महोबा का विजयपर्व है कजली महोत्सव

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'आल्हा-ऊदल और बुंदेलखण्ड' पुस्तक से साभार

महोबा का कजली महोत्सव केवल एक परंपरागत धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठान ही नहीं है बल्कि इसके साथ महोबा की आन-बान की रक्षा हेतु आल्हा-ऊदल के नेतृत्व में पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध सभी वीरों के हथियार उठाने और जान पर खेलकर अपनी लाज बचाने की स्मृतियाँ भी जुड़ी है।

महोबा का कजली महोत्सव केवल एक परंपरागत धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठान ही नहीं है बल्कि इसके साथ महोबा की आन-बान की रक्षा हेतु आल्हा-ऊदल के नेतृत्व में पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध सभी वीरों के हथियार उठाने और जान पर खेलकर अपनी लाज बचाने की स्मृतियाँ भी जुड़ी है। इसलिए रक्षाबंधन के पर्व पर आयोजित इस कजली महोत्सव में पूरा बुंदेलखण्ड एक साथ उमड़ पड़ता है।

इतिहास के कथा सूत्रों के मुताबिक उरई नरेश माहिल ही 1181 ई. में हुए इस युद्ध का सूत्रधार है। उरई नरेश माहिल जिस प्रतिहार वंश का उत्तराधिकारी था, वही प्रतिहार पहले महोबा के राजा थे। किंतु चंदेलों ने प्रतिहारों से महोबा के साथ ही उनके साम्राज्य के अधिकांश भाग छीन लिये। कभी चंदेल प्रतिहारों के सामंत थे किंतु अब प्रतिहार चंदेलों की कृपा पर जीवित थे। खुद माहिल को अपनी बहन मल्हना का विवाह चंदेल नरेश परमाल से करना पड़ा और उरई नरेश होते हुए भी उसे चंदेल राजवंश में मंत्री बनना पड़ा। माहिल अपने इस पुश्तैनी अपमान को कभी नहीं भूल पाया और उसने चंदेल सत्ता का विनाश करने हेतु क्रमश: चार युद्धों- कजली की लड़ाई, सिरसा की लड़ाई, नदी बेतवा और बैरागढ़ की प्रस्तावना लिखी। इन युद्धों से चंदेल लक्ष्मी का पराभव हुआ, चंदेलों और चौहानों के कमजोर होने से तुर्क भारत पर अधिकार करने में सफल हुए। माहिल का नाम आज भी उसके समकालीन जयचंद की तरह घृणा का पात्र है-

ताल बिगारे ते काइन ने और चुगलिन ने बिगारे गाँव
माहिल भूपत की चुगलिन से, बारा बॉट महोबा नाथ


पृथ्वीराज चौहान के मदनपुर लेख के अनुसार चौहान सेना के कुछ सैनिक घायलावस्था में महोबा पहुँचे। वहाँ उन्होंने उद्यान में कुछ समय के लिये विश्राम चाहा। माली के मना करने पर सैनिकों ने माली की हत्या कर दी। यह खबर जब दरबार में पहुँची तो माहिल और भोपति ने राजा को भड़काया कि अपराधी सैनिकों की हत्या कर दी जाय। किंतु ऊदर ने विरोध किया कि घायल सैनिकों की हत्या क्षत्रियोचित नहीं है। किंतु मतिशून्य परमाल ने ऊदल को ही सैनिकों को प्राणदण्ड देने हेतु भेजा। इसका प्रतिशोध लेने पृथ्वीराज महोबा आ धमका।

मदनपुर अभिलेख की उपरोक्त बातें सत्य होते हुए भी पूर्ण नहीं है। चंदेल एक समृद्ध साम्राज्य था। म.प्र. के भिण्ड जिले से लेकर वाराणसी तक का उर्वर क्षेत्र उसके अधीन था। चंदेल सत्ता के पराभव के बिना पृथ्वीराज का दिल्लीपति बनना अधूरा था, इसलिए चंदेल उसके निशाने पर थे। माहिल ने तो सिर्फ मौका दिया।

