संशय में है नदीजोड़ योजना की कामयाबी

Submitted by RuralWater on Thu, 03/03/2016 - 10:00
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.आखिरकार मोदी सरकार की महत्त्वाकांक्षी केन-बेतवा नदी-जोड़ परियोजना अब संकट में है। गौरतलब है पिछले साल मोदी सरकार ने नदी-जोड़ योजना के क्रम में सबसे पहले केन-बेतवा पर ही काम शुरू करने का फैसला लिया था।

जैसी आशा थी कि पन्ना टाइगर रिजर्व में पर्यावरण सम्बन्धी मंजूरी मिलने और इस इलाके में बसे गाँवों के लोगों द्वारा विस्थापन पर अपनी सहमति देने के बाद देश की पहली केन-बेतवा परियोजना पर साल 2015 के आखिर तक काम शुरू हो जाएगा। लेकिन ऐसा सम्भव न हो सका। हाँ इतना जरूर हुआ कि इससे पहले इसमें एक और पंचेश्वर परियोजना शामिल हो गई।

इस बारे में माना जा रहा था कि लगभग 7600 करोड़ रुपए की लागत वाली इस परियोजना से 4.46 लाख हेक्टेयर इलाके में सिंचाई की जा सकेगी। अब यह परियोजना वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की मंजूरी के कारण लटकी पड़ी है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में शारदा-घाघरा-गोमती को जोड़ने की योजना पर शीघ्र ही कार्य शुरू होने जा रहा है।

कहा यह जा रहा है कि इससे पूर्वी उ.प्र. में सिंचाई व्यवस्था और मजबूत होगी। यही नहीं इस इलाके को बाढ़ से हमेशा के लिये निजात मिल जाएगी। कहा तो यह भी जा रहा है कि इससे बरसाती नदी का रूप ले चुकी गोमती को सबसे ज्यादा फायदा होगा। उसमें साल भर पानी का स्तर सामान्य रहेगा।

गोमती में पानी की समस्या नहीं रहेगी और इसके किनारे बसे लखनऊ शहर की पेयजल समस्या भी दूर हो जाएगी। अब केन्द्रीय जल आयोग के ऊपर यह दारोमदार है कि वह कब तक परियोजना का सर्वेक्षण करवाकर डीपीआर दे पाता है या नहीं। दरअसल देश में नदी जोड़ परियोजना के औचित्य पर बाजपेयी सरकार के समय से ही सवाल उठते रहे हैं।

इस योजना को कभी भी किसी भी कीमत पर लाभकारी नहीं माना गया। योजना आयोग भी इसे अदूरदर्शी व अव्यावहारिक की संज्ञा दे चुका है। हमारे पर्यावरणविदों ने तो बाजपेयी सरकार के समय ही इसका पुरजोर विरोध किया था। पर्यावरण की दृष्टि से उन्होंने इसे खतरनाक बताया था।

पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ने उस समय कहा था, ‘प्रकृति के साथ ऐसी छेड़छाड़ के भयानक परिणाम होंगे। नदियों को जोड़ने के लिये जो नहरें बनेंगी, उनके रास्ते में ढेर सारे जंगल, अभयारण्य, गाँव, खेत आदि आएँगे। उनको उजाड़ना न पर्यावरण की दृष्टि से उचित होगा, न सामाजिक दृष्टि से। इससे सारी व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी और जो समस्याएँ पैदा होंगी, उनसे पार पाना आसान नहीं होगा।’ लेकिन सारे विरोध को दरकिनार कर मोदी सरकार ने 2014 में सत्ता में आते ही नदियों को जोड़ने वाली इस परियोजना को शुरू करने का मन बना लिया। गौरतलब है कि बाजपेयी शासन के दौरान इसके दूरगामी परिणामों-लाभों के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर ढेरों दावे किये गए थे। आज भी कहा जा रहा है जल संकट का निवारण ही इस योजना का लक्ष्य है। जल संकट से हमें कहाँ तक छुटकारा मिल पाएगा, यह तो समय ही बताएगा।

सच यह है कि प्रकृति मानवीय नियमों से नहीं, खुद बनाए नियमों से संचालित होती है। वर्तमान में प्रकृति हो या उसके नियम, उनमें मानवीय दखल लगातार बढ़ता जा रहा है। देश में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के दुष्परिणाम सबके सामने हैं। नदी जोड़ परियोजना मानवीय हस्तक्षेप का ही प्रतीक है। प्रकृति नदी का मार्ग खुद तय करती है।

नदी का बेसिन उसकी घाटी होती है जिसमें उसका जल होता है। प्रकृति प्रदत्त नदियों को जोड़ने से प्रकृति का सन्तुलन गड़बड़ा जाएगा। इससे विस्थापन की समस्या कितनी विकराल हो जाएगी, इसका अन्दाजा सरकार और नीति-नियन्ताओं को नहीं है। भाखड़ा-हरसूद को हम आज भी भूल नहीं पाये हैं। भाखड़ा-नांगल बाँध के समय के विस्थापितों की रिपोर्ट खुलासा करती है कि आज भी अनेकों ऐसे विस्थापित परिवार मौजूद हैं जो पुर्नवास की बाट जोह रहे हैं।

