तब लुप्त नहीं होगी कोई सरस्वती

Submitted by RuralWater on Fri, 03/18/2016 - 13:32

.नदी संस्कृति के मामले में भारत कभी विश्व का सिरमौर था। संसार के किसी भी क्षेत्र की तुलना में सर्वाधिक नदियाँ हिमालय अधिष्ठाता शिव की जटाओं से निकलकर भारत के कोने-कोने को शस्य-श्यामला बनती रही हैं। तमाम नदियाँ करोड़ों लोगों की जीवन का सेतु और आजीविका का स्थायी स्रोत होने के साथ-साथ जैव विविधता, पर्यावरणीय और पारिस्थितिक सन्तुलन की मुख्य जीवनरेखा रही हैं।

ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी भी इनमें से एक थी। करीब पाँच हजार वर्ष पहले सरस्वती के विलुप्त होने के कारण चाहे कुछ भी रहे हों, लेकिन सरस्वती की याद दिलाने वाले इस पावन स्रोत को करोड़ों-करोड़ लोग आज भी गुनगुनाते हैं।

गंगे! च यमुने! चैव गोदावरी! सरस्वति!
नर्मदे! सिंधु! कावेरि! जले अस्मिन सन्निधिं कुरु।।


नदी-भक्ति हम भारतीयों की असाधारण विशेषता है। नदियों को हम ‘माता’ कहते हैं। भारत में गंगा सहित तमाम नदियाँ मात्र जल से भरी नदियाँ नहीं मानी जाती हैं बल्कि मातृ रूप में पूजित हैं।

हजारों वर्ष पहले विलुप्त हुई सरस्वती के लिये हमारा दिल आज भी धड़कता है। सरस्वती से जुड़ी मामूली खबर भी सरकारों और जन-मन के लिये कौतूहल का विषय बन जाती है। नदियों के साथ पूरी मानवता का भविष्य जुड़ा हुआ है, क्योंकि नदियाँ मानव सभ्यताओं और संस्कृतियों की जननियाँ हैं।

विश्व की तमाम सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ नदियों के किनारे ही पल्लवित और पुष्पित हुई हैं। नदियाँ जीवनदायी अमृत यानी जल की वाहक हैं। यों भी कहा जा सकता है कि हम नदियों की संस्कृति के वारिस हैं।

नदियाँ हमारे जनमानस की स्वच्छता और निर्मलता का प्रतीक हैं, लेकिन आज हमारी गैर जिम्मेदाराना और संवेदनहीन जीवनशैली के कारण नदियों समेत तमाम प्राकृतिक जलस्रोत न केवल दूषित होते जा रहे हैं बल्कि भौतिक लोलुपता के कारण दम भी तोड़ रहे हैं।

आज हमारे सामने जैसी विकट स्थितियाँ हैं उन्हें देखते हुए हम अपने प्राकृतिक जल संसाधनों से और खिलवाड़ सहन नहीं कर सकते हैं। हमें इस बात का एहसास जितनी जल्दी हो जाये उतना ही अच्छा है। नहीं तो बाद में पछताने का मौका भी नहीं मिलेगा। अगर हम जल संस्कृति के वारिस रहना चाहते हैं तो हमें आज से और अभी से नदियों, तालाबों, जोहड़ों, डबरों, बावड़ियों, कुओं और अन्य जलस्रोतों को पुन: सजीव करने का प्रण लेना होगा।

.नदियों को बचाने के लिये युद्ध स्तर पर जुटना होगा, क्योंकि नदियों को खत्म करने का मतलब है धीरे-धीरे सभ्यताओं और संस्कृतियों को खत्म करने का सामान तैयार करना। क्या व्यक्ति, क्या समाज और क्या सरकार सभी को अपना दायित्व समझकर जलस्रोतों और नदियों को बचाने की मुहिम में जुटना होगा तभी हम काल के अभिशाप से बचेंगे, क्योंकि अगर हम आज नहीं चेते तो कल हमें अभिशाप देगा। और रसूल हमजातोव के शब्दों में कहें तो ‘अगर तुम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलाओगे तो भविष्य तुम पर तोप से गोले बरसाएगा।’ और जब भविष्य तोप से गोले बरसाएगा तो हमें बचाने शायद ही कोई आएगा।

