दवा भी है जल

Submitted by Hindi on Sat, 03/19/2016 - 09:13
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Source
जल चेतना - तकनीकी पत्रिका, जुलाई 2015

जलपानी सम्भवतः दुनिया का सबसे पुराना डाॅक्टर कहा जा सकता है। बहुत सी बीमारियाँ केवल सादा जल सही पद्धति से पीने से ठीक हो जाती हैं। आयुर्वेद में इसे जल चिकित्सा कहा गया है।

सिर दर्द, रक्तचाप, पांडू, आमवात, चर्बी बढ़ना, संधिवात, जुकाम रहना, नाड़ी की धड़कन बढ़ना, दमा, खासी, गैस, अमल पित्त, अल्सर, मलावरोध, अत्र नलिका के अन्दर से सूजन, मधुमेह, आमातिसार, पेशाब की बीमारियाँ, अनियमित मासिक धर्म, श्वेत प्रदर, स्तन की गाँठ का कैंसर, मंद ज्वर तथा अन्य छोटी-मोटी बीमारियाँ हैं।

योग रत्नाकर नामक आयुर्वेदिक ग्रंथ के अनुसार नियमित रूप से ‘ऊषा पान’ करने वाला व्यक्ति रोगों तथा बुढ़ापे से मुक्त रहता हुआ दीर्घायु जीवन व्यतीत करता है। वैद्यक ग्रंथों में ऊषा पान को अमृत पान कहा गया है। स्वास्थ्य के लिये उसकी बड़ी प्रशंसा की गई है और यह बताया गया है कि जो प्रायः नियमित रूप से जल पीते हैं उन्हें बवासीर ज्वर, पेट के रोग, सग्रहवी मूत्र रोग, कोष्ठ बहता रक्त पित्त विकार, नासिका आदि से रक्तज स्राव, कान सिर तथा कमर के दर्द, नेत्रों की जलन आदि व्याधियाँ दूर हो जाती हैं।

जल

वैद्यक ग्रंथों में लिखा है


‘सवितुरु दयकाले प्रसुतीः सालिकस्य पितेदायै रोग जरा परियुक्तो जीवे हत्सर शतं साग्रमा।’
अर्थात सूर्योदय से पूर्व आठ अँजुलि जल पीने से मनुष्य कभी बीमार नहीं पड़ता। बुढ़ापा नहीं आता और सौ वर्ष से पूर्व मृत्यु नहीं होती।

ऊषा पान करने से वायु एवं पित्त नामक दोषों से पैदा होने वाली अनेकानेक बीमारियों से छुटकारा मिल जाता है। इससे शरीर मजबूत बनता है।

प्रातःकाल सूर्योदय से पहले पिया हुआ जल माँ के दूध के समान लाभ देता है।

1. जीवनी शक्ति बढ़ती है।
2. व्यक्ति तेजस्वी बनता है।
3. शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता में बढ़ोत्तरी होती है।

जलप्यास लगने पर इसकी अनदेखी न करें ये दिल के लिये खतरनाक हो सकता है। शरीर में पानी की हल्की सी कमी महसूस होती है तो स्ट्रेस हार्मोन, कोर्ढिसोल का स्तर 1 से 2 प्रतिशत बढ़ जाता है। ये हार्मोन शरीर में फैट जमा करने और मांसपेशियों को तोड़ने का काम करता है। ये दोनों स्थितियाँ दिल के लिये ठीक नहीं होती हैं। प्यास लगने पर इसे मिटाने का सबसे बेहतर तरीका है एक गिलास पानी।

कुछ अन्य उपयोग


1. सोने से पहले पानी पीने से नींद अच्छी आती है इसके विपरीत सोकर उठने के ठीक बाद पानी पीने से आलस्य दूर हो जाता है।
2. जल केवल पेट के लिये ही नहीं अपितु दिमाग गर्म हो जाये तब आप जल पीजिए जल से हाथ पांव धोइये आप तुरन्त शान्त अनुभव करेंगे।
3. गर्मी के दिनों में कई बार हमारे द्वारा भोजन करने के बाद पूरा पानी नहीं पिया जाता है तो अजीर्ण हो जाता है। अतः सोने से पहले पानी अवश्य पीएँ।
4. शरीर से विष तुल्य हानिप्रद मल (टाक्सिन) शरीर से बाहर हो जाते हैं।

