एक गाँव में सात सौ बोरिंग

Submitted by RuralWater on Thu, 02/18/2016 - 15:45
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. क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि ढाई हजार की आबादी वाले छोटे से गाँव नानूखेडा में कितने बोरिंग हो सकते हैं, ज्यादा-से-ज्यादा पचास–साठ लेकिन आप चौंक जाएँगे कि इस अकेले गाँव में ही सात सौ से ज्यादा बोरिंग हैं। इतना ही नहीं मध्य प्रदेश के देवास जिले की बागली तहसील के नानूखेडा के आसपास घाट ऊपर के इलाके में करीब 70 वर्ग किमी के पचास गाँवों में करीब ढाई हजार से ज्यादा बोरिंग बीते सालों में हुए हैं। इनमें से ज्यादातर सूखे हुए हैं।

नानूखेडा गाँव कभी दूर–दूर तक फैले अपने हरे– भरे खेतों के लिये पहचाना जाता था लेकिन अब ज्यादातर खेत सूखे उजाड़ पड़े हैं। पानी की कमी से अब यहाँ ज्यादातर किसान एक ही फसल कर पाते हैं। यहाँ करीब साढ़े चार सौ किसान परिवार हैं। इनमें से पचास किसान ऐसे हैं, जिनके पास 40–50 बीघा तक जमीनें हैं।

गाँव में वे सक्षम किसान माने जाते हैं पर पानी की कमी ने इनकी हालत भी पतली कर दी है। बड़े काश्तकारों की हालत यह है तो छोटे और मझोले किसानों के सामने तो परिवार की रोटी का ही संकट अब बड़ा होने लगा है।

बागली और उसके आसपास छतरपुरा, नयापुरा, चारिया, आगुरली, देवगढ़, नानूखेड़ा, टप्पा, हारियाखो, करोंदिया, बड़ी, अवल्दा, अवल्दी, गुनेरा, बेहरी, लखवाड़ा जैसे करीब 40-50 गाँव हैं, जहाँ बीते डेढ़ महीनों में पाँच सौ से ज्यादा बोरिंग किये गए हैं। मोटे तौर पर यहाँ हर गाँव में पहले से ही दो सौ से तीन सौ तक ट्यूबवेल मौजूद हैं। उसके बाद भी बड़े तादाद में बोरिंग किये जा रहे हैं। बीते साल प्याज–लहसून और आलू के अधिक भाव होने से यहाँ ज्यादातर किसानों ने इसे बोया है। भूजल स्तर में कमी को किसान इससे जोड़कर भी देख रहे हैं क्योंकि इसमें पानी की खपत गेहूँ–चने की फसल से ज्यादा होती है।

कभी पग-पग रोटी, डग–डग नीर के लिये पहचाने जाने वाले मध्य प्रदेश के इस मालवा इलाके में इन दिनों भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। इससे इलाके में पानी की कमी तो महसूसी जा रही है लेकिन इसका सबसे बड़ा खामियाजा यहाँ के किसानों को उठाना पड़ रहा है। किसान परेशान हैं कि साल-दर-साल उन्हें नए बोरिंग कराने पड़ रहे हैं। कई किसान लगातार बोरिंग कराने से उनकी आर्थिक हालत बद-से-बदतर होती जा रही है।

इलाके के पत्रकार गगन शिवहरे बताते हैं कि बोरिंग करने वाले बाहर से आते हैं और अमूमन 65 रुपए प्रति फीट की दर से नगद राशि लेते हैं। इस तरह एक बोरिंग पर करीब बीस से तीस हजार रुपए तक खर्च होते हैं। ऐसे में सहज ही अन्दाज़ लगाया जा सकता है कि किसानों की गाढ़ी कमाई का कितना पैसा वे सिर्फ अपने खेत को पानी देने के लिये बहा चुके हैं। इलाके में इसे किसानों की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण बताया जाता है। किसान कंगाल हो रहे हैं तो बोरिंग करने वाले निहाल। जमीन में पानी बताने वाले ओझा–पडियारों की भी जमकर चाँदी हो रही है। लोग बोरिंग कराने से पहले उनसे पानी का ठिकाना ढूँढवाते हैं और बदले में वे किसानों से मोटी रकम वसूलते हैं।

