पर्यावरण को दूषित करता ई-कचरा

Submitted by Hindi on Wed, 03/16/2016 - 13:28
Source
जल चेतना - तकनीकी पत्रिका, जुलाई 2015

ई-कचरा पर्यावरण को लेकर अभी हमारे देश में पूरी तरह जागरुकता नहीं आई है। प्रदूषण जैसे अहम मुद्दे विकास के नाम पर पीछे छूट गए हैं। ऐसे में ई (इलेक्ट्राॅनिक) कचरे के बारे में देश में बिलकुल भी जानकारी नहीं है। न ही इस दिशा में कोई कदम उठते नजर आ रहे हैं। इलेक्ट्राॅनिक उत्पादों से बाजार भरे पड़े हैं। तकनीक में हो रहे लगातार बदलावों के कारण उपभोक्ता भी नए-नए इलेक्ट्राॅनिक उत्पादों से घर भर रहे हैं। ऐसे में पुराने उत्पादों को वह कबाड़ में बेच देता है और यहीं से आरम्भ होती है ई-कचरे की समस्या।

क्या है ई-कचरा


ई-वेस्ट आई.टी. कम्पनियों से निकलने वाला यह कबाड़ है, जो तकनीक में आ रहे परिवर्तनों और स्टाइल के कारण निकलता है। जैसे पहले बड़े आकार के कम्प्यूटर, माॅनीटर आते थे, जिनका स्थान स्लिम और फ्लैट स्क्रीन वाले छोटे माॅनीटरों ने ले लिया है। माउस, की-बोर्ड या अन्य उपकरण जो चलन से बाहर हो गए हैं, वे ई-वेस्ट की श्रेणी में आ जाते हैं।

पुरानी शैली के कम्प्यूटर, मोबाइल फोन, टेलीविजन और इलेक्ट्रानिक खिलौनों तथा अन्य उपकरणों के बेकार हो जाने के कारण भारत में हर साल इलेक्ट्राॅनिक कचरा पैदा होता है। यह मनुष्य के स्वास्थ्य के लिये गम्भीर खतरा उत्पन्न कर सकता है।

विकसित देशों में अमेरिका की बात करें, तो वहाँ प्रत्येक घर में वर्षभर में छोटे-मोटे 24 इलेक्ट्राॅनिक उपकरण खरीदे जाते हैं। इन पुराने उपकरणों का फिर कोई उपयोग नहीं होता। इससे यह अन्दाजा लगाया जा सकता है कि अमेरिका में कितना इलेक्ट्राॅनिक कचरा निकलता होगा। यह तथ्य भी देखने में आया कि केवल अमेरिका में ही 7 प्रतिशत लोग प्रतिवर्ष मोबाइल बदलते हैं और पुराना मोबाइल कचरे में डाल देते हैं।

ई-कचरे का बढ़ता आयात


ई-कचराविकासशील देशों को सर्वाधिक सुरक्षित डम्पिंग ग्राउंड माने जाने के कारण भारत, चीन और पाकिस्तान सरीखे एशियाई देश ऐसे कचरे के बढ़ते आयात से चिन्तित हैं। देश और दुनिया के पर्यावरण संगठन इसके सम्भावित खतरों पर एक दशक से भी ज्यादा समय से चिन्ता प्रकट कर रहे हैं। ऐसे कचरे के आयात पर प्रतिबन्ध लगाने के लिये भारत में बने कचरा प्रबन्धन और निगरानी कानून 1989 को धता बताकर औद्योगिक घरानों नें इसका आयात जारी रखा है। अमेरिका, जापान, चीन और ताइवान सरीखे देश तकनीकी उपकरणों में फैक्स, मोबाइल, फोटोकाॅपियर, कम्प्यूटर, लैप-टाॅप, टी.वी., बैरिया, कंडेसर, माइक्रो चिप्स, सी.डी. और फ्लाॅपी आदि के कबाड़ होते ही इन्हें ये दक्षिण पूर्व एशिया के जिन कुछ देशों में ठिकाने लगाते हैं, उनमें भारत का नाम सबसे ऊपर है।

अमेरिका के बारे में यह कहा जाता है कि वह अपने यहाँ का 80 प्रतिशत ई-कचरा चीन, मलेशिया, भारत, कीनिया तथा अन्य अफ्रीकी देशों में भेज देता है। भारत सहित कई अन्य देशों में हजारों की संख्या में महिला पुरूष व बच्चे इलेक्ट्राॅनिक कचरे के निपटान में लगे हैं। इस कचरे को आग में जलाकर इसमें से आवश्यक धातु आदि भी निकाली जाती हैं। इसे जलाने के दौरान जहरीला धुआँ निकलता है जो कि काफी घातक होता है। भारत में दिल्ली व बंगलुरु ई-कचरे को निपटाने के प्रमुख केन्द्र हैं।

