नर्मदा जी के बहाने नदी-चिन्तन

Submitted by RuralWater on Sat, 02/20/2016 - 15:24

नर्मदा जयंती पर विशेष


.‘‘जो आँखें भगवान को याद दिलाने वाली नदी का दर्शन नहीं कराती है, वो मोरों की पाँख में बने हुए आँखों के चिन्ह के समान निरर्थक है।’’ - श्रीमद् भागवत पुराण

भारत का नदी दर्शन क्या है? इसका जवाब हमारे वेद, पुराण, उपनिषद से लगाकर नर्मदा अष्टक और कालिदास रचित मेघदूत जैसे अनेक प्राचीन ग्रंथ दे देते हैं। भारत के प्राचीन साहित्य में नदियों को जिस बड़े दर्शन और दृष्टि के साथ देखा गया है- वह सब कुछ अद्भुत है।

हमने तथाकथित आधुनिक विज्ञान और तकनीकी के साथ प्रगति के जो क्षितिज स्पर्श किये हैं, वह हमें आज के वक्त प्रकृति के सामने थोड़ी-सी अहंकार मुद्रा में लाने का केवल भ्रम मात्र ही पैदा करते हैं। हमारे पुरखों ने जिस दिव्य दृष्टि के साथ नदियों को देखा और उसे समाज के सामने रखा- इन सब के सामने, हमारा आज का सच, वास्तविकता के धरातल पर बहुत और बहुत बौना नजर आता है।

भारत का नदी दर्शन किसी प्रवाहमयी नदी की कहानी भर नहीं है। वह आसमान से आने वाली बूँद और पुन: समुद्र से आसमान की ओर जाने वाले वाष्प कण की समग्र यात्रा का परिस्थितिकीय चिन्तन है। इस यात्रा के हर मोड़ पर, हर मुकाम पर नदी संरक्षण के दीर्घकालिक सूत्र- भारतीय दर्शन छिपे हुए हैं।

भगवान श्रीकृष्ण- भारत के लोक मानस में प्रमुख अवतार के रूप में पूजे जाते हैं। हमारे यहाँ गुरू ग्रंथ साहिब और श्रीमद् भागवत पुराण दो ऐसे ग्रंथ हैं, जो खुद ही भगवान का रूप हैं। भागवत पुराण का वाचन कहाँ हो- सबसे पहली प्राथमिकता नदी का किनारा होना चाहिए।

इसी भागवत जी में यदि यह कहा जाता है कि जो आँखें भगवान की याद दिलाने वाली नदी का दर्शन नहीं कराती है तो वे निरर्थक हैं। इसका सीधा-सा आशय यही है कि जब भी हम किसी नदी को देखते हैं, तो तुरन्त हमें ईश्वर का स्मरण हो जाना चाहिए। इसलिये भारत के लोक मानस में आज भी इस परम्परा का निर्वाह होता है, जिसमें नदी को देखते ही अपने आराध्य का स्मरण कर प्रणाम किया जाता है।

हमारे पुराणों में नदियों को लेकर यह मत व्यक्त किया गया है, इनमें स्नान, दर्शन, आचमन तो ठीक- स्मरण करने से भी पुण्य की प्राप्ति होती है। नदियाँ- इस देश में ‘वाटर बॉडी’ भर नहीं हैं। वे पुण्य सलिला, संस्कृति स्रोत, मोक्षदायिनी, जीवनदायिनी, प्रेरणा पुंज से प्रारम्भ होकर ‘नर्मदा माँ’ तक का भाव समाहित किये हुए रहती है। श्रीमद् भागवत पुराण में भगवान के विराट स्वरूप में कहा गया है कि समुद्र कोख है। पर्वत हड्डियाँ हैं। नदियाँ- धमनियाँ हैं। वृक्ष भगवान के रोम हैं।

