मेरे जीवन का सबसे कमजोर क्षण और सबसे बड़ी गलती : स्वामी सानंद

Submitted by RuralWater on Sun, 03/13/2016 - 13:40
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स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद -नौवाँ कथन आपके समक्ष पठन, पाठन और प्रतिक्रिया के लिये प्रस्तुत है :

.गंगाप्रेमी भिक्षु न बोलते हैं, न सही नाम बताते हैं और जन्म स्थान। पैर में भी कुछ गड़बड़ है। 70 की आयु होगी। उन्होंने भी संकल्प लिया था। वह हरिद्वार भी गए। हरिद्वार में उन्होंने भी अन्न छोड़ने की बात कही। फल-सब्जी भी उन्हें जबरदस्ती ही दिये जाते थे। बनारस में भी वह साथ में अस्पताल साथ गए।

 

सरकार के दूत थे डॉ. राजीव शर्मा


कोई तय नहीं था, लेकिन खुद पहल कर सन्यासी के हिसाब से हमने सोच लिया था कि पहले कौन जाएगा। पहले मैं, फिर भिक्षु, फिर कृष्णप्रियम और फिर बाकी। इस बीच क्या हुआ कि डिवीजनल हॉस्पीटल के डॉ. राजीव शर्मा आये। उन्होंने यह नहीं कहा कि वह सरकार का दूत बनकर आये हैं। उन्होंने परिचय दिया कि वह भी आईआईटी के हैं। वह दिन में मेरे साथ जाते थे। बीच में जापान की ‘जायका’ (कम्पनी).. मतलब वह वरुणा नाले के ट्रीटमेंट का एमओईएफ (पर्यावरण एवं वन मंत्रालय) का काम देखने जाते थे। वह वहाँ जाते थे; शायद मार्च एंड का हिस्सा वसूलने। जब वह श्रीप्रकाश जायसवाल (तत्कालीन मंत्री व सांसद) के साथ आये, तब मुझे हुआ कि वह सरकार की ओर से बात इनीशियेट करने आये हैं। यह सब स्वरूपानन्द जी की पहल पर हो रहा था।

 

मुझे कष्ट होता था


मैं इतना महत्त्वपूर्ण नहीं था कि मेरे लिये एयर एम्बुलेंस लाई जाये। किन्तु मैं देखता था कि एम्स (भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली) में बहुत कम लोगों को मुझसे मिलने दिया जाता था। अविमुक्तेश्वरानंद जी दिन भर बाहर बैठे रहते थे। मुझे कष्ट होता था। वीआईपी आते, तो हास्पीटल के एम.एस (मेडिकल सुपरिटेंडेंट) भी आते। अन्ना आये; नारायण सामी (प्रधानमंत्री कार्यालय से सम्बद्ध तत्कालीन मंत्री), अरविन्द केजरीवाल, किरण आईं। जो आते, वे सिर्फ स्वास्थ्य पर बात करते थे। गंगा जी पर कोई बात नहीं करता था।

 

लिखित ड्रॉफ्ट : मौखिक आश्वासन


इस बीच क्या हुआ कि गुरूजी (स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी), राजेन्द्र सिंह और आचार्य प्रमोद कृष्णम ने ड्रॉफ्ट बनाया। मुझे पता था कि 14 मार्च से छत्तीसगढ़ में कार्यक्रम है। गुरूजी वहाँ जाने को आतुर थे। स्वरूपानंद जी का आदेश भी था कि वह उसमें जरूर जाएँ। इसीलिये भी मुझे चिन्ता थी। अतः नारायण सामी, श्रीप्रकाश जायसवाल और गुरूजी के कारण मैंने ड्रॉफ्ट को माना। गुरूजी ने मुझसे कहा कि नहीं, मेरे दोस्तों ने मुझे तैयार किया था। मेरे दोस्त यानी एस.के. गुप्ता, एम.सी. मेहता और राजेन्द्र सिंह जी।

उस एग्रीमेंट में यह कहा गया था कि जो मौखिक आश्वासन दिये गए हैं, वे पूर्ण किये जाएँगे। उसमें यह भी था कि 17 अप्रैल की एनजीआरबीए (राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण) की बैठक होगी। बैठक में मेरे और गुरूजी के अलावा मेरे मतानुसार पाँच सन्तों को बुलाया जाएगा। यह भी लिखा गया था कि मेरे एजेण्डे पर बात होगी। मेरे एजेण्डे पर निर्णय होने के बाद ही बाकि बातें उठाई जाएँगी।

