जैव चिकित्सा अपशिष्ट मामले में एनजीटी सख्त

Submitted by RuralWater on Mon, 04/11/2016 - 15:15

भोपाल के बड़े अस्पतालों को नोटिस भेजकर माँगा जवाब



नियमों के उल्लंघन के विरुद्ध दायर याचिका पर एनजीटी में सुनवाई के दौरान सिमिति के सदस्य व अधिवक्ता सचिन के. वर्मा ने समिति द्वारा की गई जाँच की रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मण्डल ने भोपाल के जिन अस्पतालों में जाँच कर नियमों के सौ फीसदी पालन होने का उल्लेख किया है, समिति ने पहले उन्हीं अस्पतालों का निरीक्षण के लिये चुना और पाया कि इन अस्पतालों में भारी अनियमितताएँ हैं। मध्य प्रदेश के निजी व सरकारी अस्पतालों में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी जैव चिकित्सा अपशिष्ट के प्रबन्धन और निगरानी नियम 1998 का लगातार उल्लंघन होने से शहर का पूरा वातावरण दूषित हो रहा है। यह कचरा ठोस और तरल दोनों रूपों में लोगों को संक्रमित कर रहा है। संक्रामक कचरे जैसे - रक्त, पहचान योग्य शरीर के अंगों, अन्य मानव या जानवर के ऊतकों का इस्तेमाल किये गए पट्टियाँ और ड्रेसिंग, त्याग दस्ताने, सुई, उपकरण, अन्य चिकित्सा आपूर्ति आदि है, जिसे नियमों के अनुसार सही विधि से निपटान की आवश्यकता है। अस्पताल, नर्सिंगहोम, ब्लड बैंक, क्लिनिक और पशु चिकित्सकों को यह सुनिश्चित करना होता है कि इस तरह के कचरे मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिये किसी भी प्रतिकूल प्रभाव के बिना नियंत्रित किया जा रहा है।

अस्पतालों और नर्सिंग होम्स की मनमानी से क्षुब्ध होकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण मध्यक्षेत्र ने इसे अपराध माना और संज्ञान में लेते हुए सख्त रुख अपनाया। एनजीटी ने 17 नवम्बर, 2014 को इन अस्पतालों के लिये कई दिशा-निर्देश जारी किये, फिर भी सरकारी व निजी अस्पतालों और नर्सिंगहोम्स द्वारा नियमों का खुलेआम उल्लंघन को रोकने के लिये जैव चिकित्सा अपशिष्ट के प्रबन्धन की निगरानी नियम 1998 के अनुपालन में एनजीटी ने 25 मार्च, 2015 को प्रत्येक जिले में समिति गठन करने के निर्देश राज्य शासन को दिये।

पीठ के निर्देश पर राजधानी भोपाल में भी समिति बनाई गई, जिसमें अधिवक्ता एवं पर्यावरणविद सचिन के. वर्मा के अलावा अधिवक्ता पारूल भदोरिया काउंसिल मप्र प्रदूषण नियंत्रण मण्डल, अधिवक्ता आयुष वाजपेई एवं अधिवक्ता धर्मवीर शर्मा और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मण्डल के कनिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. माजीद कुरैशी सदस्य हैं। समिति के अध्यक्ष पद के लिये पूर्व जिला जज रेणु शर्मा को चुना गया, लेकिन उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद एनजीटी ने सचिन के. वर्मा को नेतृत्व सम्भालने को कहा।

हालांकि सलाहकार समिति में चिकित्सा और स्वास्थ्य, पशुपालन और पशु चिकित्सा विज्ञान, नगर निगम प्रशासन के विशेषज्ञ नहीं हैं। केवल राज्य प्रदूषण नियंत्रण मण्डल के कनिष्ठ वैज्ञानिक को इसमें प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला है।

अधिकरण की मंशा के अनुसार यह समिति अस्पतालों का औचक निरीक्षक कर प्रत्येक माह अधिकरण को अपना रिपोर्ट प्रस्तुत करेेगी। अभी तक समिति ने लगभग 20 अस्पतालों का निरीक्षण किया है और भोपाल के 9 अस्पतालों के निरीक्षण रिपोर्ट 28 मई, 2015 को एनजीटी के सामने प्रस्तुत कर दिये हैं। इन अस्पतालों में केवल जेपी अस्पताल (सरकारी) में ही जैव चिकित्सा अपशिष्ट बीएमडब्ल्यू नियम -1998 का पालन हो रहा है।

