लोक नियम: मलेथा गाँव की अनूठी परम्पराएं

Submitted by Hindi on Fri, 03/25/2016 - 09:44
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मलेथा सेराउत्तराखण्ड राज्य में लोगों ने स्वयं के ज्ञान से कई आविष्कार किये हैं। इनमें से श्रीनगर गढवाल के पास मलेथा गाँव में माधो सिंह भण्डारी नाम के शख्स ने बिना किसी आधुनिक यन्त्र के एक ऐसी सुरंग का निर्माण किया जो आज भी शोध का विषय बना हुआ है। इस सुरंग के मार्फत माधो सिंह ने ग्रामीणों के लिये न कि पानी की आपूर्ति की बल्कि मलेथा जैसी जमीन को सिंचित में तब्दील कर दिया। माधो सिंह भण्डारी की ही देन है कि ‘मलेथा का सेरा’ आज हजारों लोगों की आजीविका का साधन बना हुआ है। यही वजह है कि मलेथा गाँव के लोग अनाज इत्यादि खाद्य सामग्री कभी भी बाजार से नहीं लाते। माधो सिंह के मलेथा गाँव में आज भी ऐसी कई परम्पराएं हैं जो आज के युग में आदर्श बनी हुई है।

वीर योद्धा माधो सिंह ने 17वीं शताब्दी में लगभग डेढ़ सौ मीटर कठोर पहाड़ को काटकर जो सुरंग-नुमा गूल बनाई थी वह अक्सर कई कारणों से चर्चाओं में रहती है। निर्माण की गुणवत्ता ही नहीं इसमें मानवीय संवेदनाएं भी निहित रही है। गाँव के बुजुर्ग बताते हैं कि जहाँ गूल बनी है, वहाँ सीधे ऊपर से नीचे तक पहाड़ की कटाई होनी थी। तत्काल गाँव के किसी बुजुर्ग ने यह सलाह दी कि यदि उक्त जगह पर पहाड़ काटकर गूल का निर्माण किया गया और इसमें कभी कोई आदमी या जानवर गिर जाय तो नहीं बच पायेगा। तब यह सोचा गया कि गूल से अच्छा भला कि सुरंग निर्माण किया जाये।

माधो सिंह ने तत्काल ठान ली कि वे इस सुरंग का निर्माण करके ही चैन की साँस लेंगे। कहा जाता है कि एक बार वे श्रीनगर दरबार से वापस अपने गाँव लौटते वक्त उन्हें काफी भूख लगी थी। उनकी पत्नी ने जब उन्हें खाना परोसा तो वह खाना रूखा-सूखा था। कारण जानने पर मालूम हुआ कि गाँव में पानी की भयंकर किल्लत हो चुकी है। सब्जियाँ और अनाज का उत्पादन बिल्कुल बंद हो चुका था। इस पर माधो सिंह को रात भर नींद नहीं आई। अलकनंदा नदी तो गाँव से काफी नीचे और दूर बहती थी, जिसका पानी गाँव में पहुँच ही नहीं सकता था। मगर गाँव के ही पास में चन्द्रभागा नदी बहती है जिसका पानी गाँव तक पहुँच सकता था, परन्तु नदी और गाँव के बीच में पहाड़ था। माधो सिंह ने इसी पहाड़ के सीने में सुरंग बनाकर पानी गाँव लाने की ठानी। माधो सिंह शुरू में अकेले ही सुरंग खोदते रहे लेकिन बाद में गाँव के लोग भी उनके साथ जुड़ गये।

कहते हैं कि जब सुरंग बनकर तैयार हो गयी तो काफी प्रयासों के बावजूद भी पानी उसमें नहीं आया। किवदन्ती है कि इन्हीं दिनों रात को माधो सिंह के सपने में उनकी कुलदेवी प्रकट हुई और उन्होंने कहा कि सुरंग में पानी तभी आएगा जब वह अपने इकलौते बेटे गजेसिंह की बलि सुरंग के मुहाने पर देगा। माधो सिंह का ऐसा करने के लिये हाथ-पाँव फूल गये। लेकिन जब उनके बेटे गजे सिंह को पता चला तो वह खुद को बलि चढने के लिये तैयार हो गया। गजे सिंह गाँव में पानी की सुविधा उपलब्ध करवाने के लिये बलिदान हो गया और इसी सुरंग से गाँव तक पानी भी पहुँच गया। एक तरफ गजे सिंह का मौत का मातम पसरा था वहीं दूसरी तरफ गाँव वालों के चेहरों पर खुशहाली थी।

