पादपों में जल संरक्षण

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Source
जल चेतना तकनीकी पत्रिका, जनवरी, 2014

पादपों में जल संरक्षणहम सामान्यतः मानते हैं कि जल हमारी प्यास बुझाता है मगर सच यह है कि खाने के लिये भोजन और श्वसन के लिये आॅक्सीजन की प्राप्ति भी जल से ही होती है। प्यास बुझाने के लिये हम जल का सीधे ही प्रयोग कर लेते हैं जबकि जल से भोजन व आॅक्सीजन प्राप्त करने के लिये हमें पादपों की मदद लेनी पड़ती है। इस तथ्य से सभी परिचित हैं कि पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा भोजन बनाते हैं। इस क्रिया द्वारा निर्मित भोजन से चींटी से लेकर हाथी तक का पेट भरता है। पौधों में उपस्थित हरा पदार्थ, पर्णहरित सूर्य से ऊर्जा प्राप्त कर जल के अणु को तोड़ता है। जल के अणु के टूटने से बनी हाइड्रोजन से कार्बन डाइआॅक्साइड का अपचयन होने से कार्बोहाइड्रेट बनते हैं। कार्बोहाइड्रेट के रूपान्तरण से ही पौधों में विविध प्रकार के पदार्थ बनते हैं जिनमें से कई को हम भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं। पौधों में जल के अणु टूटने से आॅक्सीजन भी बनती है। पौधे आॅक्सीजन को वायु मण्डल में छोड़ देते हैं। वही आॅक्सीजन हमें जीवित रखती है। स्पष्ट है कि जल ही वह पदार्थ है जो हमारी भूख, प्यास मिटाने के साथ-साथ हमारे साँस को चलने देता है।

पौधे समझते हैं पानी का अर्थशास्त्र


पौधे बोलते नहीं मगर पानी के महत्त्व को बहुत अच्छी तरह समझते हैं। वे पानी को प्राप्त करने के लिये सभी प्रकार के प्रयास करते हैं मगर पानी का दुरुपयोग नहीं करते। तथा प्राप्त पानी को आवश्यकतानुसार खर्च करते हैं। पौधे पानी के अर्थशास्त्र को बहुत अच्छी तरह समझते हैं। पानी को बरतने में पौधे इतनी प्रवीणता का प्रदर्शन करते हैं कि हम उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। पानी का उपयोग करने में सभी पौधे एक सा व्यवहार नहीं करते हैं। जल की उपलब्धता व जल की गुणवत्ता के अनुसार पौधों का व्यवहार अलग-अलग तरह का होता है। हम यह भी कह सकते हैं कि भिन्न-भिन्न पादपों का जल-अर्थशास्त्र भिन्न-भिन्न होता है।

हम देखते हैं कि वर्षा के आने के साथ ही धरती पर चारों ओर हरी चादर बिछ जाती है। वर्षा समाप्त होने के साथ ही हरियाली औझल होने लगती है। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि वर्षा के पूर्व जहाँ किसी पौधे का कोई चिन्ह भी दिखाई नहीं देता, वहीं प्रथम वर्षा के तुरंत बाद ही इतने पौधे कहाँ से आ जाते हैं? इस प्रश्न का सीधा सा जवाब है कि कुछ पौधों ने अपने जीवन को वर्षा से बाँध लिया है। पादपों ने अपना जीवनकाल वर्षा ऋतु जितना छोटा बना लिया है। वर्षा आने के साथ ही इन पौधों के बीज अंकुरित हो जाते हैं। ये तेजी से वृद्धि करते हैं तथा वर्षा ऋतु की समाप्ति से पूर्व ही इन पौधों पर फूल आते हैं। वर्षा ऋतु समाप्त होते-होते बीज पक कर बिखर जाते हैं तथा मिट्टी में पड़े-पड़े आने वाली वर्षा ऋतु का इन्तजार करते हैं। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि ये पौधे अपने जीवन का अधिकांश भाग बीज के रूप में गुजारते हैं। बीज गर्म तपती रेत में भी जीवित रहने में सक्षम होते हैं। इन बीजों में एसी व्यवस्था होती है कि उनका अंकुरण पर्याप्त वर्षा होने के बाद ही हो। एसी भी व्यवस्था होती है कि वर्षा आने पर भूमि में उपस्थित सभी बीज एक ही ऋतु में अंकुरित नहीं हों। इस अनुकूलन के कारण किसी ऋतु में अंकुरण के बाद फिर वर्षा नहीं होने पर पौधे बिना बीज बनाए ही नष्ट हो जाएँ तो भी आने वाली वर्षा ऋतुओं में अंकुरित होने के लिये पर्याप्त बीज भूमि में विद्यमान रहते हैं।

