अभावों की जमीन पर कामयाबी की इबारत

Submitted by RuralWater on Sun, 04/10/2016 - 11:19
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कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती... कवि सोहन लाल द्विवेदी

.पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के मधुसूदन काठी गाँव में आर्सेनिक के खिलाफ एक ईमानदार कोशिश की गई थी। यह कोशिश आज कामयाबी की इबारत कह रही है।

कहा जा सकता है कि इस गाँव में आर्सेनिक के खिलाफ एक क्रान्ति शुरू हो गई है जो आने वाले दिनों में और बड़ा स्वरूप लेगी। मधुसूदन काठी समन्वय कृषि उन्नयन समिति, सुलभ इंटरनेशनल व एक अन्तरराष्ट्रीय संगठन 1001 फॉन्टेनेस के सहयोग से मधुसूदन काठी गाँव में 4 हजार लीटर की क्षमता वाला एक वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किया गया है जिसके जरिए 55 पैसे प्रतिलीटर की दर से मधुसूदन काठी, विष्णुपुर, तेघरिया समेत आसपास के आधा दर्जन गाँवों के 400 परिवारों को साफ पानी मुहैया करवाया जा रहा है।

मधुसूदन काठी समन्वय कृषि उन्नयन समिति के सलाहकार कालीपद सरकार कहते हैं, ‘मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि मेरे गाँव में ऐसा वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित होगा जो हजारों लोगों के लिये मददगार साबित होगा।’ उन्होंने कहा, सदाशयता और साझा प्रयास की बदौलत ही यह सम्भव हो सका है। प्लांट स्थापित करने में कुल 20 लाख रुपए खर्च किये गए।

मधुसूदन काठी समन्वय कृषि उन्नयन समिति की ओर से 1 एकड़ जमीन और श्रम मुहैया करवाया गया। प्लांट स्थापित करने में तकनीकी मदद 1001 फॉन्टेनेस और आर्थिक मदद सुलभ इंटरनेशनल ने की। इस तरह एक बेहद जरूरी परियोजना को अमलीजामा पहनाया गया।

.विष्णुपुर गाँव के किसान और आर्सेनिक से ग्रस्त 65 वर्षीय अधीन प्रमाणिक ने कहा, ‘इस प्लांट के चलते ही आज मैं शुद्ध पानी का सेवन कर पा रहा हूँ।’ इसी गाँव के रहने वाले वासुदेव प्रमाणिक कहते हैं, ‘मैं आर्सेनिक से ग्रस्त हूँ इसलिये प्लांट की ओर से मुझे निःशुल्क पानी दिया जा रहा है लेकिन मेरे परिवार के 7 अन्य सदस्य आर्सेनिक युक्त पानी पी रहे हैं।’ प्रमाणिक बताते हैं, ‘मुझे डर है कि हमारे परिवार के लोग भी कहीं आर्सेनिक की चपेट में न आ जाएँ। हम चाहते हैं कि हमारे परिवार के अन्य सदस्य भी शुद्ध पानी का सेवन करें।’

प्रमाणिक जैसे ही अन्य किसान भी पानी को लेकर अब जागरूक हो रहे हैं इसलिये साफ और शुद्ध पानी की माँग दिनोंदिन बढ़ रही है। सरकार ने कहा, ‘यहाँ प्रतिदिन 8 हजार लीटर से अधिक परिष्कृत पेयजल की जरूरत है लेकिन एक ही तालाब होने के कारण हम 4 हजार लीटर पानी ही लोगों को दे पाते हैं। अगर हम अधिक पानी प्यूरिफाई करेंगे तो तालाब शीघ्र ही खाली हो जाएगा और इससे जलसंकट उत्पन्न हो सकता है।’ सरकार ने इस समस्या का हल ढूँढ निकाला है। वे मौजूदा तालाब के पास ही एक और 180 फीट लम्बा, 80 फीट चौड़ा और 18 फीट गहरा तालाब खुदवा रहे हैं। इस तालाब की क्षमता भी मौजूदा तालाब जितनी ही होगी। यह जल्द ही तैयार हो जाएगा तो और 400 परिवारों तक शुद्ध पानी पहुँचाना सम्भव हो सकेगा।

