मानव अस्तित्व के लिये अन्तहीन सुरंग बनने की ओर बढ़ता ओजोन छिद्र

Submitted by Hindi on Sun, 02/14/2016 - 15:25
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Source
जल चेतना तकनीकी पत्रिका, जनवरी, 2014

ओजोन नाम का अर्थ


संकट में धरतीओजोन का यह नाम ग्रीक (युनानी) शब्द ओज़ीन (Ozein) के आधार पर पड़ा जिसका अर्थ होता है गन्ध। इसके सान्द्रित (गाढ़ा) रूप में एक तीक्ष्ण/कड़वी गन्ध होती है। ओजोन में आॅक्सीजन के तीन परमाणु होते हैं। हमें साँस लेने में जिस आॅक्सीजन की जरूरत होती है उसमें आॅक्सीजन के दो परमाणु होते हैं।

ओजोन की खोज


ओजोन की उपस्थिति की खोज पहली बार सन 1839 ई. में सी.एफ. स्कोनबिअन के द्वारा विद्युत स्फुलिंग के निरीक्षण के दौरान की गई।

ओजोन परत का उद्गम


ओजोन परत का उद्गम प्राचीन महासागरों से हुआ है और वह धीरे-धीरे दो सौ करोड़ वर्षों में बनकर पूरा तैयार हुआ है। ओजोन परत में जो ओजोन है उसका मूल स्रोत महासागरों के पादपों द्वारा किये गए प्रकाश संश्लेषण के दौरान पैदा हुई आॅक्सीजन है। महासागर से निकली आॅक्सीजन के अणु ऊपर उठते-उठते समताप मण्डल में पहुँच जाते हैं। वहाँ वे परमाणुओं में टूट जाते हैं। ये परमाणु दोबारा जुड़कर ओजोन का निर्माण करते हैं। आॅक्सीजन के अणुओं के बिखरने और आॅक्सीजन के परमाणुओं से जुड़कर ओजोन बनने के लिये आवश्यक ऊर्जा सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों से प्राप्त होती है। ओजोन परत सूर्य से आने वाली अधिकांश पराबैंगनी किरणों को इन क्रियाओं के लिये अवशोषित कर लेती है, जिससे ये अत्यन्त घातक पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह तक नहीं पहुँच पाती।

लगभग चालीस करोड़ वर्ष पूर्व ओजोन परत पूर्णरूप से बन गई थी। ओजोन परत के बन जाने से महासागरीय जीव-जन्तु जमीन की ओर बढ़ सकें क्योंकि वे अब ओजोन परत के कारण पराबैंगनी किरणों से सुरक्षित थे। इससे पूर्व केवल महासागरों में ही जीवन का अस्तित्व था क्योंकि महासागर ही इन घातक पराबैंगनी किरणों से मुक्त थे।

ओजोन परत कहाँ पर स्थित है?


पृथ्वी के वातावरण को कई परतों में बाँटा जा सकता है। सबसे निचली परत को हम ट्रोपोस्फीयर कहते हैं। यह जमीन से दस किलोमीटर की ऊँचाई तक स्थित है। इंसानी जीवन के ज्यादातर कार्य इसी परत में होते हैं। इसके बाद दूसरी परत स्ट्रेटोस्फियर कहलाती है। यह परत दस किलोमीटर से पचास किलोमीटर की ऊँचाई तक स्थित है। ओजोन परत भी इसी में आती है। सन् 1913 ई. में विभिन्न अध्ययनों के बाद फ्रेंच वैज्ञानिकों चार्ल्स फैब्री और हेनरी बेडसों को एक निर्णायक सबूत मिला कि ओजोन परत मुख्यतः समताप मण्डल में स्थित है। ओजोन नीले रंग की गैस होती है। ओजोन कण या ओजोन परत समताप मण्डल में 15 से 35 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित है। समताप मण्डल में ओजोन की उपस्थिति विषुवत रेखा के निकट अधिक सघन और सान्द्र है तथा ज्यों-ज्यों हम ध्रुवों की ओर बढ़ते हैं इसकी सान्द्रता कम होती जाती है।

क्या करती है ओजोन परत?