दुनिया के देशों में तेजी से बढ़ती इलेक्ट्रानिक क्रान्ति से एक तरफ जहाँ आम लोगों की उस पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ इलेक्ट्रानिक कचरे से होने वाले खतरे ने पूरे दक्षिण पूर्व एशिया खासकर पूरे भारत की चिन्ता बढ़ा दी है। पर्यावरण के खतरे और गम्भीर बीमारियों का स्रोत बन रहे इस कचरे का भारत प्रमुख उपभोक्ता है। मोबाइल फोन, लैपटाॅप, फैक्स मशीन, फोटोकाॅपियर, टेलीविजन और कबाड़ बन चुके कम्प्यूटरों के कचरे भारी तबाही के तौर पर सामने आ रहे हैं।

देश में पैदा होता ई-कचरा


वर्ष 2005 में देश में ई-कचरे की मात्रा एक लाख 46 हजार 800 टन थी जो बढ़कर वर्ष 2014 तक 20 लाख टन होने का अनुमान है। ई-कचरा पैदा करने वाले 10 अग्रणी शहरों में दिल्ली, मुम्बई, बेंगलुरु, कोलकाता, चेन्नई और हैदराबाद शामिल हैं।

जोधपुर विश्वविद्यालय के एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे सेंटर फाॅर क्वालिटी मैनेजमेंट सिस्टम के प्रमुख जाँचकर्ता श्री घोष के अनुसार, जिस तेजी से बाजार में इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों विशेष रूप से मोबाइल की धूम मची है, यह एक चिन्ता का विषय है।

ई-कचरा फैलाने में भारत दुनिया के शीर्ष देशों में पांचवें नम्बर पर है। अमेरिका और चीन इस मामले में पहले एवं दूसरे नम्बर पर हैं। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (यूएनयू) की ओर से ‘विश्वविद्यालय ई-कचरा निगरानी-2014 ‘पर जारी रिपोर्ट से यह बात सामने आई है। अगले तीन वर्षों में इलेक्ट्रॅानिक उपकरणों से फैलने वाले कचरे में 21 फीसदी तक की वृद्धि का अनुमान जताया गया है।

भारत में पिछले साल 17 लाख टन ई-कचरा पैदा हुआ था। इस मामले में भारत का नम्बर अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद आता है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक चीन और अमेरिका कुल मिलाकर 32 फीसदी ई-कचरा पैदा करता है। वर्ष 2014 में पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा एक करोड़ साठ लाख टन ई-कचरा एशिया में जमा हुआ। तीन एशियाई देशों चीन (60 लाख टन) जापान (22 लाख टन) और भारत (17 लाख टन) में आधे से ज्यादा कचरा पैदा हुआ। हालांकि प्रति व्यक्ति ई-कचरा फैलाने वालों में नाॅर्वे, स्विट्जरलैंड, आइसलैंड, डेनमार्क और ब्रिटेन पहले पाँच देशों में शामिल हैं। पूरी दुनिया में पिछले साल 4.18 करोड़ टन ई-कचरे का उत्पादन हुआ। वर्ष 2018 तक इस आँकड़े का पाँच करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। रिपोर्ट के मुताबिक मोबाइल फोन, कैलकुलेटर, कम्प्यूटर, प्रिंटर और छोटे-मोटे इलेक्ट्राॅंनिक उपकरणों के चलते सिर्फ सात फीसदी तक ही कचरा फैला। वर्ष 2014 में उत्पादित ई-कचरे में 16.5 हजार किलो टन लोहा, 19 सौ किलो टन फ्लैडियम प्लास्टिक शामिल है। इसके अलावा 22 लाख टन शीशा, तीन लाख टन बैटरी, पारा, कैडमियम, क्रोमियम आदि हैं।

ई-कचरे के निपटान की समस्या


ई-कचराविकसित देश अपने यहाँ के इलेक्ट्राॅनिक कचरे को गरीब देशों को बेच रहे हैं। विकसित देश यह नहीं देख रहे कि गरीब देशों में ई-कचरे के निपटान के लिये नियम-कानून बने हैं या नहीं! इस कचरे से होने वाले नुकसान का अन्दाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसमें 38 अलग प्रकार के रासायनिक तत्व शामिल होते हैं जिनसे काफी नुकसान भी हो सकता है। जैसे टीवी व पुराने कम्प्यूटर माॅनिटर में लगी सीआरटी (केथोड रे ट्यूब) को रिसाइकिल करना मुश्किल होता है। इस कचरे में लेड, मरक्युरी, केडमियम जैसे घातक तत्व भी होते हैं।