मौजूदा प्लांट की क्षमता बढ़ाने के लिये खोदा जा रहा है एक और तालाबसुलभ इंटनेशनल के सलाहकार और अॉल इण्डिया इंस्टीट्यूट अॉफ हेल्थ एंड हाइजिन के पूर्व निदेशक प्रो. के. जे. नाथ कहते हैं, ‘अल्ट्रा वायरेलेटेड रे (यूवी रे) को छोड़ दें तो पूरी तकनीक जेनरिक है। कोई भी व्यक्ति यह प्लांट स्थापित कर सकता है। इसके लिये किसी भी तरह के पेटेंट की जरूरत नहीं पड़ेगी।’

इस तकनीक में पानी शुद्ध करने में सबसे अहम रोल फिटकिरी और क्लोरिन का होता है। कालीपद सरकार बताते हैं, ‘4000 लीटर पानी को पीने लायक बनाने के लिये महज सौ ग्राम फिटकिरी और 50 ग्राम से भी कम क्लोरिन की जरूरत पड़ती है। तालाब से पानी को खींचकर प्लांट तक लाने और परिष्कृत कर 20 लीटर के जार में भरने तक प्रति लीटर खर्च महज 20 से 25 पैसे आते हैं। हम इसे 55 पैसे की दर से बेचते हैं। कर्मचारियों की तनख्वाह, जार के कैप और स्टिकर खरीदने के बावजूद 1 रुपया बच जाता है। इस बचत को वेलफेयर फंड में रखा जाता है ताकि आने वाले समय में जनहित के और कार्य किये जा सकें।’

परिष्कृत पानी को जार में भरता कर्मचारीसुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक कहते हैं, ‘सुलभ जल की मुहिम का हिस्सा है यह प्लांट।’ वे बताते हैं, ‘इस तकनीक के जरिए बेहद कम खर्च में पानी को परिष्कृत किया जाता है ताकि गरीब-गुर्बा लोगों को नगण्य दर पर शुद्ध पानी मुहैया करवाया जा सके। आर्सेनिक प्रभावित लोगों को चाहिए कि वे पहलकदमी करें ताकि इस तरह की और भी परियोजनाएँ स्थापित की जा सके।’ उन्होंने सुलभ इंटरनेशनल की ओर से इसमें हर तरह का सहयोग करने का भरोसा जताया।

उधर, पता चला है कि पड़ोसी गाँव झाउडांगा के आर्सेनिक प्रभावित लोग भी ऐसा ही प्लांट स्थापित करने के इच्छुक हैं। इसके लिये ग्रामीण एक छोटे से तालाब को चौड़ा कर रहे हैं। प्लांट के लिये गाँव के लोग सुलभ इंटरनेशनल से सम्पर्क भी कर रहे हैं।

 

 

 

 

 

दिलचस्प है प्लांट की स्थापना की कहानी


प्लांट की स्थापना भले ही वर्ष 2014 में हुई लेकिन इसका बीजारोपण वर्ष 2000 में ही हो गया था। सरकार बताते हैं, ‘वर्ष 2000 में हमारा गाँव भीषण बाढ़ की चपेट में आ गया था। बाढ़ में नलकूप तक डूब गए थे। पेयजल का संकट आ गया था तो समन्वय समिति के पदाधिकारियों ने सोचा कि खुद ही पहल कर नलकूपों के पानी को पीने योग्य बनाएँगे। हमने ऊँचे पर एक टैंक बनाया। पाइप के जरिए नलकूप से पानी खींचकर उसे टैंक में डालते थे। टैंक में फिटकिरी और क्लोरिन डालकर पानी को शुद्ध करते थे और इस तरह गाँव के लोगों को पानी मुहैया करवाया गया था। उस वक्त हम लोग 10 पैसे प्रतिलीटर की दर से ग्रामीणों को पानी देते थे। चूँकि भूजल में आर्सेनिक की मात्रा अधिक होती थी इसलिये ट्रीटमेंट के बाद भी देखा गया कि एक लीटर पानी में 0.02 से 0.04 मिलीग्राम आर्सेनिक मौजूद है। हमारा प्रयोग भले ही पूरी तरह सफल नहीं रहा लेकिन हमारे प्रयास को राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली।’ कालीपद सरकार कहते हैं, ‘उसी वक्त से हम सोचने लगे कि किस तरह लोगों को आर्सेनिक मुक्त पानी मुहैया करवाया जाये। इसी बीच हमारा सम्पर्क सुलभ इंटरनेशनल के पदाधिकारियों से हो गया और इस तरह एक खयाल ने परियोजना का आकार ले लिया।’