1. समताप मण्डल के तापमान को सन्तुलित बनाती है।
2. सूर्य से निकलने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर ग्रह पर जीवन की रक्षा करती है।

ओजोन की निगरानी का प्रथम यंत्र


सन 1920 के दशक में आॅक्सफोर्ड वैज्ञानिक जी.एम.बी. डाॅब्सन ने सम्पूर्ण ओजोन की निगरानी करने के लिये एक यंत्र बनाया।

ओजोन परत में बदलाव कब से आना प्रारम्भ हुआ


विश्व के चोटी के वैज्ञानिकों का मानना है कि लाखों वर्षों से वायुमण्डलीय संरचना में अधिक बदलाव नहीं आया है, लेकिन पिछले पचास वर्षों में मनुष्य ने प्रकृति के उत्कृष्ट सन्तुलन को वायुमण्डल में हानिकारक रासायनिक पदार्थों को छोड़कर अस्त-व्यस्त कर दिया है। छोड़े गए हानिकारक रासायनिक पदार्थ जीवनरक्षक ओजोन परत को नष्ट कर रहे हैं।

ओजोन परत की क्षीणता


ओजोन परत की क्षीणता दक्षिणी ध्रुव, जो अंटार्कटिका पर है, पर स्पष्ट दिखाई देती है, जहाँ एक ओजोन छिद्र है। उत्तरी ध्रुव में ओजोन परत बहुत अधिक नष्ट नहीं हुई है। अंटार्कटिका के ऊपर इस ओजोन छिद्र का पता 1985 में ब्रिटिश वैज्ञानिक जोसेफ फारमैन, ब्रायन गार्डनर और ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के ज़ोनाथन शंकलिन ने लगाया था।

किसने निभाई है महत्त्वपूर्ण भूमिका?


विश्व मौसम विज्ञान संस्था ने ओजोन क्षीणता की समस्या को पहचानने और संचार में अहम भूमिका निभाई है।

ओजोन छिद्र का आकार


नासा के नौआ उपग्रह से प्राप्त आँकड़ों के मुताबिक 2012 में अंटार्कटिक ओजोन छिद्र का औसत आकार 17.9 वर्ग किलोमीटर था।

ओजोन परत में छिद्र से क्या होता है?


ओजोन परतओजोन परत के नष्ट होने से सूर्य की घातक पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह तक पहुँचने लगती हैं। एक प्रतिशत ओजोन की मात्रा के घटने से पराबैंगनी किरणों के आयतन में डेढ़ प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है।

क्या उपाय किए गए?


संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण योजना (यू.एन.ई.पी.) ने विएना सन्धि की शुरुआत की, इसमें 30 से अधिक राष्ट्र शामिल हुए। इसमें ऐसे पदार्थों की सूची विज्ञापित की गई जो ओजोन परत को नष्ट करते हैं। इसे सन 1987 ई. में माॅन्ट्रियल में स्वीकार कर, सन 2000 ई. तक क्लोरोफ्लोरो कार्बन के उपयोग में पचास प्रतिशत कमी का आह्वान किया गया।

क्या है क्लोरोफ्लोरो कार्बन (सी.एफ.सी.)?


क्लोरोफ्लोरो कार्बन, जिसे सी.एफ.सी. के नाम से भी जाना जाता है, को हरित प्रभाव (Green House Effect) के लिये जिम्मेदार गैस माना जाता है। यह मुख्यतः वातानुकूलन मशीन, रेफ्रिजरेटर आदि से उत्सर्जित होती है तथा एरोसोल या स्प्रे इसके प्रणोदक (बढ़ाने वाले) है। सी.एफ.सी. का प्रयोग यूरीथेम फोम बनाने, सेमीकंडक्टर को धोने के लिये विलायक के रूप में और ड्राइक्लीनिंग में भी होता है। सी.एफ.सी. से निकलने वाली क्लोरीन गैस ओजोन के तीन आॅक्सीजन परमाणुओं में से एक परमाणु से अभिक्रिया करती है। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि ओजोन में छेद के लिये जिम्मेदार सी.एफ.सी. के उत्पादन और इस्तेमाल पर आज से पूर्ण प्रतिबन्ध भी लगा दिया जाये तो भी समस्या कम नहीं होने वाली है क्योंकि वातावरण में सी.एफ.सी. को समाप्त करने का कोई कारगर उपाय अभी तक ढूँढा नहीं जा सका है। परिणामतः यह गैस कम-से-कम अगले सौ सालों तक वातावरण में बनी रहेगी।

क्या है मिथाइल ब्रोमाइड?


