत इकाइयों को जल सरलता से उपलब्ध नहीं होता।

जल प्रदूषण एवं औद्योगिक इकाइयों की भूमिका


जहाँ एक ओर औद्योगिक इकाइयाँ स्वच्छ जल का उपयोग कर रही हैं वहीं दूसरी ओर ये उसे प्रदूषित भी कर रही हैं। विश्व विकास संस्था की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में उद्योगों से निकले अपशिष्ट का 70 प्रतिशत जल बिना उपचार किए छोड़ा जा रहा है।

विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में विभिन्न उद्योगों द्वारा कुल मिलाकर 30729.2 मिलियन घन मीटर अपशिष्ट जल प्रतिवर्ष निकाला जाता है। विभिन्न उद्योगों द्वारा निकाले गए अपशिष्ट जल को सारणी-3 में दर्शाया गया है।

सारणी 3 : विभिन्न उद्योगों द्वारा निकले अपशिष्ट जल का विवरण

औद्योगिक इकाइयाँ

उद्योगों द्वारा निकाला गया अपशिष्ट जल (मिलियन घन मीटर)

थर्मल पॉवर एवं ऊर्जा उद्योग

27000.9

इंजीनियरिंग उद्योग

1591.3

कागज उद्योग

695.7

कपड़ा उद्योग

637.3

इस्पात उद्योग

396.8

चीनी उद्योग

149.7

उर्वरक उद्योग

56.4

अन्य

241.3

कुल

30729.2

स्रोत : विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र (सी.एस.ई.) (2004)

 

जल प्रदूषण एवं कारण


विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वच्छ जल वह जल है जो स्वच्छ, शीतल, स्वादयुक्त, गन्धरहित हो तथा जिसका पी.एच. मान 7 से लेकर 8.5 के मध्य हो। कोई भी बाहरी पदार्थ यदि जल के इस भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुण में इस प्रकार परिवर्तन कर दे जिससे कि वह प्राणियों, औद्योगिक संस्थानों आदि के लिये उपयोग में न आ सके तो वह जल का प्रदूषण कहलाता है। यह मूल रूप से दो स्रोतों से फैलता है - प्राकृतिक स्रोत एवं मानवीय स्रोत। प्राकृतिक रूप से कभी-कभी भू-स्खलन आदि के कारण खनिज पदार्थ, पेड़- पौधों की पत्तियाँ जल में मिलती हैं जिससे जल प्रदूषण होता है। इसके अतिरिक्त नदियों, झरनों, कुओं, तालाबों का जल जिन स्थानों से बहकर आता है या इकट्ठा रहता है, वहाँ की भूमि में यदि खनिज की मात्रा है तो वह जल में मिल जाती हैं। वैसे तो इसका कोई गम्भीर प्रभाव नहीं होता परन्तु यदि जल में इसकी मात्रा बढ़ जाती है तो वह नुकसानदेह साबित हो सकता है। जल में जिन धातुओं का मिश्रण होता है उन्हें विषैले पदार्थ कहते हैं जैसे - सीसा, पारा, आर्सेनिक तथा कैडमियम। इसके अतिरिक्त जल में बेरियम, कोबाॅल्ट, निकिल एवं वैनेडियम जैसी विषैली धातुएँ भी अल्प मात्रा में पाई जाती हैं। मानवीय स्रोत द्वारा यह निम्न कारणों से फैलता है - कृषि बहिःस्राव द्वारा, घरेलू बहिःस्राव द्वारा, वाहित मल द्वारा, औद्योगिक बहिःस्राव द्वारा, उष्णीय एवं तापीय प्रदूषण, रेडियोधर्मी तत्वों द्वारा, तैलीय पदार्थों द्वारा।

औद्योगिक बहिःस्राव द्वारा जल प्रदूषण


जल प्रदूषणप्रत्येक उद्योग में उत्पादन के बाद अनुप्रयोगी पदार्थ बचते हैं उन्हें अपशिष्ट पदार्थ कहा जाता है। इसमें लवण, अम्ल, वसा, रासायनिक पदार्थ जैसे विषैले पदार्थ होते हैं। यह अपशिष्ट अधिकांशतः कार्बनिक प्रकृति का होता है जो जीवाणुओं द्वारा अपघटित हो जाता है। परन्तु यह प्रक्रिया अत्यन्त धीमी गति से होती है जिससे जल में दुर्गंध आ जाती है। यह दुर्गंध युक्त विषैला मलबा नालियों द्वारा सतही जल, नदियों, झीलों आदि में मिलता है जिससे नदियों एवं झीलों का जल प्रदूषित हो रहा है।

अधिकांश उद्योगों में जल का भारी मात्रा में उपयोग किया जाता है तथा इनसे भारी मात्रा में अपशिष्ट पदार्थ भी बहिःस्राव के रूप में निकलते हैं। संयन्त्रों में जल की आवश्यकता के कारण ही उद्योगों को नदियों एवं जलाशयों के किनारे स्थापित किया जाता रहा है। इससे न केवल उद्योगों के लिये जल की आपूर्ति आसानी से होती थी वरन अपशिष्ट पदार्थों को जलाशयों में बहाने में भी आसानी होती थी। अपशिष्ट औद्योगिक पदार्थों में अनेक प्रकार के धात्विक तत्व, लवण, क्षार, वसा, तेल आदि रासायनिक तत्व विद्यमान रहते हैं, जिनको जलाशयों में बहाने से जल प्रदूषण की गम्भीर समस्या उत्पन्न हो जाती है। चमड़े के कारखानों, शराब बनाने के कारखानों, चीनी के कारखानों, कागज एवं लुग्दी के कारखानों, उर्वरकों के कारखानों, कीटनाशी उद्योगों तथा खाद्य संस्करण उद्योगों आदि द्वारा भारी मात्रा में अपशिष्ट पदार्थ जल स्रोतों तथा नदियों एवं जलाशयों में बहाए जाते हैं, जिससे अत्यधिक जल प्रदूषण होता है। जापान के मिनीमाटा शहर में क्यूशू द्वीप पर वर्ष 1950 की घटना में पारे से हुए जल प्रदूषण ने 5000 लोगों की जीवन लीला समाप्त कर दी थी तथा इससे 50000 लोग प्रभावित हुए थे।