माहिल यह जानता था कि आल्हा-ऊदल जैसे शूरवीर महोबा में हैं तब तक परमाल का पराभव असंभव है, अत: वह इनके विरुद्ध हमेशा राजपद का कान भरता रहता था। एक दिन माहिल ने राजा से कहा कि आल्हा-ऊदल के पास उड़ने वाले घोड़े हैं, भुजबल इनके पास है ही, ये किसी समय आपसे राजपद छीन सकते हैं। परमाल तुरंत माहिल के झाँसे में आ गए, उन्होंने तुरंत ऊदल से अपने पाँचों उड़नघोड़े देने को कहा। किंतु ऊदल ने विनम्रता से यह कहते हुए मना कर दिया कि क्षत्रिय अपनी तलवार और घोड़ा किसी को माँगने पर नहीं देते, इन्हें केवल लड़ कर ही लिया जा सकता है। राजा परमाल को यह विनम्र इंकार भी अपने आदेश का उल्लंघन लगा। उसने तुरंत ऊदल को सपरिवार चंदेल साम्राज्य की सीमा से दूर जाने को कहा और ये तीन शर्तें रखीं- 1- अगर तुम महोबा का अन्न खाते हो तो समझो कि गोमांस खाते हो, 2- जल ग्रहण करते हो तो समझो गाय का खून पीते हो, 3- और अपनी पत्नी के साथ सहवास करते हो तो यह माँ के साथ सहवास होगा।

यह भादों का महीना था। यात्रा दुर्गम थी किंतु इन तीन शर्तों ने सबको किंकर्त्तव्यविमूढ़ कर दिया था। इसी समय परमाल पुत्र ब्रह्मा पहुँचे। आल्हा को लगा कि ब्रह्मा उन्हें मनाने आए हैं, किंतु ब्रह्मा का आना आग में घी था। ब्रह्मा ने राजवंश द्वारा प्रदत्त सभी वस्तुएँ लौटाने का फरमान सुनाया। बनाफरों ने यह भी मान लिया और ताला सैयद, ढेबा, देवला, बिरमा, सोनवां, फुलवा, चित्ररेखा-इंदल सबका काफिला महोबा से बाहर जाने को तैयार हुआ। ऊदल को इस समय महोबा की बहुत याद आ रही थी। वह एक बार जाकर जगनिक से मिलना चाहता था, रानी मल्हना को प्रणाम करना चाहता था, बहन चंद्राबल से गले मिलकर रोना चाहता था। किंतु ऊदल गली-2 घूमता रहा लेकिन राजा के आदेश से सबके दरवाजे बंद मिले। थका-हारा ऊदल कीरत सागर का पानी पीकर महोबा को प्रणाम कर अपने काफिले से जा मिला-

गलियन-गलियान फिरे बछेड़ा, कोनउ बात पुछइया नाइ
फाटक बंदी सबके घर में, राजा आज्ञा दई कराय
जगनिक जल्हन मन्ना गूजर, डौगर दौआ औ कल्याण
केसो पुरोहित देवा बरई, और परमाल रजा के द्वार
मल्हना रोक लेइ महुबे में, चन्द्रा हठ पकरे रह जाइ
ठाड़ी देखे सतखण्डा से, कोउ ने सेंत न पूंछी बात
मनियां देवता के मंदिर में, पहुँचो ऊदल करी प्रणाम
पीठ फेर लीन्हीं देवता ने, को असगुन को करे प्रणाम
पानी पी के सर कीरत का, मातृभूमि के चरण नवाय
नमक त्याग के चंदेलन को, कासा छोड़ महोबा क्यार


बनाफरों के साथ एक समस्या यह भी थी कि वो जाए कहाँ? क्योंकि चंदेलों के साम्राज्य विस्तार के क्रम में उन्होंने पड़ोस के सभी राजवंशों से बैर मोल ले लिया था। केवल कन्नौज ही ऐसा राजवंश था जिनसे मित्रता बरकरार थी। वहाँ का राजकुमार लाखन ससैन्य बनाफरों के साथ माड़ौ की लड़ाई में भी गया था। इसलिए कन्नौज का राजा जयचंद ही एकमात्र आश्रय था।

(उल्लेखनीय है कि प्राचीन काल में कन्नौज का एक गरिमापूर्ण इतिहास रहा है इसे कान्यकुब्ज कहा जाता था। रामायण काल में यह राजा बालि की नगरी रही है। कान्यकुब्ज का इतिहास सतयुग तक जाता था। सतयुग में इसे ‘महोदय’ कहा गया, त्रेता में ‘कुशस्थली’ फिर ‘गाधिपुरी’ और बाद में ‘कान्यकुब्ज’-कृते महोदयं नाम त्रेतायां च कुशस्थली।
पुन: गाधिपुरी जातं कान्यकुब्ज यत: परम।।