मिथाइल ब्रोमाइड भी एक ऐसा रसायन है जिसका बहुत अधिक उपयोग किया जाता है। यह ब्रोमाइड उत्सर्जित करता है जो क्लोरीन की तुलना में तीस से पचास गुना ज्यादा विनाशकारी है। इसका उपयोग मिट्टी, उपयोगी वस्तुओं और वाहन ईंधन संयोजी के लिये धूमक के रूप में होता है। वर्तमान में ऐसा कोई रसायन मौजूद नहीं है जो पूरी तरह से मिथाइल ब्रोमाइड के उपयोग को समाप्त कर दें।

नाइट्रस आॅक्साइड, जिसे हम लॉफिंग गैस के नाम से भी जानते हैं, यह भी ओजोन परत के लिये बड़ा खतरा है।

समाज पर प्रभाव


त्वचा कैंसर, त्वचा का बूढ़ा होना, आँखों की बीमारियाँ, मलेरिया, अन्य संक्रामक बीमारियाँ, समुद्र का बुरी तरह प्रभावित होना, वनस्पतियों के जीवन चक्र में परिवर्तन, खाद्य शृंखला का बिगड़ जाना, पशुओं पर भी असर, अधिकांश सूक्ष्म जीवधारी के समाप्त होने की आशंका और यदि ऐसा हुआ तो वे सभी जन्तु भी मर जाएँगे जो खाद्य शृंखला में समुद्री सूक्ष्म जीवों पर निर्भर होते हैं। पराबैंगनी किरणें जीनों में उत्परिवर्तन लाती हैं जिससे कैंसर होता है। पराबैंगनी किरणें फसलों को भी नुकसान पहुँचाती हैं। पराबैंगनी किरणों के आपतन के बढ़ने से विश्व में पैदावार घट सकती है और पृथ्वी का सम्पूर्ण पारिस्थितिकीय तंत्र प्रभावित हो सकता है।

अमेरिका की एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (ई.पी.ए.) के अनुसार ओजोन क्षरण के कारण सन 2027 तक पैदा होने वाले छः करोड़ अमेरिकी नागरिक त्वचा कैंसर से पीड़ित होंगे और इनमें से लगभग दस लाख लोगों की मौत होने का भी अनुमान है। ई.पी.ए. के ही अनुसार ओजोन क्षरण के कारण पराबैंगनी किरणें आँखों के लेंस को भी प्रभावित करती हैं जिससे मोतियाबिन्द के लगभग पौने दो करोड़ मामले सामने आ सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार हर वर्ष 32 लाख व्यक्ति पराबैंगनी किरणों के कारण बने मोतियाबिन्द से अन्धे हो जाते हैं।

समाज कैसे जिम्मेदार?


किसी व्यवस्था में छेद होने से पहले हमारे विचारों, सोचने के तरीके और जीवनशैली में शुद्धता आती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि हमारे पतन की शुरुआत हो चुकी है। हमने ओजोन की उस छतरी रूपी परत में भी छेद कर डाला है जो सूर्य की खतरनाक पराबैंगनी किरणों से हमें बचाती रही है। चिन्ता की बात यह है कि यह छेद अब सिर्फ छेद नहीं रहा बल्कि मानव अस्तित्व के लिये चुनौती रूपी अन्तहीन सुरंग बनने की ओर चल पड़ा है।

क्या करना होगा हमें?


सी.एफ.सी., मिथाइल ब्रोमाइड और नाइट्रस आॅक्साइड पर पूर्ण प्रतिबन्ध। अधिक से अधिक पेड़ लगाना जिससे ज्यादा मात्रा में आॅक्सीजन पैदा हो, ऊर्जा की खपत को घटाना, पर्यावरण अनुकूल ओजोन फ्रेडली उत्पादों और वस्तुओं का इस्तेमाल। वाहनों का इस्तेमाल कम करें इससे प्रदूषण कम होगा। गर्मियों में खुद को ठंडा रखने के लिये हल्के कपड़े पहनें, वातानुकूलित यंत्रों का प्रयोग कम करें। सजावटी रोशनियों से परहेज करें, जागरुकता अभियान से लोगों के विचार, सोच और जीवनशैली में परिवर्तन के लिये प्रेरित करें।

सम्पर्क - डाॅ. सुनील गोयल, सेक्टर एफ.एच. 369 , स्कीम नं. 54 , विजय नगर, इन्दौर (म.प्र.), पिन 452 010

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