अकाल के माथे पर सुकाल का टीका

Submitted by Hindi on Fri, 03/25/2016 - 11:18


[ उत्तर प्रदेश के बाँदा के नरैनी तहसील के सुलखानपुरवा से खबर आई कि लोग अकाल की वजह से ‘घास की रोटी’ खा रहे हैं। यह खबर कई बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में छपी। प्रकाशित खबरों का संज्ञान लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट कमिश्नर के तौर पर हर्ष मंदर और सज्जाद हसन को स्थिति का जायजा लेने के लिये भेजा। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद स्थानीय प्रशासन सक्रिय हुआ और उसने इसको झूठ बताया। इस पर जूतम-पैजार शुरू हो गई। स्वयंसेवी संगठनों ने अपनी भिखमंगई के लिए प्लांटेड खबरें कराईं, ऐसा आरोप भी लगा। पर इस विवाद में कुछ खबरें छूट गईं। ‘ब्रेक’ की जल्दबाजी में सूखे से लड़ने वालों का हौसला और धीरज खबर नहीं बन पाया। ‘घास की रोटी’ की खबर वाले इलाके से महज 100 किमी के घेरे में कई सुखद खबरें हैं, लोगों ने तालाब बनाए हैं और अपनी खेती कर रहे हैं। सच्चाई यही है कि जिन्होंने पानी बोया है, वे फसल काट रहे हैं।]

बारिश वाली माता, बाँदामध्य भारत का एक ऐतिहासिक इलाका है बुन्देलखण्ड। 2013 के साल को छोड़ दें तो बुन्देलखण्ड में पिछला एक दशक लगभग सूखा और अकालग्रस्त ही रहा है। सूखे की कुदरती मार एक बार फिर गम्भीर हो चुकी है। ‘इस वर्ष के जैसा सूखा पिछले पचास साल में नहीं देखा है’ बुजुर्ग बताते हैं। अति सूखाग्रस्त इलाकों में महोबा, हमीरपुर, चित्रकूट, बांदा, झाँसी, ललितपुर और टीकमगढ़ है। पहले रबी की फसल कमजोर हुई और अब खरीफ की फसल भी लगभग बर्बाद हो चली है। नतीजा भुखमरी के हालात हैं। लाखों की संख्या में लोग पलायन कर रहे हैं। पानी के इंतजार में अंखियां बरस रही हैं। माँ की ममता बाजार में है, बेबसी में बच्चे बेचने की घटनाएँ भी सुनने में आ रही हैं। पानी और चारे की कमी के कारण गायों को लोग खूँटे से छोड़ रहे हैं। लोग गायों के माथे पर रक्तवर्ण के कुमकुम का टीका कर गाँव से दूर छोड़ आते हैं, इसे कहते हैं अन्ना प्रथा। अन्ना गायें किसानों की बेबसी की टीका हैं। चारे-पानी के संकट से तो पशुओं के सामने मौत खड़ी हो गई है। अन्ना गायें जैसे पालतू और सियार जैसे घुमन्तू-जंगली जानवर प्यास के मारे मरे पाए जा रहे हैं।

वर्षा ऋतु बीत चुकी है। बुन्देलखण्ड तो क्या देश के हर कोने से बादल विदा हो चुके हैं। ठण्ड उतार पर है। गर्मियों की दस्तक आ चुकी है। आने वाली गर्मी में पानी की किल्लत की आशंका से लोग अभी से हलकान हैं। लोग चिन्तित हैं कि जब सर्दी में ही पानी की दिक्कत हो रही है तो गर्मी में हलक कैसे गीला होगा। बारिश की कोई उम्मीद नहीं रह गई है। पर सूखे से बदहाल और बेबस किसानों को अभी भी बांदा के लामा गाँव में विराजित 'बारिश वाली माता बिछुल देवी' से आस बंधी हुई है। किसानों ने श्रद्धा और जरूरत के चलते हजारों की संख्या में इकट्ठा होकर 'बारिश माता' को खुश करने को खूब पूजा-अर्चना की। पर माता को खुश नहीं कर पाए और न ही बारिश हुई। माता के आँगन में एक सुंदर तालाब है, जो सूखे में भी पानी सहेज कर रखे हुए है। जो सिखाता है कि 'बारिश वाली माता' बिछुल देवी को नारियल, झंडी-डंडी से आगे बढ़कर नीरांजलि चाहिए।
Jiganaura, Maudaha, Hamirpur
वैसे तो बुन्देलखण्ड में लगभग दस हजार गाँव हैं। पहाड़ी, दुर्लभ, रिहायशी इलाकों को छोड़ भी दें तो अंदाजन पचास हजार वर्ग किमी ज़मीन बरसे पानी को सहेजने के काम आ सकती है। इतनी बड़ी जमीन पर हुई वर्षा को यदि सहेज लिया जाए तो असीमित जल-संरक्षण का पुण्य कमाया जा सकता है और सूखे में भी सुखी रहा जा सकता है।