दरअसल ई-कचरे का निपटान आसान काम नहीं है क्योंकि इसमें प्लास्टिक और कई तरह की धातुओं से लेकर अन्य पदार्थ रहते हैं। इस कचरे को आग में जलाकर इसमें से आवश्यक धातु आदि निकाली जाती है। इसे जलाने से जहरीला धुआँ निकलता है जो काफी घातक होता है। विकासशील देश इनका इस्तेमाल तेजाब में डुबोकर या फिर उन्हें जलाकर उनमें से सोना-चांदी, प्लैटिनम और दूसरी धातुएँ निकालने के लिये करते हैं।

भारत में सूचना प्रोद्योगिकी का क्षेत्र बंगलुरु है। यहाँ करीब 1700 आई.टी. कम्पनियाँ काम कर रही है और उनसे हर साल 6000 हजार से 8000 टन इलेक्ट्राॅनिक कचरा निकलता है। सॉफ्टवेयर टेक्नोलाॅजी पार्क आॅफ इण्डिया (एसटीपीआई) के डायरेक्टर कहते हैं कि सबसे बड़ी जरूरत है भारी मात्रा में निकलने वाले ई-वेस्ट के सही निपटान की जब तक उसका व्यवस्थित ट्रीटमेंट नहीं किया जाता, वह पानी और हवा में जहर फैलता रहेगा।

देश में निकलने वाला हजारों टन ई-वेस्ट (इलेक्ट्राॅनिक कचरा) कबाड़ी ही खरीद रहे हैं। इनके पास इस तरह के कचरे को खरीदने की न अनुमति है और न ही वैज्ञानिक तरीके से निपटान की व्यवस्था।

स्वास्थ्य और पर्यावरण को खतरा


ई-कचरा इलेक्ट्राॅनिक चीजों को बनाने के उपयोग में आने वाली सामग्रियों में ज्यादातर कैडमियम, निकेल, क्रोमियम, एंटीमोनी, आर्सेनिक, बेरिलियम और मरकरी का इस्तेमाल किया जाता है। ये सभी पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिये घातक हैं। इनमें से काफी चीजें तो रिसाइकिल करने वाली कम्पनियाँ ले जाती हैं, लेकिन कुछ चीजें नगर निगम के कचरे में चली जाती हैं। वे हवा, मिट्टी और भूजल में मिलकर जहर का काम करती हैं। कैडमियम से फेफड़े प्रभावित होते हैं, जबकि कैडमियम के धुएँ और धूल के कारण फेफड़े व किडनी दोनों को गम्भीर नुकसान पहुँचता है।

एक कम्प्यूटर में प्रायः 3.8 पौंड सीसा, फास्फोरस, कैडमियम व मरकरी जैसे घातक तत्त्व होते हैं जो जलाए जाने पर सीधे वातावरण में घुलते हैं। इनका अवशेष पर्यावरण के विनाश का कारण बनता है। अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरण संगठन ‘ग्रीनपीस’ के एक अध्ययन के अनुसार 49 देशों से इस तरह का कचरा भारत में आयात होता है।

तमिलनाडु में सूचना प्रोद्योगिकी के विस्तार ने ई-कचरे के रूप में पर्यावरण के लिये गम्भीर संकट पैदा कर दिया है। राज्यों में जहाँ-जहाँ सूचना प्रोद्योगिकी से जुड़ी कम्पनियों द्वारा लगातार अपने ठिकाने बनाए जाने से ई-कचरे का संकट व्यापक रूप लेता जा रहा है।

भारत की सिलिकाॅन वैली के रूप में मशहूर आईटी शहर बंगलुरु में ई-वेस्ट यानी इलेक्ट्रानिक कचरे की समस्या गम्भीर होती जा रही है। इससे निकलने वाले हानिकारक रसायन न सिर्फ मिट्टी को दूषित कर रहे हैं बल्कि भूजल को भी जहरीला बना रहे हैं।

ई-कचरे ने पर्यावरण के लिये खतरा पैदा कर दिया है। खासतौर पर चेन्नई के मूर मार्केट त्रिशुलम और रेड हिल समेत कई अन्य इलाकों में ई-कचरे का ढेर बढ़ता जा रहा है।

