चोरल नदी की बदल डाली तस्वीर

Submitted by RuralWater on Mon, 03/07/2016 - 15:59


.बीते कुछ सालों में हमने अपनी नदियों के स्वरूप को मनमाने तरीके से विकृत किया है। एक तरफ जहाँ देश की अधिकांश नदियाँ प्रदूषण और अतिक्रमण की वजह से अपनी सदानीरा छवि और स्वच्छता में कमतर होती जा रही हो, ऐसे में किसी नदी के पुनरुद्धार की खबर सुखद बयार की तरह ही लगती है।

यह सुखद खबर आई है मध्य प्रदेश के इन्दौर के पास चोरल नदी के तट से। यहाँ 32 किमी नदी को सदानीरा बनाने की कोशिश के साथ इसे एक बार फिर से जीवन देने की कोशिश की गई है। यदि आपने कुछ सालों पहले इस नदी को देखा है और अबकि बार देखेंगे तो साफ है कि इसे पहचान भी नहीं पाएँगे। यहाँ के आदिवासियों के साथ सरकार और एक संगठन ने इसकी तस्वीर ही बदल डाली है और यकीन कीजिए, वह भी आधे बजट में।

मध्य प्रदेश में निमाड़ यानी घाट नीचे का इलाका। एक तरफ ऊँचे–ऊँचे पहाड़ तो नीचे की तरफ गहरी खाईयाँ। ऐसे ही ऊँचे–नीचे इलाके में बहती है एक नदी। नाम है इसका चोरल नदी। पहाड़ों का पानी समेटकर नीचे लाते हुए कई जगह यह साँप की तरह मुड़ते– मुड़ाते हुए सागवान के घने जंगलों में कहीं बलखाती तो कहीं पछाड़ खाती 35 किमी का सुहाना सफर तय करते हुए अन्ततः यह बडवाह के पास नर्मदा नदी में जा मिलती है। इसके रास्ते में कई मनोहारी झरने पड़ते हैं तो कहीं प्राकृतिक वैभव और शान्त जंगल के बीच कल–कल करती नदी का संगीत बरबस ही हमें अपनी ओर खींचता सा लगता है।

यह इन्दौर से करीब 55 किमी दूर इसी जिले के जानापाव की पहाड़ी से निकलती है। इसी पहाड़ी पर परशुराम की जन्मस्थली भी मानी जाती है। यहाँ की सुरम्य छटा में इसका उद्गम है। यह इलाका मालवा में ही आता है लेकिन चोरल नदी कुछ किमी ही मालवा में चलते हुए अनायास पछाड़ खाकर पहाड़ों से करीब 1300 फीट नीचे निमाड़ में गिरती है और इस तरह मालवा से पानी समेट कर निमाड़ की झोली में डाल देती है।

जिस जंगल से होकर यह गुजरती है उनमें इस नदी के किनारे रहते हैं छोटे–छोटे गाँवों के कई आदिवासी परिवार। ये लोग चोरल नदी के आसपास की ऊबड़–खाबड़ कुछ जमीन को जैसे–तैसे उपजाऊ समतल बनाकर वहाँ अपने परिवार का पेट भरने लायक खेती करते रहे हैं। पर इस पहाड़ी नदी के भरोसे कोई खेती कैसे कर सकता है। यह बरसात के दिनों में अपनी अंजुरी में खूब सा पानी समेटे बड़ी तेज और उतावली सी नजर आती है तो कुछ ही दिनों में इसकी चाल मन्द–मंथर होते–होते रुक जाती है। जितनी जल्दी विकराल होती है, उतनी ही जल्दी शान्त भी हो जाती है यह नदी।