कन्नौज का बिलग्राम ही ‘बालिग्राम’ है। यह विष्णु का प्रिय निवास था। इसे गुह्यतीर्थ कहा गया। यही महाराज कुंशनाभ की सौ पुत्रियों जिन्हें पवनदेव ने कुब्जा बना दिया था, का पाणिग्रहण काम्पिल्य के ब्रह्मदत्त के साथ हुआ था। भरत की माता शकुंतला के पालनकर्ता कण्व के शिष्यों ने गंगातट पर कुब्जकपुष्पों से परिवेष्ठित कण्वकुब्जिका यहीं विकसित की। कालांतर में इसे कान्यकुब्ज कहा गया। कान्य और कुब्ज नामक दो भाई राजा राम द्वारा यज्ञ में आमंत्रित किए गए थे। यज्ञ स्थल पहुँचने पर कुब्ज को लगा कि राम ने ब्राह्मण वध किया है, अत: यज्ञ में सम्मिलित होना उचित नहीं है। फलत: कुब्ज लौट गए और कान्य ने यज्ञ में दानादि लिया और वहीं रह गए। कुब्ज के साथ जो लौट गए वहीं कान्यकुब्ज कहलाए और कान्य के साथी जो सरयूपार बस गए वही सरयूपारीण कहलाए।)

किंतु जयचंद भी बनाफरों को शरण देकर परमाल को अपना शत्रु नहीं बनाना चाहता था। अत: उसने शुरू में इन लोगों को शरण देने में आनाकानी की। किंतु जब उसकी कूट बुद्धि जगी तो उसे याद आया कि बनाफर चंदेलों की तरह उसके भी साम्राज्य विस्तार में योगदान दे सकते हैं। गॉजर, विजहट, कुड़हर और बिरियावाले हीरसिंह-वीरसिंह सब इस समय जयचंद को आँखे दिखा रहे थे। आल्हा-ऊदल इस समय जयचंद को उपयोगी हो सकते थे। उसने रिजगिरि रियासत और चंद्रगिरि का दुर्ग खुशी-खुशी उनके भरण-पोषण के लिये दे दिया।

अब माहिल के लिये मैदान खाली था। उसने तुरंत पृथ्वीराज को खबर भेजी। चौहान मौके की ताक में तो था ही, तुरंत रक्षाबंधन के मौके पर महोबा आ धमका। चौहान सेना ने महोबा के चारों तरफ अपना शिविर लगाया। इस घेरे से महोबा की स्थिति वैसे हो गई जैसे हार के बीच गला या बत्तीस दाँतों के बीच जीभ। सूपा, करहरा, पचपहरा, उर्मिल सागर, कल्याण सागर सब जगह दिल्ली सेना के बड़े-बड़े दल ठहरे। खुद पृथ्वीराज सालट-मालट के जंगलों में रुका। कलचुरियों ने भी चंदेलों से इसी समय अपना हिसाब किताब करना जरूरी समझा और चौहान की मदद के लिये उन्होंने भी अपनी एक बड़ी सेना भेजी जिसने चरखारी में अपना अड्डा जमाया।

महोबा पहुँचकर पृथ्वीराज ने राजा परमाल को अपनी शर्तें भेजी अथवा युद्ध का आमंत्रण दिया। उसने कालिंजर और ग्वालियर का किला, खजुराहो की बैठक, पारस पथरी, नौलखा हार सब एक साथ मांगा। लेकिन राकुमारी चंद्राबल का डोला इस फेहरिस्त की सबसे घृणित शर्त थी। चंद्राबल राजा परमाल की इकलौती पुत्री थी। उसका विवाह बारीगढ़ में राजा वीरसिंह यादव और सुंदरी के पुत्र इंद्रसेन से हुआ था। यह रियासत चंदेल साम्राज्य के अंतर्गत होते हुए भी लगभग स्वायत्त थी। लगभग 10 कि.मी. में फैला यहाँ का राजमहल एक बड़ी प्राचीर के अंदर है। इतनी लंबी बाड़ अन्य किसी किले में नहीं है। पृथ्वीराज चंद्राबल का विवाह अपने पुत्र ताहर के साथ करना चाहता था और यह विवाह भी कीरत सागर के तट पर होना था-

