स्पष्ट हुई आदेश और अपील की मिलीभगत - स्वामी सानंद

Submitted by RuralWater on Sun, 02/14/2016 - 16:19


स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद - पाँचवाँ कथन आपके समक्ष पठन, पाठन और प्रतिक्रिया के लिये प्रस्तुत है:

. दिसम्बर, 2008 तक मैंने तय कर लिया था कि फिर अनशन करुँगा। मेरे सामने प्रश्न था कि कहाँ करुँ? दिल्ली में पहला अनशन तो मैंने महाराणा प्रताप भवन में किया था।

27-28 जून तक वे भी कहने लगे थे कि कब खाली करोगे। मैंने सोचा कि दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित मालवीय स्मृति भवन में करुँ। सोच थी कि इसे बीएचयू एलुमनी एसोसिएशन ने बनवाया है; मैं भी बीएचयू एलुमनी ही हूँ और मालवीय जी का गंगाजी के लिये बहुत कन्ट्रीब्युशन था; अच्छा रहेगा। बी एम जायसवाल, मालवीय भवन के प्रबन्धक थे। उनसे मिला। वह खुश थे। उन्होंने कहा कि बोर्ड बदल गया है। अब महेश शर्मा जी इसके अध्यक्ष हैं। गिरधर मालवीय जी भी बोर्ड में हैं। बाद में पता चला कि ये तीनों समर्थन में थे, लेकिन सांसद राजा कर्णसिंह जी ने मना कर दिया।

मैंने सोचा कि कर्णसिंह जी ने इसे शायद कांग्रेस बनाम भाजपा बना लिया है। मैं, मकर संक्रान्ति से करने का निर्णय कर चुका था; तब आचार्य जितेन्द्र (गंगा महासभा) ने कहा कि हिन्दू महासभा भवन में करा दूँगा। निर्णय मेरा था। राजेन्द्र सिंह (जलपुरुष) व रवि चोपड़ा (लोक विज्ञान संस्थान, देहरादून) इसके विरुद्ध थे, पर मेरे साथ थे; अतः मैंने उनसे कहा कि दूसरी जगह दिला दो, पर वे दूसरी जगह नहीं दिला पाये।

 

एक शंकराचार्य से मिला आशीष


जनवरी, 2009 के शुरू में स्वामी स्वरूपानन्द जी का स्वास्थ्य खराब हो गया था। मैं उनका हाल-चाल लेने एम्स गया। उन्होंने पूछा कि कमेटी क्या कर रही है। मैंने कहा - “वह सन्तोषजनक नहीं है। प्राधिकरण भी गठित नहीं हुआ और हाई पावर कमेटी की रिपोर्ट भी नहीं आई। मुझे सरकार पर शंका है।’’ इस पर उन्होंने मुझे अपना आशीर्वाद दिया। उपवास शुरू करने के लिये जब 14 जनवरी को हवन सम्पन्न किया, तो राजेन्द्र ने कहा - ‘स्वरूपानंद जी से आशीर्वाद ले लो।’ स्वरूपानंद जी ने कुछ नहीं कहा, सिर्फ आशीर्वाद दिया - विजयी भव।

 

दूसरे शंकराचार्य ने भी दिया आश्वासन


बहरहाल, हिन्दू महासभा में अनशन चलता रहा। जब फरवरी आई, तो मुझे भी लगा कि आखिरकार कब तक चलेगा। कमजोरी भी महसूस हुई। थोड़ी सी आतुरता भी थी। सन्तों में चिदानन्द मुनि, हंसदेवाचार्य और रामदेव से सम्पर्क बना रहा। स्वरूपानंद जी से भी सम्पर्क रहा।

मेरी प्रार्थना पर समर्थन देने के लिये स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी दिल्ली आये। हिन्दी भवन में बैठक हुई। क्या करें? कैसे करें? आठ फरवरी तक यह विचार चलता रहा, तभी महन्त मिश्र (आईआईटी, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर तथा संकटमोचन हनुमान मन्दिर, बनारस के महन्त स्वर्गीय प्रो. वीरभद्र मिश्र) के माध्यम से पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी का सन्देश मिला- “यदि तुम्हारे प्राण चले जाते हैं, तो यह हमारे लिये शर्म की बात होगी।’’

 

