सतत विकास और उत्पादकता बढ़ाने हेतु भारत में टपकदार सिंचाई विधि विकल्प

Submitted by Hindi on Tue, 02/16/2016 - 13:33
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Source
जल चेतना तकनीकी पत्रिका, जनवरी 2014

सिंचाईपृथ्वी पर इस समय 140 करोड़ घन मीटर जल है। इसका 97 प्रतिशत भाग खारा पानी है, जो समुद्रों में स्थित है। मनुष्यों के हिस्से में कुल 136 हजार घन मीटर जल ही बचता है। पूरे विश्व में पानी की खपत प्रत्येक 20 साल में दोगुनी हो जाती है, जबकि धरती पर उपलब्ध पानी की मात्रा सीमित है। शहरी क्षेत्रों, कृषि क्षेत्रों और उद्योगों में बहुत ज्यादा मात्रा में पानी बेकार होता है। जलवायु परिवर्तन के कारण कृषकों के लिये जल आपूर्ति की भयंकर समस्या उत्पन्न हो जाएगी तथा बाढ़ एवं सूखे की बारम्बारता में वृद्धि होगी। भारत में सिंचाई के परम्परागत विधियों के प्रयोग से भूजल स्तर में निरन्तर ह्रास परिलक्षित हो रहा है। गिरते भूजल स्तर और वर्षा के अभाव में फसलों में सिंचाई करना बहुत कठिन हो गया है। भारत में कुल उपज क्षेत्र का 36 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र है।

आज के बदलते परिवेश में जहाँ सम्पूर्ण उपयोगी जल का 83 फीसदी कृषि कार्य में प्रयोग होता है वहीं हमारे सामने जल की गुणवत्ता को बनाए रखना एक चुनौती पूर्ण कार्य है। बढ़ती हुई जनसंख्या की खाद्यान्न पूर्ति एवं गिरते हुए जलस्तर की रोकथाम हेतु हमें सिंचाई के परम्परागत (अप्लावन, कुंड, एवं क्यारी) विधियों को त्याग कर सिंचाई के नए विकल्पों को अपनाना होगा। सिंचाई के नए विकल्पों में ड्रिप सिंचाई (टपकदार) और स्प्रिंकलर (बौछारी) सिंचाई प्रमुख है। टपकदार सिंचाई में जल को पौधों के जड़ क्षेत्र (रूटजोन) में बूँद-बूँद करके पहुँचाया जाता है। इस विधि का विकास इज़राइल में किया गया था। वृहद प्रयोगात्मक स्तर पर 1869 ई. में इसे जर्मनी द्वारा अपनाया गया। जलस्तर के गिरते हुए प्रारूप को देखते हुए यह विधि अन्य देशों में भी लोकप्रिय होती जा रही है।

सिंचाई की यह विधि ऊसर, रेतीली मृदाओं व बागों की सिंचाई के लिये अत्यन्त उपयोगी है। इस विधि में पी.वी.सी. की पाइप लाइन खेत में बिछाई जाती है और आवश्यकतानुसार जगह-जगह पर नाॅजिल लगाए जाते हैं। नाॅजिल से जल निकल कर मृदा को धीरे-धीरे नम करता है। इस विधि द्वारा सिंचाई करने से 35-75 प्रतिशत पानी की बचत होती है। यह विधि ऊँची-नीची मृदाओं के लिये उपयुक्त है। पिछले 15 से 20 वर्षों में इस तरह की सिंचाई विधि की भारत के विभिन्न राज्यों में लोकप्रियता बढ़ी है। आज 3.51 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल ड्रिप सिंचाई के अन्तर्गत आता है जो कि 1960 ई. में 40 हेक्टेयर था। भारत के राज्यों में ड्रिप सिंचाई के अन्तर्गत सर्वाधिक क्षेत्रफल वाले मुख्य राज्य महाराष्ट्र (94 हजार हेक्टेयर), कर्नाटक (66 हजार हेक्टेयर) और तमिलनाडु (55 हजार हेक्टेयर) हैं। इसमें स्त्रावण एवं वाष्पन न्यूनतम होता है। उत्सर्जक ड्रिप सिंचाई के द्वारा 30-40 प्रतिशत तक उर्वरक की तथा 60-80 प्रतिशत श्रम की बचत के साथ उपज में 90 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। इसके अन्य लाभों में खरपतवारों पर नियंत्रण प्रमुख है।