बहरहाल, अपने देश की कोई भी सांस्कृतिक गाथा नदियों के पुण्यधर्मी प्रवाह को बिसरा कर नहीं लिखी जा सकती। इसलिये हमारी संस्कृति को एक सूत्र में पिरोने वाले वेदों में नदियों की महिमा विस्तार से वर्णित है। संसार में ऐसा दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता, जिसमें किसी समाज ने अपने जीवन प्रवाह को नदियों से इस तरह जोड़कर देखा है। नदियों से ओत-प्रोत जैसा भूगोल अपने देश का है वैसा विश्व में कोई दूसरा नहीं।

नदियों के महत्त्व को रेखांकित करते हुए काका कालेलकर ने लिखा है ‘जीवन और मृत्यु दोनों में आर्यों का जीवन नदी के साथ जुड़ा है। उनकी मुख्य नदी तो है गंगा। यह केवल पृथ्वी पर ही नहीं, बल्कि स्वर्ग में भी बहती है और पाताल में भी बहती है। इसीलिये वे गंगा को त्रिपथगा कहते हैं। जो भूमि केवल वर्षा के पानी से ही सींची जाती है और जहाँ वर्षा के आधार पर ही खेती हुआ करती है, उस भूमि को ‘देव मातृक’ कहते हैं। इसके विपरीत, जो भूमि इस प्रकार वर्षा पर आधार नहीं रखती बल्कि नदी के पानी से सींची जाती है और निश्चित फसल देती है, उसे ‘नदी मातृक’ कहते हैं।

भारतवर्ष में जिन लोगों ने भूमि के इस प्रकार दो हिस्से किये, उन्होंने नदी को कितना महत्त्व दिया था, यह हम आसानी से समझ सकते हैं। पंजाब का नाम ही उन्होंने सप्त-सिंधु रखा। गंगा-यमुना के बीच के प्रदेशों को अन्तर्वेदी (दो-आब) नाम दिया। सारे भारतवर्ष के ‘हिन्दुस्तान’ और ‘दक्खन’ जैसे दो हिस्से करने वाले विन्ध्याचल या सतपुड़ा का नाम लेने के बदले हमारे लोग संकल्प बोलते समय ‘गोदावर्य: दक्षिणे तीरे’ या ‘रेवाया: उत्तर तीरे’ ऐसे नदी के द्वारा देश के भाग करते है।

कुछ विद्वान ब्राह्मण-कुलों ने तो अपनी जाति का नाम ही एक नदी के नाम पर रखा है-सारस्वत। गंगा के तट पर रहने वाले पुरोहित और पंडे अपने-आपको गंगापुत्र कहने में गर्व अनुभव करते हैं। राजा को राज्यपद देते समय प्रजा जब चार समुद्रों का और सात नदियों का जल लाकर उससे राजा का अभिषेक करती, तभी मानती थी कि अब राजा राज्य करने का अधिकारी हो गया। ‘भगवान की नित्य पूजा करते समय भी भारतवासी भारत की सभी नदियों को अपने छोटे से कलश में आकर बैठने की प्रार्थना अवश्य करेगा।’ लेकिन आज हम नदियों को महत्त्व देने वाली बात भूलकर उन्हें बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। इसी का नतीजा है कि चहुँओर जल के लिये त्राहि-त्राहि मची हुई है।

.हमारे उत्तरी क्षेत्र को गंगा और यमुना ने ही संसार का सबसे विस्तृत उर्वर क्षेत्र बनाया है। पश्चिम अपनी पाँच नदियों के कारण पंचनद प्रदेश कहलाता है। ये पांचों नदियाँ वैदिक और पौराणिक काल की हैं। इनमें से सतलुज नदी वेदों-पुराणों में जहाँ शतद्रू के नाम से विख्यात थी, वहीं ब्यास, बिपाशा के नाम से जानी जाती थी। नर्मदा, महानदी, ताप्ति और सोन नदियाँ जहाँ मध्य भारत का गौरव हैं, वहीं दक्षिण भारत कृष्णा, कावेरी और गोदावरी के कारण धन-धान्य से भरपूर रहा है। उत्तर-पूर्व भारत में ब्रह्मपुत्र और तीस्ता के उपकारों को भला कौन भूल सकता है।

इन सबके बीच भी सैकड़ों नदियाँ ऐसी हैं जो सदियों से देश के जन-गण के लिये प्राकृतिक नीति आयोग का काम करती आ रही हैं। न तो हम भगवान राम के जीवन चरित की साक्षी सरयू को भूल सकते हैं न गौतम बुद्ध, महावीर के बिहार में विहार करती गंडक नदी को भूल सकते हैं और न ही लाखों भारतीयों के आध्यात्मिक समागम कुम्भ को अनदेखा कर सकते हैं।

