आदिवासियों ने हलमा से बनाया तालाब

Submitted by RuralWater on Sun, 02/21/2016 - 11:03

बात होते–होते किसी ने कहा कि छायन के पास पहाड़ियों से हर साल बड़ी तादाद में पानी नाले से बह जाता है। किसी तरह यदि हम इस बहते हुए बारिश के पानी को रोक सकें तो यह पानी पूरे साल हमारे और आसपास के गाँवों को पानी दे सकता है। बात सबको जँच गई। पंचायत ने तय किया कि सरकार से आग्रह करेंगे कि यहाँ पानी रोकने के लिये तालाब बना दे तो यह पानी हमारे काम आ सकेगा और इलाके का जलस्तर भी बढ़ेगा। सरकार उन दिनों पूरे मध्य प्रदेश में जमीनी जलस्तर को बढ़ाने और जल संरचनाओं को विस्तार देने का काम कर ही रही थी।

सरकार ने जिस तालाब को बनाने के लिये नौ लाख रुपए की भारी–भरकम राशि खर्च करने का प्रोजेक्ट बनाया था, उसे अनपढ़ आदिवासी समाज ने मिल-जुलकर महज 85 हजार में ही न सिर्फ बनाया बल्कि बीते नौ सालों से लगातार हर साल इस तालाब का पानी आसपास के आधा दर्जन आदिवासी गाँवों के लिये वरदान साबित हो रहा है।

मध्य प्रदेश के चमचमाते शहर इन्दौर से करीब डेढ़ सौ किमी दूर झाबुआ जिले के बामनिया के पास है छायन गाँव। इसी गाँव में है यह मनोहारी तालाब। कभी इस इलाके में ख्यात समाजवादी नेता मामा बालेश्वर दयाल ने यहाँ के भील आदिवासियों के बीच यहीं रहकर उन्हें मुख्य धारा से जोड़ने के लिये महत्त्वपूर्ण काम किये थे।

चिलचिलाती धूप, 35 डिग्री तापमान और सनसनाते हवा के गर्म थपेड़ों के बीच हमारी गाड़ी चली जा रही थी। आसपास कुछ नहीं था, उजाड़ और तपन के सिवा। न कोई हरियाली न कोई पेड़ों के झुरमुट, ऊँचे–नीचे पहाड़ों के बीच कहीं–कहीं कोई पेड़ या कुछ टापरियाँ जिन्दगी का अहसास कराते से। इन्हीं टापरियों के छोटे–छोटे झुण्ड फलिया कहलाते हैं यानी आदिवासियों के गाँव। किसी फलिये में 12 से 15 तो किसी में 25 से 35 टापरियाँ।

यह इलाका काला पानी के नाम से पहचाना जाता है। पुराने समय में जब देश की आजादी के दीवानों को अण्डमान की जेलों में रखा जाता था तो गाँवों में कहा जाता था कि उन्हें काले पानी की सजा हो गई। झाबुआ का यह आदिवासी इलाका भी सुविधाभोगी समाज और शहरी लोगों के लिये काले पानी की सजा ही समझा जाता है। अत्यधिक गर्मी, उसर और उजाड़ में उबड़–खाबड़ बसा यह इलाका शहरियों को कम ही भाता है।

इस इलाके में पानी की बहुत कमी है। फसलों के लिये सिंचाई तो दूर की बात, कई जगह तो पीने का पानी भी संकट। ऊँची–नीची जमीन होने से बारिश का पानी नदी–नालों से बह जाता है और बारिश खत्म होते ही पानी की कमी। पानी की कमी से निपटने के लिये इनके पास कोई खास संसाधन भी नहीं होते। लिहाजा उजाड़ इनकी नियति बन चुकी है।

पानी के इस संकट भरे दौर में जहाँ कई गाँव घड़े भर पानी के लिये मोहताज हो रहे हों वहीं इस तालाब में ठाठे मारते नीले पानी को देखकर किसी का भी मन बाग–बाग हुए बिना नहीं रह सकता। आसपास छोटी–छोटी पहाड़ियाँ और इसके बीचोबीच यह सुन्दर तालाब मन मोह लेता है। सुबह से शाम तक तालाब पर चहल–पहल बनी रहती है।

इस तालाब के आकार लेने के पीछे जज्बे की अनूठी और बड़ी रोचक कहानी है। तालाब की यह कहानी शुरू होती है करीब नौ साल पहले से। 2007 का साल। वैसे तो कुछ सालों पहले से ही इलाके में पानी की कमी महसूसी जाने लगी थी लेकिन 2007 में यह और भी बढ़ गई। हालत यह हो गए कि लोगों और मवेशियों के लिये पीने का पानी ही नहीं बचा। लोग परेशान हो गए।

धरती से पानी निकालने के लिये कोई ज्यादा संसाधन उनके पास थे नहीं। घड़े भर पानी के लिये भी कोसों दूर तक जाना पड़ता। फिर भी पानी था कि दूर-ही-दूर होता जा रहा था। ऐसे में एक दिन गाँव के लोग चौपाल पर बैठे और पानी के स्थायी समाधान के लिये बात होने लगी।

