पर्यावरण पर अपरम्परागत हथियारों का प्रभाव

Submitted by Hindi on Mon, 04/04/2016 - 12:44
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योजना, जून 1995

लेखक के अनुसार लगातार पर्यावरण प्रदूषित होने के कारण नाभिकीय युद्ध से पूर्व ही महाविनाश का भयानक दृश्य उपस्थित हो सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि पर्यावरण में बढ़ते निरन्तर प्रदूषण को तेजी से कम करने का प्रयास नहीं किया गया तो 21वीं सदी के अन्दर ही महाप्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। अपरम्परागत एवं घातक हथियारों के प्रयोग ने न केवल मानवता को विनाश के कगार पर लाकर खड़ा किया है बल्कि इनके प्रभाव से प्राकृतिक पर्यावरण का बिगड़ता सन्तुलन भी मानवता को महाविनाश के गर्त में गिरने के लिये मजबूर कर रहा है। जिसे रोकने के लिये अपरम्परागत हथियारों के पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभावों को रोकना आज की आवश्यकता है।

विश्व के अनेक वैज्ञानिकों ने इस बात को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि पृथ्वी की सतह पर सूर्य की गर्मी की तीव्रता में अचानक तेजी से आई गिरावट पूरे ग्रह के मौसम में बहुत अन्तर ला सकती है। नाभिकीय शीत का प्रभाव पृथ्वी के गोले (पिण्ड) को भी तेजी के साथ ठंडा कर देगा, जिससे प्रकृति के साथ-साथ समस्त जीव-जन्तु भी सदा-सदा के लिये ठंडे हो जाएँगे। अतः इसके प्रभाव महाविनाश का एक भयावह दृश्य उपस्थित कर सकते हैं। पर्यावरण प्रदूषित होने के कारण इतना अधिक परिवर्तित हो रहा है कि नाभिकीय युद्ध से पूर्व ही महाविनाश का भयानक दृश्य उपस्थित हो सकता है। अपरम्परागत, हथियार के रूप में नाभिकीय, रासायनिक, जैविक एवं लेसर किरणों की निरन्तर नवीन प्रणायों के विकास के नाम पर निःसन्देह पर्यावरण के विरुद्ध विश्व के विकसित एवं विकासशील राष्ट्र जो दमन की कार्यवाही कर रहे हैं, इस पर अंकुश न लगाया गया तो, पृथ्वी का पतन होने के साथ-साथ तबाही-ही-तबाही दिखाई देगी। हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण प्रकृति का अनुशासन है, जब यह अनुशासन बिगड़ता है, तो प्राकृतिक सन्तुलन भी असन्तुलित हो जाता है, जिससे प्रदूषण पनपने के अवसर अधिक बढ़ जाते हैं। मानव ने विकास एवं सुरक्षा के नाम पर अपरम्परागत हथियारों को अत्यधिक बढ़ावा देकर प्रकृति को ही अपनी परिधि में घेर लिया है, वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि पर्यावरण में बढ़ते निरन्तर प्रदूषण को तेजी से घटाया नहीं गया तो 21वीं सदी के अन्दर ही महाप्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।

अपरम्परागत हथियारों की होड़ एवं प्राकृतिक संसाधनों एवं सुविधाओं का अथाह शोषण पर्यावरण को इतना अधिक प्रदूषित कर रहे हैं जहाँ मानव की जीवन-रक्षा साधारणतया सम्भव नहीं होगी। अपरम्परागत हथियारों के प्रभाव के रूप में पर्यावरण पर व्यापक परिवर्तन एक लम्बी अवधि से अनुभव किया जा रहा है, किन्तु अब मानव जीवन के लिये एक गम्भीर खतरा भी इससे स्पष्ट दिखाई देने लगा है। अपरम्परागत हथियारों के रूप में हम दो प्रकार के शास्त्रास्त्रों का मुख्य रूप से उल्लेख करते हैं-