हालाँकि बुन्देलखण्ड में पिछले दो-तीन दशकों से सतही पानी और भूजल में भारी गिरावट देखी जा रही है। भूजल स्तर में लगातार गिरावट से हैण्डपम्प, ट्यूबवेल और नलकूप साथ छोड़ते जा रहे हैं। बड़े-बड़े तालाब भी सूख चले हैं। ऐसे में कोई ऐसा तालाब दिख जाए, जिसमें 20 फीट पानी भरा हो तो रेगिस्तान में नखलिस्तान जैसा ही नज़र आता है।
Jiganaura, Maudaha, Hamirpur
सूखे में भी सुखी होने का एक प्रयास उत्तर प्रदेश में स्थित जिला हमीरपुर, तहसील मौदहा, ग्राम जिगनौड़ा, निवासी आशुतोष तिवारी के खेत में देखने को मिलता है। अनमोल बूँदों को सहेजकर रखने वाले आशुतोष के पास इस अकाल में भी पानी का बंदोबस्त है। आशुतोष तिवारी बताते हैं कि 'सूखे की परेशानी से निजात पाने को एक बोरवेल खुदवाया था, पर उसमें जरूरत का पानी नहीं मिला। अखबारों में ‘महोबा-अपना तालाब अभियान की चर्चा सुनता रहता था।’ बड़ी इच्छा होती थी कि एक तालाब बनाऊँ। सरकार को एक परियोजना के लिये मिट्टी की जरूरत थी, मैंने तुरन्त हामी भरी। और 35 फिट गहरा एक तालाब बना डाला। 2013 में तालाब निर्माण हुआ ही था कि बारिश आ गई। और तालाब लबालब भर गया। तब से इस तालाब में लगातार पानी आता-जाता रहा है। पर कभी सूखा नहीं तालाब। उस समय हमारे खेत के आस-पास जितने भी तालाब लोगों ने खुदवाए थे। उन सब में अभी भी पानी है। इन्हीं तालाबों की वजह से आज हमारे खेत में फसलें दिखाई पड़ रही हैं। वरना पूरे क्षेत्र की तरह हमारा भी खेत पानी की किल्लत से बोया नहीं जाता और भूमि बंजर पड़ी रहती।'

आशुतोष ने तालाब के काफी पानी को अभी भी बचा रखा है। सिंचाई में इस्तेमाल नहीं करते। पूछने पर बताते हैं कि काफी पानी वह बचाकर रखेंगे ताकि घुमन्तू पशुओं, जंगली और ग्रामीण जानवरों को पीने का पानी मिल सके। अब आशुतोष महज फसलों पर निर्भर न रहकर बागवानी भी कर रहे हैं। जिनमें आम, अमरूद, सीताफल, कटहल, नींबू, मौसमी, करौंदा आदि के करीब 600 फलदार और 500 सागौन के ईमारती लकड़ी वाले पेड़ लगाए हैं।

आशुतोष की तरह ही महोबा के बरबई गाँव के शिवराज सिंह ने भी अपना तालाब बनाया। घर में बहन की शादी थी, थोड़ा बहुत रूपया- पैसा, जेवर जैसे कैसे जुटा रखा था। और ज़मीन बेचकर शादी को सोचा। तभी अपना तालाब अभियान की प्रेरणा से तालाब के फायदे के बारे में जाना। बस फिर क्या था घर में सलाह मशविरा किया और बहन की शादी रोककर बनाया तालाब। 2013 में वर्षा की बूँदों को समेटने का जतन तालाब बनाकर पूरा हुआ। उस साल की अच्छी बारिश ने तालाब को पूरी तरह भर दिया, इससे उनके दशकों से सूखे खेतों को पानी मिला, साथ ही मिला निराश परिवार को खेती का नया नजरिया।

