आयुर्वेद के अनुसार जल के औषधीय गुण

Submitted by Hindi on Wed, 03/16/2016 - 13:04
Source
जल चेतना - तकनीकी पत्रिका, जनवरी 2015

जलजल सभी स्थानों पर सुलभ होने वाली सबसे सस्ती लेकिन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण औषधि है। कभी-कभी तो जब सारी औषधियाँ असफल हो जाती हैं तब जल की एक घूँट या मात्र कुछ बूँदें ही जादू के असर की तरह काम करके मनुष्य के जीवन को आश्चर्यजनक ढंग से बचा देती हैं। इसलिये कहा भी गया है।

अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदः।
भोजनेचामृतंवारि भोजनान्ते विषप्रदः।।


अजीर्ण में जब भोजन पच न रहा हो जल औषधि का काम करता है। भोजन के पच जाने पर जल पीना बल वर्द्धक होता है। भोजन में मिला हुआ जल अमृत के समान लाभकारी होता है। भोजन के तुरन्त बाद जल पीना विष तुल्य हो जाता है क्योंकि इससे भोजन पचाने वाली अग्नि मन्द हो जाती है। जल जीवन के लिये एक आवश्यक वस्तु होते हुए भी हम यह नहीं जानते कि स्वस्थ जीवन जीने के लिये जल किस प्रकार उपयोगी हो सकता है। इस बात का जितना सम्यक ज्ञान आयुर्वेद देता है शायद ही कोई दूसरा ग्रन्थ या अन्य चिकित्सा पद्धति ऐसा ज्ञान देती हो। आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ भाव प्रकाश निघन्टु में जल का विशद वर्णन किया गया है। जैसे कि जल के विभिन्न नाम, जल के विभिन्न गुण, जल के भेद, वर्ष भर में प्राप्त भिन्न-भिन्न समयों में जल के भिन्न-भिन्न गुण, जल के विभिन्न स्वरूप, जल पीनेे का उपयुक्त समय, कब जल नहीं पीना चाहिए, कब कम जल पीना चाहिए, अशुद्ध जल को पीने लायक कैसे बनाया जाये, पिया हुआ जल कितने समय में पच जाता है इत्यादि का जितना विशद, सम्यक व सटीक वर्णन इस ग्रन्थ में किया गया है शायद ही संसार के किसी दूसरे ग्रन्थ में किया गया हो।

जल के नाम


पानीयं सलिलं नीरं कीलालं जलाम्बुच।
आपो वारवारि कं तोयं पयः पाथोस्तथोदकम्।
जीवनं वनमम्भोऽर्णवोमृतम् घनरसौऽपिच।


पानीयं, सलिलं, नीरं, कीलाल, जल, अम्बु, आप, वार, वारि, कं, तोय, उदक, जीवन, वन, अम्भः अर्णः, अमृत तथा घनरस ये जल के पर्यायवाची हैं।

जल के गुण


पानीयं श्रम नाशन क्लमहरं मूर्छापिपासपहम्।
तंद्रा छर्दिविबन्धह्वदवलकरं निद्राहरं तर्पणम्।।
हृदयं गुप्तरसं हिअजीर्णशमकं नित्यंहितं शीतलम्।
लध्वच्छं रसकारणं निगदितंपीयूषवज्जीवनम्।।


जल श्रम को दूर करने वाला, क्लान्ति नाशक, मूर्छा, प्यास को नष्ट करने वाला, तन्द्रा, वमन और विवन्ध को हटाने वाला, बलकारक, निन्द्रा को दूर करने वाला, तृप्ति दायक, हृदय के लिये हितकर, अव्यक्तरस वाला, अजीर्ण का शमन करने वाला, सदा हितकारक, शीतल, लघु स्वच्छ, सम्पूर्ण मधुरादि रसों का कारण एवं अमृत के समान शास्त्रों में कहा गया है।

जल के भेद


पानीयं मुनिभिः प्रोक्तं दिव्यं भौममिति द्विधा।
धाराजं करकामय तौशारचं तथा हेमं।
दिव्यंचर्तुबिधमं पोक्तं तेषु धारामं गुणाधिकम्।।