1. नाभिकीय हथियार
2. रासायनिक हथियार

संयुक्त राष्ट्र संघ के एक अध्ययन के अनुसार नाभिकीय हथियारों के प्रयोग से ऐसा जलवायु प्रभाव पैदा किया जा सकता है, जो उन सीमाओं के पार-दूर-दूर तक फैल जाएगा, जहाँ ऐसे हथियारों का प्रयोग किया गया है वहाँ इस सम्बन्ध में निश्चित वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं, जो यह बताते हैं कि यदि बड़े पैमाने पर नाभिकीय हथियारों का इस्तेमाल हुआ, तो उससे विश्व का पर्यावरण बुरी तरह से प्रभावित ही नहीं होगा बल्कि पूरी तरह से लड़खड़ा जाएगा। सम्भावित प्रभाव होंगे जैसे- धूल, धुआँ एवं कालिख हो जाने के कारण सूर्य से पृथ्वी पर पहुँचने वाली धूप व गर्मी में कमी आ जाएगी। आकस्मिक ऐसे परिवर्तन देखने को मिलेंगे जिससे मानव सभ्यता के साथ-साथ प्रकृति को भारी आघात लगेगा, जिससे जीव-जन्तुओं के साथ-साथ प्राकृतिक सम्पदा का सर्वस्व स्वाहा हो जाएगा। नाभिकीय हथियार जहाँ अपनी प्रहारक क्षमता से प्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों को मौत के घाट उतार सकते हैं, वहाँ इनके प्रयोग से निकली रेडियोधर्मी विकिरणों से प्रत्यक्ष रूप से करोड़ों की संख्या में लोग घुट-घुट कर मरने को मजबूर होंगे।

वर्ष 1983 में मास्को में नाभिकीय हथियारों के खतरे से मानव जाति की रक्षा के लिये कार्यरत वैज्ञानिकों का एक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर वाशिंगटन ने भी ‘नाभिकीय युद्ध के बाद विश्व’ पर एक अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की। अनेक अध्ययनों एवं सम्मेलनों ने यह अवश्य स्पष्ट कर दिया कि नाभिकीय हथियारों का विकास एक ऐसे चरण में पहुँच गया है, कि अगर उनका उपयोग किया गया तो पृथ्वी के पर्यावरण में अतीत की तमाम प्राकृतिक विपदाओं द्वारा लाये गए परिवर्तनों से भी कहीं अधिक बड़े परिवर्तन पैदा हो जाएँगे। करोड़ों लोगों के उसी समय मारे एवं तबाह हो जाने के साथ-साथ समताप मण्डल की ओजोन परत का क्षय हो जाने के अलावा प्रलयाग्नियों की चपेट में पैदा होने वाले अपरिमित धुएँ एवं कालिख से वातावरण के प्रकाशीय गण एवं ताप बिल्कुल ही परिवर्तित हो जाएँगे। यह भी सम्भावना है कि बड़े नाभिकीय हथियारों के घात प्रतिघात के कारण पृथ्वी के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों की जानकारी देने वाला भी कोई न रहे।

वैज्ञानिकों के एक अध्ययन के अनुसार विश्व के वर्तमान नाभिकीय हथियारों के जमाजखी का मात्र 15 से 20 प्रतिशत ही प्रयोग किया जाये तो लगभग दस लाख वर्ग किलोमीटर जैसे व्यापक क्षेत्र में भीषण अग्नि ज्वाला जंगल की आग की भाँति भड़क उठेगी। इस आग की चपेट में शहर की समस्त आबादी के साथ ही औद्योगिक केन्द्र, संचार व्यवस्था, विद्युत केन्द्र गैस एवं तेल के क्षेत्र भी आ जाएँगे जो कि विनाशलीला को बढ़ाने में और सहायक सिद्ध होंगे। नाभिकीय हथियारों के विस्फोट से बड़े पैमाने पर धूल, धुआँ एवं आग के साथ अन्य कचरा भी वायुमण्डल में व्याप्त हो जाएगा, जिससे पृथ्वी की सतह पर आने वाली सूर्य की किरणों की तीव्रता में कई गुणा कमी आ जाएगी। इसका परिवर्तन इतना जोरदार होगा कि इसके झटके से प्राकृतिक सन्तुलन तो लड़खड़ा ही जाएगा किन्तु जीव-जगत को भी भारी विपदा के असहनीय संकट से गुजरना होगा।