इस गूल पर आज भी ढोल नगाड़ो के साथ पानी लाने के लिये पूरे गाँव से लोग चन्द्रभागा नदी पर जाते हैं। वहाँ नदी पर बाँध बनाकर पानी लाया जाता है। जिससे 275 परिवारों के 110 एकड़ खेत सिंचित होते हैं, लेकिन कभी पानी को लेकर गाँव में झगड़ा नहीं हुआ। यही है मलेथा गाँव की व्यवस्था की खासियत का एक अनूठा उदाहरण।

.तीन किमी क्षेत्र में फैले इस गाँव में 22 जातियों, उपजातियों के 275 परिवार यहाँ निवास करते हैं। इस तरह गाँव माल खोला, बिचला खोला, बंगारयों खोला, नेग्यों खोला में बँटा है। इतनी सारी भिन्नताओं और परिस्थितियों के बावजूद जोड़े रखती है इस गाँव की व्यवस्था। गाँव में रोपाई से पूर्व पंचायत होती है। पंचायत बुलाने के लिये यूँ तो प्रबन्ध कार्यकारणी है, लेकिन सूचना देने वाला ‘पौरी’ सूचना देने के लिये नियुक्त होता है। इस व्यक्ति को बैठक ही नहीं कार्यकारणी के हर निर्णय को समय पर देने यथा जंगल में लकड़ी कटान कब होगा, पानी कौन उपयोग करेगा, कब सार्वजनिक उत्सव होंगे जैसी सूचनाएं देनी होती है। उसके बदले उसे ‘प्रचार खेत’ मिलता है, जिस पर उगा अनाज उसे मिलता है।

कार्यकारणी की पंचायत में रोपाई के लिये पानी लाने की तिथि और उस दिन देवी-देवताओं को भोग लगाने के लिये पकवान आदि का अंशदान ‘म्यलाग’ इसी बैठक में क्रमवार पानी पहुँचाने की जिम्मेदारी के लिये ‘कोल्लालू’ और बंदरो से फसल बचाने के लिये ‘बंदरवाल्या’ नियुक्त होता है, जिन्हें प्रत्येक परिवार से फसल के तैयार होने पर अनाज मिलता है और काम ठीक न करने पर इसमें कटौती का प्रावधान होता है। इसी तरह द्यूलेश्वर शिवालय में पूजा-अर्चना करने वाले और सामग्री के लिये ‘बिंदी खेत’ और नागराजा, बद्रीकेदार आदि खेत की उपज मेहनताना दिया जाता है। ओलावृष्टि को मन्त्रो से दूसरी तरफ भेजने वाले बलूनी परिवारों के लिये ‘डाल्यूँ खेत’ दिये गये हैं।

गाँव की पंचायत अपने वनों के प्रति सचेत हैं। घास तो वर्ष में कभी भी कितना भी वनों से लो, मगर लकड़ी कितनी काटनी है, इसके लिये मानक निर्धारित हैं। गाँव में शादी-ब्याह जैसे व्यक्तिगत आयोजन खुले स्तर पर ही होते हैं, पर सभी ग्रामीणों को निमन्त्रित भी किया जाता है। सार्वजनिक आयोजनों में सभी का शिरकत करना जरूरी है। कई मन्दिरो में पूजा, माधो सिंह भण्डारी स्मृति मेला, श्रमदान और पंचायत बैठकों में सभी ग्रामीण अनिवार्य रूप से भाग लेते हैं।

गाँव के भले के लिये अपने प्राण देने वाले माधो सिंह भण्डारी के पुत्र गजे सिंह की स्मृति में रोपाई के अन्तिम दिन ‘मायाझाड़ा खेत’ में समारोह होता है। बकरे की बलि दी जाती है। समाज के लिये बलिदान की याद शायद यही परम्पराओं को निभाने की शक्ति और प्रेरणा देता हो।
 

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प्रेम पेशे से स्वतंत्र पत्रकार और जुझारु व्यक्ति हैं, विभिन्न संस्थानों और संगठनों के साथ काम करते हुए बहुत से जमीनी अनुभवों से रूबरू हुए। उन्होंने बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की।

 

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