क्योंकि गंगा इंटरनेट पर नहीं बहती

Submitted by RuralWater on Thu, 03/03/2016 - 16:33


.खबर आई कि प्रधानमंत्री की प्रिय साइट माय जीओवी (मेरी सरकार) में लोगों द्वारा भेजे जा रहे उपायों का कुछ मंत्रालयों ने बिल्कुल भी संज्ञान नहीं लिया। जल संसाधन मंत्रालय भी उनमें से एक हैं। मंत्रालय से जुड़े लोग सफाई दे रहे हैं कि जल संसाधन और गंगा संरक्षण मंत्रालय का स्वयं का सोशल साइट नेटवर्क है जो लगातार गंगा सफाई जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर सुझाव आमंत्रित करता है।

मंत्रालय अब जल की उपलब्धता को भी ऑनलाइन कर रहा है। यहीं नहीं नदी से जुड़ी हर चीज ऑनलाइन की जा रही है यहाँ तक की गंगा सफाई अभियान से जुड़ी कोशिशें भी। वे कोशिशें जो जमीन पर आँखे फाड़कर देखने से भी नजर नहीं आती।

सच्चाई ये भी है कि इंटरनेट पर जो हड़बड़ी और चमक दिखाई दे रही है उसके मूल में आरटीआई से उठते सवालों से बचने की कोशिशें हैं और जमीनी वास्तविकता विपरीत है। पिछले दिनों केन्द्रीय जल आयोग ने बाँध पुनर्वास एवं सुधार परियोजना की साइट को हिन्दी में लांच किया, साइट के एकमात्र पेज पर मंत्री के फोटो के साथ बाँधों का सतही डाटा है।

अब यदि आप ये जानना चाहेंगे इतने सालों बाद भी दामोदर वैली के विस्थापितों को कौन सा कष्ट जन्तर-मन्तर पर बैठाए हुए है तो इसका जवाब यहाँ नहीं मिलेगा। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने भी उन फैक्टरियों की सूची ऑनलाइन करने का आदेश जारी किया है जो गंगा में लगातार चेतावनियों के बावजूद प्रदूषण फैला रही हैं। कुल मिलाकर गंगा से जुड़ी सभी कोशिशें इस आभासी दुनिया में ही नजर आ रही है।

अब वास्तविक हालात पर एक नजर डालिए, एक हाई लेवल मीटिंग में उमा भारती ने अपने विभाग और उससे जुड़ी सभी संस्थाओं को मिशन मोड में आकर गंगा से जुड़ी परियोजनाओं को पूरा करने का आदेश दिया, ठीक ऐसा ही आदेश उन्होने मंत्रालय की जिम्मेदारी सम्भालने के तुरन्त बाद भी दिया था। इसका मतलब है तब से अब तक कुछ भी नहीं बदला।

अधिकारियों पर नकेल कसने के पीछे प्रधानमंत्री की समीक्षा बैठक है जो वे हर पखवाड़े विभिन्न विभागों के साथ कर रहें हैं, सम्भवत मार्च के पहले सप्ताह में गंगा मंत्रालय के साथ समीक्षा बैठक होनी है। पूरा मंत्रालय गंगा की चिन्ता छोड़ प्रधानमंत्री के लिये पावर पाइंट प्रजेंटेशन बनाने में जुटा है और चुनौती ये है कि बताने के लिये कुछ नहीं है। सालाना पत्रकारवार्ता भी इसीलिये रद्द की गई थी।

इसके बावजूद भारती के प्रयासों की परिपक्वता उनके नीतिगत बयानों से साफ होती है, उन्होंने नए बड़े बाँध बनाने से पहले मौजूदा जलाशयों के सौ फीसदी इस्तेमाल पर जोर दिया। मंत्री बनने से पहले धारीदेवी की नाराजगी को केदारनाथ हादसे की वजह बताने वाली उमा अब मानती हैं गाँधी सरोवर के सीमेंटीकरण में प्राकृतिक निकास का ना होना सबसे बड़ी लापरवाही थी।

मंत्रालय के बाँध पुनर्वास और सुधार परियोजना ने केदारनाथ जैसी आपदा के दौरान लागू किये जाने वाले एक्शन प्लान का मसौदा भी जारी किया लेकिन मजे की बात ये है कि उत्तराखण्ड सहित किसी भी राज्य को इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। सामंजस्य की यही कमी हर आपदा के बाद साफ नजर आती है। उमा भारती स्वयं इसे आधी शादी करार देती हैं यानि लड़के ने तय कर लिया कि इसी लड़की से शादी करुँगा और लड़की को पता ही नहीं।

गंगा मंत्रालय की सभी योजनाओं जैसे नमामि गंगे, नदी जोड़ों योजना, नदी बेसिनों का एकीकृत जल संसाधन प्रबन्धन अध्ययन, जल क्रान्ति अभियान और भूमि संरचना की भूजल पहचान तथा जलभृत मानचित्र कायक्रमों में आगे बढ़ने की जिजिविषा नजर नहीं आती। नदी जोड़ों में केन–बेतवा परियोजना ही कुछ आगे बढ़ पाई है बाकि परियोजनाएँ तो डीपीआर स्तर पर ही जूझ रही हैं।

गोदावरी को लेकर तो आन्दोलन भी मुखर होने लगा है और करीब–करीब हर प्रस्तावित योजना के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी हो चुकी है, बावजूद इसके कि सुप्रीम कोर्ट ने नदी जोड़ों को देश के लिये जरूरी करार दिया है। इसी तरह नए बाँधों के निर्माण के साथ ई-प्रवाह पर जोर दिया जा रहा है जबकि ई-प्रवाह एक अवधारणा मात्र है, दुनिया का कोई भी देश किसी भी नदी में ई-प्रवाह का फार्मूला तैयार नहीं कर सका है।

बहरहाल गंगा सफाई जैसे प्राथमिक मुद्दे जमीन पर दम तोड़ रहे हैं और वेबसाइट पर देखकर लगता है नदियों के अच्छे दिन आ गए हैं। अफसोस गंगा इंटरनेट पर नहीं बह सकती।
 

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