आज संसार में तेल, गैस एवं रासायनिक क्रियाओं का प्रभाव जहाँ बहुत अधिक बढ़ गया है, वहाँ नाभिकीय हथियारों के विस्फोट से उत्पन्न अग्नि को यह तत्व और अधिक बढ़ावा देंगे जिससे अत्यधिक विनाश सम्भव होगा। आज ज्वलनशील पदार्थों का अनुमान लगाया जाये तो यह प्रतिवर्ग किलोमीटर सैकड़ों किलोग्राम बैठेगा। जंगल में लगी आग का स्वरूप अत्यन्त भयंकर तो होगा ही, साथ ही इसके प्रभाव उसकी तुलना में कहीं अधिक घातक साबित होंगे, क्योंकि गैस, तेल एवं पोलीमस आदि बहुत अधिक मात्रा में सूर्य की गर्मी को सोखते हैं। इसके साथ ही कई करोड़ टन कालिख और धूल से वायुमंडल भर जाएगा जोकि अत्यन्त विनाशकारी सिद्ध होगा।

आकस्मिक जलवायु या मौसम परिवर्तन के कारण स्वयं ही मानव भारी विपत्ति में पड़ जाएगा, क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में सौर-विकिरण को पृथ्वी की जमीनी सतह, समुद्र एवं वायुमंडल ग्रहण करते हैं, तथा अक्षांश और वर्ष के काल विशेष के अनुसार अलग-अलग परिणामों में गर्म होते हैं। तापमानों में इस अन्तर से समुद्र व वायुमंडल के मध्य अन्य अनेक क्रियाएँ सम्पादित होती हैं तथा एक ऐसी जलवायु का जन्म होता है, जिसके अनुसार स्वयं मानव अपने को तैयार कर लेता है। जलवायु में जो प्राकृतिक परिवर्तन होते हैं वह एक सीमित समय के साथ ही धीरे-धीरे परिवर्तित होते हैं। जिससे जीव-जगत को स्वयं को जलवायु के अनुसार समायोजित करने में समस्या का सामना नहीं करना पड़ता है।

नाभिकीय हथियारों के आकस्मिक प्रयोग से जहाँ एक ओर भीषण अग्नि ताप से जलकर स्वाहा होने वाले बड़े शहरों में उपस्थित तेल, गैस एवं रासायनिक भण्डारों से वायु मण्डल में कचरा एवं अनगिनत धुआँ छा जाएगा वहाँ इससे प्रभावित वायुमण्डल से नाभिकीय शीत लहर की लहराती हवाओं की लपेट में जीव-जगत की अत्यन्त दयनीय स्थिति होगी।

नाभिकीय शीत के प्रभाव से कृत्रिम व्यवस्थाएँ भी विफल हो जाएँगी, क्योंकि आकस्मिक पर्यावरण परिवर्तन के कारण जलवायु पर आधारित खाद्य सामग्री का उत्पादन सम्भव न हो सकेगा और विश्व में उपलब्ध खाद्य सामग्री रेडियोधर्मी विकिरणों के प्रभाव से विषैली एवं घातक हो चुकी होगी।

नाभिकीय शीत का सीधा सम्बन्ध मौसम के आकस्मिक परिवर्तन से है, जिसकी चपेट में जलवायु से लेकर जीव जन्तु भी प्रत्यक्ष रूप से आएँगे। नाभिकीय हथियारों के प्रयोग से जहाँ मानव को मानसून दगा देगा, वहीं अनेक खाद्य समस्याओं का भी सामना करना पड़ेगा।