जाहिर है, ईश्वर के विराट स्वरूप में समस्त प्राकृतिक संसाधन उनके अंश हैं। धर्मग्रंथों के माध्यम से यही सन्देश दिया गया है कि इस भाव के साथ हमें हर कीमत पर उनका संरक्षण करना है। यदि हम नदियों के साथ ठीक व्यवहार नहीं करते हैं तो हम भगवान की धमनियों को ‘ब्लॉकेज’ कर रहे हैं। जंगलों और वृक्षों पर मुसीबत आती है तो समझिए- हम भगवान के रोम-रोम को नोंचकर उन्हें कष्ट पहुँचा रहे हैं। प्रकृति संरक्षण के अद्भुत भाव अनेक ग्रंथों में दृष्टिगोचर होते हैं।

भारत की इन परम्पराओं में अकेले नदी भर नहीं, अपितु ‘नदी-परिवार’ की चिन्ता की गई है। नदी, बिना परिवार के कैसे जिन्दा रह सकती है? नदी के परिवार में पर्वत, जंगल, तालाब, कुण्ड, बावड़ी, खेत, मेढ़, नालों, अन्तर धाराएँ से लगाकर तो समुद्र और फिर बादल भी शामिल हैं। सूर्य देवता इस चक्र को संचालित करते हैं। मिट्टी इस चक्र को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कारण है। रामचरित मानस में तुलसीदास जी ने लिखा है-

‘बूँद अघात सहहि गिरी कैसे,
खल के वचन सन्त सह जैसे’


यह मनुष्य और पर्वत दोनों में जज्ब करने की क्षमताओं की ओर इशारा है। भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन के बहाने, इन्द्र प्रकोप के सन्दर्भों के साथ पर्वत पूजा की प्रेरणा दी है। सन्देश स्पष्ट है- जब पर्वतों की पूजा होगी तो उनका संरक्षण होगा। वहाँ घना जंगल आबाद होगा।

जब तेज बरसात होगी यानी इन्द्र देवता का प्रकोप होगा, तब ये पर्वत और जंगल- इस बरसात को अपने में समाहित कर लेंगे। इसके लाभ होंगे- एक तो जान-माल की हानि नहीं होगी और जंगल की वजह से पर्वत में समाया यह पानी एक साथ न बहकर रिसन के तौर पर रहेगा, जो नदियों को सदानीरा रखेगा। न बाढ़ का खतरा और न सूखे का संकट। मिट्टी का कटाव भी नहीं होगा। पत्थरों के पहाड़- ‘पानी के बैंक’ वाले पर्वत बन जाएँगे।

भागवत पुराण में गोवर्धन पूजा के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने पर्यावरण नीति के बिन्दुओं के महत्त्व को प्रतिपादित किया है। यह हमारे दर्शन की नदी-चिन्ता का महत्त्वपूर्ण प्रसंग माना जाता है। स्कंदपुराण सहित अन्य ग्रंथों में पानी की हर उस यात्रा के मुकाम को पूजा- अर्चना और धर्म के साथ जोड़ा गया है, जो किसी नदी को सदानीरा बनाए रखने के लिये आवश्यक होता है।

उज्जैन में कभी घना जंगल हुआ करता था और वहाँ नौ नदियाँ एक साथ बहा करती थीं। स्कंदपुराण में इस जंगल की ही महत्ता सबसे पहले प्रतिपादित की गई है और इसे ‘महाकाल वन’ की संज्ञा दी गई। इस जंगल की पूजा का आह्वान किया गया है। यहाँ के सातों तालाबों को ‘सप्त सिंधु’ की तर्ज पर पूजा जाता रहा है। यहाँ के हर एक कुण्ड का अपना महत्त्व बताया गया है।