धरती का सीना छलनी करते रहने से अब यहाँ का जमीनी जलस्तर भी 600 से 800 और कहीं–कहीं एक हजार फीट तक चला गया है। नयापुरा के सुरेश नेता के खेत में एक हजार फीट तक बोरिंग कराना पड़ा है तो यहीं धर्मेन्द्र, राजाराम और अम्बाराम के खेत में करीब 800 फीट तक। कमोबेश यही स्थिति धावड़ियाखेड़ा, पांजरिया और बावड़ीखेड़ा की भी बताई जाती है।

बागली अनुभाग में इस बार चालीस इंच बारिश हुई है और प्रशासन के मुताबिक यह सामान्य बारिश है। इसे सूखाग्रस्त क्षेत्र नहीं माना जा सकता फिर भी यहाँ भूजल स्तर लगातार गहरे तक धँसता जा रहा है। पानी की कमी से लोगों की फसलें लगातार सूख रही हैं। अपनी फसल को सूखने से बचाने की जुगत में किसान जैसे–तैसे पानी की व्यवस्था करना चाहता है। पुराने बोरिंग सूखते जा रहे हैं और हर साल सैकड़ों नए होते जा रहे हैं। बार–बार धरती का सीना छलनी किया जा रहा है।

प्याज की सूखती फसल को देखता फूलियाकई किसान परिवारों ने कर्ज लेकर बोरिंग कराए हैं तो कई परिवारों में औरतों के गहने तक बिक चुके हैं। बोरिंग से पानी की आस में कई किसानों की तो जमीनें तक बिक चुकी हैं। बागली के पास बसे नयापुरा गाँव के किसान रमेश से मिलिए। उसकी आँखों में पानी का इन्तज़ार की पीड़ा साफ़ नजर आती है। रमेश बताते हैं कि कुछ सालों पहले तक पानी की कोई परेशानी नहीं हुआ करती थी। खेत पर बने कुएँ पर उनके बाप–दादा चरस से सिंचाई करते थे और इतनी उपज आती थी कि खलिहान और कोठे–गोदाम भर जाया करते थे। लेकिन बीते कुछ सालों में कुएँ में पानी लगातार कम होता चला गया और खेत को पानी देने के लिये ट्यूबवेल कराना पड़ा।

बीते सात सालों से वह हर साल बोरिंग कराते रहे हैं पर कभी पर्याप्त पानी नहीं मिला। रमेश अब नाउम्मीद होते जा रहे हैं। वे बताते हैं कि उन्होंने अपनी पचास बीघा जमीन में इन सात सालों में 75 बोरिंग करवाए हैं। सात बोरिंग तो अभी बीते महीने ही करवाए हैं। उन्होंने अप्रैल में उज्जैन के सिंहस्थ में माँग को देखते हुए अपने खेत पर आलू लगाए हैं। प्याज और लहसुन भी लगाई है पर इनके लिये अब पानी कहाँ से लाऊँ। इनमें सामान्य फसलों के मुकाबले ज्यादा पानी की जरूरत होती है। मेरी आँखों के सामने खेत में खड़ी फसल सूख रही है। कुएँ में आड़े बोर भी लगवाए पर पानी नहीं मिला तो नहीं मिला। जमीन में भले ही पानी न हो पर बातें करते हुए रमेश की आँखों में बरबस पानी छलछला आता है।