पुण्यदायिनी इन नदियों का ही प्रताप है कि जितनी विविधता भरी और उपजाऊ भूमि भारत में है, उतनी दुनिया में और कहीं नहीं। लेकिन अफसोस की बात है कि पिछले दो सौ वर्षों की अंग्रेजी शिक्षा और साठ वर्षों की वामपंथी कुशिक्षा ने हमारे लहलहाते काल-बोध को कमजोर कर दिया है।

अगर हमारे राजनेताओं की जमात ने अंग्रेजी शिक्षा के कारण देश के भूगोल को उपेक्षित न बनाया होता तो आज पाठ्यक्रमों से मिट चुके देश को बच्चे ठीक से पढ़ पाते। वे जान पाते कि अपने देश की नदियों और पहाड़ों के कितने सुन्दर नाम और कितना महत्त्व था। हमारे बच्चे अपने पुरखों की कमाई नेकियों से रू-ब-रू होते। लेकिन भारत का मूल मिटाने वाली वोट जुटाऊ राजनीति और मार्क्सवादी अफीम के नशे में धुत बुद्धिजीवियों ने योजनाबद्ध तरीके से स्कूली पाठ्यक्रमों से देश लगभग मिटा ही डाला है।

भारत का जनमानस नदियों की निर्मलता से आज भी अपने जीवन को निर्मल और पवित्र बनाए रखने की प्रेरणा लेता है, बेशक विकास की गाद इन नदियों के पाट समेटने में लगी हुई है, इसके बावजूद आम जनता आज भी इन रुखी-सूखी नदियों में अपने जीवन का स्रोत और सार खोजती है। हमारा वैदिक और पौराणिक साहित्य नदियों की स्तुतियों और पूजा-अर्चना से भरा पड़ा है।

.प्रत्येक नदी के स्रोत हैं, आरती-पूजा का विधान है। लेकिन इन्हें बचाए रखने का विधान कहीं खो गया लगता है तभी तो सरस्वती लुप्त हुई और कई ‘सरस्वतियाँ’ विलुप्ति की कगार पर हैं। प्राकृतिक जलस्रोतों और प्रकृति को मात्र भौतिक दृष्टि से देखना पश्चिम का भोगवादी नजरिया है। हमारी नदियों को किसी भौतिक ऊहापोह में नहीं बाँधा जा सकता।

आज हमने अपने सारे सरल काम जटिल कर लिये हैं। हम अपने अनेकानेक सामाजिक दायित्व बिसरा चुके हैं। नदियों के प्रति भी हमारे कर्तव्य बाधित और भ्रमित हो चले हैं। काका कलेलकर एक जगह लिखते हैं, ‘वेदकाल के ऋषियों से लेकर व्यास, वाल्मीकि, शुक, कालिदास, भवभूति, क्षेमेंद्र, जगन्नाथ तक किसी भी संस्कृृत कवि को ले लीजिए, नदी को देखते ही उसकी प्रतिभा पूरे वेग से बहने लगती है। हमारी किसी भी भाषा की कविताएँ देख लीजिए, उनमें नदी के स्रोत अवश्य मिलेंगे और हिन्दुस्तान की भोली जनता के लोकगीतों में भी आपको नदी के वर्णन कम नहीं मिलेंगे। कवि जिस माटी के गुण गाते थकते नहीं थे, आज वह माटी ही थक चली है। सुजला, सुफला, शस्य-श्यामला धरती बंजर बनती जा रही है। इसका कारण कुछ और नहीं बल्कि नदियों के महत्त्व को बिसरा देना ही है।

लेकिन जिस दौर में केवल अधिकारों की छीना-झपटी मची हो, उस दौर में कर्तव्यों की चिन्ता भला किसे है! हमारे पुरखों ने नदियों से जुड़े विधि-विधान अपनी जीवनचर्या से जोड़ रखे थे। लेकिन उद्योग बनते सियासी तंत्र में अधिकार हमारे, कर्तव्य तुम्हारे का खेल चल पड़ा है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट ही सरकारों की मुख्य नीतियों में शुमार हो चुकी है।

हालांकि इसी देश में कुछ बरस पहले ऋषि विनोबा ने कहा था, ‘सबै भूमि गोपाल की, नहीं किसी की मालकी।’ लेकिन इस बात को आज कौन समझ रहा है।