कम वर्षा वाले क्षेत्रों के कई पशुपालक कुछ इसी प्रकार से अपना जीवन-यापन करते हैं। ये पशुपालक वर्षा होने पर अपने स्थानों पर आ जाते हैं तथा वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद उन स्थानों की ओर चले जाते हैं जहाँ उनके लिये पर्याप्त पानी व चारा उपलब्ध हो। विश्व की महान सभ्यताओं के नदी किनारे विकसित होने का एक मात्र कारण जल की उपलब्धता ही रहा है। आज भी वे ही क्षेत्र अधिक विकसित हो पाते हैं जहाँ शुद्ध जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है।

परिश्रमी पौधे


.राजस्थान के मरुस्थलीय भाग में बहुत बड़ी आबादी निवास करती है। ये लोग जमीन में गहरे कुएँ खोद कर उनसे पानी निकालते हैं। पानी को बहुत कठिनाई से प्राप्त करने के कारण ये जल का महत्त्व अच्छी तरह समझते हैं। इस कारण ये जल को बहुत ही किफायत से खर्च करते हैं। कठिन क्षेत्र में भी अपना जीवन मस्ती से गुजारते हैं। इन लोगों ने ऐसा जीवन जीने की कला पौधों से ही सीखी है। रेगिस्तान में जब चारों ओर सूखे का साम्राज्य फैला होता है तब बबूल, खेजड़ी आदि वृक्षों को लहलहाते, फूल खिलते देखा जा सकता है। खेजड़ी को जन सामान्य द्वारा बहुत ही सम्मान दिया जाता है। खेजड़ी के एक वृक्ष को बचाने हेतु अमृता देवी के नेतृत्व में 300 महिलाओं के शहीद होने की घटना को आज भी सम्मान से याद किया जाता है। खेजड़ी को राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया गया है। रेगिस्तानी वृक्षों की विशेषता यह है कि इनकी जड़, भूमि के ऊपर रहने वाले भाग की तुलना में कई गुणा लम्बी व शाखान्वित होती है जो जमीन में गहराई से उपस्थित जल को पर्याप्त मात्रा में एकत्रित कर ऊपरी भाग को भेजती है। इनके प्रयासों के कारण पौधों को जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है। इन पौधों की पत्तियाँ छोटी होती हैं। पत्तियों पर जलरोधी पदार्थ पर्त चढ़ी होती है जिस कारण गर्मियों में भी इनकी सतह से बहुत कम जल खर्च होता है। रेगिस्तान में प्रमुख रूप से पाया जाने वाला केर का वृक्ष तो जल की बचत करने में इनसे भी एक कदम आगे बढ़ जाता है। केर में पत्तियाँ काँटे में बदल जाती हैं। इससे दो लाभ व एक हानि होती है। एक लाभ यह कि पत्तियाँ न होने से वाष्प के रूप में जल की हानि नहीं होती। दूसरा लाभ यह कि काँटे होने के कारण कोई पशु इन्हें हानि नहीं पहुँचाता। हानि यह होती है कि पत्तियों के बिना भोजन कौन बनाए? केर ने उस हानि को रोकने का उपाय भी कर लिया। केर का तना हरा होकर पत्तियों की जिम्मेदारी को सम्भाल लेता है। तने पर जलरोधि पदार्थ की मोटी पर्त चढ़ी होती है, इस कारण जल की तनिक भी हानि नहीं होती। यही कारण है कि तपती रेत के समुद्र के बीच केर अकेला मुस्कराता नजर आता है।

जल संग्राही पौधे


रेगिस्तानी जिलों बाड़मेर व जैसलमेर में यह परम्परा है कि वर्षा आने पर घर की छत पर गिरने वाले पानी को बाहर बहने नहीं दिया जाता। पानी को एकत्रित कर घर में भूमि में बने ‘टांके’ में एकत्रित कर लिया जाता है। बाद के दिनों में इस एकत्रित जल को बहुत ही सावधानी से खर्च किया जाता है। जब मेरी नियुक्ति बाड़मेर में थी तो प्रति दिन एक बाल्टी पानी टांके में से दिया जाता था। प्राप्त पानी का एक भाग नहाने के काम में लाया जाता था, मगर नहाने के काम में आए पानी को भी व्यर्थ बहने नहीं दिया जाता था। उस पानी को एकत्रित कर उसका उपयोग कमरे में पौंछा लगाने या अन्य ऐसे ही किसी काम में किया जाता था।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मानव ने वर्षाजल को एकत्रित करने के बाद सावधानी से खर्च करने की बात भी पौधों से ही सीखी है। नागफनी, ग्वारपाठा, थोर आदि कई मांसल पौधे हैं जो रेगिस्तान में आसानी से रह लेते हैं। ये पादप वर्षा के दिनों में उपलब्ध जल को अपने तने या पत्तियों में एकत्र कर लेते हैं। आगामी वर्षा ऋतु तक इसी जल को सावधानी से खर्च करते हैं। जल के अपव्यय को रोकने के सभी उपायों को ये पादप काम में लाते हैं। सर्वाधिक जल खर्च करने वाले पादप भाग पत्तियों को भी त्याग देते हैं या रूपान्तरित कर लेते हैं। तना हरा होकर पत्तियों की भोजन बनाने की जिम्मेदारी सम्भाल लेता है। सभी भागों पर जलरोधि उपत्वचा का आवरण चढ़ा लिया जाता है। ऐसा लगता है कि ये पादप भोजन बनाने के अलावा किसी अन्य बात पर जल खर्च नहीं करते हैं। भोजन बनाने के लिये इन पौधों को कार्बन डाइआॅक्साइड वायुमण्डल से लेनी होती है। कार्बन डाइआॅक्साइड को अन्दर लेने के लिये रन्ध्र खोलने होते हैं। रन्ध्र खुलेंगे तो जलवाष्प की हानि होने की संभावना रहेगी। ये पौधें जल हानि की इस संभावना से बचने हेतु प्रकाश संश्लेषण क्रिया के रासायनिक चरणों में भी परिवर्तन कर लेते हैं। ये पौधें रात्रि में रन्ध्र खोल कर कार्बन डाइआॅक्साइड प्राप्त करते हैं। एकत्रित कार्बन डाइआॅक्साइड द्वारा दिन में प्रकाश उपलब्ध होने पर भोजन बनाते हैं। सामान्य पौधे सी-3 पादपों से भिन्न होने के कारण इन्हें सी-4 पादप कहते हैं। इनके इस गुण के कारण ये उन स्थानों पर आसानी से रह लेते हैं जहाँ अन्य कोई पादप नहीं रह सकता।