खजुहागढ़ की बैठक लिख दई, लिख दियो नगर ग्वालियर क्यार
पानन का लिखे नगर महोबा और सपरें के किरतुआ ताल
लिखी खदान पन्ना वाली, जहाँ हीरन के खुदे खदान
किला कालिंजर का लिख दीन्हों, घोड़ा हरनागर सो जान
पारस पथरी को लिख दीन्हों, लोहो छुवत सोन होइ जाइ
नाच को लिख दई लाखा पातुर, भूषन को नौलखा हार
डोला लिख दियो चंद्राबल को, ताहर संग करो विवाह
ताल किरतुवा मड़वा बनिहै, खम्भा बनिहै लोटन आम


ये शर्तें सुनते ही परमाल के हाथ-पाँव फूल गए। अब परमाल को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। आल्हा-ऊदल का निष्कासन उन्हें अब भारी पड़ रहा था। माहिल ने तुरंत सभी शर्तें स्वीकार करने और चंद्राबल का डोला देने का मशविरा दिया। परमाल भी इसी पक्ष में था। किंतु रानी मल्हना, राजकुमार ब्रह्मा, रंजीत और अन्य दरबारीगण आपे से बाहर थे। चंद्राबल को भरोसा था कि अगर यह खबर कन्नौज उसके ऊदल भैया के पास पहुँच जाए तो उसकी लाज बच जाएगी। लेकिन कन्नौज खबर जाए कैसे? पृथ्वीराज का सेनापति चौड़ा जब देखता कि महोबा के आस-पास में कोई चिड़िया उड़ रही है तो बाज छोड़कर उसे मरवा देता, जब कोई कुत्ता भौंकता तो तोप दगवा देता-

उड़ै चिरैया गढ़ महोबे में, चौड़ा बाज देत छोड़वाए
कुत्ता भौंके जो महोबा में, चौड़ा देत तोप दगवाय


लेकिन मल्हना ने एक युक्ति निकाली। उसने जगनिक के पुत्र जल्हन के माध्यम से पृथ्वीराज चौहान को पचास हजार पान, गुलाब, घोड़ों की भेंट भेजकर यह निवेदन किया कि पंद्रह दिन के लिये युद्ध को टाल दिया जाए। पृथ्वीराज ने क्षत्रिय धर्म का निर्वाह करते हुए पंद्रह दिन तक पुन: स्थगित रखने की शर्त मान ली। तब मल्हना ने एक मार्मिक पत्र जगनिक के माध्यम से आल्हा को लिखा और जल्द महोबा आने की गुहार की। मल्हना ने यह भी लिखा कि यदि आने में देर कर दी तो तुम्हें महोबा में केवल राख मिलेगी-

घर-घर महोबा पृथ्वी घेरा, फाटक बंद दियो करवाय
तुम बिन विपदा हम पर गिर गई, बेटा हमको होऊ सहाय
नगर महोबा जब लुट जैहें, तब का खाक बटोरबा आय
याही दिन को हम पालो है, को अइसन में अइहे काम
सो तुम छाए रहे कनवज में, हम पर परी आपदा आए
देखत चिठ्ठी के आवो तुम, राखा धर्म चन्देले क्यार


लेकिन जगनिक को देखते ही आल्हा-ऊदल भड़क उठे। घनघोर बारिश में भीगते हुए महोबा छोड़ना उनके कलेजे में धँसा था। महाकवि जगनिक अब अपना सारा रस-छंद भूले चुपचाप खड़े थे। ऐसे समय में आल्हा की माँ देवल देवी सामने आई। उन्होंने अपने पुत्रों को धिक्कारा, उनके राष्ट्रीय प्रेम की याद दिलाई। यहाँ तक सुना दिया कि, ‘‘मैं अब तक समझती थी कि मैंने शेरों को जन्म दिया है, लेकिन आज मुझे पता चला है कि मैंने गीदड़ जन्में हैं। मुझे इसका आभास पहले होता तो पैदा होते ही सूतिका गृह में तुम दोनों का गला दबा देती।’’ देवल देवी ने इस समय जो कहा वह आल्हखण्ड की सर्वाधिक बेशकीमती पंक्तियाँ हैं और शायद सबसे चर्चित भी जिसे स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए-

बारह बरस ले कूकुर जीवै, औ सोलह ले जिए सियार
बरस अठारह क्षत्रिय जीवै, आगे जीवन को धिक्कार
सदा तुरैया न बन फूलै, यारों सदा न सावन होए
स्वर्ग मड़ैया सब काहूॅ की, यारों सदा न जीवन होए