इसी चेम्बर से पानी फिल्टर में जाता है

 

 

इन प्रक्रियाअों से पानी होता है परिष्कृत


पहले तालाब का पानी मोटर के जरिए रिजर्वायर में रखा जाता है। इस रिजर्वायर में 100 ग्राम फिटकिरी और 50 ग्राम से भी कम क्लोरिन डाला जाता है। इन्हें कुछ देर तक पानी में मिलाया जाता है। ऐसा करने के बाद पानी को 8 घंटे तक उसी रिजर्वायर में छोड़ दिया जाता है। 8 घंटों के बाद पानी को तीन चेंबरों वाले फिल्टर बेड में डाला जाता है। पहले चेम्बर में बालू और छोटे-छोटे पत्थर होते हैं। पानी उससे होते हुए दूसरे चेम्बर में पहुँचता है। दूसरे चेम्बर में एक्टिवेटेड कार्बन होता है। पानी इस चेम्बर से होते हुए तीसरे चेम्बर में पहुँचता है। तीसरे चेम्बरों से पानी अल्ट्रा वायलेटेड रे समेत 5 फिल्टरों से होकर जार तक पहुँचता है।

 

 

रखरखाव हो तो काफी दिन चलेगा प्लांट


प्रो. के.जे. नाथ बताते हैं, ‘अगर सही तरीके से इस प्लांट का रखरखाव किया जाये तो कम-से-कम 10 वर्षों तक तो प्लांट चलेगा ही। मशीन के नाम पर अल्ट्रा वायलेटेड रे और कुछ फिल्टर हैं। सम्भव है कि 4-5 वर्षों में इन्हें बदलना पड़े।’ उन्होंने आगे कहा, इस प्लांट में वाटर प्यूरिफिकेशन की प्रक्रिया इतनी सस्ती है कि अगर इसे दोगुनी कीमत पर भी बेचा जाये तो इससे होने वाली बचत से ही नए फिल्टर खरीदे जा सकते हैं। यही नहीं अगर कोई चाहे तो बैंक से लोन लेकर भी प्लांट स्थापित कर सकता है और पानी बेचकर होने वाले फायदे से 6 से 7 वर्षों में ही लोन भी चुकता कर सकता है।

तालाब के पानी को इस टैंक में फिटकिरी और क्लोरिन मिलाया जाता है

 

 

आर्सेनिक युक्त पानी के शुद्धिकरण में कारगर नहीं


इस प्लांट में जिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है उससे जीवाणु दूषित (बैक्टेरियल कॉन्टेमिनेटेड) पानी को ही परिष्कृत किया जा सकता है। यही वजह है कि इसमें तालाब के पानी का इस्तेमाल किया जा रहा है। आर्सेनिक दूषित या अन्य रसायन दूषित पानी को परिष्कृत करने के लिये दूसरे टेक्नोलॉजी का सहारा लिया जाता है जो बहुत खर्चीला है।


 

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उमेश कुमार रायउमेश कुमार राय पत्रकारीय करियर – बिहार में जन्मे उमेश ने स्नातक के बाद कई कम्पनियों में नौकरियाँ कीं, लेकिन पत्रकारिता में रुचि होने के कारण कहीं भी टिक नहीं पाये। सन 2009 में कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले सबसे पुराने अखबार ‘भारतमित्र’ से पत्रकारीय करियर की शुरुआत की। भारतमित्र में बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करीब छह महीने काम करने के बाद कलकत्ता से ही प्रकाशित हिन्दी दैनिक ‘सन्मार्ग’ में संवाददाता के रूप में काम किया। इसके बाद ‘कलयुग वार्ता’ और फिर ‘सलाम दुनिया’ हिन्दी दैनिक में सेवा दी। पानी, पर्यावरण व जनसरोकारी मुद्दों के प्रति विशेष आग्रह होने के कारण वर्ष 2016 में इण्डिया वाटर पोर्टल (हिन्दी) से जुड गए। इण्डिया वाटर पोर्टल के लिये काम करते हुए प्रभात खबर के गया संस्करण में बतौर सब-एडिटर नई पारी शुरू की।

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