भाव प्रकाश निघंटु में जल के दो भेद कहे गए हैं दिव्य जल और भौम जल इसमें भी दिव्य जल को चार प्रकार का कहा गया है। धाराजल, कारकामय जल, तुषार जल और हेम जल। इसमें जो धारा जल होता है वह अन्य जलों की अपेक्षा अधिक गुणदायक होता है। धारा जल आसमान से वर्षा के रूप में प्राप्त होने वाले जल को कहते हैं। कारकामय जल आसमान से ओलों के रूप में प्राप्त होने वाले जल को कहते हैं तथा भौम जल पृथ्वी के अन्दर संचित रहने वाले जल को कहते हैं। हेमजल, हिमगलन से निर्मित होने वाले जल कहते हैं।

धारा जल के लक्षण


धाराभिः पतितं तोयं गृहीतं स्फीतवाससा।
शिलायां वसुधायां धौतायां पतितंचतत्।।
सौबर्णे राजते ताम्रे स्फाटिके कांचनिर्मिते।
भाजनें मृण्मयेवापि स्थापितं धार मुच्यते।।


धारा जल के रूप में आकाश से गिरा हुआ यदि धुली हुई स्वच्छ शिला पर या पृथ्वी पर गिरा हुआ हो तो उसे लेकर स्वच्छ मोटेे वस्त्र, सोना, चांदी, तांबा, स्फटिक कांच अथवा मिट्टी, से चाहे जिस किसी के बने हुए बर्तन मे रख दे इसी को धारा संज्ञक जल कहते हैं।

धारा जल के गुण


धारा नीरं त्रिदोष्घनंनिर्देश्य रसं लघु।
सौम्यं रसायनं वल्यं तर्पणं हृदि शीतलम्।।
पाचनं मूर्छा तन्द्रा दाह श्रमनाशनमं।


यह त्रिदोष नाशक, अनिर्देश्य रस वाला ,लघु, सौम्य, रसायन, बलकारक, तृप्तिदायक, आह्लाद उत्पन्न करने वाला, जीवन स्वरूप, पाचक, बुद्धिवर्द्धक एवं मूर्छा, तंद्रा, दाह, श्रम, क्लान्ति, प्यास इन सब को दूर करने वाला होता है। इसमें विशेष कर वर्षा ऋतु का जल विशेष लाभ दायक माना गया है।

धारा जल के भेद


धारा जलं च द्विबिधं गांग सामुद्र भेदतः।
धारा जल के दो भेद कहे गए हैं गांग तथा सामुद्र।


गांग जल के लक्षण


आकाश गंगासम्बन्धित जल मादाय दिग्गजाः।
मेर्घैन्तरिता कुर्वन्तीति वच सताम्।।


सत्पुरुषों का कथन है कि दैविक लोग आकाश गंगा का जल लेकर मेघों के द्वारा जल बरसाते हैं। आश्विन या क्वार मास में बरसने वाला जल इतना शुद्ध होता है कि उसे गांग जल ही मानना चाहिए। इस जल में भिगोया गया अन्न खराब नहीं होता है।

समुद्री जल के लक्षण


तद् गांग सर्ब दोषघ्नं ज्ञेयं सामुद्रमन्यथा।
तत्तु संक्षार लवणं शुक्रं दृष्टि बलापहम्।


यदि भिगोया हुआ अन्न तुरन्त खराब हो जाये अथवा उसका रंग बदल जाये तो उसे समुद्र जल समझना चाहिए।

जल के निर्विष तथा सविष होने का प्रमाण


फूत्कार विष वातेन नागानां व्योम चारिणाम्।
वर्षाषु सविषं तोयं दिव्यं मयाश्विनं बिना।।


शास्त्रों में कहा गया है कि वर्षा ऋतु में आकाशचारी नागों (दिव्य सर्पों) के फुफकार से जल विष युक्त हो जाता है किन्तु, वही जल आश्विन मे विष युक्त नहीं रहता।

यतोऽगस्तस्य दिव्यर्षैरुदयात्सकलं जलम्।
निर्मलं निर्विष स्वादु शुक्रलं स्याददोषापहम्।।