बात होते–होते किसी ने कहा कि छायन के पास पहाड़ियों से हर साल बड़ी तादाद में पानी नाले से बह जाता है। किसी तरह यदि हम इस बहते हुए बारिश के पानी को रोक सकें तो यह पानी पूरे साल हमारे और आसपास के गाँवों को पानी दे सकता है। बात सबको जँच गई। पंचायत ने तय किया कि सरकार से आग्रह करेंगे कि यहाँ पानी रोकने के लिये तालाब बना दे तो यह पानी हमारे काम आ सकेगा और इलाके का जलस्तर भी बढ़ेगा। सरकार उन दिनों पूरे मध्य प्रदेश में जमीनी जलस्तर को बढ़ाने और जल संरचनाओं को विस्तार देने का काम कर ही रही थी।

छायन गाँव का तालाबगाँव के पढ़े-लिखे लोगों ने आवेदन और पंचायत का प्रस्ताव नत्थी कर सरकारी अफसरों तक पहुँचाया। कई महीने बीत गए पर कुछ नहीं हुआ। गाँव के लोग तहसील पहुँचे और जिले के अफसरों के दफ्तर भी। बार–बार कहने पर जिले के अफसरों ने तालाब बनाने के लिये तकनीकी सर्वेक्षण करने के लिये एक तकनीकी दल गाँव में भेजा। तकनीकी दल ने यहाँ–वहाँ नाप-जोख की।

दल ने जिले में जो रिपोर्ट सौंपी, उसके मुताबिक यहाँ तालाब बनाने के लिये करीब नौ लाख रुपए का प्रोजेक्ट बनाया गया। अब सरकार ने प्रोजेक्ट रिपोर्ट तो बना ली पर पैसे थे नहीं। पंचायत के पास तो खैर इतनी राशि हो ही नहीं सकती। लिहाजा कई महीनों तक तकनीकी रिपोर्ट और प्रोजेक्ट दफ्तरों में धूल खाता रहा। गाँव के लोग इन्तजार ही करते रह गए।

इस तरह तो काम होगा नहीं और पानी की किल्लत रोज–रोज की। अब करें तो क्या। एक दिन फिर गाँव की चौपाल पर पंचायत जमी और तय किया कि अब सरकार की ओर देखने में वक्त जाया करने की जरूरत नहीं है। अब तालाब को सरकार नहीं, हम गाँव के लोग ही मिल–जुलकर बनाएँगे। बात आसान नहीं थी। जिसने सुना, अचरज में पड़ गया कि ऐसा कैसे होगा।

फिर पंचायत ने ही फैसला दिया कि हम हलमा करेंगे। छायन के अमरा वसुनिया ने इसके लिये अपनी निजी जमीन भी दे दी। सबने कहा कि हलमा से यह तालाब बनेगा। हलमा याने इलाके के हजारों आदिवासी एक साथ मिलकर श्रमदान करते हैं और इसके बदले में कोई पैसा नहीं लेते हैं। दरअसल यह आदिवासी भील समाज की एक पुरानी लोक रवायत है, जिसके मुताबिक समाज हित के काम सब लोग आपस में मिल–जुलकर साझा श्रम से पूरा करते हैं। यह परम्परा इस समाज में पीढ़ियों से चली आ रही है।

हलमा इन्हें सामाजिक सरोकारों से जोड़ता है। हम शिक्षित लोग इन्हें अनपढ़ और कम पढ़े–लिखे समाज का मानते हैं पर बताइए किसी शिक्षित समाज में ऐसी कोई परम्परा रही हो, जो समाज हित में पूरे समाज को एक जगह इक्ट्ठा कर साझा श्रम की बात करती हो, नहीं ही मिलेगी। फिर हमें क्या अधिकार है इन्हें पिछड़ा मानने का बल्कि पिछड़े तो हम ही हैं जो हर जगह और हर हाल में अपना ही भला सोचते रहते हैं और जिन्दगी भर अपना ही घर भरने के काम में लगे रहते हैं। समाज के बारे में सिर्फ बातें ही करते रहते हैं, कभी आगे बढ़कर कुछ बदलने का जतन नहीं कर पाते। इस मायने में इनकी सामजिक चेतना सभी समाज से कहीं आगे की नजर आती है।

हलमा के लिये गाँव–गाँव सन्देश भेजा गया और तय समय पर हजारों आदिवासियों ने एक साथ जमीन पर कुदाली लगाना शुरू किया। कुछ ही दिनों में पहाड़ सा दिखने वाला यह काम चुटकियों में पूरा हो गया। तालाब बनने के बाद इसमें 85 हजार की रकम से सिर्फ कुछ तकनीकी उपकरण लगाए गए हैं। इस तरह नौ लाख में बनने वाला यह तालाब महज 85 हजार में बनकर तैयार हो गया।

बड़ी बात यह है कि तालाब का संधारण तथा अनुरक्षण अब भी यहाँ का आदिवासी समाज ही कर रहा है और शायद इसीलिये ये तालाब इलाके के दूसरे तालाबों के मुकाबले ज्यादा अच्छे तरीके से पानी सहेज पा रहा है। इसके पानी से मवेशियों और लोगों की प्यास तो बुझती ही है, इसका पानी आसपास के खेतों की सिंचाई में भी काम आ रहा है।

इस एक तालाब ने आसपास के छह गावों को पानी के लिये आत्मनिर्भर बना दिया है। बीते नौ सालों से इस तालाब की वजह से यहाँ के लोगों की माली हालत में भी बदलाव हुआ है और सामाजिक दशा में भी। यहाँ से रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन की प्रवृत्ति भी थम गई है। उन अनाम हाथों को सलाम करने की इच्छा होती है, जिनमें थमी कुदालियों ने यहाँ की कायापलट कर दी।

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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