सदानीरा बनेगी नदी

Submitted by Hindi on Thu, 02/18/2016 - 13:24
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Source
जल चेतना तकनीकी पत्रिका, जुलाई 2014

सदानीरा बनेगी नदी जल ही जीवन है। जल जब होता है तो उसका महत्व समझ नहीं आता है मगर जब संकट आता है तो जल की उपयोगिता पता चलती है। जल को पानी, नीर या किसी भी नाम से पुकारें, यह हमारे अस्तित्व का पर्याय है और इसे हमें मानना और समझना चाहिए। पानी की निरंतर होती कमी और पानी के लिए दिनोदिन होते संघर्ष ने हमारी चेतना को जागृत करने की कोशिश की है और हम पानी के प्रति सचेत हुए हैं।

पेयजल की स्थिति में रतलाम शहर सौभाग्यशाली है ,जिसे धोलावाड़ जैसा जलाशय सच्चे साथी के रूप में मिला है। जिस तरह सच्चा साथी सुख और दुःख दोनों समय साथ देता है,उसी तरह धोलावाड़ जलाशय भी हर समय पानी उपलब्ध कराता है। जिले के आदिवासी अंचल सैलाना में स्थित यह जलाशय न सिर्फ एक शहर को पानी उपलब्ध कराता है बल्कि यह इस अंचल के लिए सिंचाई का प्रमुख स्त्रोत भी है। यहां उल्लेखनीय है कि यह इलाका जिसमें धोलावाड़ जलाशय स्थित है यह डूंगर यानी पठारी क्षेत्र है। यहां की भूमि पथरीली है। किसान जो कि अधिकांश आदिवासी समाज के हैं उनका मुख्य कार्य खेती ही है। लेकिन पानी की कमी के कारण यहां के किसानों को गर्मी के मौसम में मजदूरी के लिए राजस्थान और गुजरात की ओर पलायन करना पड़ता है। यहां से इन दोनों प्रदेशों की सीमा लगती है, इसलिए मजदूरी के लिए यहां जाना सुगम होता है। यह सिलसिला यूं ही चलता रहता अगर अस्सी के दशक में यहां धोलावाड़ जलाशय की नींव न रखी जाती। यह जलाशय बना तो इस क्षेत्र की दशा ही बदल गई। मगर कब तक! आखिर कब तक यह जलाशय हमें पेयजल उपलब्ध कराता रहेगा। किसी भी पेड़ से फल पाने के लिए उसकी जड़ों को सींचना होता है। धोलावाड़ से पानी निरंतर मिलता रहे इसके लिए आवश्यक है कि हम इसके संवर्धन के लिए कार्य करते रहें और इसके संरक्षण की कोशिश करें। इस जलाशय और इसकी जिंदगी के साथ संवाद किया जाए।

धोलावाड़ जलाशय में वर्षा जल का संग्रहण किया जाता है। बारिश में औसतन इस इलाके में 35 से 40 इंच तक की वर्षा होती है। बीच में कुछ सालों में अल्पवर्षा की स्थिति बनी मगर अमूमन इधर अच्छी वर्षा होती रही है। वर्षा से यह तालाब पूरा भरा जाता है और साल भर पूरे इलाके और यहाँ से लगे रतलाम शहर को निरंतर पानी देता रहता है। इस तालाब में वर्षा के दौरान आने वाला जल मुख्य रूप से जिस नदी से आता है वह है जामड़ नदी। यानी धोलावाड़ में आने वाले पानी का प्रमुख केंद्र है जामड़ नदी। जामड़ नदी का उद्गम स्थल गोपालपुरा ग्राम पंचायत का नेपाल ग्राम है। यहां से प्रारंभ हो कर जामड़ नदी 27 किलोमीटर का सफर तय करती है। यह इस सफर में 27 गांवों को लाभांवित भी करती है। इस नदी की राह में कई सुंदर स्थान भी हैं जो कुदरत की सौंदर्य गाथा कहते हैं।

जामड़ नदी का जलग्रहण क्षेत्र लगभग 183.81वर्ग किलामीटर है। लगभग 8 हजार हेक्टेयर क्षेत्र की भूमि पर खेती जामड़ नदी से ही हो पाती है। इस क्षेत्र में 2 हजार 172 हेक्टेयर क्षेत्र में रबी की तथा 7 हजार 334 हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ की फसल होती है। ग्राम नेपाल से धोलावाड़ तक जामड़ पहुँचती है तो रास्ते में 6 बड़े नालों का पानी भी इसमें शामिल हो कर इसकी ताकत बढ़ाता है।