शरद ऋतु में आकाश में अगस्त्य तारे का उदय हो जाता है अतः सम्पूर्ण जल निर्मल, निर्विष, स्वादु, शुक्रल एवं दोष जनक नहीं होता।

हेम जल के लक्षण


हेमवद्शिखरादिव्यो द्रवीभूयाभिवषर्ति।

हिमालय आदि के शिखरों से द्रवीभूत होकर जो हिम बरसता है उससे प्राप्त होने वाले जल को हेम जल कहते हैं।

हेम जल के गुण


यतदेवं हिमं हेमं जलमार्हुमनीषिणः।
हिमाम्बु शीतं स्निग्धं गुरु वातविबर्ध्रनं।।


यह शीतल पितनाशक, गुरू तथा वायु को बढ़ाने वाला होता है।

भौम जल के भेद


भोमम्बो निगदितं प्रथमं त्रिबिधं बुधैः।
जांगलं परमानूपं ततः साधारणं क्रमात्ं।।


विद्वानों ने भौम जल को जांगल, आनूप तथा साधारण इन तीन प्रकारों का माना है।

जांगल जल के लक्षण


अल्पोदकोऽल्पवृक्षस्य पितरक्तमयान्वितः।
ज्ञातव्यो जांगलोदेशस्तत्र्त्य जांगलं जलः।।


जिस स्थान पर थोड़े जल व थोड़े वृक्ष होते हैं उस स्थान को जांगल देश तथा वहाँ पैदा होने वाले जल को जांगल जल कहते हैं।

जांगल जल के गुण


जांगलम सलिलं रुक्षं लवणं लघु पितन्वितः।
व्ह्निकृत कफहृत पथ्यं विकारान् हरते बहूनृ।।


यह रुक्ष, लवण रस युक्त, लघु, पितनाशक अग्निवर्धक कफनाशक, पथ्य एवं लवण रस युक्त, लघु, कफ नाशक, पथ्य तथा अनेक प्रकार के विकारों को नष्ट करने वाला होता है।

आनूप जल के लक्षण


बह्वम्बु बहुवृक्षच वातश्लेष्मा मयान्वितः।
देशोऽनूप इतिख्यात आनूपं तदभवज्जलं।।


जिस स्थान पर अधिक रूप से जल तथा वृक्ष होते हैं एवं वात तथा कफ सम्बन्धी रोग अधिक होते हों उसे आनूप देश कहा जाता है तथा वहाँ प्राप्त होने वाले जल को आनूप जल कहते हैं।

आनूप जल के गुण


आनूपं वारि वार्यभिष्यन्दि स्वादु स्निग्धं घनं गुरु।
बन्हिहृदं कफंकृतं हृद्यं विकारान् कुरुते बहून्।।


यह अभिष्यन्दि (नेत्रों के लिये अहितकर), स्वादिष्ट, स्निग्ध, धन, गुरू, अग्नि को नष्ट करने वाला, कफ कारक, हृदय के लिये हितकर एवं बहुत से रोगों को उत्पन्न करने वाला होता है।

साधारण जल के लक्षण


मिश्र चिह्नस्तु यो देश सहि साधारणः स्मृतः।
तस्मिन देशे यदुदकं तत्तु साधारणं स्मृतम्।।


जहाँ पर जांगल तथा आनूप दोनों ही देशों के चिह्न मिले हुए हो तो उसे साधारण देश तथा वहाँ के जल को साधारण जल समझना चाहिए।

साधारण जल के गुण


साधारणं तु मधुरमं दीपनं शीतलं लघु:।
तर्पणं रोचनं तृष्णा दाह दोष त्रय प्रणुत।।


यह मधुर रस युक्त, अग्नि दीपक, शीतल, लघु, तृप्ति कारक रोचक, प्यास, दाह तथा त्रिदोष को दूर करने वाला होता है।