 

पाँच परियोजना रोकने की अपेक्षा


यह 22-23 मार्च की बात है। मुझे लगा कि 17 अप्रैल में तो अभी समय है। मैं चाहता था कि उपवास तभी खोलूँ, जब मीटिंग हो जाये; तब तक पाँच परियोजनाओं (मन्दाकिनी पर चल रही फाटा-ब्योंग व सिंगोली-भटवारी परियोजना तथा अलकनन्दा पर चल रही श्रीनगर- धारीदेवी, विष्णुप्रयाग-पीपलकोटी और विष्णुगंगा पर चल रही तपोवन-विष्णुगाड परियोजना) पर काम बन्द रहे। क्यों कहा मैंने? क्योंकि अलकनन्दा को लेकर मेरा सन्यास था। सन्यास लेते ही मैंने अपने को मन्दाकिनी के साथ जोड़ लिया था। मन्दाकिनी को लेकर सुशीला भण्डारी, जगमोहन सिंह आदि आन्दोलन कर रहे थे। सो, सिर्फ अलकनन्दा की बात करना ज्यादती लगी। तपोवन-विष्णुगाड की सुरंग जोशीमठ के नीचे से जा रही थी। वह कहते थे कि ज्योतिषपीठ बैठ जाएगा। पंचप्रयागों में एक प्रयाग- विष्णुप्रयाग बैठ जाएगा। इन्ही पाँच पर कन्टीन्युअस कन्सट्रक्शन भी चल रहा था। मैं, स्वरूपानंद जी को भी आदर देना चाहता था।

 

मौखिक का सच-झूठ


श्रीप्रकाश जायसवाल और नारायण सामी कह रहे थे कि सरकार लिखकर देती है, तो लीगल समस्या होगी। परियोजना वाले मुआवजा भी माँग सकते हैं। अतः सरकार लिखकर नहीं दे सकती। बोले कि जुबानी आदेश पर ही बन्द हो जाएगा। वे दो परियोजनाओं को बन्द करने को तैयार थे। वे फाटा-ब्योंग और पीपलकोटी को बन्द करने को कह रहे थे। कह रहे थे कि यह 15 दिन में हो जाएगा। मैंने सोचा कि इससे बात नहीं बनेगी। रात को गुरूजी (स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी) आये, तो बताया कि वे कह रहे हैं कि चार को बन्द करा देंगे। सम्भवतः वह श्रीनगर परियोजना को बन्द कराने को कह रहे थे। हालांकि यह आश्वासन सीधे मुझे नहीं दिया गया था; फिर भी मैंने कहा कि चलो यही हो।

अगले दिन 24 मार्च को उपवास खुला। शाम को गुरूजी ने पूछा - “आपने तो स्वीकार लिया है न? अब आप मेरे हाथ से जल पी लो।’’ मैंने इनकार किया। मैंने कहा कि सार्वजनिक होना चाहिए। सुबह उपवास खुलने के बाद वह चले जाएँ।

 

बनाया एजेण्डा: तय किये नाम व विषय


मुझे जो पत्र मिला था, उसका जवाब भी मुझे ही देना था। जवाब ही नहीं, मीटिंग बुलाने वालों को धन्यवाद भी देना था। एजेण्डा भी लिखना था। मैं एस.के. गुप्ता के यहाँ गया; सोचा कि यहीं से मुजफ्फरनगर चला जाऊँगा। मैंने पत्र लिखा। मैंने 10 आइटम का एजेण्डा दिया। बिल ड्रॉफ्ट के बारे में भी था कि बिल अटैच हो जाएगा। उस पर चर्चा बाद में हो जाएगी, लेकिन पास कराने के बारे मे चर्चा का कन्सीडिरेशन मीटिंग में ही कर लिया जाएगा। एजेण्डा नोट बाद में भेज दूँगा। मैंने यह लिखा था। अपने और अविमुक्तेश्वरानंद जी के अलावा पाँच लोगों की सूची भी दी थी:

1. स्वामी निश्चलानंद जी (शंकराचार्य-पुरी)
2. स्वामी हंसदेवाचार्य जी (जगद्गुरू-रामानंदचार्य पीठ)
3. स्वामी शिवानंद जी (मातृसदन-हरिद्वार)
4. स्वामी रामदेव जी (पतंजलि-हरिद्वार)
5. आचार्य प्रमोद कृष्णम (कल्किपीठ-सम्भल)