विश्व के अनेक वैज्ञानिकों ने इस बात को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि पृथ्वी की सतह पर सूर्य की गर्मी की तीव्रता में अचानक तेजी से आई गिरावट पूरे ग्रह के मौसम में बहुत अन्तर ला सकती है। नाभिकीय शीत का प्रभाव पृथ्वी के गोले (पिण्ड) को भी तेजी के साथ ठंडा कर देगा, जिससे प्रकृति के साथ-साथ समस्त जीव-जन्तु भी सदा-सदा के लिये ठंडे हो जाएँगे। अतः इसके प्रभाव महाविनाश का एक भयावह दृश्य उपस्थित कर सकते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान यह भी है कि आकस्मिक नाभिकीय हथियारों के प्रयोग के परिणामस्वरूप वायुमंडल की ऊपरी सतह पर धूल की मात्रा की अधिकता जहाँ बहुत बढ़ जाएँगी, हाँ निचली सतह पर धुएँ की अधिकता के कारण कुछ ही महीनों में पृथ्वी की सतह के तापमान में 40 से 50 डिग्री की जोरदार गिरावट आ जाएगी जिसे मान शरीर जल्दी से बर्दाश्त नहीं कर पाएगा और अत्यधिक ठंड से ठंडा होकर रह जाएगा।

नाभिकीय शीत के प्रभाव से जहाँ मानव की अपनी सुरक्षा व्यवस्था संकट में हो जाएगी, वहाँ नित नवीन समस्याओं का भी सामना करना पड़ेगा। आकस्मिक अंधकार एवं भीषण शीत लहर के कारण अनेकों बीमारियों का जन्म होना साथ-ही-साथ बचने के उपायों के अभाव में इस विपत्ति को और बढ़ावा मिलेगा। खाने-पीने की वस्तुओं की कमी हो जाएगी, क्योंकि उपलब्ध वस्तुएँ विकिरण के प्रभाव से विषैली होंगी वहीं नई वस्तुओं का उत्पादन करना बहुत कठिन हो जाएगा। सभी ओर विशाल एवं भयंकर स्थिति ही दिखाई देगी, क्योंकि न तो सहन करने की क्षमता होगी और न ही किसी प्रकार का समुचित साधन। जब सूर्य की रोशनी पृथ्वी पर नहीं पहुँच पाएगी तो अंधेरा होने के साथ ही मानव के साथ-साथ जीव-जन्तु व वनस्पति भी अंधेरे में अपने अस्तित्व को बनाए रखने में समर्थ नहीं होंगे।

मानव ने अपनी सुख-सुविधा एवं सीमित सुरक्षा के नाम पर जो प्राकृतिक सम्पदा का दुर्दशापूर्ण दोहन किया है उसे हम घुटन की जिन्दगी जीने को लाचार हो चुके हैं। अतः अपरम्परागत हथियारों के पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभावों को रोकना आज की आवश्यकता है। नाभिकीय युद्ध के कारण जो शीत चलेगी उससे पर्यावरण इतना अधिक प्रदूषित हो जाएगा कि धमाकेदार परिवर्तन के साथ जीव-जन्तुओं का जीना कठिन हो जाएगा। नाभिकीय विस्फोट से उत्पन्न अग्नि संसार के समस्त वनों का लगभग 25 प्रतिशत तथा उत्तरी गोलार्द्ध की कृषि कार्य के लिये उत्तम भूमि के 50 प्रतिशत भाग को जलाकर भस्म कर देगी। नाभिकीय विस्फोट और भीषण अग्नि ज्वाला के कारण वायुमण्डल में कार्बनिक एसिड, नाइट्रिक एसिड, प्रोपीलीन, एथीलीन आदि अनेक विषैली गैसों की भरमार हो जाएगी इन विषाक्त गैसों के कारण पर्यावरण अस्त-व्यस्त हो जाएगा और अम्लीय वर्षा (एसिड रेन) और हिमपात शुरू हो जाएगा जिसमें मिट्टी पर औसतन पाँच गुना अम्लीय तत्व बढ़ जाएँगे। इससे हरे-भरे घास के मैदान रेगिस्तान और बंजर की भाँति हो जाएँगे।