बावड़ियाँ भी पूजनीय रही हैं। सन्देश स्पष्ट है- महाकाल वन में कोई बूँद आसमान से आती है तो हर मोड़, हर मुकाम पर पूजा और आदर के साथ देखी जाएगी और जब वह नदी में जलधारा के रूप में बहेगी तो मोक्षदायिनी क्षिप्रा में ही जाएगी- नदी संरक्षण का कितना अद्भुत दर्शन हमारे शास्त्रों में छिपा है। स्कंदपुराण में तो महाकाल वन में उसी व्यक्ति को निवास की पात्रता होती थी, जो मिट्टी को स्वर्ण के समान महत्त्व देता हो! कितने दूरदृष्टा थे हमारे पुरखे- मिट्टी और जल ही नहीं बचेगा तो फिर क्या बचेगा।

स्कंद पुराण के रेवा खण्ड में नर्मदा जी का विषद वर्णन है। ‘त्वदीय पाद पंकजम, नमामि देवी नर्मदे।’ आदि गुरू शंकराचार्य जी ने नर्मदा अष्टक की रचना की, जिसे हम मन्दिर में घण्टालों के बीच सस्वर गाते हैं- वह नदी की पूजा का वह रूप है, जो नदी के जीवन के लिये समस्त ‘आदर्श’ स्थितियों की ओर इशारा करता है।

नर्मदा जयन्ती हर बार हमें नदी-चिन्तन का प्रसंग उपलब्ध कराती है। भारत का नदी दर्शन क्या था और आज हम नदियों की हालत क्या करते जा रहे हैं, यह स्पष्ट है। अमरकंटक से लेकर भरुच तक- नर्मदा जी का प्रवाह लोक जीवन में आस्था का प्रवाह है। नर्मदा की अभिव्यक्ति सही मायनों में मौन के करीब होती है। नर्मदा जी के लाखों-लाख भक्तों को जो जहाँ हैं, उसे करीब की नदी संरक्षण की प्रेरणा मिलती रहे। यही प्रार्थना हम नर्मदा जी से करते हैं...

सबिंदु सिन्धु सुस्खल तरंग भंग रंजितम
द्विषत्सु पाप जात जात कारि वारि संयुतम
कृतान्त दूत काल भुत भीति हारि वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 1

त्वदम्बु लीन दीन मीन दिव्य सम्प्रदायकम
कलौ मलौघ भारहारि सर्वतीर्थ नायकं
सुमस्त्य कच्छ नक्र चक्र चक्रवाक् शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 2

महागभीर नीर पुर पापधुत भूतलं
ध्वनत समस्त पातकारि दरितापदाचलम
जगल्ल्ये महाभये मृकुंडूसूनु हर्म्यदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 3

गतं तदैव में भयं त्वदम्बु वीक्षितम यदा
मृकुंडूसूनु शौनका सुरारी सेवी सर्वदा
पुनर्भवाब्धि जन्मजं भवाब्धि दुःख वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 4

अलक्षलक्ष किन्न रामरासुरादी पूजितं
सुलक्ष नीर तीर धीर पक्षीलक्ष कुजितम
वशिष्ठशिष्ट पिप्पलाद कर्दमादि शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 5

सनत्कुमार नाचिकेत कश्यपात्रि षटपदै
धृतम स्वकीय मानषेशु नारदादि षटपदै:
रविन्दु रन्ति देवदेव राजकर्म शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 6

अलक्षलक्ष लक्षपाप लक्ष सार सायुधं
ततस्तु जीवजंतु तंतु भुक्तिमुक्ति दायकं
विरन्ची विष्णु शंकरं स्वकीयधाम वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 7

अहोमृतम श्रुवन श्रुतम महेषकेश जातटे
किरात सूत वाड़वेषु पण्डिते शठे नटे
दुरंत पाप ताप हारि सर्वजंतु शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 8

इदन्तु नर्मदाष्टकम त्रिकलामेव ये सदा
पठन्ति ते निरंतरम न यान्ति दुर्गतिम कदा
सुलभ्य देव दुर्लभं महेशधाम गौरवम
पुनर्भवा नरा न वै त्रिलोकयंती रौरवम 9

त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
नमामि देवी नर्मदे, नमामि देवी नर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
 

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