उस हालत में देश की डेढ़ दर्जन नदियों को जोड़ने से उत्पन्न लाखों लोगों के विस्थापन, उनके जान-माल की भरपाई और पुर्नवास की व्यवस्था सरकार कैसे कर पाएगी, यह समझ से परे है। जबकि सिंचाई की अनेकों बड़ी परियोजनाओं से कितनी आबादी उजड़ी, सैकड़ों-हजारों गाँवों की बलि चढ़ी, से भी सरकार ने कोई सबक नहीं लिया। पर्यावरण में बढ़ते प्रदूषण से मौसम में बदलाव आया, मानसून की गति बिगड़ी, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि से देश दोचार हुआ। लेकिन इस ओर भी हमने सोचना मुनासिब नहीं समझाा।


केन-बेतवा अभी अधर में है जबकि शारदा-घाघरा और गोमती को जोड़ने की परियोजना के पहले चरण को जल संसाधन मंत्रालय हरी झंडी दे चुका है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी के लिये प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जबकि हकीकत है कि मैदानी इलाकों की परियोजनाओं के परवान न चढ़ने के पीछे राज्यों के हित निहित हैं। वे इसके लिये राजी नहीं हैं। सरकार यह क्यों नहीं सोचती कि जब कम लागत में स्थानीय स्तर पर जन सहयोग से जोहड़ और तालाब बनाकर समाज की पानी की जरूरत पूरी की जा सकती हैं तो फिर बड़े बाँध और नदी जोड़ परियोजनाओं की क्या जरूरत है। अच्छा होता सरकार भूजल के अन्धाधुन्ध दोहन के खिलाफ कानून बनाती, उनका सही ढंग से क्रियान्वयन कराती, वर्षाजल को बेकार समुद्र में बहकर जाने से रोकने, उसके संरक्षण के उपाय करती और पानी की बर्बादी रोकने की दिशा में जन-चेतना जागृत करती। लेकिन ऐसा करने के बजाय पानी के व्यापार को बढ़ाने वाली नदी-जोड़ परियोजना को लागू करने का विचार कहाँ तक न्यायोचित है, यह विचार का मुद्दा है?

हमारे योजनाकारों ने इस ओर भी ध्यान क्यों नहीं दिया कि गंगा और यमुना आसपास से ही निकल कर अलग-अलग क्यों बहती हैं। फिर जिस प्रभु ने इतनी सारी नदियाँ बनाईं, उसने कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एक नदीं क्यों नहीं निकाली। आखिर एक ही उद्गम से निकलकर नदियाँ अलग-अलग क्यों बहती हैं? समझ नहीं आता इस योजना में ऐसा क्या है जिस पर अमल के लिये सरकार अडिग है। विडम्बना यह कि पारतापी-नर्मदा व दमनगंगा-पिंजाल को लेकर महाराष्ट्र व गुजरात में एक ही दल की सरकारें होने के बाद भी विवाद जारी है। राज्यों के बीच जल-विवाद थमे नहीं हैं।

महानदी-गोदावरी नदी-जोड़ परियोजना पर ओडिशा का विरोध जगजाहिर है। पहले से तय की गईं 30 नदी-जोड़ परियोजनाओं के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान देश में शारदा-यमुना लिंक के रूप में 31वीं परियोजना भी जुड़ गई है। इसके पानी को उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान व गुजरात तक पहुँचाने की योजना है। उस हालत में जबकि हिमालयी इलाके की सात परियोजनाओं पर दूसरे देशों के शामिल होने और मैदानी इलाकों की नौ परियोजनाओं में राज्यों में आपसी सहमति नहीं बन पाने के कारण रोक लगी हुई है।

केन-बेतवा अभी अधर में है जबकि शारदा-घाघरा और गोमती को जोड़ने की परियोजना के पहले चरण को जल संसाधन मंत्रालय हरी झंडी दे चुका है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी के लिये प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जबकि हकीकत है कि मैदानी इलाकों की परियोजनाओं के परवान न चढ़ने के पीछे राज्यों के हित निहित हैं। वे इसके लिये राजी नहीं हैं।

सरकार यह क्यों नहीं सोचती कि जब कम लागत में स्थानीय स्तर पर जन सहयोग से जोहड़ और तालाब बनाकर समाज की पानी की जरूरत पूरी की जा सकती हैं तो फिर बड़े बाँध और नदी जोड़ परियोजनाओं की क्या जरूरत है। देश में ऐसे उदाहरणों की भी कमी नहीं है जहाँ समाज ने पारम्परिक ज्ञान को अपनाकर अपनी समृद्धि वापस लाने में कामयाबी पाई। जरूरी है कि समाज पानी के व्यापार और कुदरत के साथ खिलवाड़ की साजिश को समझे, तभी प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा सम्भव है।

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एक परिचय:


. 21 जनवरी 1952 को एटा, उ.प्र. में शिक्षक माता-पिता के यहाँ जन्म।

राजकीय इंटर कॉलेज, एटा से 12वीं परीक्षा उत्तीर्ण, सागर विश्वविद्यालय से स्नातक, छात्र जीवन में अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन, समाजवादी युवजन सभा और छात्र संघ से जुड़ाव रहा। राजनैतिक गतिविधियों में संलिप्तता के कारण विधि स्नातक और परास्नातक की शिक्षा अपूर्ण।

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