भौम जल के अन्य प्रकार से भी दो भेद होते हैं -

नद्या नदस्यावा नीरं नादेयं इति कीर्तितम्।

भौम जल का एक प्रकार नादेय भी है। नादेय का अर्थ होता है नदी का जल।

नादेयं उदकं रुक्षं वातलं लघु दीपनं ।
अभिष्यन्दि विशदं कटुकं कफपितन्वितः।।


नदी का जल रुक्ष, वातजनक, लघु, अग्निदीपक, अभिष्यन्दि, विशद, कटु रस युक्त एवं कफ तथा पित को दूर करने वाला होता है।

शीघ्र तथा मन्द गति से बहने के भेद से नदियों के जल में जो गुण भेद होते हैं वे शीघ्र तथा मन्द गति से बहने के कारण अलग-अलग होते हैं।

ऐसी जितनी भी नदियाँ होती हैं जो शीघ्र गति से बहती हैं उनका जल स्वच्छ तथा लघु होता है तथा मन्द गति से बहने वाली जितनी भी नदियाँ होती हैं उनका जल सेवा तथा गिरी हुई पत्तियों के कारण स्वच्छ नहीं होता उनका जल भारी तथा अस्वच्छ होता है।

नद्यः शीघ्रवहा लघ्वः सर्बायाश्चामलोदकाः।
गुरुव्यः शैवालसंछन्ना मदंगाः कलुषाश्चया।।
हिमवत्प्रभवा पथ्याः नद्योस्माहृत पाथसा।
गंगा शतद्रु सरयू यमुनाद्यागुणोतमाः।
सह्य शैलभवानद्यो बेणा गोदावरी मुखाः।।
कुर्वन्ति प्रायशः कुष्टमीषकांत कफावहोः।


हिमालय से निकलकर बहने वाली या पत्थरों से टक्कर खा कर बहने वाली, ऐसी गंगा, सतलज, सरयू, यमुना आदि जो नदियाँ है उनका जल पथ्य या गुण युक्त एवं उत्तम होता है सह्य पर्वत से निकल कर बहने वाली वेणा गोदावरी आदि नदियाँ उन सब का जल प्रायः कुष्ठ रोग को पैदा करने वाला होता है। ये वात एवं कफ को बढ़ाने वाला होता है।

औद्भिद जल


बिदार्य भूमि निम्ना यन्महत्या धारयास्रवेत।
तत्तोयं औद्भिदं नामं बदन्तीति महर्शयः।।


भौम जल के अन्तर्गत एक प्रकार का जल भी होता है, जिसको औद्भिद जल कहते हैं।

औद्भिद जल के लक्षण तथा गुण


औद्वदं वारि पितघ्नं विदाह्यतिशीतलं।
प्रीणनं मधुरं वल्यमीशितं वातकर लघु।।


नीची जमीन को फोड़ कर जो जल धारा के रूप मे निकलता है उसे औद्भिद जल कहते हैं। यह पित नाशक, अबिदाही, अतिशीतल, तृप्तिकारक, मधुररस युक्त एवं किंचिद वात कारक तथा लघु होता है।

अंशुदक जल


दिवा रबिकर्रैजुष्टं निशि शीतकरांशुभिः।
ज्ञेयं अंशुदकंनामं स्निग्धं दोष त्रयापहम्।।


जिस जल के ऊपर दिन में सूर्य तथा रात्रि मे चंद्रमा की किरणें पड़ती हों उसे अंशुदक जल कहते हैं।

अंशुदक जल के गुण


अनभिस्यन्दि निर्दोषमान्तरिक्षं जलोपमम्।
वल्यं रसायनं मेध्यं शीतं लघु सुधा समम्।।


यह जल स्निग्धगुण युक्त, त्रिदोष नाशक, अभिष्यन्दि, निर्दोष, अन्तरिक्ष जल के समान, वातकारक, रसायन, मध्य, मेधा के लिये हितकर, शीतल, लघु तथा अमृत के समान हितकारक होता है।

