धरती के बढ़ते तापमान से संकट में है इंसानी अस्तित्व

Submitted by RuralWater on Thu, 03/17/2016 - 16:08


.इस साल जनवरी खत्म होते-होते मौसम ने अचानक तेवर बदल दिये। दिल्ली वाले इन्तजार ही करते रहे कि इस साल कड़ाके की ठंड व कोहरा कब पड़ेगा कि शरीर आधी बाँह की शर्ट के लिय मचलने लगा। और फिर मार्च शुरू होते ही जब उम्मीद थी कि अब मौसम का रंग सुर्ख होगा, फसल ठीक से पकेगी; उसी समय बादल बरस गए और ओलों ने किसानों के सपने धराशाही कर दिये।

जरा गम्भीरता से अपने अतीत के पन्नों का पलट कर देखें तो पाएँगे कि मौसम की यह बेईमानी बीते एक दशक से कुछ ज्यादा ही समाज को तंग कर रही है। हाल ही में अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा ने भी कहा है कि फरवरी में तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि ने पूर्व के महीनों के रिकार्ड को तोड़ दिया है।

नासा के आँकड़ों के अनुसार यह पर्यावरण के लिय उत्पन्न होने वाले खतरे के संकेत हैं। शनिवार को डाटा जारी होने के बाद उनका अध्ययन कर भूमिगत तापमान पर अपने ब्लॉग में जेफ मास्टर्स और बाब हेनसन ने लिखा है कि यह मानव उत्पादित ग्रीन हाउस गैसों के नतीजतन वैश्विक तापमान में लम्बे समय में वृद्धि की चेतावनी है। मार्च की शुरुआत में प्रारम्भिक नतीजों से यह सुनिश्चित हो गया है कि तापमान में वृद्धि के रिकार्ड टूटने जा रहे हैं।

1951 से 1980 के मध्य की आधार अवधि की तुलना में धरती की सतह और समुद्र का तापमान फरवरी में 1.35 सेल्सियस अधिक रहा है। जबकि अब से एक माह पहले जनवरी में ही आधार अवधि का रिकार्ड टूट चुका है।

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और इस बदलाव के कारण धरती किस दिशा में जा रही है, इसके लिये जरा भारत के आदिग्रंथ महाभारत के एक हिस्से को बाँचते हैं। करीब पाँच हजार वर्ष पूर्व के ग्रंथ महाभारत में ‘वनपर्व’ में महाराजा युधिष्ठिर का मार्कण्डेय ऋषि से मार्मिक संवाद दर्ज है।

युधिष्ठिर मार्कण्डेय ऋषि से विनम्रता पूर्वक पूछते हैं- ‘‘महामुने, आपने युगों के अन्त में होने वाले अनेक महाप्रलय के दृश्य देखे हैं, मैं आपके श्रीमुख से प्रलयकाल का निरूपण करने वाली कथा सुनना चाहता हूँ।’’

(महाभारत, गीता प्रेस-गोरखपुर, द्वितीय खण्ड-वनपर्व, मार्कण्डेय-युधिष्ठिर संवाद, पृ. 1481-1494) इसमें ऋषि जवाब देते हैं- ‘‘हे राजन, प्रलय काल में सुगन्धित पदार्थ नासिका को उतने गन्धयुक्त प्रतीत नहीं होंगे। रसीले पदार्थ स्वादिष्ट नहीं रह जाएँगे। वृक्षों पर फल और फूल बहुत कम हो जाएँगे और उन पर बैठने वाले पक्षियों की विविधता भी कम हो जाएगी। वर्षा ऋतु में जल की वर्षा नहीं होगी। ऋतुएँ अपने-अपने समय का परिपालन त्याग देंगी। वन्य जीव, पशु-पक्षी अपने प्राकृतिक निवास की बजाय नागरिकों के बनाए बगीचों और विहारों में भ्रमण करने लगेंगे। सम्पूर्ण दिशाओं में हानिकारक जन्तुओं और सर्पों का बाहुल्य हो जाएगा। वन-बाग और वृक्षों को लोग निर्दयतापूर्वक काट देंगे।’’