किसान शिवराज सिंह व उनके छोटे भाई और माँ के हिस्से में कुल 14 एकड़ ज़मीन है। पर पिछले एक-डेढ़ दशक से इतनी भी फसल नहीं मिलती थी कि वह ठीक तरह से अपने परिवार का भरण-पोषण कर पाते। दो-तीन कुन्तल प्रति एकड़ की पैदावार अमूमन मिल पाती। जिससे लागत निकाल पाना भी मुश्किल होता। कम बारिश के सालों में कई सालों तक बीज भी वापस नहीं हुआ। यही वजह थी कि साल 2012 में अपनी 14 एकड़ जमीन को एक साल के लिये ठेके पर उठा दिया। इससे 42000 रु. सालाना की रकम मिली। इस रकम से परचून की दुकान खोली। दुकान से परिवार की परवरिश का प्रयास किया। पर साल पूरा होने के पहले ही दुकान की मूल पूँजी भी उदर-पोषण में चुक गयी। आय का कोई अन्य साधन न देखकर ज़मीन बेचकर ही बहन के विवाह का मन बनाया। माँ के हिस्से की डेढ़ एकड़ जमीन का सौदा करना तय किया। अप्रैल 2013 में 3 लाख 15 हजार में ज़मीन बेची।
शिवराज सिंह
उसी दौरान सिंचाई जलसंकट के टिकाऊ समाधान के लिये काम कर रहे ‘अपना तालाब अभियान’ की बैठक उनके गाँव में हुई। शिवराज सिंह ने शादी रोककर पहले तालाब बनाने का तय किया। जून 2013 में ‘एक लाख तिरासी हजार रुपये’ की लागत से पौन एकड़ का साढ़े तीन मीटर गहरा तालाब बना डाला। अपने परिवार के साथ वर्षा के दिनों में भी तालाब के भीटों पर सुबह से शाम तक बने रहने की आदत सी डाल ली, तभी तो तालाब में पानी की मात्रा का अंदाजा लगाकर कम पानी वाले बीजों का चयन कर बोवाई की। उनके असिंचित एकफसली खेत दोफसली होने की ओर अग्रसर हैं। इस सूखे के साल में भी शिवराज पहली फसल ले चुके हैं, और दूसरी की तैयारी में हैं।
मैयादीन का तालाब
शिवराज सिंह की बहन की शादी हो गई है। बेटी के हाथ पीले करने की तैयारी में है। शिवराज सिंह बताते हैं कि पानी के साथ भाई भी लौट आया है, भाई संकट के दौर में गाँव से पलायन कर गया था, गाँव जल्दी आता न था। पर अब लौटकर खेती में हाथ बँटाता है। इस साल शिवराजसिंह अपने तालाब की लम्बाई-चौड़ाई और गहराई बढ़ाने का मन भी बना चुके हैं, जिससे अपनी चौदह एकड़ खेती को तीन पानी देने के काबिल हो सकें। शिवराज सिंह पूरे भरोसे से कहते हैं कि ‘जल्दी ही तालाब को और बड़ा करूँगा, ताकि सभी खेतों को पानी मिल सके।’

महोबा जनपद की तहसील चरखारी के गाँव काकून के कई किसानों ने भयंकर सूखे में भी बोई है, फसल। वर्ष 2013-15 के बीच ‘अपना तालाब अभियान’ से प्रेरित गाँव काकून में लगभग 50 से ज्यादा किसानों ने तालाब बनाने का संकल्प लिया और बना डाले तालाब। पुराने और नए सभी तालाबों ने नई इबारत लिखनी शुरू कर दी है। तालाबों ने सूखी और बंजर जमीनों की प्यास बुझाना शुरू किया है। तालाबों में पानी नहीं भी है तो तालाब के नजदीक के कुओं में 15-20 फीट पर पानी है। तालाब भले ही सूख गये हों, पर धरती की कोख में पानी दे गये हैं।