स्वरूपानंद जी की निर्णायक चिट्ठी


मेरे मन में आया कि दोनों शंकराचार्य भी बनारस में हैं और महन्त जी भी। मेरी हनुमान जी पर आस्था भी रही है। सोचा कि संकटमोचन के दर्शन भी कर लूँगा; सो, मै बनारस गया। वहाँ जो जो आश्वासन मिले; निश्चलानंद जी ने जो फोन किये, उनसे यह भी लगा कि उनके सम्पर्क भाजपा में हैं। एस.के. गुप्ता जी को साथ ले गया था। उन्होने स्वरूपानंद जी से कहा कि एक पत्र, प्रधानमंत्री जी के नाम लिख दें। उन्होंने स्वीकृति दे दी। एस.के. गुप्ता जी ने ड्रॉफ्ट लिखा। देर रात तक वह फाइनल हो गया। उसमें लिखा था कि लोहारी-नाग-पाला को रद्द कर दें, तो उपवास खत्म कर देंगे।

 

बातचीत का बुलावा


प्रधानमंत्री जी उन दिनों बीमार थे। कुछ आईआईटीएन, पृथ्वीराज चव्हाण (प्रधानमंत्री कार्यालय से सम्बद्ध तत्कालीन राज्यमंत्री) के सम्पर्क में थे। हमने तय किया कि पत्र को पृथ्वीराज चव्हाण के माध्यम से प्रधानमंत्री जी को पहुँचाएँ। राजेन्द्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री जी की बेटी दमन सिंह के द्वारा पहुँचाने की कोशिश करते हैं।

दमन सिंह ने पहले कहा कि पिताजी कहते हैं कि तुम सरकारी कामकाज में दखल नहीं करोगी; फिर भी दमन सिंह ने गंगाजी का काम मानते हुए पत्र को पृथ्वीराज जी से पहले ही पहुँचा दिया। उस पर प्रधानमंत्री जी ने कुछ लिखा। क्या लिखा, मालूम नहीं। वह आदेश दिया हुआ पत्र, 17 फरवरी, 2009 को पृथ्वीराज चव्हाण के पास पहुँचा। उनके पास तो पहुँचाने वाला पत्र पहले से ही था। वह नाराज हुए। फिर चव्हाण ने उस समय के ऊर्जा मंत्री शिंदे जी को कुछ डायरेक्शन्स दी।

18 फरवरी को शिंदे ने चिदानंद जी को बुलाया। चिदानंद जी ने एम.सी. मेहता (पर्यावरण मामलों के विख्यात वकील) को फोन किया। एस के गुप्ता ने मुझे बताया कि शिंदे जी, लोहारी-नाग-पाला पर बात करना चाहते हैं।...तो ज्ञानेश चौधरी, परितोष त्यागी (केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सेवानिवृत्त चेयरमैन), एस.के. गुप्ता, रवि चोपड़ा 18 की शाम को शिंदे जी के घर मीटिंग में पहुँचे।

 

आदेश और अपील की मिलीभगत


दो बैठकें, पैरलल चल रही थी। बाहर शिंदे जी व अधिकारीगण बात कर रहे थे और अन्दर कमरे में पृथ्वीराज चव्हाण बैठे थे। निर्देश साफ था। रात दस बजे ड्राफ्ट बन गया। गुप्ता जी वगैरह ड्रॉफ्ट लेकर आये। मुझे उसमें आपत्तियाँ थीं। चिदानंद जी ने मुझे डाँटा भी, पर अन्ततः ड्रॉफ्ट की भाषा बदली।

पर्यावरण प्रवाह को लेकर हाईपावर कमेटी के सदस्य दो घन मीटर प्रति सेकेण्ड की बात कर रहे थे, एनटीपीसी के चेयरमैन चार की और गैर सरकारी सदस्य 16 घन मीटर प्रति सेकेण्ड की बात कर रहे थे। परितोष व रवि ने कहा, तो शिन्दे ने कहा कि 16 माँगते हो, मैं 20 घन मीटर देता हूँ।

निर्णय हुआ कि जब तक एन्वायरनमेंटल फ्लो तय नहीं होता, तब तक लोहारी-नाग-पाला पर काम बन्द रखा जाये। उसमें लिखा गया कि लोहारी-नाग-पाला बन्द कर देंगे। रात दो बजे पुनः मोडीफाइड ड्रॉफ्ट लेकर आये। मैंने कहा कि सुबह बिड़ला मन्दिर में उपवास खोलूँगा।

आदेश, 18 फरवरी का था। 20 फरवरी को नैनीताल में अवधेश कौशल (आरएलईसी) ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर दी कि यह आदेश निरस्त किया जाये। हाईकोर्ट ने स्टे दे दिया। 18 फरवरी का आदेश निरस्त हो गया। चुनाव भी आने वाला था। मेरी स्थिति विचित्र थी कि मैं क्या करुँ? बहुत बाद में पता चला कि यह सब मिलीभगत थी। एनटीपीसी का वकील ही अवधेश कौशल वाली पीआईएल का वकील था।