कमोबेश यही स्थिति बागली में गाँधीनगर के देवकरण राठौर की है। उनके खेत पर करीब एक सौ साल पुराना सौ फीट का कुआँ है। यह कुआँ इलाके भर में मशहूर है। कितने ही अकाल आये और चले गए पर कभी इस कुएँ में पानी खत्म नहीं होता। देवकरण के परिवार की पचास बीघा जमीन पर इसी से सिंचाई होती रही है। बुजुर्ग बताते हैं कि बीते साठ सालों में कभी उन्होंने इस कुएँ का तल तक नहीं देखा था। पर इस बार यह कुआँ भी अभी से सूख चुका है। इसकी तली अब सूखी पड़ी है। लोगों को पता चला तो कई बुजुर्ग खेत तक इसकी तली देखने ही आये। कुएँ के साथ छोड़ने के बाद उन्होंने अपनी जमीन में तीन बोरिंग करवाए, पर हर बार धूल-ही-धूल उड़ती नजर आई। पानी का नामोनिशान नहीं मिला। हारकर उन्होंने कुएँ के तल में आड़े बोरिंग करवाए पर यहाँ भी कुछ नहीं। वे निराश होकर कहते हैं– जैसे पानी हमारी किस्मत पर ही फिर चुका है। तभी तो एक लाख रुपए खर्च करने के बाद भी हम वहीं-के-वहीं हैं।

पास के ही चारिया गाँव के आदिवासी किसानों की हालत तो और भी बुरी है। यहाँ के आदिवासी केरिया ने अपने और परिवार की मेहनत से करीब 40 फीट गहरा कुआँ की खुदाई की लेकिन सब बेकार। यह भी सूखा ही पड़ा है। इसमें चुल्लू भर पानी भी नहीं है। केरिया का भाई फूलिया बताता है कि कुएँ में पानी देखकर प्याज की फसल लगाई थी पर अब बीच में पानी खत्म हो गया। फसल पानी के अभाव में सूख रही है। हमारे पास बोरिंग कराने लायक पैसा नहीं है, अब क्या करें।

विधायक चम्पालाल देवड़ा बताते हैं कि साल-दर-साल बागली इलाके के इन 50 गाँवों में पानी गहरे से गहरा धँसता जा रहा है। इस बार बारिश ठीक होने के बाद भी बीते एक महीने में ही जलस्तर तेजी से लूढ़का है। लोगों को समझ नहीं आ रहा है कि यहाँ की धरती का पानी आखिर गया कहाँ। इससे पहले कभी इस तरह फरवरी तक ही पानी खत्म नहीं हुआ था। इसने किसानों की कमर तोड़ दी है। अभी से ये हालात हैं तो फिर गर्मियों में क्या होगा। यह सवाल सभी को मथ रहा है।

बड़ी के किसान अम्बाराम चौधरी के पास केवल 6 बीघा जमीन है। अब तक उनके कुएँ से ही काम चल जाया करता था लेकिन बीते दो सालों में खेत के आसपास सात बोरिंग करवाए हैं। दुर्भाग्य से किसी में भी पानी नहीं निकला। अब उनके ऊपर कर्ज भी चढ़ गया है। श्यामनगर में तो बस्ती से लगे एक खेत में बोरिंग होने से उनके यहाँ पीने के पानी की ही दिक्कत हो गई। ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर को जन सुनवाई में शिकायत की है कि पास के एक खेत में बोरिंग होने से उनके ट्यूबवेल में पानी की आवक स्रोत ही बन्द हो गई। अब लोग पीने का पानी कहाँ से लाएँ।

हालात बहुत बुरे हैं। जहाँ कभी 200 से 300 फीट पर पानी ही पानी हुआ करता था, अब वहीं धरती के रगों में बहने वाला पानी गहरे तक धँसते–धँसते एक हजार फीट तक जा पहुँचा है। अब भी समय है कि हम धरती के पानी की सीमाओं को पहचाने तथा उसके मनमाने दोहन को रोकें नहीं तो धरती का सीना छलनी करने पर भी पानी नसीब नहीं हो सकेगा।
 

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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