इसी बीच ‘नमामि गंगे’ के संकल्प के साथ हरियाणा सरकार को अपने तमाम जलस्रोतों और छोटी-मोटी सभी नदियों को निर्मल बनाने की सार्थक और व्यावहारिक योजना बनानी चाहिए। जब तक जलस्रोतों को बचाने के ऐसे अभियान व्यावहारिक नहीं होंगे तब तक ‘सरस्वतियाँ’ यों हीं लुप्त होती रहेंगी। नई सरकार का यह दायित्व है कि वह प्रदेशवासियों के साथ मिलकर निर्मल नदी, निर्मल तालाब, निर्मल जोहड़, निर्मल बावड़ी और निर्मल जल के संकल्प को स्थायी बनाए।

सरस्वती का उद्गम स्थल आदिबद्री माना जाता है, लेकिन हैरानी की बात है कि इस क्षेत्र में प्लाइवुड उद्योग धड़ल्ले से जंगलों पर कुलाड़ी चला रहा है। लगभग चार सौ लाइसेंस पहले से जारी हैं, अभी दो सौ लाइसेंस और देने की बात चल रही है। इसका दुष्परिणाम यह होगा कि बचाखुचा भूजल भी सिमटता जाएगा। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जीवन को चलाने के लिये कारोबार भी फलने-फूलने चाहिए, लेकिन जिम्मेदारी और नियमों के साथ। क्या ऐसा सम्भव नहीं कि प्रत्येक प्लाइवुड लाइसेंस धारक प्रतिवर्ष अपना लाइसेंस रिन्यू करवाने से पूर्व कम से कम पाँच सौ पेड़ अवश्य लगाएँ? ऐसा सम्भव है। सरकार को ऐसे नियमों को सम्भव बनाना चाहिए ताकि भूजल स्रोतों का खजाना बचा रहे।

.हरियाणा आज अपनी भूजल सम्पदा के मामले में बहुत बड़े संकट के मुहाने पर खड़ा है। हरियाणा में कुल जल सम्भर क्षेत्र 108 हैं, जिनमें से 82 डार्क जोन में बदल चुके हैं। मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल के अपने क्षेत्र करनाल के सभी छह ब्लॉक डार्क जोन में बदल चुके हैं। हरियाणा देश के एकमात्र राज्य है जिसमें मात्र छह फीसद वन बचे हैं। जिस प्रदेश में वन इतने कम हों वहाँ कभी भी अकाल की स्थिति पैदा हो सकती है। हरियाणा की नई सरकार को नए सपनों के साथ प्रदेश की शुष्क पर्यावरणीय स्थिति को श्रद्धा से सींचना होगा। सभी नदियों के किनारों पर युद्ध स्तर पर देशज पेड़ रोपने होंगे। पेड़ों से बड़ा जल संरक्षक कोई नहीं होता।

ऐसे हालात में भी हरियाणा सरकार सौभाग्यशाली है कि प्रदेश में सरस्वती के प्रकट होने की खबरें यदा-कदा आ रही हैं, लेकिन सरकार को मात्र नारियल फोड़कर, चार चावल चढ़ाकर और तिलक लगाकर अपने कर्तव्य से पल्ला नहीं झाड़ना होगा बल्कि उसे सरस्वती के ऐसे स्रोत से प्रेरणा लेकर प्रदेश के सभी पुरातन जलस्रोतों की सार-सम्भाल का जिम्मा उठाना होगा।

सरस्वती बोर्ड की सार्थकता तभी है जब हरियाणा की नदियाँ, तालाब, जोहड़, डबरे, बावड़ियाँ और कुएँ सम्भाले जाएँ। अन्यथा देखा जाता रहा है कि ऐसी संस्थाएँ कुछ ज्ञात-अज्ञात कार्यकर्ताओं या परिचितों के पेट की भेंट चढ़ जाती हैं। अगर प्रदेश सरकार पर्यावरण प्रेमियों, जल का महत्त्व समझने वालों, पंचायतों और युवकों को साथ लेकर अपने जलस्रोतों को बचाने में सफल होती है तो यकीन मानें इससे न केवल दिन-प्रतिदिन विलुप्ति की कन्दरा की ओर बढ़ती यमुना बच पाएगी बल्कि कोई ‘सरस्वती’ कभी लुप्त नहीं होगी। आइए, प्रदेश में फूटे सरस्वती के स्रोत से प्रेरणा लेकर हम सब सुखद भविष्य की रचना में जुटें।

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