 

स्पष्ट हुआ स्वरूपानंद जी का प्रभाव


खैर, 20 फरवरी को एनजीआरबीए (राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण) के गठन का नोटिफिकेशन आ गया। गंगा जी को नेशनल रिवर घोषित कराने में तीन डेलीगेशन प्रधानमंत्री जी से मिले थे; तारा गाँधी, रमा राउत, बी के चतुर्वेदी वगैरह..किन्तु मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि प्रधानमंत्री जी पर स्वरूपानंद जी का प्रभाव है। मुझे यह भी स्पष्ट था कि कांग्रेस की सरकार में यदि गंगाजी के पक्ष में कोई निर्णय कराना है, तो स्वामी स्वरूपानंद जी का प्रभाव ही काम करेगा।

 

पुनः उपवास की विवशता


स्वास्थ्य लाभ की दृष्टि से मैं कुछ समय शान्त रहा। मई, 2009 में बेचैनी हुई कि इस धोखे से चुप तो नहीं बैठ सकता। जून शुरू में मैने ए के गुप्ता (इलाहाबाद के नामी वकील श्री अरुण कुमार गुप्ता) और गिरधर मालवीय के जरिए नैनीताल हाईकोर्ट में पटीशन डाल दी। सोचा कि कुछ नहीं होगा, तो आषाढ़ पूर्णिमा (गुरू पूर्णिमा) से पुनः उपवास शुरू कर दूँगा।

चार जुलाई, 2009 को बनारस के गणमान्य लोगों ने महन्त मिश्र के घर बैठक की। जालान जी, अविमुक्तेश्वरानंद जी वगैरह सब आये। उन्होंने कहा कि एक महीने का समय दो। उनके आश्वासन पर मैंने एक माह के लिये उपवास स्थगित कर दिया। आश्वासन हस्ताक्षरित था, किन्तु आश्वासन पर उन्होंने कुछ नहीं किया।

उधर नैनीताल हाईकोर्ट की डेट पड़ी। चीफ जस्टिस रिटायर हो रहे थे। उन्होंने सोचा कि क्यों सरकार के विरोध में करें; टाल दिया। सितम्बर की तारीख दे दी। मैं पुनः बनारस चला गया।

महन्त मिश्र जी के यहाँ रुका था। शुरू करने के दिन अविमुक्तेश्वरानंद जी मिलने गया। उन्होंने कहा कि स्वरूपानंद जी का फोन आया था कि काम तो बन्द है, क्यों उपवास करते हो?

मैने कहा - “बारिश के कारण काम बन्द है। आदेश तो है नहीं।’’

उन्होंने कहा - “नहीं, स्वरूपानंद जी की बात हो गई है। प्रधानमंत्री जी ने कहा है।’’ अविमुक्तेश्वरानंद जी ने शंकराचार्य जी से मेरी बात करा दी। शंकराचार्य जी ने कहा - “हाँ, प्रधानमंत्री जी ने मान लिया है।’’

मैंने विश्वास किया और उनका आदेश मान अनशन भी स्थगित कर दिया।अगले दिन प्रेस कान्फ्रेंस हुई। प्रेस ने पूछा- ‘कैसे विश्वास करें?’

मैने कहा- “शंकराचार्य जी ने कहा है कि प्रधानमंत्री जी ने कहा है, तो मैंने मान लिया; वरना यदि लिखित देकर भी मुकर जाएँ, तो क्या करेंगे?’’

 

फिर टूटा विश्वास


फिर मैं दिल्ली आ गया। पता चला कि हाँ, कुछ मशीनें हटा दी हैं। लेकिन यह सब नाटक था। अक्टूबर तक काम बन्द रहा; उसके बाद फिर शुरू हो गया। मेरे लिये संकट था कि अब क्या करुँ। पत्रकार.. मित्रगण पूछने लगे कि अब क्या करोगे?

यह 2009 तक की कथा है।
संवाद जारी...

अगले सप्ताह दिनांक 21 फरवरी, 2016 दिन रविवार को पढ़िए स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद शृंखला का छठा कथन

प्रस्तोता सम्पर्क :
ईमेल : amethiarun@gmail.com
फोन : 9868793799

इस बातचीत की शृंखला में पूर्व प्रकाशित कथनों कोे पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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