काकून के मैयादीन के पास पट्टे की बंजर-ऊसर दो बीघा ज़मीन है। ज़मीन बंजर तो थी ही साथ ही सिंचाई का कोई साधन भी नहीं था। मैयादीन सरकार से मिली ज़मीन का उपयोग खेती के लिये करने में असमर्थ थे। पानी नहीं तो खेती कैसे होगी। मैयादीन ने भी अपने खेत में एक छोटा तालाब खुदवाने का निर्णय लिया आज उनके तालाब में पानी है जो उनकी उम्मीदों की फसल को सूखे में भी पानी दे रहा है। सूखे में भी फसल की रखवाली के लिये खेत पर डटे हुए हैं। यकीनन ऐसे प्रयासों में ही बुन्देलखण्ड के सूखे के समाधान के बीज छिपे हुए हैं।
मैयादीन के तालाब के पास का एक कुंआ
बुन्देलखण्ड के सूखे से निपटने के लिये हम सबको अपने हुनर, अपने संसाधन और अपने सम्बन्धों की पूँजी का सदुपयोग कर जरूरत की छोटी-छोटी योजनाओं पर काम करना होगा। जरूरत है कि ग्राम्य-जीवन में रचे-बसे खेती-किसानी, पेड़ और पानी की विधाओं में अनुभवी, पारंगत, कुशल किसान शिल्पियों पर भरोसा करें। नहीं तो रोना ही पड़ेगा। बेहतर तो है कि सिंचाई, जल संजोने व खेती के टिकाऊ तौर-तरीकों के अनुभवों के मुताबिक निदान की दिशा में छोटे-छोटे काम शुरू करें। और यह राज-समाज की साझी पहल से ही सम्भव है।

बुन्देलखण्ड में तालाबों की संस्कृति पिछले एक-डेढ़ हजार साल से खूब समृद्ध रही है। बुन्देलखण्ड के लगभग हरेक गाँव में यहाँ-वहाँ तालाब देखने को मिल जाएँगे। बुन्देलखण्ड की धरती और माटी के साथ ही पठारी धरातल में सबसे उपयुक्त जल संजोने का तरीका तालाब ही है। चंदेल राजाओं ने लगभग एक हजार साल पहले समय-सिद्ध तालाब और बावड़ियों की खुशबू और खूबसूरती को पहचान लिया था और उनको चिरस्थाई बनाने के लिये हर सम्भव कोशिश की थी। पर हमने बेकदरी के हजार साल बिता दिए हैं। हम भूल गये, अब परेशान हैं, ज़मीन छोड़ रहे हैं, पलायन को विवश हैं। ऐसे में आशुतोष, शिवराज सिंह, मैयादीन जैसे किसानों से मिलने की जरूरत है, जो बेबसी का टीका पोंछकर सुकाल का टीका लगा रहे हैं। इन्होंने बड़े जतन से अपने-अपने तालाबों में पानी टिकाया, अब पानी उन्हें टिकाए हुए है।

अपना तालाब अभियान क्या है?
यह जानना जरूरी है कि अपना तालाब अभियान क्या है? कहानी की शुरुआत की तिथि का ठीक- ठीक अंदाज तो नहीं है। साल 2013, महीना मार्च। हमेशा की तरह बुन्देलखण्ड के अकाल की खबरें इस बार भी सुर्खियों में था। कुछ मित्रों के साथ अपन अनुपम मिश्र जी से मिलने उनके दफ्तर पहुँचे। औपचारिक कुशल-क्षेम के बाद उन्होंने पूछा- कैसे आए। जो चिन्ता थी बताया। धीरज बंधाते हुए उन्होंने कहा कि इसमें चिन्ता की कोई बात नहीं। सब ठीक हो जाएगा। पानी का इतना बड़ा अकाल नहीं, बुद्धि का अकाल है। अपन को बुद्धी ठीक करने के लिये कुछ करना चाहिए। कुछ धूल हम सब के दिमाग पड़ गई है जिसे झाड़ने की जरूरत है। सबसे पहले जहाँ-जहाँ अच्छे काम हुए है वहाँ के मित्रों की एक छोटी बैठक बुलाओ। इसमें बुन्देलखण्ड के मित्र भी आएँगे। जाओ तैयारी करो। तारिख तय कर के बताना। अपन अब बैठक में मिलेंगे।