इसके पूरे प्रवाह क्षेत्र में चार ग्राम पंचायतों के इसके किनारे करीब 17 गाँव आते हैं। इन सभी गाँवों की ज्यादातर आबादी आदिवासी वर्ग से है। पीढ़ियों पहले ये लोग जंगल और उसके उत्पादों पर निर्भर रहते थे लेकिन बाद के दिनों में जंगल इनके नहीं रहे तब इन्होंने खेती करना शुरू किया। आदिवासी यहाँ खेती तो करते पर कभी भी बारिश की फसल के अलावा कोई दूसरी फसल नहीं ले पाते थे। बारिश खत्म होते–होते नदी का बहाव कम होने लगता और गर्मी शुरू होने से पहले ही यह नदी धीरे–धीरे सूखने लगती।

नदी सूखने के साथ ही आदिवासियों के पास हाथ-पर-हाथ धरे बैठने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता था। बरसों से ये आदिवासी इसी तरह की बदहाल और बदरंग जिन्दगी बिताने को मजबूर थे। सरकारों के नुमाइन्दों ने कई बार इनकी दशा सुधारने की कोशिश की पर कोई फर्क नहीं आया। पता लगा कि यदि किसी तरह यह नदी सदानीरा बन जाये और लबालब भरी रह सके तो यह इलाका गुलजार हो सकता है। पर ऐसा होना तो जैसे आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा कठिन काम था। नदी का प्रवाह क्षेत्र पूरी तरह से पहाड़ी ढाल पर था और उसमें पानी रोक पाना कैसे हो पाता। इसी सबको सोचते हुए कई बरस और बीत गए। इधर पानी के लिये हाहाकार और तेज होने लगी।

वह 2011 का साल था। आखिरकार चोरल नदी को सतत प्रवाहमान बनाने के लिये कागजी कार्यवाहियाँ तेज हुई। इस काम के लिये तकनीकी सर्वे हुआ और इसकी लागत बनी करीब नौ करोड़ रुपए से अधिक की। खाका तैयार हुआ कि केन्द्र सरकार और राज्य सरकार इसमें अलग–अलग कामों के लिये पैसा देगी। केन्द्र के भूमि विकास और जल संसाधन मंत्रालय तथा मप्र सरकार के पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग ने राजीव गाँधी जलग्रहण क्षेत्र प्रबन्धन कार्यक्रम के तहत इस काम को पूरा करने का बीड़ा उठाया।

लेकिन सर मुंडाते ही ओले। नदी पहाड़ों से जिस पहले गाँव केकरिया डाबरी में उतरती थी, वहीं काम करना मुश्किल हो गया। बारह सौ फीट नीचे बसे इस गाँव तक पहुँचने का कोई रास्ता ही नहीं था कहीं से। आदिवासी जिसे रास्ता बताते थे, वह इतना दुर्गम था कि आदमी का साबूत जाना भी मुश्किल। पहाड़ों में से निकल रहे पत्थरों को पकड़कर इस रेतीले और फिसलपट्टी की तरह के रास्ते को पार करना पड़ता था तो ऐसे में कैसे यहाँ तक मशीनें पहुँचती और कैसे निर्माण के लिये सामान। बहुत मुश्किल था।

केकरिया डाबरी गाँव में 15 आदिवासी परिवार रहते थे और केवल बरसात के दिनों में ही गाँव आते थे। नदी के सूखने पर बाकी दिनों में इन परिवारों को हर साल पलायन कर रोज़गार की तलाश में यहाँ–वहाँ भटकना पड़ता था। यही हालत कुशलगढ़, गुजरा और रतवी गाँवों में रहने वाले लोगों की भी थी। नदी सूखने के बाद इन्हें पीने के पानी से भी महरूम होना पड़ता था। ये लोग जैसे–तैसे नदी क्षेत्र में गड्ढा खोदकर अपने और परिवार के लिये पानी जुटाते थे। एक ही बार फसल होने से इन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता था।