राजस्थान के इतिहासकार कर्नल टॉड ने देवल देवी के उपर्युक्त गुणों को देखकर उसे विश्व की सबसे वीर एवं चरित्रवान महिला माना है। माँ की फटकार सुनकर अंतत: आल्हा-ऊदल महोबा जाने को तैयार हुए। जयचंद ने लाखन और एक बड़ी सेना भी इनके साथ भेजी। राजकुमार लाखन उस समय नवविवाहित थे। नवोढ़ा कुसुमा ने बहुत कोशिश की, लेकिन लाखन तो मित्र ऊदल के साथ जीने-मरने की कसम खा चुका था। ये सभी सिरसा मलखान के पास पहुँचे। मलखान भी इनके साथ महोबा आया, ऐसा चंदबरदाई बताता है। ये सभी लोग जोगियों के वेश में करिया पठवा के पास आकर रुके। इन जोगियों ने अपनी पहचान तो उजागर नहीं की लेकिन रानी मल्हना से मिलकर यह बता दिया कि आप लोग बेफिक्र होकर कजली प्रवाहित करें और महोबा के नौजवानों से कहिए कि रक्षाबंधन का पर्व तब मनाएँ जब दुश्मन पीठ दिखाकर महोबा से भाग जाए।

पंद्रह दिन का समय पूरा हो चुका था। अब मल्हना के पास दो ही विकल्प थे- युद्ध अथवा समर्पण। उसने युद्ध चुना। राजदरबार में युद्ध का ताना-बाना रचा गया। पूर्व दिशा की सेना चरखारी के चक्रपान जगतेष के नेतृत्व में, दक्षिण यादव बंधु दौगड़ दौआ, उत्तर रावराय के नेतृत्व में रखी गयी। लेकिन पश्चिमी कमान का दायित्व लेने के लिये कोई तैयार न था। जगनिक थाल में पान का बीरा रखे सबको ललकार रहा था, लेकिन यहाँ कान्हराय और चौड़ा का कठिन मोर्चा था, इसलिए किसी का साहस न हुआ।

ऐसे कठिन समय में उरई नरेश माहिल का पुत्र अभई आ धमका। चंद्राबल उसकी सगी बुआ की पुत्री थी। बचपन से ही चंद्राबल उसकी प्रिय थी। उसका डोला दिल्ली जाए, यह अभई को सहन नहीं था। उसने थाल में रखा बीरा उठा लिया और महोबा की युवा शक्ति को ललकारा। माहिल को जब यह खबर लगी तो वह सिर पीटकर जार-जार रोने लगा। कहाँ तो उसने एक तीर से दो निशाने साधे थे कि चौहानों और चंदेलों के विनाश के उपरांत सारा उत्तरी भारत उसके कब्जे में होगा, लेकिन अभई ने उसका सारा खेल बिगाड़ दिया था। माहिल जानता था कि अभई की सारी वीरता पृथ्वीराज के सामने पंगु हो जाएगी, लेकिन अब तीर माहिल के हाथ से निकल चुका था। अभई और पृथ्वीराज कोई भी एक तिल पीछे हटने को तैयार नहीं था।

श्रावणी पूर्णिमा के दिन कीरत सागर के पाट पर भयंकर युद्ध शुरू हुआ। मोर्चे पर सबसे पहले अभई आया। वह आपे से बाहर था। लगता जैसे कोई दैवी शक्ति आज उसकी देह में उतर आई है। पृथ्वीराज का पुत्र सूरज और महायोद्धा टंक अभई के हाथों मारे गए। अभई के ऊपर नियंत्रण की सारी कोशिशें बेकार साबित हो रही थीं। अंत में पृथ्वीराज ने महावीर कान्हराय को भेजा। कान्हराय ने अभई को बहुत समझाया, युद्ध से विरत होने को कहा, जीतने पर पारस पथरी और महोबा का आधा राज्य भी देने को कहा, लेकिन अभई ने एक फटकार में ये लालच हवा में उड़ा दिए। उसी समय किसी ने धोखे से पीछे से आकर अभई की पीठ में भाला मार दिया। अभई के घायल होते ही चौड़ा की ललकार पर ताहर ने अभई का शीश काट लिया।