यहाँ जैव चिकित्सा अपशिष्ट के लिये कूड़ेदानों का मानक के अनुसार अलग-अलग रंग हैं। यहाँ के नर्सों व अन्य कर्मचारियों को बीएमडब्ल्यू नियम 1998 की पूरी जानकारी है। कायाकल्प योजना के तहत साफ-सफाई का स्तर भी बेहतर है। जबकि पीपुल्स, एलबीएस, भोपाल केयर, सिल्वरलाइन, शुभम अर्थोंपेटिक्स, यशोदा, सिटी एवं नवोदय कैंसर अस्पताल आदि नियमों का खुला उल्लंघन कर रहे हैं।

नियमों के उल्लंघन के विरुद्ध दायर याचिका पर एनजीटी में सुनवाई के दौरान सिमिति के सदस्य व अधिवक्ता सचिन के. वर्मा ने समिति द्वारा की गई जाँच की रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मण्डल ने भोपाल के जिन अस्पतालों में जाँच कर नियमों के सौ फीसदी पालन होने का उल्लेख किया है, समिति ने पहले उन्हीं अस्पतालों का निरीक्षण के लिये चुना और पाया कि इन अस्पतालों में भारी अनियमितताएँ हैं।

श्री वर्मा ने एनजीटी से कहा कि समिति ने अपने निरीक्षण में जयप्रकाश अस्पताल को तो मानक के अनुरुप पाया, वहीं निजी अस्पताल और नर्सिंग होम्स नियमों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाते देखे गए। निजी अस्पताल में कर्मचारियों को बीएमडब्ल्यू नियम 1998 की जानकारी ही नहीं है और न ही जैव चिकित्सा अपशिष्ट के लिये अलग-अलग रंग के कूड़ेदान का उपयोग कर रहे हैं।

जैव चिकित्सा अपशिष्ट अनुसूची द्वितीय के अनुसार भण्डारण, परिवहन, उपचार और निपटान से पहले कंटेनरों व बैग में अलग-अलग लेबल नहीं है। मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रतिकूल प्रभाव को नजरअन्दाज करते हुए जैव चिकित्सा अपशिष्ट इलाज के 48 घंटे की अवधि के बाद भी संग्रहीत रखा गया है। इसके अलावा जैव चिकित्सा अपशिष्ट को अन्य कचरे के साथ मिश्रित कर रखा गया है।

एसटीपी, ईटीपी के बारे में कमेटी ने एनजीटी को बताया कि प्रतिदिन 200 से 300 खून के नमूने जाँच के लिये अस्पतालों में लिये जाते हैं, जिसे जाँच के बाद यूँ ही पानी में बहा दिया जाता है। इसके अलावा ऑपरेशन थियेटर के अपशिष्ट भी नाले में बहा दिया जाता है। निरीक्षण के दौरान अस्पताल में मैकेनाइज्ड लॉन्ड्री और इंसीनरेटर काम नहीं कर रहा था। वैसे भी यहाँ के अस्पतालों में अपना मैकेनाइज्ड लॉन्ड्री है ही नहीं।

भोपाल का एलबीएस अस्पताल तो एक कदम आगे बढ़कर अस्पताल के पिछले हिस्से से चिकित्सा अपशिष्ट सीधे जलस्रोतों में डाल रहा है। इस अस्पताल में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मुख्यद्वार पर भी एक नीले रंग का प्लास्टिक का बड़ा थैला, जिसमें सारे जैव चिकित्सा अपशिष्ट भरकर रखा जाता है, जिसे प्रतिदिन नगर निगम के कर्मचारी दैनिक शुल्क लेकर अन्य कचरे के साथ ही उठा ले जाते हैं। इसी तरह भोपाल केयर अस्पताल सारा तरल अपशिष्ट गैर कानूनी ढंग से जलस्रोतों में डाल देते हैं। जो इंसान, जानवर और पर्यावरण तीनों के लिये खतरा पैदा करता है।