नाभिकीय शीत की प्रथम स्थिति के सन्दर्भ में वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जिस समय नाभिकीय विस्फोट होगा, तो उसी समय धूल धुएँ के बादलों वाली तेज हवाओं के साथ वायुमंडल में पश्चिम से पूर्व तथा उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ने लगेगी और अपने विषाक्त विकिरण के साथ ही रासायनिक गन्दगी पूरी दुनिया में अपना फैलाव शुरू कर देगी। काले एवं जहरीले धुएँ के साथ ही फैली धूल से समस्त भू-मण्डल एक बार ढँक जाएगा और यहीं से शुरुआत होगी नाभिकीय शीत की। इसे ही नाभिकीय शीत के प्रथम चरण की संज्ञा भी दे सकते हैं।

द्वितीय स्थिति में नाभिकीय शीत की लहर दूसरे सप्ताह में ही समस्त भू-मण्डल को अधिक घने धूल एवं धुएँ के बादलों से ढक लेंगी और समस्त उत्तरी गोलार्द्ध इसकी चपेट में होगा जिससे गर्मी के दिनों में भीषण बर्फ जमना शुरू हो जाएगा और इस आकस्मिक परिवर्तन को मानव सहित सभी जीव-जन्तु भी सहन नहीं कर पायेंगे और अनेकों बीमारियों के शिकार होने लगेंगे। इसी के साथ ही आकस्मिक मौसम एवं जलवायु में बदलाव से पेड़ पौधे एवं फसलें भी प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगी और एक बड़ा खाद्यान्न संकट भी पैदा हो जाएगा।

तृतीय स्थिति में नाभिकीय शीत के प्रभाव से तीसरे सप्ताह के बाद ही भू-मण्डल के सम्पूर्ण उत्तरी गोलार्ध को काले एवं जहरीले धुएँ एवं धूल का आवरण पूरी तरह से ढँक लेगा। नाभिकीय शीत के प्रत्यक्ष प्रभाव में आये तथा इससे बचे क्षेत्रों के तापमान में अन्तर से समस्त ग्रह पर वायु प्रवाह की दिशा में जोरदार बदलाव आ जाएगा और धीरे-धीरे दक्षिणी गोलार्द्ध को भी अपनी परिधि में समेटना शुरू कर देगा और नाभिकीय शीत लहर से जहाँ ठण्ड-ही-ठण्ड होगी वहाँ लगातार अन्धेरा भी समस्त जीव-जन्तु एवं वनस्पति को आकस्मिक संवाद में डाल देगा जिससे बच पाना शायद ही किसी परिस्थिति में सम्भव हो सके।

नाभिकीय शीत की अन्तिम एवं चौथी स्थिति के बारे में वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एक माह के बाद एशिया एवं यूरोप महाद्वीपों के तापमान में भी कम-से-कम 10 डिग्री सेंटीग्रेड की आकस्मिक गिरावट आ सकती है। उत्तरी गोलार्द्ध के क्षेत्रों में तो तापमान 30 से 50 डिग्री सेंटीग्रेड तक गिर जाने का अनुमान है, जिससे भयंकर जाड़े की स्थिति के साथ ही अन्धकार के वातावरण में समस्त जीव-जगत एवं पेड़-पौधे व फसलें भी असमय में ही काल कवलित हो जाएगी। नाभिकीय शीत का अन्धेरा ही अकेले समुद्र की सतह पर प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को नष्ट कर सकेगा, जिसमें समुद्री जीव-जन्तु भी इसकी चपेट में अपने को नहीं बचा पाएँगे। यहाँ तक तक अधिकांश उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों में भी 5 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान गिर जाएगा। लगभग समस्त भू-मण्डल धूल एवं धुएँ के घरे बादलों से भर जाएगा और अन्धकार-ही-अन्धकार के कारण तापमान में निरन्तर गिरावट से महाप्रलय का दृश्य उपस्थित हो जाएगा।