माहिल का सब कुछ लुट गया। अभई का बलिदान माहिल का पाप धो गया। श्री शिवानंद मिश्र ने अभई की लड़ाई और उसके युद्ध को बहुत खुबसूरत पंक्तियों में उकेरा है-

पर किसी नीच ने पीछे आकर भोंक दिया पैना भाला
माहिल सुत हुआ धराशायी, वह आन बान का मतवाला
सेनापति चौड़ा ने आगे बढ़कर ललकारा ताहर को
अभई का शीश काट लो, छोड़ो मत घायल नर नाहर को
ताहर का काल खड्ग चमका, सिर कटकर कुण्ठित हुआ नहीं
छल है, धोखा है, कुटिल नीति, युद्ध में धर्म है कहीं नहीं
जैसे ही रुण्ड कटा धड़ से, अभई का जाग्रत रुण्ड हुआ
उन अंधाधुन्ध प्रहारों से रणथल लोहू का कुण्ड हुआ
घमासान युद्ध में अभई राज दुलारा चिर निद्रा सोया
उस दिन जब माहिल रोया, बेत्रवती रोया, बिरंच रोया


अभई की मृत्यु के पश्चात परमाल के छोटे पुत्र रंजीत ने मोर्चा संभाला। किंतु कान्हराय से द्वंद युद्ध में रंजीत मारा गया। रंजीत और अभई की समाधियाँ महोबा के बंधान वार्ड में है।

दोनों की मौत की खबर सुनकर चंदेल सेना में भगदड़ मच गयी, राजमहल मल्हना और चंद्राबल के चीत्कारों से भर गया। किंतु परमाल के बड़े पुत्र ब्रह्मा ने सबको ढॉढ़स बंधाया, सैनिकों की स्वामिभक्ति को ललकारा। ब्रह्मा ने रानी मल्हना से कहा कि “सब लोग विष की छुरी और कटार लेकर कीरत सागर पहुँचो और कजली प्रवाहित करो। जीते जी दिल्ली मत जाना, मरने पर चील-कौएं हड्डियाँ भले ले जाएँ।” मल्हना सात सौ पालकियों के साथ कीरत सागर पहुँची। सभी पालकियों में विष कटार के साथ स्त्रियाँ बैठी थीं।

चौड़ा यह देखकर खुश हुआ कि रानी ने समर्पण कर दिया है। लेकिन तभी ब्रह्मा का तूर्य सुनायी पड़ा। भागी हुई चंदेल सेना फिर कीरत सागर उमड़ी आ रही थी। ब्रह्मा ने अपनी माँ से यह भी कह दिया कि जब तक मेरे घोड़े की हुँकार सुनायी देती रहे तब तक सब लोग गीत गाना और कजली प्रवाहित करना-

जब तक रण हुंकत रहो, घोड़ा करे उछाड़
तब तक मंगल गाइये कीरत सर की पार
हंक पाण लोपै जबै, थके जो भुजबल मोर
रज राखो चंदेल की, निज कुल लाज बहोर
विष पुरियां छुरियां दई, सबके हाथ गहाय
कर न गहै चौहान नृप, सुर पुर पाँव पठाय


कीरत सागर के पाट पर ब्रह्मा ने विकट युद्ध किया। चौहान सेना के दो शूरवीर सरदन मरदन उसके पहले ही वार में मारे गये। महामल्ल कान्ह कुंवर ब्रह्मा का वार बचाने के चक्कर में हाथी से गिर पड़े, उनके लिये दूसरा हाथी मंगाया गया। चौड़ा के निर्देश पर पूरी चौहान सेना ने ब्रह्मा को घेर लिया। जब ब्रह्मा मल्हना की आँख से ओझल हो गया तो रानी ने सोचा कि उसका ज्येष्ठ पुत्र भी खेत रहा। उसने महोबा की स्त्रियों को शपथ दिलायी कि पृथ्वीराज के हाथों में पड़ने से बेहतर है कि कीरतसागर में डूब कर प्राण दे दिया जाए। मल्हना के निर्देश पर हाथी पानी की अतल गहराइयों में मोड़ दिया गया।