कृषि और व्यापार पर टिप्पणी करते हुए मार्कण्डेय ऋषि कहते हैं- ‘‘भूमि में बोये हुए बीज ठीक प्रकार से नहीं उगेंगे। खेतों की उपजाऊ शक्ति समाप्त हो जाएगी। लोग तालाब-चारागाह, नदियों के तट की भूमि पर भी अतिक्रमण करेंगे। समाज खाद्यान्न के लिय दूसरों पर निर्भर हो जाएगा।’’

वे आगे कहते हैं- ‘‘हे राजन, एक स्थिति ऐसी भी आएगी कि जनपद जन-शून्य होने लगेंगे। गरीब लोग और अधिकांश प्राणी भूख से बिलबिलाकर मरने लगेंगे। चारों ओर प्रचण्ड तापमान सम्पूर्ण तालाबों, सरिताओं और नदियों के जल को सुखा देगा। लम्बे काल तक पृथ्वी पर वर्षा होनी बन्द हो जाएगी। प्रचण्ड तेज वाले सात सूर्य उदित होंगे और जो कुछ भी धरती पर शेष रहेगा, उसे वे भस्मीभूत कर देंगे।’’

फिर लौटकर अपने मूल सवाल पर आते हैं कि फरवरी के तापमान में खतरनाक स्तर पर वृद्धि आखिर क्यों हुई? इस माह वैश्विक तापमान में 1.35 सेल्सियस की बढ़ोत्तरी हुई। धरती की सतह का इस तरह गरम होना चिन्ताजनक है और हालात मार्कण्डेय ऋषि द्वारा किये गए वर्णन की ही तरह है। तापमान ऊर्जा का प्रतीक तो है लेकिन इसके सन्तुलन बिगड़ने का अर्थ है हमारे अस्तित्व पर संकट।

यह तो सभी जानते हैं कि वायुमंडल में सभी गैसों की मात्रा तय है और 750 अरब टन कार्बन डाइऑक्साईड के रूप में वातावरण में मौजूद है। कार्बन की मात्रा बढ़ने का दुष्परिणाम है कि जलवायु परिवर्तन व धरती के गरम होने जैसेे प्रकृति नाशक बदलाव हम झेल रहे हैं। कार्बन की मात्रा में इजाफे से दुनिया पर तूफान, कीटों के प्रकोप, सुनामी या ज्वालामुखी जैसे खतरे मँडरा रहे हैं। दुनिया पर तेजाबी बारिश की सम्भावना बढ़ने का कारक भी है कार्बन की बेलगाम मात्रा।

धरती में कार्बन का बड़ा भण्डार जंगलों में हरियाली के बीच है। पेड़ , प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से हर साल कोई सौ अरब टन यानि पाँच फीसदी कार्बन वातावरण में पुनर्चक्रित करते हैं।

आज विश्व में अमेरिका सबसे ज्यादा 1,03,30,000 किलो टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करता है जो कि वहाँ की आबादी के अनुसार प्रति व्यक्ति 7.4 टन है। उसके बाद कनाडा प्रति व्यक्ति 15.7 टन, फिर रूस 12.6 टन हैं । जापान, जर्मनी, द.कोरिया आदि औद्योगिक देशों में भी कार्बन उत्सर्जन 10 टन प्रति व्यक्ति से ज्यादा ही है। इसकी तुलना में भारत महज 20 लाख सत्तर हजार किलो टन या प्रति व्यक्ति महज 1.7 टन कार्बन डाइऑक्साइड ही उत्सर्जित करता है।

