खतरनाक स्तर पर पहुँचता समुद्री जल

Submitted by RuralWater on Sun, 04/10/2016 - 16:21
Printer Friendly, PDF & Email

पृथ्वी के बढ़ते तापमान को लेकर वैज्ञानिकों द्वारा दी गई यह चेतावनी हमें एक बार फिर से विकास के नमूने को लेकर पुनर्विचार का आग्रह कर रही है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि वैज्ञानिक उपलब्धियों और आविष्कारों ने मानव जाति का जीवन सरल बनाया है। जीवन में सुख-सुविधाओं की वृद्धि अब भोग-विलास की परिणति में बदलती जा रही है। इस कारण मनुष्येत्तर प्राणियों व पर्यावरण को इतनी हानि हुई है कि ब्रह्मांड का पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ाने लगा है। समुद्र के जलस्तर में पिछली एक सदी में हुई वृद्धि चिन्ता पैदा करने वाली है। वैज्ञानिकों के एक समूह ने दावा किया है कि मानवजनित कारणों से वायुमण्डल में बढ़ते तापमान के कारण समुद्री जलस्तर बहुत तेज गति से बढ़ा है। इतना पहले 27 शताब्दियों में भी नहीं बढ़ा। वर्ष 1900 से 2000 तक वैश्विक समुद्री जलस्तर 14 सेमी या 5.5 इंच तक बढ़ा है।

यदि ग्लोबल वार्मिंग न होती तो यह वृद्धि आधी से भी कम रहती। पृथ्वी के बढ़ते तापमान को लेकर वैज्ञानिकों द्वारा दी गई यह चेतावनी हमें एक बार फिर से विकास के नमूने को लेकर पुनर्विचार का आग्रह कर रही है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि वैज्ञानिक उपलब्धियों और आविष्कारों ने मानव जाति का जीवन सरल बनाया है।

जीवन में सुख-सुविधाओं की वृद्धि अब भोग-विलास की परिणति में बदलती जा रही है। इस कारण मनुष्येत्तर प्राणियों व पर्यावरण को इतनी हानि हुई है कि ब्रह्मांड का पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ाने लगा है। कालान्तर में जिसके नतीजे समुद्र के किनारे बसी आबादियों के उजड़ने में देखने को मिल सकता है? इस वजह से एक भयावह नई समस्या पर्यावरण शरणार्थियों के रूप में खड़ी होने की आशंका बलवती हो रही है।

जलवायु परिर्वतन के चलते एक नई वैश्विक समस्या आकार ले रही है-पर्यावरण शरणार्थी। बीते कुछ सालों में आई प्राकृतिक आपदाएँ बाढ़, भूस्खलन, बवंडर और कोहरे के प्रकोप के रूप में देखने में आ रही हैं। इन आपदाओं को प्रकृति की स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं माना जा सकता है, क्योंकि इनकी आवृत्तियाँ कम समय में ज्यादा बार देखने में आ रही हैं।

लिहाजा ये आपदाएँ संकेत जरूर रही हैं कि जलवायु परिवर्तन का दायरा लगातार बढ़ रहा है और इसकी चपेट में दुनिया की ज्यादा-से-ज्यादा आबादी आती जा रही है। जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि इस विराट व भयानक संकट के चलते यूरोप, एशिया और अफ्रीका का एक बड़ा भूभाग इंसानों के लिये रहने लायक ही नहीं रह जाएगा। तब लोगों को अपने मूल निवास स्थलों से जिस पैमाने पर विस्थापन या पलायन करना होगा, वह मानव इतिहास में अभूतपूर्व होगा।

इस व्यापक परिवर्तन के चलते खाद्यान्न उत्पादन में भारी कमी आएगी। अकेले एशिया में कृषि को बहाल करने के लिये हर साल पाँच अरब डॉलर का अतिरिक्त खर्च उठाना होगा। बावजूद दुनिया के करोड़ों लोगों को भूख का अभिशाप झेलना होगा। वर्तमान में अकाल के चलते हैती और सूड़ान में कमोबेश ऐसे ही हालात हैं।

