सद्गति और दुर्गति

Submitted by Hindi on Fri, 02/12/2016 - 15:41
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यथावत, 16-30 सितम्बर 2013

दो-दो पलों में बँटी हमारी चेतना के लिये दो अरब साल बहुत होते हैं। यानी चौबीस अरब महीने। 5,76,00,00,00,000 घंटे। कल्पना से परे। मनुष्य के सबसे पुराने अवशेष भी दो-ढाई लाख साल से पुराने नहीं मिले हैं। और वह इस सृष्टि के सबसे नए नवेले प्राणियों में शुमार है। लेकिन दो अरब साल पहले ऐसा कुछ हुआ था जो आज हमारे अस्तित्व और उत्तरजीविता के बारे में एक अहम सबक सिखाता है। पृथ्वी पर सबसे पहले आया एक कोशिका वाला हरा-नीला बैक्टीरिया अपनी ही करनी की वजह से अब काल के गाल में समा चुका है।

पृथ्वी कितनी पुरानी है यह तो विज्ञान को पत्थरों में रेडियोधर्मिता नाप कर ठीक पता चल गया है। पर यह ठीक से पता नहीं चला है कि हमारे ग्रह पर जीवन कब शुरू हुआ। कुछ तथ्य हैं, और उनके आधार पर कुछ अन्दाजे। पृथ्वी और हमारा सौरमंडल कोई 454 करोड़ साल पहले बने। और ऐसा अनुमान है कि कोई साढ़े तीन अरब साल पहले पृथ्वी पर जीवन के अंकुर खिले थे। यह थे एक कोशिका वाले हरे-नीले बैक्टीरिया।

ऐसे असंख्य जीव पानी में पनपने के बाद हमारे ग्रह पर फैल गए थे। इनका हरा रंग सूरज के उजाले से शक्ति पैदा करता था, कुछ वैसे ही जैसे आज के वनस्पति करते हैं। उस सरल जीवन के लिये जो कुछ जरूरत थी वह या तो धरती से मिल जाता या हवा से खींच लिया जाता। सूरज से प्रकाश और वायुमंडल से कार्बन और नाइट्रोजन। इन बैक्टीरिया ने रूप ले लिया था सौर पटलों का, जो करोड़ों एकड़ में फैले रहे होंगे। ओजोन गैस की तह तब आकाश में नहीं बनी थी, सो सूरज का खतरनाक विकिरण धरती तक आता था, पर हमारे हरे-नीले पुरखे उसे सहन करना जानते थे, बल्कि शायद उससे उन्हें पनपने में मदद ही मिली होगी।

जीवन का, प्राण का र्इंधन यही था। इस र्इंधन को जलाने से कुछ उत्सर्जन भी होता था, कुछ धुआँ भी निकलता था। यह धुआँ, विषैली हवा हरे-नीले बैक्टीरिया साँस से बाहर कर देते थे, कुछ वैसे ही जैसे हमारे फेफड़े कार्बन डाइआॅक्साइड छोड़ते हैं। या जैसे हमारी आँत मल त्यागती है, और गुर्दे मूत्र त्यागते हैं। जीवन का यह कामयाब रूपरेखा थी। यह प्राणी बहुत फले-फूले और पृथ्वी पर इनका राज बीसियों करोड़ साल चला।

इस कामयाबी की वजह से इनकी संख्या बहुत बढ़ गई थी। जो विषैली गैस इनकी साँस से बाहर आती थी वह पहले तो धरती के तत्त्वों से प्रतिक्रिया करके ठिकाने लग जाती थी। लेकिन जनसंख्या बढ़ने से इतनी गैस निकलने लगी कि वह मुक्त रूप में पृथ्वी के वायुमंडल में फैलने लगी। कोई दो अरब साल पहले यह विषैली गैस इतनी बढ़ गई कि इस का जहर असहनीय हो गया। हरे-नीले बैक्टीरिया पर प्रलय आ गया, वे लुप्त होने लगे। प्राणी विनाश के इतिहास में यह घनघोर अध्याय था। शायद आज तक का सबसे बड़ा प्रलय, हमारे गृह का सबसे विशाल प्रदूषण।