भिन्न-भिन्न समयों में जल के स्वरूप तथा गुण


पौशेवारि सरोजातं मार्घैत्तुतडागजम्।
फागुन कूप सम्भूतं चैत्रेचैन्ज्यंहिर्तैमतम्ं।।
बैशाखै नैझरंनीरं जेष्ठे शस्तं तथौद्भिदम्।
आषाडे शस्यते कौपं श्रावणे दिव्यमेवच।।
भाद्रेकौपं पयं शस्तंमाश्विने चौंज्यमेवच।
कर्तिके मार्गशीर्षे च जलमात्रंप्रशस्यते।।


पौष मास में सरोवर का जल, माघ मास में तालाब का जल, फागुन मास में, कुएँ का जल, चैत्र मास मे चौंन्च्य का जल, बैशाख मास में झरने का जल, जेष्ठ मास मे ओद्भिद जल, आषाड़ मास में कुएँ का जल, श्रावण मास में आकाश का जल, भादौ मास में कुएँ का जल, क्वार मास मे चौंन्च्य का जल, कार्तिक तथा अगहन मास में सम्पूर्ण जल प्रशस्त होता है।

जल ग्रहण करने का समय


भोमानाम्भ्सौ प्रायो ग्रहणं प्रातरिष्यते।
शीतत्वं निर्मलत्वंच यतस्तेषां मतो गुणः।।


सभी प्रकार के जलों को प्रातःकाल ही ग्रहण करना चाहिए क्योंकि उस समय जल शीतल तथा निर्मल होता है।

जलपान ग्रहण करने का उचित समय


अत्यम्बुपानान्नविपच्यतेऽन्न निरम्बुपानाच्च स एव दोषा।
तस्मान्नरोबह्नि बिवर्धनाय मुहु्रमुर्हु वारि पिबेत भूरिम्।।


अधिक जल पीने से अन्न नहीं पचता और कुछ भी जल न पीने से वही अवस्था होती है अतः मनुष्य को चाहिए कि उत्तम स्वास्थ्य के लिये बार-बार थोड़े अन्तराल पर जल पीता रहे।

शीतल जल पीने के योग्य व्यक्ति


मूर्छा, पित सम्बन्धी रोग, गर्मी, दाह, विष, रक्त विकार, मदात्यय, श्रम, भ्रमरोग, तमक श्वास, वमन, रक्तपित इन सब रोग वालों के लिये शीतल जल हितकर होता।

मूर्छा पितोष्णदाहेषु विषे रक्ते मदात्यये।
श्रमे भ्रमे बिदग्धेऽन्ने तमकेवमथौयथा।।


शीतल जल किसे नहीं पीना चाहिए


पार्श्वशूले प्रतिश्याये वातरोगे गलग्रहे।
आघ्मानं स्मिते कोष्ठे सद्य शुद्ध नवज्वरे।।
अरुवि ग्रहणी गुल्मंच श्वास कासेषु विद्रधौ।
हिक्कायां स्नेहपानंच शीताम्बु परिवर्जयेत।।


पार्श्व शूल, जुकाम, वात रोग, गलग्रह, अफारा, बद्धकोष्ठ के तत्काल बाद, नवीन ज्वर, अरुचि, ग्रहणी, गुल्म, श्वास, खांसी, बिद्रधि, हिचकी स्नेह पान, इन सब में शीतल जल वर्जित होता है।

किन अवस्थाओं मे कम पानी पीना चाहिए


अरोचते प्रतिश्याये मंदाग्नो श्वयथौ क्षये।
मुख प्रसेके जठरे कुष्ठे नेत्रमयेज्वरे।।
ब्रणे मधुमेहेच पिवेत पानीयल्पकम्।


अरुचि, जुकाम, मंदाग्नि, शोथ, क्षय, मुख प्रसेक, उदर रोग, कुष्ठ, नेत्र बिकार, ज्वर, ब्रण, ओर मधुमेह इन रोगों में अल्प जल पीना ही हितकर होता है।

मनुष्य के लिये जलपान की आवश्यकता


जल प्राणियों का जीवन स्वरूप है सम्पूर्ण जगत जलमय है। इसलिये एकदम से ही जल का त्याग नहीं करना चाहिए।