पर्यावरण संरक्षण के लिये काम करने वाली एक स्वैच्छिक संस्था ‘सिटिजन कंज्यूमर एंड एक्शन ग्रुप’ के अनुसार बेकार पड़े इलेक्ट्रानिक उपकरणों को तोड़ने और बीनने के काम में लगे लोगों को इस बात का तनिक भी अन्दाजा नहीं है कि ये उपकरण उनके स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण के लिये भी कितने खतरनाक हैं।

इलेक्ट्राॅनिक उपकरण सेमीकंडक्टर तकनीक से बनाए जाते हैं। इनमें ऊर्जा स्रोतों को लघु से लघुत्तम करने, परम्परागत धातु तांबे के साथ ही सिलीकाॅन, कैडमियम, सीसा, क्रोमियम, पारा व निकल जैसी भारी धातुओं का उपयोग किया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार पर्यावरण में असावधानी व लापरवाही से इस कचरे को फेंका जाता है तो इनसे निकलने वाले रेडिएशन शरीर के लिये घातक होते हैं। इनके प्रभाव से मानव शरीर के महत्त्वपूर्ण अंग प्रभावित होते हैं। कैंसर व तंत्रिका व स्नायु तंत्र पर भी असर हो सकता है।

क्या है नियम


ई-कचरे के निपटान के लिये नियम बनाए गए हैं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ई-कचरे के समुचित प्रबन्ध एवं निपटाने के लिये ‘खतरनाक कचरा प्रबन्धन, रखरखाव एवं सीमापार यातायात नियम 2008’ बनाए हैं। नियमों के अनुसार ई-कचरे के निपटारे में इकाइयों को केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में पंजीकृत होना जरूरी है।

शहरों में कबाड़ी ही कम्प्यूटर, मोबाइल व इलेक्ट्राॅनिक वस्तुओं को कबाड़ के रूप में खरीद रहे हैं। वे इस कचरे में से मतलब की उपयोगी वस्तुओं को निकालकर खतरनाक अपशिष्ट को खुले में फेंक देते हैं। इसमें से निकलने वाले हानिकरण रेडिएशन लोगों के जीवन के लिये खतरा बन सकते हैं। इसके निपटान व नियंत्रण के लिये जिम्मेदार प्रदूषण बोर्ड के अधिकारी लापरवाह बने हुए हैं। ई-कचरे को खरीदने के लिये नियमानुसार प्रदेश के प्रदूषण बोर्ड द्वारा अनुमति लेने के बाद केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड द्वारा पंजीयन कराना होता है।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि एक टन ई-कचरे से 350 ग्राम सोना निकल सकता है। इलेक्ट्राॅनिक कचरे में पाये जाने वाले सोने की शुद्धता अयस्कों में सोने की मात्रा से 100 गुनी ज्यादा होती है।

खराब हुए मोबाइल फोन को हम कचरा समझ कर फेंक देते हैं या कबाड़ी को बेच देते हैं। लेकिन शायद आप नहीं जानते कि उसमें सोना होता है। जितना महंगा मोबाइल उसमें सोने की मात्रा उतनी ही अधिक।

मोबाइल के सर्किट बोर्ड के अलावा कम्प्यूटर व मदर बोर्ड और चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों में सोना समेत चांदी और प्लेटिनम जैसी मूल्यवान धातुएँ होती हैं, मोबाइल फोन को तोड़कर उसका पीसीबी निकाला जाता है। पीसीबी में जो सोना है, उसे घुलन के लिये विभिन्न घोलों जैसे साइनाइड, थायोयूरिया, एक्वा रेजिया और थायो सल्फेट घोल का इस्तेमाल किया जाता है। जिस घोल में सोना मौजूद है, उसे निकालने के लिये चारकोल या जस्ता का चूर्ण मिलाया जाता है। सोने को धातु अवस्था में प्राप्त करने के लिये चारकोल को जलाया जाता है या फिर इलेक्ट्रो विनिंग तकनीक की सहायता ली जाती है। इससे सोना अलग हो जाता है।