अनुमान है कि यह 2030 तक तीन गुणा यानि अधिकतम पाँच तक जा सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि प्राकृतिक आपदाएँ देशों की भौगोलिक सीमाएँ देखकर तो हमला करती नहीं हैं। चूँकि भारत नदियों का देश है, वह भी अधिकांश ऐसी नदियाँ जो पहाड़ों पर बर्फ पिघलने से बनती हैं, सो हमें हर-सम्भव प्रयास करने ही चाहिए।

कार्बन उत्सर्जन की मात्रा कम करने के लिये हमें एक तो स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देना होगा। हमारे देश में रसोई गैस की तो कमी है नहीं, हाँ सिलेंडर बनाने के लिय जरूरी स्टील, सिलेंडर वितरण के लिय आँचलिक क्षेत्रों तक नेटवर्क को विकसित करना और गरीब लोगों को बेहद कम दाम पर गैस उपलब्ध करवाना ही बड़ी चुनौती है।

कार्बन उत्सर्जन घटाने में सबसे बड़ी बाधा वाहनों की बढ़ती संख्या, मिलावटी पेट्रो पदार्थों की बिक्री, घटिया सड़कें व आटो पार्ट्स की बिक्री व छोटे कस्बों तक यातायात जाम होने की समस्या है। देश में बढ़ता कचरे का ढेर व उसके निबटान की माकूल व्यवस्था ना होना भी कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण की बड़ी बाधा है। सनद रहे कि कूड़ा जब सड़ता है तो उससे बड़ी मात्रा में मीथेन, कार्बन मोनो व डाइऑक्साइड गैसें निकल कर वायुमण्डल में कार्बन के घनत्त्व को बढ़ाती हैं। साथ ही बड़े बाँध, सिंचाई नहरों के कारण बढ़ते दल-दल भी कार्बन डाइऑक्साइड पैदा करते हैं।

कार्बन की बढ़ती मात्रा से दुनिया का गरम होने के कारण दुनिया में भूख, बाढ़, सूखे जैसी विपदाओं का न्यौता है। जाहिर है कि इससे जूझना सारी दुनिया का फर्ज है, लेकिन भारत में मौजूद प्राकृतिक संसाधन व पारम्परिक ज्ञान इसका सबसे सटीक निदान है। छोटे तालाब व कुएँ, पारम्परिक मिश्रित जंगल, खेती व परिवहन के पुराने साधन, कुटीर उद्योग का सशक्तीकरण कुछ ऐसे प्रयास हैं जो बगैर किसी मशीन या बड़ी तकनीक या फिर अर्थव्यवस्था को प्रभावित किये बगैर ही कार्बन पर नियंत्रण कर सकते हैं और इसके लिये हमें पश्चिम से उधार में लिये ज्ञान की जरूरत भी नहीं है।

धरती के गरम होने से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं ग्लेशियर। ये हमारे लिये उतने ही जरूरी हैं जितना साफ हवा या पानी। तापमान बढ़ने से इनका गलना तेजी से होता है। इसी के चलते कार्बन उत्सर्जन में तेजी आती है व इससे एक तो धरती का तापमान नियंत्रण प्रणाली पर विपरीत प्रभाव होता है दूसरा नदियों व उसके जरिए समुद्र में जल का स्तर बढ़ता है। जाहिर है जल स्तर बढ़ने से धरती पर रेत का फैलाव होता है, साथ ही कई इलाकों के डूबने की सम्भावना भी होती है।

ग्लोबल वार्मिंग या धरती का गरम होना, कार्बन उत्सर्जन, जलवायु परिवर्तन और इसके दुष्परिणाम स्वयं धरती के शीतलीकरण का काम कर रहे ग्लेशियरों पर आ रहे भयंकर संकट व उसके कारण समूची धरती के अस्तित्त्व के खतरे की बातें अब पुस्तकों, सेमीनार व चेतावनियों से बाहर निकल कर आम लेागों के बीच जाना जरूरी है। साथ ही इसके नाम पर डराया नहीं जाये, बल्कि इससे निपटने के तरीके भी बताया जाना अनिवार्य है।
 

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