जीवनं जीविनां जीवो जगत सर्वन्तु तन्मयम्।
नातोल्पनिषेधेन कदाचिद् वारिवार्यते।


प्यास का स्वरूप


अत्यन्त प्यास बड़ी भयंकर होती है क्योंकि उससे सद्य प्राण निकल जाते हैं। इसलिये प्राणों को धारण करने का साधन जल अवश्य ही पीते रहना चाहिए।

तृष्णा बलीयसी घोरा सद्य प्राण विनाशिनी।
तस्मादेव तृष्णाऽऽतार्यं पानीयं प्राण धारणम्।।


गुणकारी जल के लक्षण


जो जल गन्ध रहित हो तथा जिसका रस पूर्ण रूप से न मालूम पड़ता हो एवं जो शीतल हो तथा शीघ्र ही प्यास को मिटाने वाला हो तथा स्वच्छ लघु तथा हृदय के लिये हितकर हो ऐसे जल को उत्तम समझना चाहिए।

अगन्धं अव्यक्त रसं सुशीतं तर्पनाशनम्।
स्वच्छं लधुंच हृदयंच तोयं गुणवदुच्यते।।


अवगुण दिखाने वाला जल


पिच्छिल किृमिलं किलन्नं पर्ण शैवालकर्दमैः।
विवर्णं बिरसं सान्द्रं दुर्गन्धं न हितं जलम्।।


जो जल पिच्छिल (चिकना), कृमियुक्त, पत्तों तथा सेवार से युक्त एवं कीचड़ से खराब हो गया हो, विकृत वर्ण का हो गया हो, विरस तथा दुर्गन्ध युक्त होता है वह जल हितकारी नहीं होता है।

दूषित जल को स्वच्छ बनाने के उपाय


निन्दितं चापि पानीयं क्वथितं सूर्य तापितम्।
सुवर्ण रजतं लौहमं पाषाणं सिकतामपि।।
भृशं सन्ताप्य निर्वाप्य सप्तधा साधितं तथा।
कर्पूर जाति पुन्नागं पाटलादि सुभाषितम्।
शुचि साद्रं पट स्रावि क्षुद्र जन्तु विर्वजितम्।
स्वच्छ कनकमुक्ताऽधै शस्याद्दांषवर्जितम्।।
पर्ण मूल विशग्रन्थि मुक्ता कनक शेवलैः।
गोमेदेन च वस्त्रेण कुर्यादम्बु प्रसादनम्।।


जो जल उक्त प्रकार से निन्दित हो उसे काढ़े की भाँति पकाएँ। सूर्य की किरणों से गरम करके अथवा सोना, चांदी, लोहा, पत्थर, बालू को खूब गरम करके सात बार उक्त जल में बुझा दें, तदुपरान्त कर्पूर, चमेली का पुष्प सुलतान चम्पा का पुष्प, पाढल आदि के पुष्पों से सुभाषित करके और तब स्वच्छ तथा गाढ़े वस्त्र से छानकर, छोटे-छोटे कृमियों को दूर कर, इस प्रकार से स्वच्छ किये जल को सुवर्ण तथा मोती के द्वारा शुद्ध करके जल स्वच्छ तथा दोष रहित हो जाता है। पत्ते, मूल, कमल, मूल, मोती सुवर्ण, मणि, गोमेद मणि या वस्त्र इन सब से जल को स्वच्छ करना चाहिए।

पिये हुए जल के पचने का परिमाण


पीतं जलं जीर्यति यामयुग्माद्यैमेकमात्राच्छुतिशीतलंच।
तर्दध्रमात्रेण श्रुतं कदुष्णं पयः प्रपाके त्रय एव काला।


पिया हुआ साधारण जल दोपहर के लगभग दो घंटे मे पच जाता है। उबालकर तत्पश्चात शीतल किया हुआ जल एक पहर लगभग डेढ़ घंटे में पच जाता है तथा औटाया हुआ किचिंद गरम जल आधा पहर लगभग एक घंटे में ही पच जाता है।

सम्पर्क करें
पी. आर. भट्ट, प्रधानाचार्य, राजकीय इण्टर कालेज हिंसरियाखाल, टिहरी गढ़वाल, मो.नं. 7579022065, ईमेल : erbhatt04@gmail.com

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