जहाँ ऑस्ट्रेलिया,फिलीपाइन्स और श्रीलंका में बाढ़ का कहर ढाया, वहीं ब्राजील में भारी बारिश और भूस्खलन ने तबाही मचाई। अमेरिका में बर्फबारी का यह आलम था कि बर्फ की दस-दस फीट ऊँची परत बीछ गई। मैक्सिको में कोहरे का प्रकोप है तो कैंटानिया में ज्वालामुखी से उठी 100 मीटर ऊँची लपटें तबाही मचा रही हैं।

प्रकृति के अन्धाधुन्ध दोहन के दुष्परिणामस्वरूप पिछले 5 साल के भीतर भयंकर आपदाएँ देखने में आई हैं। श्रीलंका में 3,25,000 लोग बेघर हुए। करीब 50 लोग काल के गाल में समा गए। इस तांडव की भयावहता का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश की थल, जल और वायु सेना के 28,000 जवान राहत कार्य में लगाने पड़े थे।

ऑस्ट्रेलिया में हालात और भी गम्भीर रूप में सामने आये। करीब 40 लाख लोग बेघर हुए। यहाँ के ब्रिस्बेन शहर की ऐसी कोई बस्ती बचाव दलों को देखने में नहीं आई जो जलमग्न न हो। पानी से घिरे लोगों को हेलिकॉप्टर से निकालने के काम में सेना लगी। सौ से ज्यादा लोगों ने जान गँवाई। फिलीपाइन्स में आई जबरदस्त बाढ़ ने लहलहाती फसलों को बर्बाद कर दिया था।

नगर के मध्य और दक्षिणी हिस्से में पूरा बुनियादी ढाँचा ध्वस्त हो गया था। भूस्खलन के कारण करीब 4 लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा है। इस कुदरती तबाही का शुरुआती आकलन 23 लाख डॉलर लगाया गया था। ब्राजील को बाढ़, भूस्खलन और शहरों में मिट्टी धँसने के हालातों का एक साथ सामना करना पड़ा है।

यहाँ मिट्टी धँसने और पहाड़ियों से कीचड़ युक्त पानी के प्रवाह ने 600 से ज्यादा लोगों की जान ली। ब्राजील में प्रकृति के प्रकोप का कहर रियो द जेनेरियो नगर में भी बरपा था। रियो वही नगर है, जिसमें जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर 1994 में पृथ्वी बचाने के लिये पहला अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ था।

मैक्सिको के सेलटिलो शहर में कोहरा इतना घना गहराया था कि सड़कों पर एक हजार से भी ज्यादा वाहन परस्पर टकरा गए थे। इस भीषणतम सड़क हादसे में करीब दो दर्जन लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। कैंटानिया ज्वालामुखी की सौ मीटर ऊँची लपट ने नगर में राख की परत बिछा दी थी और हवा में घुली राख ने लोगों का जीना दुश्वार कर दिया था। इससे पहले अप्रैल 2010 में उत्तरी अटलांटिक समुुद्र के पास स्थित यूरोप के छोटे से देश आइसलैंड में इतना भयंकर ज्वालामुखी फटा था कि यूरोप में 17 हजार उड़ानों को रद्द करना पड़ा था।