लेकिन पृथ्वी पर जीवन खत्म नहीं हुआ। उसका रूप बदल गया। अब वही प्राणी पनप पाये जो वायुमंडल में मौजूद इस विषैली गैस को सहन करना जानते थे। जो नहीं सीख पाये वे कुछ विशेष जगहों पर सीमित रह गए, जैसे दलदलों और समुद्र की गहराई में या हम जैसे प्राणियों की आँत के भीतर। कालान्तर में प्राणी जगत ने इस विषैली गैस का इस्तेमाल करना सीख लिया। हर प्राणी की हर कोशिका में इस विष को बुझाने वाले तत्त्व बनने लगे। हरे-नीले बैक्टीरिया में भी जिन प्रकारों ने इस विष को सहन करना सीख लिया वे आज भी बचे हुए हैं।

आगे चलकर यही विषैली गैस जीवन का स्रोत बन गई। यह विषैली गैस थी आॅक्सीजन। यानी जिसे हम प्राणवायु कहते हैं। वायुमंडल में मुक्त आॅक्सीजन को आज जीवन की कसौटी माना जाता है। वैसे तो हमारे ब्रह्मांड के तत्त्वों में आॅक्सीजन की बहुतायत है, पर इसका रासायनिक स्वभाव इतना चंचल है कि आॅक्सीजन बहुत तेजी से किसी भी पदार्थ के साथ प्रतिक्रिया करती है। इसलिये इसका मुक्त रूप वायुमंडल में नहीं टिकता है।

आॅक्सीजन हमारे शरीर की कोशिकाओं को चलाती है ही, इसके कुछ अंश उत्पाद भी मचाते हैं। इन्हें ‘फ्री रैडिकल’ कहा जाता है। इस उत्पात से बचने के लिये जीवों ने ‘एंटी-आॅक्सीडेंट’ बनाना सीख लिया है, जो इन उत्पाती अंशों पर काबू करते हैं। ‘फ्री रैडिकल’ और ‘एंटी-आॅक्सीडेंट’ के बीच का देवासुर संग्राम हममें से हर एक के शरीर में चलता है। विज्ञान अब यह गहराई से दिखा चुका है कि शरीर के बूढ़ा होने और अन्त में मृत्यु को प्राप्त होने का कारण भी आॅक्सीजन से निकले ‘फ्री रैडिकल’ ही हैं। इसे ‘आॅक्सीडेटिव स्ट्रेस’ कहते हैं। यानी जैसा मिर्जा गालिब ने कहा है : ‘‘... उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले।’’

अगर आज हमारे वायुमंडल का पाँचवाँ हिस्सा मुक्त आॅक्सीजन है, तो इसलिये कि पेड़-पौधे इसे अपनी साँस में छोड़ देते हैं। ठीक भाषा में कहें तो आॅक्सीजन पेड़ पौधों का मल है जिसे वह त्याग देते हैं। उनका कूड़ा करकट है, उनका जूठन। लेकिन हमारे लिये यही प्राण वायु है। हर पर हम आॅक्सीजन अपने फेफड़ों में खींचते हैं। साँस टूटना जीवन का अन्त होता है।

प्रकृति में किसी का कूड़ा किसी और का साधन होता है। हर किस्म के प्राणी किसी तरह के साधन का एक हिस्सा भर इस्तेमाल करते हैं। जो नहीं पुसाता उसे त्याग देते हैं। वहीं किसी और के लिये साधन बन जाता है। प्रकृति में कुछ भी बेकार नहीं जाता। जीवन का हर रूप जीवन के किसी और रूप से लेन-देन करके ही पनपता है।