कई औद्योगिक इकाइयाँ अपने मलबे को बाहर भूमि पर ढेर लगा देती हैं। वर्षा में इससे निकलने वाले पदार्थ वर्षाजल के साथ निस्सारित होकर भूजल को प्रदूषित करते हैं। कुछ औद्योगिक इकाइयाँ गर्मजल को बिना ठण्डा किए झीलों, नदियों, तालाबों आदि सतही जल स्रोतों में मिला देते हैं। केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड (2003) की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत की 18 बड़ी नदियाँ प्रदूषित हो गई है। उसका कारण है प्रतिदिन उद्योगों से लगभग 6.2 बिलियन लीटर अपशिष्ट निकलता है जो बिना उपचारण के किसी ना किसी रूप में सतही जल में मिलाया जा रहा है। यही कारण है कि गंगा क्रिया योजना (1985) तथा राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना इतने वर्ष बाद भी नदी जल प्रदूषण को रोक नहीं पा रही हैं।

विभिन्न उद्योग एवं प्रदूषण


भारत में जल प्रदूषण को जितना खतरा बड़ी औद्योगिक इकाइयों से नहीं अपितु लघु उद्योगों से है। एक रिपोर्ट के अनुसार जल में फैलने वाले कुल प्रदूषण का 40 प्रतिशत भाग छोटे एवं लघु उद्योगों द्वारा फैलाया जा रहा है। इसी का उदाहरण है - कानपुर में चमड़ा उद्योग से गंगा जल में प्रदूषण, पश्चिमी बंगाल में भूजल में आर्सेनिक प्रदूषण एवं चमड़ा, शराब, पटसन, कागज उद्योगों से प्रदूषित होता हुगली का नीला जल तथा दिल्ली के पास यमुना का प्रदूषित होता जल आदि।

धातु उद्योगों द्वारा पारा, साइनाइट, अम्ल, क्षार, आर्सेनिक सीसा, लोहा आदि रासायनिक पदार्थ जल के पी.एच. मान को असंतुलित कर देते हैं। जबकि इंजिनियरिंग उद्योग द्वारा लैड के प्रदूषण से विभिन्न रोग जन्म ले रहे हैं। उर्वरक उद्योगों से निकला यूरिया, फाॅस्फेट नाइट्रेट जल के बी.ओ.डी., सी.ओ.डी. को बढ़ा देते हैं तथा भारी धातु प्रदूषण भी फैला रहे हैं। तैलीय पदार्थों द्वारा समुद्र में मछलियों का जीवन खतरे में पड़ता जा रहा है। उद्योगों से निकला गर्म पानी झीलों एवं नदियों के जलीय जीवन को प्रभावित कर रहा है।

जल प्रदूषण के प्रभाव


इसके कारण जहाँ एक ओर 4 मिलियन लोग प्रतिवर्ष असमय काल के गाल में समा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इसको स्वच्छ करने के लिये लगभग 366 अरब रूपये के राजस्व की हानि हो रही है। जल प्रदूषण के कारण स्वच्छ जल के स्रोतों पर दबाव बढ़ रहा है जिससे अन्य क्षेत्रों में इसके उपयोग में कठिनाई हो रही है। जलीय जीव-जन्तुओं पर प्रदूषित जल का बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। जल प्रदूषण से जल में काई की अधिकता हो जाती है तथा आॅक्सीजन की कमी हो जाती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार एक लीटर जल में आॅक्सीजन की मात्रा इस समय 0.1 में यह 2.5 घन सें.मी. थी। जल प्रदूषण से प्रभावित होने वाले जन्तुओं में मछलियाँ प्रमुख हैं। लखनऊ की गोमती नदी में कारखानों द्वारा छोड़े गए प्रदूषित जल से नदी का जल इतना विषाक्त हो गया था कि जल के ऊपर मरी हुई मछलियाँ तैरती दिखाई देती थी। जल प्रदूषण का प्रभाव केवल मनुष्य ही नहीं अपितु पशुओं-मछलियों-चिड़ियों सब पर पड़ता है। प्रदूषित जल न पीने के योग्य, न कृषि के लिये और न उद्योगों के अनुकूल होता है। सबसे गम्भीर तथ्य है कि प्रदूषित जल, जलीय जीवन को नष्ट कर देता है, उसकी उत्पादन क्षमता को भी कम कर देता है। अंततः यह मनुष्य के जीवन के लिये अत्यन्त घातक है।

इस प्रकार उद्योग, जल प्रबन्धन को दोतरफा चुनौती दे रहे हैं। जहाँ एक ओर जल की बढ़ती माँग परेशान कर रही है वहीं दूसरी ओर फैलते प्रदूषण ने जल प्रबन्धन के लिये नयी-नयी चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। अतः आज सरकारी कठोर कानून एवं कड़े दण्ड की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त जन-जागृति भी एक विकल्प है। जल पुरूष श्री राजेन्द सिंह के अनुसार ‘जल के प्रबन्धन के लिये आवश्यक है मनुष्य एवं समाज को जल स्रोतों से जोड़ना’।

संपर्क - श्रीमति अंजु चौधरी, राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की, उत्तराखण्ड

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