आइसलैंड से उठे इस धुएँ ने इंग्लैंड, नीदरलैंड और जर्मनी को अपने घेरे में ले लिया था। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि ज्वालामुखी से फूटा लावा बर्फीली चट्टानों को पिघला देगा। लावा और बर्फीला पानी मिलकर एक ऐसी राख उत्पन्न करेंगे जिससे हवाई जहाजों के चलते इंजन बन्द हो जाएँगे। राख जिस इंसान के फेफड़ों में घुस जाएगी उसकी साँस वहीं थम जाएगी। इसीलिये इस कालखण्ड में यूरोपीय देश के लोंगों को बाहर निकलने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। भारत उत्तराखण्ड में जबरदस्त भूस्खलन और जम्मु-कश्मीर में ऐसी ही त्रासदी झेल चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि 2050 तक दुनिया भर में 25 करोड़ लोगों को अपने मूल निवास स्थलों से पलायन को मजबूर होना पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन की मार मालदीव और प्रशान्त महासागर क्षेत्र के कई द्वीपों के वजूद को पूरी तरह लील लेगा। इन्हीं आशंकाओं के चलते मालदीव की सरकार ने पर्यावरण सरंक्षण की दिशा में महत्त्वपूर्ण पहल करते हुए चर्चा के लिये समुद्र की गहराई में बैठकर औद्योगिक देशों का ध्यान अपनी ओर खींचा था, ताकि ये देश कार्बन उत्सर्जन में जरूरी कटौती कर दुनिया को बचाने के लिये आगे आएँ।

बांग्लादेश भी बर्बादी की कगार पर है। चूँकि यहाँ आबादी का घनत्व बहुत ज्यादा है, इसलिये बांग्लादेश के लोग बड़ी संख्या में इस परिवर्तन की चपेट में आएँगे। यहाँ तबाही का तांडव इतना भयानक होगा कि सामना करना नमुमकिन होगा। भारत की सीमा से लगा बांग्लादेश तीन नदियों के डेल्टा में आबाद है। इसके दुर्भाग्य की वजह भी यही है।

इस देश के ज्यादातर भूखण्ड समुद्र तल से बमुश्किल 20 फीट की ऊँचाई पर आबाद हैं। इसलिये धरती के बढ़ते तापमान के कारण जलस्तर ऊपर उठेगा तो सबसे ज्यादा जलमग्न भूमि बांग्लादेश की होगी। जलस्तर बढ़ने से कृषि का रकबा घटेगा। नतीजतन 2050 तक बांग्लादेश की धान की पैदावार में 10 प्रतिशत और गेहूँ की पैदावार में 30 प्रतिशत तक की कमी आएगी।

इक्कीसवीं सदी के अन्त तक बांग्लादेश का एक चौथाई हिस्सा पानी में डूब जाएगा। वैसे तो मोजांबिक से तवालु और मिस्त्र से वियतनाम के बीच कई देशों में जलवायु परिवर्तन के कारण पालयन होगा, लेकिन सबसे ज्यादा पर्यावरण शरणार्थी बांग्लादेश के होंगे। एक अनुमान के मुताबिक इस देश से दो से तीन करोड़ लोगों को पलायन के लिये मजबूर होना पड़ेगा।

बांग्लादेश पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का अध्ययन करने वाले जेम्स पेंडर का मानना है कि 2080 तक बांग्लादेश के तटीय इलाकों में रहने वाले पाँच से दस करोड़ लोगों को अपना मूल क्षेत्र छोड़ना पड़ सकता है। देश के तटीय इलाकों से ढाका आने वाले लोगों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। अमेरिका की प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ ने बांग्लादेश के पर्यावरण शरणार्थीयों पर एक विशेष रपट में कहा है कि बूढ़ी गंगा किनारे बसे ढाका शहर में हर साल पाँच लाख लोग आते हैं। इनमें से ज्यादातर तटीय और ग्रामीण इलाकों से होते हैं। यह संख्या वाशिंगटन डीसी के बराबर है।

अभी यह स्पष्ट नहीं है कि जलवायु परिवर्तन से हुए पर्यावरण बदलाव के कारण कितने लोग शहरों में आकर बसने को मजबूर हो रहे हैं। लेकिन यह तय है कि विकासशील देशों में गाँवों से शहरों की ओर होने वाले पलायन में जलवायु परिवर्तन प्रमुख कारण होगा।