.सिंचाई तंत्र में विभिन्न कार्यों को सम्पादित करने हेतु इसके बहुत से सहायक अवयव होते हैं जैसे उत्सर्जक (ड्रिपर), शीर्ष नियंत्रण इकाई, छत्रक, प्रक्षालन इकाई, दाब मापी फिटिंग वाॅल्व और उर्वरक अन्तर्क्षेपक यंत्र आदि। पौधों की वृद्धि के लिये आवश्यक मृदा नमी का वांछित स्तर बनाए रखने हेतु तंत्र से दबाव के साथ कम दर (2 से 20 लीटर प्रति घंटा) से जल दिया जाता है। सिंचाई की इस विधि में जल को बूँद-बूँद करके जल उत्सर्जक की सहायता से सीधे पौधों की जड़ों तक पहुँचाया जाता है। ड्रिप सिंचाई के अन्तर्गत फल वाली फसलों जैसे - केला, आम, बेर, अंगूर, अमरूद, शहतूत, सेब एवं अनार इत्यादि, सब्जियों वाली फसलों जैसे - खीरा, लौकी, कद्दू, टमाटर, फूलगोभी, बन्दगोभी, भिंडी, आलू, प्याज, बैंगन, कपास, गन्ना एवं मूँगफली आदि तथा अन्य फसलों जैसे - गुलाब, रजनीगन्धा, आदि को सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। किन्तु इस सिंचाई विधि को अपनाने में तकनीकी ज्ञान, स्वच्छ सिंचाई जल तथा अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है। दूसरे प्रमुख सिंचाई विधि के रूप में बौछार या छिड़काव सिंचाई विधि हैं।

इस विधि के द्वारा हवा में फव्वारे के रूप में पानी का छिड़काव किया जाता है जो मृदा की सतह पर कृत्रिम वर्षा के रूप में गिरता है। इस विधि में पानी का कृत्रिम वर्षा के रूप में छिड़काव किया जाता है जिससे पानी का समान वितरण होता है तथा कहीं पर भी पानी जमा नहीं होता है। इस विधि की रूपरेखा में पम्प मोटर मुख्य रेखा, फव्वारा निकाय आदि प्रमुख होते हैं। इसका प्रयोग करने से सिंचाई जल की लगभग 30-70 प्रतिशत तक बचत होती है। सिंचाई की इस विधि का प्रयोग रेतीली मृदा, ऊँची-नीची जमीन और जहाँ पर पानी की उपलब्धता कम है, वहाँ पर किया जा सकता है। इस विधि का प्रयोग विभिन्न फसलों जैसे कपास, मूँगफली, तम्बाकू तथा फूलों वाली फसलों की सिंचाई के लिये किया जाता है। इस विधि में यह विशेष ध्यान रखना होता है कि सिंचाई करते समय वायु की गति तेज नहीं होनी चाहिए। सिंचाई की इस विधि में कवकनाशी, कीटनाशी तथा उर्वरकों का प्रयोग आसानी से किया जा सकता है। रेगिस्तानी इलाकों के लिये सिंचाई की यह विधि अति उत्तम मानी जाती है। अतः रेगिस्तानी इलाकों के लिये सिंचाई की इस विधि की सिफारिश की जाती है।

संपर्क - श्री अजय कुमार मिश्र, केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसन्धान संस्थान, करनाल - 132 001, हरियाणा

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