यहाँ सूखे और पुराने खून के धब्बे फर्श और कमरे बेसिनों में पाया गया। अस्पताल में साफ-सफाई भी नहीं है। सिल्वर लाइन अस्पताल अपना सारा कचरा नगर निगम के सीवेज में डाल रहा है। शुभम ऑर्थोपेडिक्स ने तो समिति के निरीक्षण के दौरान एक भी रजिस्टर नहीं दिखाया। यहाँ ऑपरेशन थियेटर का अपशिष्ट और सारा कचरा बगैर ट्रीट किये सीधे पानी में बहा दिया जाता है। लगभग सभी अस्पतालों में कमरे की साइज के हिसाब से मरीजों के लिये बिस्तरों की संख्या अधिक हैं।

समिति की रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए न्यायमूर्ति सोनम फिन्टसो वांगई और पर्यावरण विशेषज्ञ सत्यभान सिंह ने भोपाल के एम्स, पीपुल्स और जेके अस्पताल के साथ ही अन्य अस्पतालों को नोटिस भेजकर जवाब माँगा है। हालांकि एम्स की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ सिंह ने अपना पक्ष रखा।

श्री वर्मा ने एनजीटी को कई जिलों में सलाहकार समिति न बनाये जाने की भी जानकारी दी। जिस पर न्यायपीठ ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिये कि प्रत्येक जिले में अस्पतालों के निरीक्षण के लिये शीघ्र सलाहकार समिति बनाई जाये। न्यायपीठ ने कहा कि अस्पतालों के अपशिष्टों के निपटान के लिये समितियों का अस्तित्व में होना आवश्यक है। मामले की अगली सुनवाई 26 अप्रैल को होनी है।

समिति के सदस्य अधिवक्ता श्री वर्मा ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए बताया कि मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मण्डल ने भोपाल में लगभग 160 अस्पताल होने का उल्लेख किया हैं, जबकि अस्पतालों की संख्या इससे कहीं अधिक हैं। राजधानी के प्राय: हर गली में एक नर्सिंग होम और अस्पताल हैं और यह सभी बीएमडब्ल्यू नियम 1998 का उल्लंघन कर रहे हैं। श्री वर्मा ने कहा कि बड़ा होने के बावजूद भोपाल एम्स की हालत बदतर है।

यहाँ साफ-सफाई और कूड़ेदान के सम्बन्ध में किसी भी नियम का पालन नहीं हो रहा है। यहाँ तक कि जवाबदारी भी नहीं है। उन्होंने कहा कि जहाँ तक मैकेनाइज्ड लॉन्ड्री का सवाल है, तो एक स्वीकार्य गुणवत्ता तो अस्पताल के कपड़े धोने में होने ही चाहिए, जिससे रोगी एवं उनके परिजन सन्तुष्ट हों। क्योंकि अस्पतालों की चादरों में खून एवं अन्य दाग-धब्बे अधिक मात्रा में होते हैं।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण के सख्ती के बाद एनएचएम प्रदेश के सभी जिला अस्पतालों में निजी भागीदारी से मैकेनइज्ड लॉन्ड्री बनाने की कवायद शुरू कर दी है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने वर्ष 2016-17 के प्लान में इसे शामिल के लिये मध्य प्रदेश एनएचएम की ओर से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को प्रस्ताव भेजा है। मार्च में इसकी कार्ययोजना तैयार हो जाएगी।

न्यायपीठ का साफ निर्देश हैं कि अस्पतालों के कपड़े मैकेनाइज्ड लॉन्ड्री में ही धोये जाये। प्रदेश के किसी भी अस्पतालों में मैकेनाइज्ड लॉन्ड्री नहीं है। भोपाल के जेपी अस्पताल प्रबन्धन ने कपड़ों की मैकेनाइज्ड धुलाई के लिये ठेके पर दिया है, जो अस्पताल परिसर से बाहर है। अब यह व्यवस्था की जा रही है कि लॉन्ड्री अस्पताल परिसर में ही हो। अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या के लिहाज से मैकेनाइज्ड लॉन्ड्री बनाई जाएगी।

उल्लेखनीय है कि अस्पताल से निकलने वाले चादर, कम्बल, ओटी ड्रेस व मरीजों के कपड़ों में बैक्टीरिया होने की आशंका ज्यादा रहती है। आम कपड़ों की तरह धुलाई में इनसे निकलने वाला वेस्ट पीने के पानी के स्रोतों में मिलता है। यह मानव शरीर के लिये नुकसानदायक है।

बहरहाल यह हाल मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के अस्पतालों का है। प्रदेश के अन्य जिलों में अस्पतालों की हालत क्या होगी, इसका अन्दाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

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