जामड़ से हो कर पानी धोलावाड़ जलाशय में पहुंचता है। धोलावाड़ जलाशय की लंबाई 1360 मीटर तथा वेस्ट वेयर 78.50 मीटर है। डेम की उंचाई जमीन से 33.40 मीटर तथा निर्मित 19.50 मीटर है। इस जलाशय को जीवनदायक कहा जाता है क्योंकि इससे वर्षभर रतलाम शहर को पानी मिलता है। इससे कुल 6 हजार 520 हेक्टेयर क्षेत्र उपचारित होता है। इससे खरीफ की 1398 हेक्टेयर तथा रबी की 5 हजार 122 हेक्टेेयर क्षेत्र में फसलें ली जाती है। इस जलाशय का लाभ यहाँ के किसानों को मिलता रहे इसलिए जलाशय से नहरें निकाली गई हैं। ये नहरें धोलावाड़ के क्षेत्र रावटी, बासिन्द्रा, शिवगढ़, उमर, रानीसिंग आदि क्षेत्रों में बनाई गई है। धोलावाड़ से निकलने वाली नहरों में जब पानी दौड़ता है तो आदिवासी अंचल के किसानों के चेहरों पर हंसी बिखरने लगती है।

धोलावाड़ जलाशयइस जीवनदायी जलाशय को सदाबहार बनाने के लिए आवश्यक है कि इसके प्रमुख स्रोत जामड़ नदी को सदानीरा बनाए रखा जाए। जामड़ नदी का पानी वर्षा के दौरान तो काफी होता है पर वर्षा के कुछ समय बाद यह नदी वीरान नज़र आती है। नदी के सूखने से इससे लगे जीवन में भी वीरानगी हो जाती है। इस बात को शिद्दत से महसूस किया गया और यह सोचा गया कि किस तरह जामड़ नदी को वर्षभर जीवंत बनाए रखा जा सके। जामड़ नदी में पानी बहता रहे इसके लिए समन्वित प्रयास प्रारंभ किए गए। जिला प्रशासन एवं जिला पंचायत रतलाम ने जामड़ नदी को पानीदार बनाए रखने के लिए प्रयास प्रारंभ किए। जामड़ नदी को पुनर्जीवित करने के लिए बनाई गई कार्य योजना के अनुसार इस नदी की राह में आने वाले क्षेत्रों जैसे ग्राम पंचायत गोपालपुरा, ईसरथूनी, जामथुन, जुलवानिया, रामपुरिया, बंजली, पलसोड़ी, आमलीपाड़ा, राजपुरा, धामनिया, बिबडौद, खेतलपुर में ऐसी संरचनाएं बनाना प्रारंभ किया गया, जिससे जामड़ नदी को सहारा मिल सके। ग्रीष्म ऋतु में जामड़ का सूखना उन सभी चेहरों का मुरझाना है जो इसी पर आश्रित हैं। आज की स्थिति में करोड़ों की लागत वाले धोलावाड़ जलाशय की अहमियत तभी तक है, जब तक जामड़ में पानी है।