‘‘प्रातःकाल खटिया ते उठ के पियै तुरन्तै पानी।
तके घर वैदन आई है, बात घाघ के जानी’’


प्रातःकाल जल पीने के बाद 45 मिनट तक कुछ भी खाना-पीना नहीं चाहिए। यह जल वक्रीकृत चिपकी तथा सुस्त आँतों को साफ कर सक्रिय करता है जिससे आँतों में पड़े अन्न (खाया हुआ) का सत्व आँतों द्वारा शोधित होकर उसका खून में रूपान्तरण होता है।

जलपानी कोशिकाओं को नई ऊर्जा देता है और उसका विकास करता है। पानी का सम्बन्ध हमारी किडनियों से होता है। पानी के कारण ही हमारी किडनियाँ रक्त शुद्धिकरण और सन्तुलन का कार्य करने में सक्षम होती हैं। पानी शरीर की भीतरी मशीनरी की सफाई करता है यह पाचन क्रिया को दुरुस्त करता है। योगासन की तकनीक में इसे कुंजल कहा जाता है। यदि पानी सही समय पर सही मात्रा में दिया जाये तो आँतों की कार्यप्रक्रिया पानी से सुचारु रूप से चलती है। पानी मांसपेशियों को लचीला बनाता है। पानी उच्च रक्त चाप को घटाने में सहायक होता है और रक्त में मिलकर रक्त के प्रवाह की प्रक्रिया को बेहतर बनाता है।

1. प्रातःकाल हाथ मुँह धोकर मुँह में जल भरकर मटकी के पानी से या ताजे पानी से आँखों पर छींटे मारकर धोने से आँखों की निंद्रा, उनिंदापन, थकान, लानिया आदि दूर होते हैं। लगातार कुछ दिनों तक करने से आँखो की बीमारियाँ दूर हो जाती हैं।
2. नमक युक्त गर्म पानी में कपड़ा भिगोकर सिकाई करें इससे जोड़ों के दर्द में आराम मिलेगा।
3. किसी भी वस्तु से जल जाने पर जले हुए स्थान को ठंडे जल में तब तक डुबोए रखें जब तक जलन शान्त न हो जाये।
4. गर्मी के दिनों में घर से बाहर जाते समय पानी पीकर निकलें। इससे लू लगने का डर नहीं रहता है। लम्बी यात्रा करना हो तो साथ में पानी रखें तथा हर एक घंटे के अन्तराल पर पानी पीते रहें।

पानी पीने के नियम


1. पानी सदा बैठकर पीना चाहिए, खड़े-खड़े नहीं पीना चाहिए।
2. पानी धीरे-धीरे घूँट कर पीना चाहिए गट-गट करके शीघ्रता से नहीं।
3. ‘रोटी पीवे पानी खावे’ अर्थात रोटी का निवाला खूब चबाएँ ताकि मुँह में तरल बन जाये और पानी को रोटी की तरह धीरे-धीरे पीएँ।
4. रात को जब भी पानी पीयें उजाला कर पीये तथा मटकी पर पानी भरने वाला बर्तन उल्टा कर रखें।
5. भोजन के बीच में पानी न पीएँ। भोजन से पहले पानी पीएँ। भोजन के तुरन्त बाद पानी नहीं पीएँ। लगभग आधे एक घंटे बाद पानी पीएँ।

‘पहले पीवे योगी, बीच में पीवे भोगी, अन्त में पीवे रोगी’।
6. गर्मी के दिनों में कहीं से भी आकर एक-दम पानी न पीये कुछ देर रुककर पीएँ। रात्रि में जागने पर हर घंटे पानी पीएँ। दिन भर में आठ या दस गिलास पानी पीना चाहिए।
7. चाय, काॅफी, फल आदि के सेवन के पश्चात पानी नहीं पीएँ।
8. शुद्ध व स्वच्छ जल पीएँ। फिटकरी से शुद्ध करें। उबाल कर पीएँ या घर में फिल्टर लगाएँ क्योंकि अधिकांश पेट की बीमारियाँ अशुद्ध जल से होती है।

जलसम्पर्क करें
(आभा जैन), 44, बंदा मार्ग, भवानी मण्डी, (राज.)

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