सभी बैठक की तैयारी में जुट गए। ठीक आठ दिन बाद की तारीख पक्की हुई। सब कुछ अनौपचारिक तरीके से हो रहा था। मैं केसर (इंडिया वाटर पोर्टल) ने साथियों को खबर करने की जिम्मेवारी ली। मित्रों के आने-जाने और खाने-पीने का इन्तज़ाम अजय भाई (पैरवी संस्था के निदेशक) ने की। बैठक की जगह अनुपम जी के ऑफिस का कमरा तय हुआ।

देवास से दिलीप सिंह पंवार और रघुनाथ सिंह तोमर जी, बुन्देलखण्ड के बांदा से सुरेश रैकवार जी, छतरपुर से संजय भाई, लापोड़िया राजस्थान से लक्ष्मण सिंह के अलावा दिल्ली से अजय झा, प्रभात भाई और अनुपम जी बैठक में शामिल हुए। बाहर से आये सभी लोगों ने अपने-अपने इलाके के काम की जानकारी दी। बैठक के अंत में तय हुआ कि अगले मानसून के पहले यही टीम बुन्देलखण्ड के दोनों हिस्सों में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में किसानों के साथ बात-चीत करेगी।

इस बार की बैठक थोड़ी बड़ी थी लिहाजा तैयारी में कुछ ज्यादा वक्त लगा। सात अप्रैल 2013 को अतर्रा, बांदा और आठ अप्रैल को छतरपुर में बैठक निर्धारित की गई। करीब दिन भर की बैठक के बाद हम लोगों ने चरखारी, महोबा में रात बिताना तय किया।

8 अप्रैल 2013 को बुन्देलखण्ड के तालाबों के सम्बन्ध में एक बैठक का आयोजन बांदा जिले के अतर्रा ग्रामीण इलाके में किया गया। आयोजनकर्ता संस्था के प्रमुख सुरेश रैकवार द्वारा पूर्व वर्षों में अस्तित्व खोते जा रहे, कुछ एक तालाबों के पुनर्जीवन का कार्य जन सहयोग से कराये जाने का अनुभव था। इस कार्यक्रम में पैरवी दिल्ली प्रायोजक रही। कार्यक्रम में क्षेत्रीय किसानों, शिक्षकों, पत्रकारों, संस्थाओं के प्रतिनिधियों की उपस्थिति रही। चर्चा के दौरान पुराने तालाबों को संवारने की जरूरत महसूस की गयी। जनपद के पल्हरी गाँव में तैनात शिक्षा मित्र ओमप्रकाश भारतीय द्वारा अपने सजातीय परिवारों के कब्जे से एक बड़े तालाब को मुक्त कराने का साहस भी सुना। पर इन सबसे किसानों की बदहाली का रास्ता मिल सकता हो, या उनकी खुशहाली बढ़ सकती हो, नजर नहीं आयी। एक और प्रयोग पर चर्चा आई। किसानों के खेत पर उनके अपने तालाबों का निर्माण, जिससे वह सिंचाई कर फसलों का उत्पादन बढ़ा सकें। इस बात को रखने वाले और समर्थन करने वालों की उस बैठक में संख्या भले ही कम रही हो, पर बात पते की ही नहीं फायदे की भी थी। पुष्पेन्द्र भाई द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव पर उदाहरण सहित पुष्टि, केसर ने प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में रखा, मीटिंग में देवास क्षेत्र के जल संकट से निजात पा चुके, तालाबों से फायदा पाने वाले किसान भी मौजूद थे। उनकी मुँह ज़ुबानी सुनकर एक बात सभी को समझ में आने लगी थी। बुन्देलखण्ड मे गहराती जल समस्या का एक मात्र विकल्प किसानों के अपने तालाब हो सकते हैं। पर यह काम कब और कहाँ से प्रारम्भ हो, संसाधन और वातावरण के अभाव में काम कठिन था। इसी संदर्भ में 9 अप्रैल को एक बैठक का आयोजन बुन्देलखण्ड के म.प्र. में छतरपुर में आयोजित थी। यात्रा के दौरान तय हुआ कि पानी पुनरूत्थान पहल के चरखारी में किये गये प्रयासों को देखते हुए चलें। सम्भव हो तो इस दिशा में सहयोगी बने जिलाधिकारी अनुज कुमार झा से भी मुलाकात करें।