कड़े नियम जरूरी


पर्यावरणअन्तरराष्ट्रीय स्तर पर बेसल कन्वेंशन के अन्तर्गत इलेक्ट्राॅनिक कचरे सम्बन्धी नियमों का पालन होता है। चीन ने अपने यहाँ पर ई-कचरे आयात करने पर रोक ही लगाई है। हांगकांग में बैटरियाँ व केथोड़ रे ट्यूब का आयात नहीं किया जा सकता। इसके अलावा दक्षिण कोरिया, जापान व ताईवान ने यह नियम बनाया है कि जो भी कम्पनियाँ इलेक्ट्राॅनिक उत्पाद बनाती हैं वे अपने वार्षिक उत्पादन का 75 प्रतिशत रिसाइकल करें। वहीं भारत की बात की जाये तो अभी ई-कचरे के निपटान व रिसाइकलिंग के लिये कोई प्रयास शुरू ही नहीं हुए। देश में तेजी से बढ़ रही कम्प्यूटर व इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों की संख्या से भी अब इस तरह के नियम-कायदे बनाना जरूरी हो गया है।

सरकार और सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग को इस खतरे से निपटने के लिये तुरन्त कार्रवाई करनी चाहिए। तामिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कहना है कि उसने सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी कम्पनियों को ई-कचरे के निस्तारण के लिये उचित तरीके अपनाए जाने की हिदायत दी है, लेकिन ज्यादातर कम्पनियाँ इसका पालन नहीं कर रही हैं।

इण्डो-जर्मन स्विस ई-वेस्ट कम्पनी के सहयोग से बंगलुरु में काम कर रहे स्वैच्छिक संगठन ‘ई-वेस्ट एजेंसी’ ने इलेक्ट्रानिक कचरे के सही निपटान के लिये पर्यावरण और वन मंत्रलय को भी पत्र लिखा है, कहा है कि इसके सम्बन्ध में कानूनी प्रावधान किया जाना चाहिए।

ई-कचरा पुराने मोबाइल, खराब कम्प्यूटर और बेकार हो गए इलेक्ट्रानिक आइटम अब यहाँ-वहाँ नहीं फेंक सकेंगे। अब ई-वेस्ट सम्बन्धी नियम लागू हैं। इनके तहत इलेक्ट्रानिक कचरे को निर्धारित कलेक्शन सेंटर में ही डम्प करना अनिवार्य हैं।

केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अधिसूचित ई-वेस्ट सम्बन्धी नियमों के अनुसार 1 मई 2012 के बाद से तमाम राज्यों में ई-वेस्ट का सुरक्षित डिस्पोजल अनिवार्य हैं। नियमों को लागू करने की जिम्मेदारी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपी गई है।

ई-वेस्ट सम्बन्धी नियम (ई वेस्ट मैनेजमेंट एंड हैंडलिंग रुल्स) के अनुसार जितना भी सामान निर्मित हो रहा है उनके सुरक्षित रिसाइकल या डिस्पोजल की जिम्मेदारी सम्बन्धित उत्पाद निर्माताओं की होगी। ऐसा शहरों में कलेक्शन सेंटर के माध्यम से किया जाएगा। ई-वेस्ट एकत्रित करने का कार्य कलेक्शन सेंटर के माध्यम से किया जाएगा। ये कलेक्शन सेंटर अधिकृत ई-वेस्ट रिसाइकल प्लांट तक ई-वेस्ट पहुँचाएँगे।

ई-कचरे की समस्या से निजात पाने के लिये दुनिया के हर देश में कोशिशें जारी हैं। भारत में भी इस कचरे को ठिकाने लगाने के लिये बाकायदा सेंटर खोले जाएँगे। यहाँ पर पुराने कम्प्यूटर सहित अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरणों को डी-कम्पोज किया जा जाएगा अभी देश में सिर्फ 10 फीसदी ई- कचरा ही डी-कम्पोज हो पा रहा है। बाकी अभी भी बेकार पड़ा है या फिर ग्रे मार्केट में चला गया है। विशेषज्ञों के अनुसार इन सेंटर के शुरू हो जाने पर इनका सही उपयोग हो पाएगा।

इलेक्ट्रिकल व इलेक्ट्रानिक उपकरण के कचरे के निपटान की जिम्मेदारी अब उनके निर्माताओं की ही होगी। ई-कचरे के प्रबन्धन का जिम्मा इन उपकरणों को बनाने वालों का होगा। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस सम्बन्ध में दिशा-निर्देश जारी किये हैं।

दिशा-निर्देशों के अनुसार बोर्ड के जहरीले कचरे प्रबन्धन प्रभाग ने कहा है कि ई-कचरे में से समस्त कीमती और उपयोगी सामग्री को रिसाइकल किये जाने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित किया जा सकेगा।

सम्पर्क करें
डाॅ. विनोद गुप्ता, 43/2 सुदामा नगर , रामटेकरी, मन्दसौर - 458001(म.प्र.)

Disqus Comment