कहते हैं जहाँ चाह, वहाँ राह की तर्ज पर सबसे पहले यहाँ तक पहुँचने के लिये वैकल्पिक कच्चा रास्ता बनाया गया। यहाँ से बैलगाड़ी, ट्रैक्टर और टट्टुओं के सहारे जैसे–तैसे सामान पहुँचना शुरू हुआ। अच्छे काम में लोग जुटना शुरू हुए। जब आदिवासियों ने देखा कि हमारी भलाई और नदी को सतत प्रवाहमान बनाए रखने के लिये काम हो रहा है तो उन्होंने भी श्रमदान करने का फैसला किया। इसी दौरान इलाके में लोगों की भलाई के लिये काम करने वाली एक संस्था भी सामने आई। सब मिलकर जुट गए चोरल की मनुहार में और नदी मनुहार कैसे ठुकरा सकती थी। काम बनता चला गया लोग जुटते रहे।

अब सवाल था कि नदी के प्रवाह को यहाँ धीमें कैसे किया जाये तो कई तकनीकें एक साथ अपनाई गईं। प्रशासन, स्वयंसेवी संस्था और स्थानीय आदिवासी समाज ने मिलकर पहाड़ों पर कई जगह कन्टूर ट्रेंच, बोल्डर चेकडैम और अन्य संरचनाओं तथा खेतों की मेड़बन्दी भी की गई। बारिश के साथ मिट्टी के कटाव को रोकने के लिये सभी तरह के जतन किये गए। चोरल नदी में मिलने वाले छते नदी-नालों को भी उपचारित किया गया। नदी क्षेत्र में दो दर्जन से ज्यादा नाले और दो छोटी नदियाँ भी थीं लेकिन वक्त के साथ बन्द हो चुकी थी, इन्हें फिर से ढूँढकर पुराने स्वरूप में लाया गया।

आदिवासियों की करीब पाँच सौ साल पुरानी तकनीक काम में आई और नदी को साठ साल पुराने स्वरूप में लौटा दिया गया। पहाड़ी रास्ते पर जेसीबी या दूसरी मशीनों का उपयोग सम्भव नहीं था, इसलिये आदिवासियों की टोली ने खुद मोर्चा सम्भाला और अपनी कुदाली और फावड़ा से उन्होंने पत्थरों चट्टानों तक को तोड़ डाला। पहाड़ी नालों के रास्ते खोल दिये गए। देखते-ही-देखते एक के बाद एक नाले धीरे–धीरे सामने आते गए। चोरल में छह और सहायक नदियों में दो स्टॉपडैम बनाए गए।

नागरथ चैरिटेबल ट्रस्ट के प्रभारी सुरेश एमजे बताते हैं कि यह करीब नौ करोड़ की सरकारी बजट का प्रोजेक्ट था लेकिन समुदाय की सहभागिता से इसे महज पाँच करोड़ 45 लाख रुपए में ही पूरा कर लिया गया। अब यह अधिकांश क्षेत्र में पूरे साल बहती रहती है। टीम वर्क से जहाँ प्रोजेक्ट की लागत कम हुई, वहीं सतत निगरानी से इसकी गुणवत्ता में भी असर आया है। बीते पाँच सालों से हम लोग खुली आँखों से एक सपना देख रहे थे और अब वह साकार रूप ले चुका है।

इन्दौर के जिला कलेक्टर पी नरहरी बताते हैं कि अब इन गाँवों के आदिवासी किसानों को प्रशासन फूलों की खेती के लिये भी प्रेरित करेगा ताकि इनकी नियमित आमदनी हो सके।

आखिरकार पाँच साल की कड़ी मेहनत और जज्बे का ही परिणाम है कि अब यह नदी जगह–जगह रुकते-थमते बहने लगी है, अब भी इसमें पर्याप्त नीला पानी ठाठे मार रहा है। यहाँ की तस्वीर अब बदल चुकी है। आसपास हरियाली-ही-हरियाली नजर आती है और इससे भूजलस्तर भी बढ़ गया है। अब यहाँ के आदिवासी परिवारों के चेहरे पर पानीदार चमक है। उत्साहित आदिवासी किसान बताते हैं कि अब उनकी बरसों पुरानी चाहत पूरी हुई है। अब वे भी गेहूँ–चने सहित साल में तीन फसल ले सकेंगे।
 

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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