औरतों ने खोदा अपने लिये कुआँ

Submitted by RuralWater on Sat, 02/20/2016 - 13:11

26 साल की फूलवती अपने हाथों के छाले दिखाते हुए कहती है कि इनका दुःख नहीं है, ये तो कल ठीक हो जाएँगे पर हमारे अपने कुएँ में पानी हिलोरे लेगा, इसकी खुशी है। इस तरह कड़ी मेहनत करते हुए एक महीना बीत गया था पर पानी का नामोनिशान नहीं था। पानी भले ही न हो लेकिन औरतों में उम्मीद बाक़ी थी। वे फिर भी जुटी रही। जैसे–जैसे दिन गुजर रहे थे। आदमी लोग उन्हें ताने मारते, तंज कसते पर अब बात इज्जत की थी। औरतों ने हार नहीं मानी और आखिरकार 40वें दिन औरतों की भी किस्मत जागी। मध्य प्रदेश के पश्चिम निमाड़ खंडवा जिले का खालवा गाँव में पानी खत्म हो गया तो वहाँ की औरतों को अपने सिर पर मटका रखकर दूर–दूर से पानी लाना पड़ता था। एक दिन सब औरतें बैठीं और मिलकर उपाय सोचने लगी। उन्हें लगा कि समस्या का पार पाना है तो सबको साथ मिलकर ही कोई रास्ता निकालना होगा। आनन–फानन में योजना बनी कि हम दूर कुएँ तक नहीं जाएँगी, बल्कि कुएँ को ही गाँव में ले आएँगी और यही उन्होंने किया भी। हालांकि यह इतना आसान भी नहीं था।

हिन्दी के कवि प्रेमशंकर शुक्ल की कविता है पानी का मतलब। इसमें वे कहते हैं कि-

पानी का मतलब
दुनिया को मतलब देना है
और आदमी को बचाना है
मतलबी होने से
पानी का मतलब
एक तिहाई भू-भाग है
लेकिन घूँट भर की प्रयास को
सूखने नहीं देना उससे भी बड़ी चुनौती है


इस गाँव की इन औरतों ने इसी बात को जैसे सच कर दिखाया है। यहाँ की औरतों ने अपने परिवार की घूँट भर प्यास बुझाने के लिये आपस के मतलब मिटाकर पानी के लिये एकजुट होकर न केवल चट्टानों को तोड़ा बल्कि चट्टानों के बीच से अपने हिस्से का पानी भी उलीच लिया। इतना ही नहीं दो औरतों ने तो अपने हिस्से की जमीन भी कुआँ बनाने के लिये बकायदा शपथ पत्र लिखकर छोड़ दी।

करीब दो हजार लोगों की बस्ती पर पीने तक का पानी नहीं। गाँव के दोनों सरकारी हैण्डपम्प सूख गए। अब गाँव घड़े–घड़े पानी को मोहताज। पानी कहीं नहीं।

सरकारी अफसरों से मदद के लिये कहा पर कुछ नहीं हुआ। पंचायत ने भी हाथ खड़े कर दिये। पानी की किल्लत औरतों के लिये कोई एक–दो दिन की बात नहीं थी, धीरे–धीरे यह उनकी रोजमर्रा की जिन्दगी का अनिवार्य हिस्सा ही बन गई थी। पूरे गाँव में पानी कहीं नहीं था।

बरसात के दिनों में तो कुछ यहाँ–वहाँ से जुगाड़ हो भी जाता लेकिन बारिश का मौसम खत्म होते ही फिर वही पानी के लिये हाहाकार शुरू हो जाया करती। औरतों ने आदमियों से बात की पर कुछ नहीं हुआ। परेशानी तो रोज–रोज औरतों को ही उठानी पड़ती थी। कुएँ से पानी लाने का काम तो गाँव में औरतों के ही जिम्मे था। यहाँ तक कि दो से ढाई किमी दूर खेतों पर बने कुओं और ट्यूबवेल से उन्हें पानी लाना पड़ रहा था। और वहाँ भी कहाँ आसान था। कभी बिजली नहीं तो कभी खेत मालिक की मर्जी। पास के गाँव के एक खेत पर बने ट्यूबवेल से तो वही औरतें पानी भर पाती, जो हर साल ट्यूबवेल मालिक सूरज बघेल को बिजली के खर्चे के सौ रुपए दे सके।

गाँव के हैण्डपम्प सूखे तो औरतों ने पंचायत से गुहार लगाई कि गाँव में ही पानी के लिये कपिलधारा से एक कुआँ बन जाये तो उन्हें रोज की इस मशक्कत से निजात मिल जाएगी, पर इतना आसान कहाँ था उनके लिये। कपिलधारा के कुएँ के लिये कागज यहाँ से वहाँ दौड़ते रहे और बाद में न जाने कहाँ अटक गए। इधर औरतों के लिये एक–एक दिन भारी हो रहा था, पानी की व्यवस्था में। उन्हें हर दिन पानी की जुगाड़ में अपने खेती-बाड़ी और मेहनत–मजूरी के काम में देर सबेर हो जाती।

गाँव की औरतें पंचायत पहुँची पर कोई फायदा नहीं हुआ। पंचायत के पास न तो पैसा है और न ही कुछ करने की इच्छा। उन्होंने जगह–जगह अपनी बात रखी और अफसरों से आग्रह किया कि किसी तरह उनके गाँव में पीने भर के पानी का इन्तजाम हो सके लेकिन कहीं से कोई बात नहीं बनी। अफसर बात तो सुनते पर दिखवाते हैं, करवाते हैं जैसी बातें करते हुए टाल जाते। हर तरफ से निराश और हताश होने के बाद भी इन अनपढ़ और कम पढ़ी-लिखी औरतों ने हार नहीं मानी। वे फिर इकट्ठा हुई और उन्होंने अब ठान लिया कि वे गाँव में पानी अब खुद लाएँगी। बात बनी तो बीस औरतें कमर कसकर तैयार हो गईं।