विस्थापन से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि ढाका में मौसम में बदलाव के चलते विस्थापितों की संख्या लगातार बढ़ रही है। तटीय बाढ़ बार-बार आने लगी है। जमीन में खारापन बढ़ने से चावल की फसलें नष्ट हो रही हैं। यही नहीं,भयंकर तूफानों से गाँव-के-गाँव तबाह हो रहे हैं। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि बांग्लादेश की गिनती जल्दी ही ऐसे देशों में होने लगेगी, जहाँ दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले ज्यादा पर्यावरण शरणार्थी होंगे।

बांग्लादेश की सरकार ने इस समस्या को दुनिया के अन्तरराष्ट्रीय मंच कोपेनहेगन सम्मेलन में उठाया भी था। बांग्लादेश के प्रतिनिधि सुबेर हुसैन चौधरी का कहना था कि इस शिखर सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन से होने वाले आन्तरिक विस्थापन और पलायन पर भी गौर किया जाना चाहिए। इस संकट से तीन करोड़ लोगों के प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। तय है ऐसे विकट हालात में घनी आबादी के घनत्व वाला बांग्लादेश इस संकट से अपने स्थानीय संसाधनों से नहीं निपट सकता। इसलिये समय रहते ऐसे तरीकों की तलाश जरूरी है, जिनके जरिए पर्यावरण शरणार्थियोें को विश्व के अन्य खुले हिस्सों में बसाने के मुकम्मल इन्तजाम हों। तत्काल तो पर्यावरण शरणार्थियों को मान्यता देकर उन्हें अन्तरराष्ट्रीय समस्याग्रस्त समूह का दर्जा दिया जाना जरूरी है ताकि वैश्विक स्तर पर राहत पहुँचाने वाली संस्थाएँ उनकी मदद के लिये तैयार रहें।

हालांकि विश्व स्तर पर धरती के बढ़ते तापमान को लेकर दुनिया जलवायु सम्मेलनों में चिन्तित दिखाई दे रही है, किन्तु परिवर्तन के प्रमुख कारक औद्योगिक व प्रौद्योगिक विकास को नियंत्रित करने में नाकाम रही है। नतीजतन वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा का असर वर्षा चक्र पर साफ दिखाई देने लगा है। यह बदलाव जहाँ एशिया में मुसीबत के रूप में पेश आ रहा है, वहीं अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों में वरदान साबित हो रहा है। इस स्थिति पर अचम्भा करने की जरूरत इसलिये नहीं है, क्योंकि यह सब वैसा ही हो रहा है, जैसा वैज्ञानिक संकेत देते रहे हैं।

इस मानसून में हवा एवं समुद्री पानी के बढ़ते तापमान और उत्तरी ध्रुव व हिमालयी बर्फ के पिघलने की बढ़ती गति ने ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के संकेत भारत समेत पूरी दुनिया में देना शुरू कर दिये हैं। वर्षा चक्र के अनियमित हो जाना इस परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। भारत में तो ये स्थिति इतनी भयावह है कि मौसम विभाग को हर दूसरे दिन वर्षा से सम्बन्धित अपनी भविष्यवाणी खण्डित करनी पड़ रही है। जो खासतौर से खेती-किसानी से जुड़े लोगों की चिन्ता और मानसिक अवसाद का सबब बन रही है। इसके दुष्परिणामस्वरूप लोग बदतर मानसून और फिर बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि की मार से दो-चार हो रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन पर अन्तर-सरकारी पैनल पहले ही चेतावनी दे चुका है कि यदि समय रहते सतर्कता नहीं बरती गई तो इन बदलावों के नतीजतन भारत समेत पूरे एशिया में वर्षा की कमी होगी। जल-चक्र भंग हो जाने के कारण पानी का संकट पैदा होगा। बीमारियाँ विकराल रूप धारण करने लग जाएँगी। खाद्यान्न की उपलब्धता पर प्रतिकूत प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि कृषि उत्पादकता में 15 से 20 प्रतिशत तक की कमी आ जाएगी।