विश्व में रासायनिक हथियारों के जखीरे इतने जमा हैं और भविष्य में भी बढ़ोत्तरी के आसार हैं, क्योंकि हर गरीब मुल्क अपनी रक्षा की आड़ में रासायनिक हथियारों की कटार अवश्य रखना चाहेगा, जिसका परिणाम होगा विश्व की वह स्थिति जिसका सही जायजा काल्पनिक रूप से उपस्थित कर पाना भी अत्यन्त कठिन है। अतः अम्लीय वर्षा से केवल मानव जीवन ही प्रभावित नहीं होगा, बल्कि प्रकृति में ऐसा परिवर्तन आएगा कि महाप्रलय का दृश्य उपस्थित हो जाएगा। उद्योग स्वयं ही अपनी चपेट में लाखों की संख्या में प्रतिवर्ष लोगों को मौत का ग्रास बना देंगे।

अभी हाल ही में अमरीका के लाॅस अल्गाॅस नेशनल लेबोरेटरी के कर्नल जाॅन आलेकसान्द्र ने हथियारों की दुनिया में नया अध्याय जोड़ा है। इनके दल ने ऐसे हथियार बना लेने का दावा किया है, जो मारक एवं संवाहक नहीं होगा जिससे बिना रक्तपात के ही युद्ध जीता जा सकेगा। यह हथियार भी परम्परागत युद्ध हथियारों की तरह ही प्रयोग किये जाएँगे परन्तु खतरनाक रसायनों, नाभिकीय विकृतियों या भीषण विस्फोट की बजाय इसमें होगी- लेसर किरणें, पराश्रव्य ध्वनियाँ, सूक्ष्म तरंगें, कुछ प्रमुख रसायन अथवा अतिसूक्ष्म जीव। इन हथियारों के प्रभाव से प्रतिद्वन्दी सेना के सैनिकों को आत्म-विस्मृति हो सकती है, वे भूल जाएँगे कि वे यहाँ क्यों और किस लिये तैनात हैं? सेना के प्रक्षेपास्त्र एवं राॅकेट आदि जो इलेक्ट्रॉनिक सर्किट और गाइडेड कंट्रोल सिस्टम पर आधारित होंगे, जो उनका सारा सूचना तंत्र बाधित हो जाएगी। यहाँ तक कि शहर व छावनी की विद्युत आपूर्ति भी बाधित की जा सकती हैं और उद्योगों के एयर टैंक भी। हथियारों द्वारा छोड़े गए सूक्ष्मतम जीवाणु जमीन के अन्दर छिपाकर रखे तेल या पेट्रोल, ईंधन, भंडार को निरर्थक जेली में परिवर्तित करने में सक्षम होंगे तो इनसे निकले रसायन विमानों के पंखों को गलाने, उनके टायरों को भुरभुरा कर देने तथा सड़कों आदि को सुपर ग्लू के जरिए चिपचिपा करने का कमाल दिखा सकते हैं। भले ही कहने के लिये यह संहारक व मारक हथियार न हो किन्तु तनाव के ताने-बाने से बनी शान्ति की चादर में गलता अवश्य लग रहा है नाभिकीय मुक्त विश्व की परिकल्पना को यदि साकार रूप नहीं दिया गया तो निश्चित ही मानव मुक्त विश्व की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।

यह भी एक गम्भीर विषय है कि अपरम्परागत एवं घातक हथियारों के प्रयोग ने ही केवल मानवता को विनाश की कगार में लाकर खड़ा नहीं किया है, बल्कि इनके प्रभाव से प्राकृतिक पर्यावरण का बिगड़ता सन्तुलन भी मानवता को महाविनाश के गर्त में गिराने के लिये विनाश कर रहा है। मानव ने अपनी सुख-सुविधा एवं सीमित सुरक्षा के नाम पर जो प्राकृतिक सम्पदा का दुर्दशापूर्ण दोहन किया है उसे हम घुटन की जिन्दगी जीने को लाचार हो चुके हैं। अतः अपरम्परागत हथियारों के पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभावों को रोकना आज की आवश्यकता है।

अध्यक्ष, सैन्य विज्ञान विभाग, राजकीय महाविद्यालय, आदमपुर (हिसार)

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