पुनरूत्थान की योजना


जामड़ नदी को नदी पुनर्जीवन योजना (रिवर रिवायवल स्कीम) के तहत शामिल किया गया। प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने इस नदी को सदानीरा बनाने के कार्य की शुरूआत प्रदेश स्तरीय जलाभिषेक कार्यक्रम में की। प्रथम चरण में जामड़ से धोलावाड़ बांध तक के 27 किलोमीटर लम्बे भाग को शामिल किया गया। इसका केचमेंट एरिया 183.81 वर्ग किलोमीटर है। जामड़ नदी के पुनरूत्थान के लिए 17.90 करोड़ की विस्तृत कार्ययोजना बनाई गई है। जनसहयोग के आधार पर जिले में 1.20 करोड़ की लागत के 21 तालाबों का निर्माण कार्य प्रारंभ किया जा चुका है। इनमें से 5 तालाब जामड़ नदी के केचमेंट एरिया में जनसहयोग से बनने की शुरूआत हुई, जिनकी लागत 18.50 लाख है। इसके साथ ही सतही जलसंवर्धन एवं भू-जल संरक्षण की विभिन्न संरचनाओं पर सात लाख रूपए व्यय किए जा चुके हैं। यह योजना इस उम्मीद के साथ बनाई गई है कि इससे निश्चित रूप से जामड़ नदी का रूप निखरेगा। जामड़ का उद्गम स्थल प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। यहां बनाए गई जलसंरचनाएं वर्षाकाल में नैसर्गिक आनंद की अनुभूति कराती है। यहां से लगा हुआ क्षे़त्र है ईसरथूनी। यहाँ प्राकृतिक झरना नागरिकों के लिए पिकनिक स्पाॅट बन गया है। इस इलाके को देखने के लिए वर्षाकाल में दूर-दूर से लोग आते है। इसका यह लाभ हुआ कि जो लोग अपने जलाशयों और नदियों के प्रति अब तक अनभिज्ञ थे वे भी इस बात को महसूस करने लगे हैं कि पानी की कद्र ज़रूरी है। जल के प्रति जागरूकता बढ़ाने में भी इस प्रयास ने अहम भूमिका निभाई है।

सहेजने की परंपरा


सभी प्राणियों के जीवन को बचाने के लिए किए जाने वाले किसी भी प्रकार के प्रयासों को सभी का साथ मिलता है तो यह एक परम्परा को सहेजने का काम होता है। जामड़ नदी के संरक्षण के लिए यहाँ के नागरिकों का अपार स्नेह और सहयोग प्राप्त हो रहा है। यहाँ के जलाशयों और जलसंरचनाओं से सहेजने में स्थानीय नागरिकोें का महत्वपूर्ण सहयोग प्राप्त हो रहा है। लोग इस बात को समझ चुके हैं कि यदि ये स्रोत जीवित रहेंगे तो उन्हें पर्याप्त पेयजल मिलेगा और सिंचाईं में सहायता मिलेगी। नदी से जुड़े स्थानों का भू-जल स्तर बढ़ेगा। अन्य जल स्रोतों का भी स्तर बढ़ेगा। इस बात को क्षेत्र के लोग भी समझने लगे हैं। गोपालपुरा के ही एक किसान श्री कचरूजी ने तो अपने ही खेत में सवा बीघा क्षेत्र में करीब एक लाख रूपए स्वयं व्यय कर तालाब बना डाला। अब क्षेत्र के लोग कचरूजी को भागीरथ कृषक के रूप में जानते हैं। इन्हें मुख्यमंत्री ने सम्मानित भी किया है। इनसे प्रेरणा ले कर कुछ और किसान अपने खेतों में अपने व्यय से तालाब बना रहे हैं। लोग अब जान चुके हैं कि जामड़ नदी को पुनर्जीवन प्रदान करने से समूचे क्षेत्र को जीवन मिलेगा। जन और जानवर ही नहीं, यह ज़मीन, जंगल भी मुस्कुराने लगेंगे। प्रकृति भी तभी अपना आशाीष प्रदान करेगी। जामड़ के पुनर्जीवन के लिए किए जा रहे प्रयासों को अभी सफलता इस मायने में मिलने लगी है कि यहाँ के लोगों में पानी के प्रति और जलस्रोतों के प्रति अपनत्व का भाव आया है। लोग अब अपने खेतों में पानी के लिए जलसंरचनाओं का निर्माण करने लगे है। इसके साथ ही खेती के प्रति भी रूझान बढ़ा है। पानी रहने से सालभर किसी न किसी फसल को यहां के किसान प्राप्त कर रहे हैं। जामड़ को अभी पूरे साल प्रवाहमान बनाने के लिए निरंतर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। ये प्रयास यहाँ तक पहुंचे हैं तो वह दिन भी दूर नहीं जब सालभर इस नदी में पानी दौड़ता रहेगा और हर समय लोगों के चेहरों पर मुस्कान बिखरी रहेगी।

स्रोत संदर्भ - जिला प्रशासन एवं जिला पंचायत रतलाम द्वारा उपलब्ध आँकड़े।

सम्पर्कः 39 नागर वास, रतलाम: 457001, मो. 98270 84966, ईमेल-ashish.dashottar@yahoo.com

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