पर कुआँ खुदेगा कहाँ। इस पर बात चल ही रही थी कि किसी ने कहा कि यदि गंगा बाई और उसकी जेठानी रामकली बाई के खेत के बीच कुआँ खोदा जाएगा तो अच्छा पानी निकल सकेगा। पर यह जमीन तो उनकी निजी है। बैठक में ही गंगा बाई भी मौजूद थी। उसने आगे बढ़कर कहा कि गाँव को पानी मिले, इससे बड़ी और क्या बात हो सकती है। मैं अपने हिस्से की जमीन कुएँ के लिये छोड़ने को तैयार हूँ। अब बारी रामकली बाई की थी। उसने भी गंगा बाई की बात का समर्थन किया और कहा कि गाँव को पानी देने के लिये वह भी अपने हिस्से की जमीन देने को तैयार हो गई। इस तरह दोनों की आधी–आधी जमीन पर कुआँ बनना तय हुआ।

बात यह भी उठी कि गाँव भर की औरतें एकजुट होकर तब तक कुएँ की खुदाई करेंगी, जब तक कि पानी की धार नहीं फूट आएगी। गाँव की सारी औरतें खुद श्रमदान करेंगी और पानी के लिये अपना पसीना बहाएगी लेकिन कहीं ऐसा न हो जाये कि पानी निकलने के बाद गंगा बाई और रामकली बाई उस कुएँ पर अपना अधिकार समझने लगे। इस पर 50 साल की गंगा बाई और 60 साल की रामकली बाई ने पास के कस्बे में बकायदा स्टांप लिखकर शपथ पत्र दिया कि यह कुआँ उनका नहीं होकर पूरे गाँव के इस्तेमाल के लिये होगा।

कुछ ही देर में यह बात हवा की तरह पूरे गाँव में फैल गई कि गाँव की औरतें अब अपने दम पर कुआँ खोदेगी और जमीन से पानी निकालेगी। गाँव के पुरुषों ने उनका विरोध किया और यहाँ तक कहा कि ये काम आसान नहीं है। मिट्टी तक तो खोद लेंगी पर जब धरती में नीचे चट्टानें आएँगी, तब क्या करेंगी। पुरुषों के लिये ही यह काम कठिन होता है तो ऐसे में घाघरा पल्टन यह काम कैसे करेगी। हर घर के पुरुषों ने अपने–अपने घरों की औरतों को रोकने की कोशिश की पर कोई औरत नहीं रुकी। उन्होंने तय कर लिया था, वही किया।

और इस तरह कुएँ की खुदाई शुरू हुई। पाँच हाथ फिर दस हाथ और इसी बीच निकली भारी भरकम और जिद्दी चट्टानें। पर औरतों ने हार नहीं मानीं। वे लगातार जुटी रहीं। बीस औरतें हर दिन अपने घरों के काम जल्दी निपटाकर आ पहुँचती और शाम होने तक गीत गाते, एक दूसरे का उत्साह बढ़ाते काम करती रहतीं। कुदाली, हथौड़ा, छैनी, सब्बल, सीढ़ी.. जिसके घर में जो था, वही लेकर आती रही।

26 साल की फूलवती अपने हाथों के छाले दिखाते हुए कहती है कि इनका दुःख नहीं है, ये तो कल ठीक हो जाएँगे पर हमारे अपने कुएँ में पानी हिलोरे लेगा, इसकी खुशी है। इस तरह कड़ी मेहनत करते हुए एक महीना बीत गया था पर पानी का नामोनिशान नहीं था। पानी भले ही न हो लेकिन औरतों में उम्मीद बाक़ी थी।

वे फिर भी जुटी रही। जैसे–जैसे दिन गुजर रहे थे। आदमी लोग उन्हें ताने मारते, तंज कसते पर अब बात इज्जत की थी। औरतों ने हार नहीं मानी और आखिरकार 40वें दिन औरतों की भी किस्मत जागी। आखिरकार जिद्दी चट्टानों को भी हार माननी पड़ी। कुएँ की तली से जैसे ही एक बड़ी चट्टान टूटी तो पानी की धार ने उन औरतों के फीके चेहरे भी खुशियों के रंग से सराबोर कर दिये।

गाँव की औरतों के इस काम में मदद करने वाली स्पंदन की सीमा प्रकाश कहती हैं कि यह काम आसान नहीं था पर औरतों ने कर दिखाया। 25 फीट तक खुदाई के बाद अभी काम रुका हुआ है पर गर्मियों में इसे फिर शुरू करेंगे। इसे पाँच फीट तक और खोदेंगे ताकि पूरे साल इसमें पानी बना रहे। अब तो औरतों के चेहरे की चमक और उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है।

यह तो खालवा की औरतों की कहानी पर अब भी ऐसे कई गाँव हैं, जहाँ पानी की किल्लत है और वहाँ की औरतें अब भी सरकार और सरकारी नुमाइंदों की ओर टकटकी बाँधे कुछ बदलने की उम्मीद में हैं। पर खालवा की कहानी हमें सीखाती है कि हम पक्का ठान लें तो अपनी किस्मत खुद लिख सकते हैं।

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ स

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