जिलाधिकारी अनुज कुमार झा के आवास पर देर रात पहुँचकर चर्चा के दौरान हमने देवास में किये गये पानी के संकट से निजात पाने की घटना का जिक्र किया। और उसे देखने की जरूरत। तय यही हुआ कि जिले से अधिकारियों, किसानों, स्वैच्छिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों की एक टीम जाकर देखेगी। इसके लिये जाने वाले सदस्यों की सूची का दायित्व पुष्पेन्द्र भाई को दिया गया। इस बैठक में गाँधी शांति प्रतिष्ठान के कार्यकर्ता श्री प्रभात, पैरवी दिल्ली से अजय कुमार भी शामिल रहे।

देवास भ्रमण के लिये निर्धारित सूची के क्रम में जिलाधिकारी महोबा द्वारा 15 अप्रैल 2013 को एक पत्र जारी किया गया। जनपद के उपकृषि निदेशक श्री जी.सी.कटियार के नेतृत्व में उपसभ्भागीय कृषि प्रसार अधिकारी श्री वी.के.सचान, सहायक अभियन्ता लघु सिंचाई डा. अखिलेश कुमार, खण्ड विकास अधिकारी पनवाड़ी श्री दीनदयाल, उपनिदेशक भूमि संरक्षण एवं जल संसाधन महोबा श्री आर के.उत्तम, क्षेत्रीय वनाधिकारी पनवाड़ी श्री हरी सिंह, ए.डी.एम.यू. अधिकारी जायका वन प्रभाग महोबा श्री रामेश्वर तिवारी, किसान भारत सिंह यादव, किसान मिश्रा, स्वैच्छिक संगठनों में डा. अरविन्द खरे (ग्रामोन्नति), श्री पंकज बागवान और पुष्पेन्द्र भाई शामिल हुए।

देवास भ्रमण के दौरान गाँव में तालाबों के श्रृंखलावद्ध निर्माण और गाँव-गाँव में चल रहे तालाब निर्माण की स्वसंचालित पहल देखकर उम्मीद जगी। इस दौरान उन ग्राम पंचायतों को भी देखा जहाँ पर प्रत्येक किसान परिवार के पास अपना तालाब था।

9 मई 2013 को देवास मप्र के तालाबों का अवलोकन कर वापस आई टीम के सदस्यों के अनुभवों को जानने समझने और उन अनुभवों का प्रयोग महोबा जिले में दोहराने के उद्देश्य से एक बैठक का आयोजन विकास भवन सभागार में जिलाधिकारी महोबा की अध्यक्षता में किया गया। उसके बाद से हम लोग गाँवों में लग गए किसानों के साथ संवाद में। और लोगों से हम लोग यही कहते रहते थे कि हर किसान को अपने पानी का प्रबंधन करना है, और उसके लिये अपना-अपना तालाब बनाना है, फिर हुआ यह कि धीरे-धीरे यह अभियान ‘अपना तालाब अभियान’ बन गया.

‘अपना तालाब अभियान’ कोई योजना नहीं है, और न ही कोई एनजीओ, यह राज समाज की साझी पहल है। और हर वह व्यक्ति जो बुन्देलखण्ड के सूखे से जूझ रहा है, वह इस अभियान का साथी है।
 

सहयोग - अनिल सिंदूर, रवि प्रकाश

जिन किसानों की कहानी कही गई है, उनके सम्पर्क पते -

सम्पर्क - आशुतोष तिवारी, ग्राम: जिगनौड़ा, तहसील: मौदहा, हमीरपुर, उत्तरप्रदेश, फोन - 9452223536
सम्पर्क: शिवराज सिंह, ग्राम: बरबई, विकासखंड – कबरई, महोबा, उत्तरप्रदेश, फोन - 08400436748
सम्पर्क: मैयादीन, ग्राम: काकून, विकासखंड: चरखारी, महोबा, उत्तरप्रदेश, फोन -(वाया दशाराम) 09695983151
 

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मीनाक्षी अरोरामीनाक्षी अरोराराजनीति शास्त्र से एम.ए.एमफिल के अलावा आपने वकालत की डिग्री भी हासिल की है। पर्या्वरणीय मुद्दों पर रूचि होने के कारण आपने न केवल अच्छे लेखन का कार्य किया है बल्कि फील्ड में कार्य करने वाली संस्थाओं, युवाओं और समुदायों को पानी पर ज्ञान वितरित करने और प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित करने का कार्य भी समय-समय पर करके समाज को जागरूक करने का कार्य कर रही हैं।

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