एक और एक मिलकर एक सौ ग्यारह


.पौधों में जल संरक्षण की बात की जाए और लाइकेन को भूल जाएं ऐसा होना संभव नहीं लगता। संगठन में शक्ति है कहावत का अनुपम उदाहरण है लाइकेन। लाइकेन किसी एक पादप का नाम नहीं है अपितु शैवाल तथा कवक के मिल कर रहने का उदाहरण है। शैवाल में भोजन बनाने की क्षमता होती है। कवक भोजन नहीं बना सकती मगर शैवाल को ढ़ककर उसे बाहरी खतरों से बचाने, जीवन के लिये आवश्यक खनिज पदार्थ जुटाने आदि का कार्य बहुत ही दक्षता से करती है। कहावत है कि एक ओर एक ग्यारह होते हैं मगर लाइकेन में तो एक और एक मिल कर एक सौ ग्यारह होते दिखाई देते हैं। एकदम ठोस एवं सूखी सतहों पर जहाँ किसी वनस्पति के पनपने की कल्पना नहीं की जा सकती वहाँ पर भी लाइकेन अपना डेरा जमाने में सफल रहते हैं। लाइकेन डेरा जमाने के बाद धीरे- धीरे वहाँ मिट्टी की पतली पर्त जमा कर देते हैं जिससे कालान्तर में शैवाल, ब्रायोफाइटा आदि उच्चतर पादप वहाँ बसते जाते हैं। एक समय ऐसा आता है जब ठोस एवं सूखा क्षेत्र घने जंगल में बदल जाता है। आज हम पृथ्वी वासी मंगल ग्रह पर बसने की योजना बना रहे हैं तब हम लाइकेन की इस नेतृत्वकारी भूमिका की उपेक्षा नहीं कर सकते। जर्मनी में किया गया एक प्रयोग मंगल पर मानव बस्ती बसाने की संभावना बढ़ाता है। जर्मनी के अन्तरिक्ष अनुसंधान संस्थान ने तापक्रम, वायुदाब, प्रकाश, खनिज सान्द्रता आदि को नियंत्रित कर पृथ्वी पर मंगल जैसा वातावरण रचा। इस प्रकार रचे गए मंगल जैसे वातावरण में सहजीवी जीव लाइकेन को रखा गया। प्रयोग में पाया गया कि लाइकेन जैसे जीव मंगल के वातावरण में पनप सकते हैं।

अनेक पादप लवण युक्त जल में भी निर्वाह कर लेते हैं। कुछ प्रदूषित जल से भी परहेज नहीं करते। कई पादप भूमि से हानि कारक रसायनों को अवशोषित कर उसे अच्छा बना देते हैं। स्पष्टतः जल संरक्षण के गुण को पादपों ने विकास क्रम में बहुत पहले तथा बहुत गम्भीरता से अपना लिया था। मानव ने भी कुछ सीमा तक पौधों का अनुकरण किया मगर अब आवश्यकता पौधों जैसी गम्भीरता लाने की है। जितना जल्दी हम इस बात को समझेंगे तथा दूसरों को समझाएँगे उतना ही अच्छा रहेगा अन्यथा अस्तित्व का संकट उत्पन्न हो जाएगा।

संपर्क - श्री विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी, पूर्व प्रधानाचार्य, 2, तिलक नगर पाली, राजस्थान-306 401, मो. 09829113431

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