मैंने यह भी तय किया था कि किस विषय पर कौन बोलेगा। स्वामी निश्चलानंद जी को मैं शीर्ष धर्माचार्य मानता हूँ। तय किया कि वह गंगाजी के धार्मिक पक्ष पर बोलेंगे। हंसदेवाचार्य जी, प्रवाह की अविरलता का पक्ष रखेंगे। रामदेव जी, गंगा के स्वास्थ्य पर कहेंगे। शिवानंद जी, खनन और अतिक्रमण का पहलू रखेंगे और प्रमोद कृष्णम जी के लिये मैंने प्रदूषण का विषय तय किया था।

 

दलगत नहीं था चयन


मैंने यह कोई साथ कोई स्वार्थवश, रणनीतिवश या पार्टीवश नहीं किया था। यह 2010 से चल रही चर्चा के कारण था। इन सभी पाँचों से मैं 2010 से ही अलग-अलग मिलकर इन विषयों पर चर्चा करता रहा था। मैं जानता था कि प्रमोद कृष्णम और शिवानंद जी, कांग्रेस से जुड़े हैं और बाकि राइटिस्ट हैं या कहिए कि भाजपा से जुड़े हैं। अतः यह कोई दलगत निर्णय नहीं था। गुरू जी से मेरी चर्चा होती ही रहती थी। उनके संज्ञान में पाँचों नाम थे। गोविन्द (गंगा महासभा) पर सब टाइप कर दिया। कहा कि हार्ड कॉपी भेजने के साथ-साथ ई मेल भी कर दें। मैंने नामों सहित पत्र लिखकर 28 मार्च को प्रधानमंत्री जी को भेज दिया। मैने प्रधानमंत्री जी को लिखा था कि एनजीआरबीए की मीटिंग हेतु सभी सदस्यों को इंडिवीजुअली इनवाइट करें। प्रधानमंत्री के अलावा गंगा प्राधिकरण के सदस्य सचिव- पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, नारायण सामी और श्रीप्रकाश जायसवाल को भी भेज दी। एस.के. गुप्ता ने हार्ड कॉपी ने भेजी और सॉफ्ट कॉपी मैंने। गुरूजी तक का कोई कॉपी नहीं दी।

हालांकि मुझे पता चल गया था कि काम बन्द नहीं हुआ है, तो भी मैं सोच रहा था कि कोई जाये; राजेन्द्र सिंह या कोई इंजीनियर देख आये कि काम बन्द हुआ कि नहीं?

 

सबसे कमजोर क्षण : सबसे बड़ी गलती


मैं मुजफ्फरनगर गया था। मैंने सोचा कि एक तारीख को हरिद्वार जाऊँ। वहाँ से पुरी शंकराचार्य के पास पुरी होते हुए बनारस चला जाऊँगा। आचार्य जितेन्द्र ने कहा कि वह भी पुरी चलेंगे। मैंने कहा कि मुजफ्फरनगर बनारस से लौटने का रिजर्वेशन करा लूँगा। मैं मुजफ्फरनगर में ही था कि गुरूजी का फोन आया। उन्होंने डाँटा- “तुमने हमसे पूछे बिना एजेण्डा और नाम कैसे तय कर लिये? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?’’

मुझे याद पड़ता है इससे पहले यदि किसी ने डाँटा था, तो अमेरिका के प्रोफेसर डॉक्टर डाल ने आईआईटी के डायरेक्टर के सामने डाँटा था। उन्होंने डाँटा था कि या तो अमेरिका जाना स्वीकार कर लो या फिर आईआईटी छोड़ जाओ।

गुरूजी... अविमुक्तेश्वरानंद जी मुझे तब तक डाँटते रहे, जब तक कि मैंने माफी नहीं माँग ली।

मैं समझता हूँ कि वह मेरी जिन्दगी का सबसे कमजोर क्षण था और सबसे बड़ी गलती। मैंने कहा- “गुरूजी, आप जो चाहेंगे, वही होगा।’’

संवाद जारी...

अगले सप्ताह दिनांक 20 मार्च, 2016 दिन रविवार को पढ़िए स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद शृंखला का दसवाँ कथन

प्रस्तोता सम्पर्क:
ईमेल : amethiarun@gmail.com
फोन : 9868793799

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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