पर्यावरण एवं सामाजिक न्याय नेतृत्व पर आठ दिवसीय कार्यशाला

Submitted by RuralWater on Thu, 04/07/2016 - 16:14
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तिथि: 07 से 14 अप्रैल, 2016
स्थान: तरुण आश्रम,
गाँव: भीकमपुरा किशोरी,
तहसील: थानागाजी,
जिला: अलवर, राजस्थान
संयोजक संगठन : एकता परिषद, जलबिरादरी, जनान्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, नवदान्या, मजदूर किसान शक्ति संगठन एवं अन्य।



गरीब-सीमान्त किसान, भूमिहीन खेतिहर मजदूर और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के जलवायु सरोकार क्या हैं? जलवायु परिवर्तन की इस परिस्थिति में सुरक्षा और समाधान को लेकर हमारी क्या-क्या भूमिका हो सकती है? उस भूमिका का निर्वाह सुनिश्चित करने के लिये हमें कैसी तैयारी की जरूरत है? इन प्रश्नों पर आज विचार-विमर्श की जरूरत है। जरूरत कि समय रहते भावी कार्ययोजना बने। इसीलिये तरुण भारत संघ के गँवई आँगन में ठंडे दिमाग और स्थिर मन के साथ विचार करने की दृष्टि से यह कार्यशाला आयोजित की गई है। बदलती आबोहवा के दिखते दुष्प्रभावों ने दुनिया को चिन्तित किया है; भारतीयों को भी। क्योंकि भारत में भी बाढ़ और सुखाड़ का दंश कम होने की बजाय, बढ़ा ही है। परिणति गरीब के मजबूरी भरे पलायन और जबरन विस्थापन के रूप में सामने है। वे कह रहे हैं कि धरती को बुखार है। वे कह रहे हैं कि मौसम गड़बड़ा गया है। गर्मी, सर्दी सब अनुमान से परे हो गए हैं।

बेमौसम बारिश, तापमान में अचानक वृद्धि और घटोत्तरी अब आश्चर्य की बात नहीं। निचले समुद्री तट से लेकर ऊँचे पहाड़ तक कोई भी अप्रत्याशित बाढ़ से अछूते नहीं है। महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड लम्बे समय से सुखाड़ के शिकार हो रहे हैं। सबसे कमजोर, सबसे गरीब, छोटे व मंझोले किसानों की आजीविका लम्बे समय से दुष्प्रभावित हो रही है।

वैज्ञानिक, सिर्फ और सिर्फ ग्रीन हाउस गैसों को दोष दे रहे हैं; जबकि सम्भवतः वास्तविक कारण पानी और भूमि से हमारे लेन-देन में आया असन्तुलन है। सरकार और कम्पनियाँ इस मसले पर चुप हैं। काॅप 21 में भूमि, जल, नमी और हरित क्षेत्र की भूमिका पर बहुत चर्चा न होने के पीछे एक कारण यह है कि मुनाफा कमाने वाले शायद यह समझते हैं कि जितना बिगाड़ होगा, बाजार के लिये उतने मौके होंगे।

निस्सन्देह, ऐसे में सामाजिक चेतना के पहरुओं और सामाजिक व प्रकृति सरोकारों के हितधर्मियों के लिये जानना जरूरी है कि जलवायु परिवर्तन क्या है? कैसे, कब से, कहाँ-कहाँ और किस हद तक यह बदलाव प्रगट हो रहा है? खासकर दलितों, आदिवासियों और महिला हित के मसलों पर काम करने वाले संगठनों के लिये आज क्यों जरूरी है जलवायु परिवर्तन और इसके विविध आयामों को समझना-समझाना?

गरीब-सीमान्त किसान, भूमिहीन खेतिहर मजदूर और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के जलवायु सरोकार क्या हैं? जलवायु परिवर्तन की इस परिस्थिति में सुरक्षा और समाधान को लेकर हमारी क्या-क्या भूमिका हो सकती है? उस भूमिका का निर्वाह सुनिश्चित करने के लिये हमें कैसी तैयारी की जरूरत है? इन प्रश्नों पर आज विचार-विमर्श की जरूरत है। जरूरत कि समय रहते भावी कार्ययोजना बने। इसीलिये तरुण भारत संघ के गँवई आँगन में ठंडे दिमाग और स्थिर मन के साथ विचार करने की दृष्टि से यह कार्यशाला आयोजित की गई है। उत्तरापेक्षियों में एकता परिषद की ओर से श्री पी. वी, राजगोपाल जी और जलबिरादरी व तरुण भारत संघ की ओर से जलपुरुष श्री राजेन्द्र सिंह जी का नाम है।

हालांकि गरीब की चिन्ता करने वाले इस कार्यशाला के आयोजन का आमंत्रण.. विवरण सब कुछ अंग्रेजी में है। विदेशी फंड आधारित परियोजनाओं और दस्तावेजीकरण को प्रमाण मानने वाले कार्यों की एक यही दिक्कत है कि वे गरीब की बात भी करेंगे, तो अंग्रेजी में। जैसे मान लिया गया है कि अंग्रेजी सब समझते हैं और दक्षिण भारतीय लोग हिन्दी नहीं समझते।

खैर, आयोजकों द्वारा प्रेषित आमंत्रण पत्र ने कुछ इन्ही शब्दों में कार्यशाला का मन्तव्य व चिन्ता प्रस्तुत की है। उन्होंने इसे ‘नेतृत्व निर्माण बैठक’ भी कहा है। निस्सन्देह, विषय गम्भीर है। स्थितियाँ-परिस्थितियाँ और काॅप 21 के वक्त जलवायु परिवर्ततन पर शासन व मीडिया चर्चा में आई तेजी और उसके बाद छाई चुप्पी भी गम्भीर ही है। आवश्यक है कि यह चुप्पी टूटे; संवाद हो; निर्णय हों; प्रयास हों और बदलाव के कारणों का निवारण तथा दुष्प्रभाव से संरक्षा जमीन पर उतरे। इसी विश्वास के साथ शामिल होने मैं भी इस कार्यशाला में जा रहा हूँ। लौटकर लिखता हूँ कि क्या निकला?

अधिक जानकारी के लिए संपर्क:
ईमेल : jalpururushtbs@gmail.com

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

कार्यवृत


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