आल्हा, ऊदल, लाखन, ढेबा, ताला सैयद का दल जोगियों के वेश में पड़ा था। वह किसी माकूल घड़ी की प्रतीक्षा में था। लेकिन मल्हना को डूबते देख ऊदल और लाखन करीत सागर में कूद पड़े। ऊदल ने हाथी की सूड़ पकड़कर मल्हना को बाहर निकाला। इस अराजकता की स्थिति में ताहर चंद्राबल का डोला लेकर पचपहरा भाग गया था। लाखन जोगियों के साथ पचपहरा पहुँचा और ताहर को पराजित कर डोला वापस लाया। उधर ऊदल अन्य साधुओं के साथ चौहान सेना से भिड़ा था। युद्ध का अंतिम क्षण जानकर पृथ्वीराज भी मैदान में पहुँचा। उसे देखते ही चंदेल सेना में भगदड़ मच गयी। उसका सामना किया आल्हा ने। लेकिन जैसे ही आल्हा सामने आया, चंदबरदाई ने पृथ्वीराज का हाथ पकड़ लिया। उसने बताया कि आल्हा को अमरत्व का वरदान है, इसे पीठ दिखाकर भाग चलो, अन्यथा तुम ससैन्य मारे जाओगे। पृथ्वीराज ने आल्हा को पीठ दिखायी और उसके पीठ दिखाते ही चौहान सेना बैरंग मैदान से भाग गयी-

गुरु गोरख को पाय अमर वर, साठ लाख जिन हने पठान
पितु हत्या का बदला लेके, बेला ब्या में पायो मान
गन्धर्व जीत अश्व लै लीन्हों, जैचन्द को भज्यो अभिमान
महुबे कजलियन सर कीरत पर, जीत्यो शब्दभेद चौहान


तूफान गुजर जाने के बाद अब सब लोग कीरत सागर के किनारे थे। चंद्राबल ने कजली प्रवाहित करने के बाद सबसे पहले लाखन को दिया, क्योंकि इसी साधु की बदौलत इसके प्राण बचे थे। लाखन ने उसे दस हाथी देने का वचन दिया। मल्हना ने ऊदल की तरफ इशारा करके कहा कि इस छोटे योगी को भी कजली दो, इसने मुझे डूबने से बचाया। चंद्राबल ने ऊदल को कजली दी, तो ऊदल ने अपने हाथ का कड़ा निकालकर दिया। कड़ा देखते ही चंद्राबल ऊदल को पहचान जाती है और उससे लिपटकर रो पड़ती है।

राजा परमाल अपने कृत्यों के लिये आल्हा ऊदल से क्षमा मांगते हैं, चंद्राबल ऊदल का पैर पकड़कर महोबा में ही रहने का आग्रह करती है, लेकिन आल्हा ने परमाल को उसकी तीनों शर्तें याद करायी, कन्नौज की राह पकड़ी तथा बुरे वक्त में साथ देने का वचन दिया।

दूसरे दिन परेबा था। महोबा में धूमधाम से बहनों ने भाइयों को राखी बांधी। मल्हना ने शिवताण्डव की प्रतिमा का जलाभिषेक किया। उस क्षण की स्मृति में महोबा में आज भी रक्षाबंधन परेबा के दिन मनाया जाता है। हवेली दरवाजा शहीद स्थल से एक विजय जुलूस निकलकर कीरत सागर पर समाप्त होता है। रायबहादुर शिवचरनलाल तिवारी ने इस जुलूस की परम्परा डाली थी। नगरपालिका महोबा एक सप्ताह तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करती है। आल्हा की चौकी इस एक सपताह तक आल्हा मंच का रूप ले लेती है और आल्हा परिषद के संयोजक श्री शरद तिवारी के नेतृत्व में एक सप्ताह तक रात दिन बुंदेली नृत्य व गायन की प्रस्तुति होती है। परेबा के दिन कीरत सागर पर लाखों की भीड़ होती है और महोबा की स्त्रियाँ जल में कजली प्रवाहित करती हैं। दर्जनों की तादाद में टीवी चैनल इस क्षण को कैमरे में कैद करने के लिये दौड़ते रहते हैं। कवि घनश्याम ने भी इस क्षण को अपने शब्दों में बांधने की कोशिश की है-

पहिन पटरंग बिरंगन की, अंग-अंग अनंग लजावति हैं
सिर पे कजरी, अ‍ॅखियां कजरी, मुख से कजरी धुन गावति हैं
‘घनश्याम’ तला पे झला के झला, रहें ठाड़ी भुजाएं हिलावति हैं
‘दुनिया’ को डुबोये वो हाथन सों, दुनिया को डुबोय दिखावति हैं।


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