कचरे की उपयोगिता समझनी हो तो हमारी हड्डियाँ एक उदाहरण हैं। हर वह जीव जिसकी कम-से-कम एक कोशिका होती हो वह कैल्शियम को कचरे की तरह उत्सर्जित करता है। कालान्तर में जीवों ने इस कैल्शियम को इस्तेमाल करना सीख लिया और समुद्री जीवों ने शंख बनाने सीख लिये। इसी प्रक्रिया से जमीन के प्राणियों ने कंकाल, हड्डी और दाँत बनाना सीखा। अपने ही शरीर से उपजे कचरे से।

हमारा भोजन भी इसी तरह के लेन-देन से आता है। जीवन का हर रूप पृथ्वी के उर्वरकों का एक छोटा सा संग्रह है। यह रचना जब टूटती है तो उर्वरक किसी और रूप में चले जाते हैं। जैसे धरती में उगे गेहूँ की रोटी हमारे पेट में जाती है। हमारे मरने के बाद चाहे हमें दफनाया जाये या आग के हवाले किया जाये, उर्वरक घूम के फिर वहीं पहुँचते हैं जहाँ से निकले थे। जीवन की लीला ऐसे ही चलती है। लेकिन साधनों को ऐसे इस्तेमाल करने की एक सीमा भी होती है। यह सीमा प्राणियों को ठीक पता नहीं होती। यह सीमा पार करने पर प्राणी अपने ही कूड़े के ढेर में दब कर समाप्त भी हुए हैं। पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत करने वाले हरे-नीले बैक्टीरिया को ही ले लीजिए, जो अपनी बनाई आॅक्सीजन के शिकार हुए।

मनुष्य को इन सीमाओं का अन्दाजा तो है, लेकिन हमारे ज्ञान की सीमा है। साढ़े चार अरब साल पुरानी पृथ्वी पर हमें आये दो लाख साल ही हुए हैं। इसमें भी पिछले बारह हजार साल से ही जलवायु इतनी अनुकूल बनी हुई है कि हम फल फूल सके हैं। खेती से अपना भोजन खुद उगा पाये हैं। घनी बस्तियों और शहरों में रहना शुरू किया है। उसमें भी पिछले कई सौ सालों में कुछ वैज्ञानिक खोजों की मदद से हमने ढेर सारा भोजन पैदा करना सीख लिया है, कई बीमारियों का उपचार करना भी। इससे हमारी आबादी सौ साल में चौगुनी बढ़ी है। आज पृथ्वी पर कोई सात अरब मनुष्य हैं, जबकि 20वीं सदी के शुरू में केवल डेढ़ अरब के लगभग लोग थे।

मल-मूत्र भी चौगुना बढ़ा है। लेकिन उसे ठिकाने लगाने के तरीके चौगुने नहीं हुए हैं। चार अरब से ज्यादा लोगों यानी दस में से छह लोग के पास तो शौचालय है ही नहीं। और है भी तो उनके मैल का ठीक से निस्तारण नहीं होता। मल-मूत्र का ठीक से निस्तारण न हो तो कई समस्याएँ आती हैं। मैले के रास्ते से कई तरह के रोग फैलते हैं जो करोड़ों लोगों को बीमार करते और मारते हैं। आधुनिक सीवर व्यवस्था पानी की घोर बर्बादी करती है, और मैला पानी हमारी नदियों और तालाबों को दूषित करता है।

यह मैल, हमारे ही शरीर से मल और मूत्र के रूप में निकले उर्वरक हैं, जो धरती से खेती के द्वारा निकाले होते हैं। इन्हें पानी में डालने से जमीन की उर्वरता कम होती है। प्रकृति का सहज चक्र तो यही है कि जमीन की उर्वरता वापस जमीन में जानी चाहिए। हमारा मल मूत्र वापस जमीन में नहीं गया तो जमीन बंजर होगी और पानी दूषित। चारों ओर ऐसा ही हो रहा है। कहीं हम उन हरे-नीले बैक्टीरिया के रास्ते तो नहीं जा रहे जो अपने मैले से उपजे प्रलय का शिकार हुए?

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