पृथ्वी पर मौजूद 30 प्रतिशत प्रजातियों के विलुप्त हो जाने का खतरा बढ़ जाएगा। हिमालय की बर्फ पिघलने से पहले तो इससे निकलने वाली नदियों में पानी बढ़ेगा, लेकिन फिर पानी की मात्रा घटती चली जाएगी। यह स्थिति भारतीय खेती को तबाह करने वाली साबित होगी, क्योंकि सिंचाई व पेयजल की आपूर्ति करने वाली प्रमुख नदियों का उद्गम स्रोत हिमालय ही है।

दूसरी तरफ बढ़ते वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन भारत के रेगिस्तान और अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों में वरदान भी साबित हो रहे हैं। ब्रिटेन के रीडिंग विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय वायुमण्डलीय अध्ययन केन्द्र के ताजा अध्ययन के मुताबिक पिछले कुछ सालों से अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में नियमित बारिश हो रही है। साहेल अफ्रीका का वह क्षेत्र है, जो दशकों से सूखे की मार झेल रहा है। सातवें और आठवें दशक में इस इलाके और इथोपिया जैसे देशों में अकाल के कारण करीब एक लाख लोगों की मौत हो गई थी।

भूख से मर रहे लोगों की हृदयविदारक तस्वीरें बीबीसी पर प्रसारित होने के बाद पूरी दुनिया का ध्यान इस इलाके पर गया था। उल्लेखनीय है कि सहारा रेगिस्तान के दक्षिणी हिस्से में स्थित साहेल क्षेत्र के देशों में मौरिटेनिया, गाम्बिया, माली, नाइजर, नाइजीरिया, बर्किना, फासो, सेनेगल और कैमरून आदि देश शामिल हैं। अब यहाँ कुछ सालों से अच्छी-खासी बारिश हो रही है।

वैज्ञानिकों को आश्चर्य इस बात पर है कि ये सुखद परिणाम वैश्विक तापमान बढ़ाने के लिये जिम्मेवार ठहराई जा रही ग्रीन हाउस गैसों के कारण आये हैं। शोध के दौरान सुपर कम्प्युटर की मदद से वैज्ञानिकों ने उत्तरी अफ्रीका में बारिश की अलग-अलग दशाओं का अध्ययन किया।

1980 से अब तक हुई बारिश के आँकड़ों के सिलसिलेवार अध्ययन से वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं। अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्राध्यापक रॉन सुटॉन ने कहा है कि गर्मी में बारिश के विभिन्न कारकों, समुद्री तापमान ग्रीन हाउस गैसें और एरोसेल के संयुक्त अध्ययन से यह तस्वीर देखने में आई हैं। कुछ ऐसा ही विचित्र नजारा भारत में राजस्थान और गुजरात के रेगिस्तान में देखने को मिल रहा है।

इस व्यापक बदलाव का असर कृषि पर दिखाई देगा। खाद्यान्न उत्पादन में भारी कमी आएगी। अन्तरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान के मुताबिक अगर ऐसे ही हालात रहे तो एशिया में एक करोड़ दस लाख, अफ्रीका में एक करोड़ और बाकी दुनिया में चालीस लाख बच्चों को भूखा रहना होगा। कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन का मानना है कि यदि धरती के तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो जाती है तो गेहूँ का उत्पादन 70 लाख टन घट सकता है।

बहरहाल दुनिया की आबादी इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो मौसम के बदलाव पर भी अंकुश न लगा पाये तो 2050 तक इस आबादी को खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिये तीन अरब हेक्टेयर अतिरिक्त जमीन की जरूरत होगी, जो दुनिया के विकासशील देशों के कुल रकबे के बराबर है।

संयुक्त राष्ट्र के एक आकलन के मुताबिक 2050 तक दुनिया की आबादी 9 अरब 20 करोड़ हो जाएगी। उभरते जलवायु संकट और बढ़ते पर्यावरण शरणार्थियों के चलते इतनी कृषि लायक भूमि उपलब्ध कराना असम्भव होगा। लेकिन ये तो आनुमान हैं और इनके निराकरण उम्मीदों पर टिके हैं।

लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा