पानी के विवाद में घिरा आइपीएल

Submitted by Hindi on Thu, 04/14/2016 - 13:34
Source
दैनिक जागरण, 14 अप्रैल, 2016

वैसे तो आइपीएल का विवादों से पुराना नाता है, लेकिन इस बार यह कुछ अलग कारणों से है। एक ऐसे समय में जबकि महाराष्ट्र के कई जिले भयंकर सूखे का सामना कर रहे हैं तो वहाँ पर आइपीएल मैचों के दौरान होने वाले पानी की बर्बादी को रोकने के लिये हाईकोर्ट को आगे आना पड़ा और पूर्व निर्धारित 20 में से 13 मैचों को बाहर कराने का निर्देश देना पड़ा। जाहिर है कि हमें अपने मानदंडों पर नए सिरे से विचार करना चाहिए ताकि ऐसी किसी स्थिति से बचा जा सके…

इंडियन प्रीमियर लीग यानी आइपीएल शुरू हो चुकी है। ये इस लीग का नौवां संस्करण है। आइपीएल को आमतौर पर विवादों की लीग के तौर जाना जाने लगा है। हर साल आइपीएल कोई नया विवाद लेकर आता है। लिहाजा ये साल भी अलग नहीं है। आइपीएल के नौवें सत्र में पानी और सूखे का मुद्दा छाया हुआ है। बांबे हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल के बाद महाराष्ट्र में होने वाले सभी आइपीएल मैचों को बाहर कराने का आदेश दिया है। जब पूरा देश ही सूखे से जूझ रहा हो तो ऐसे में ऐसी लीग का क्या औचित्य, जहाँ एक मैच में हजारों लीटर पानी की बर्बादी हो। मैदान और पिचों को दुरुस्त करने पर बेहिसाब पानी बहा दिया जाए। महाराष्ट्र जबरदस्त सूखे की चपेट में है। वहाँ 21 जिले भयंकर सूखे का सामना कर रहे हैं। लोग पानी की एक-एक बूँद के लिये तरस रहे हैं। ऐसे में आइपीएल का आयोजन सवाल खड़े करता है। इन जगहों पर पानी के संकट का आलम ये हैं कि बड़े जलाशय सूख चुके हैं या जलस्तर काफी कम हो गया है। जल संकट की त्राहि-त्राहि है। केन्द्र सरकार को ट्रेनों के जरिए पानी भरकर भेजना पड़ रहा है। वह भी वहाँ की आबादी और पानी की जरूरतों के मद्देनजर ऊँट के मुँह में जीरे सरीखा है। आइपीएल में पानी का मसला एक जनहित याचिका के जरिये जब हाईकोर्ट में आया तो पूरे देश में ये चर्चा का विषय बन गया। बहस शुरू हो गई कि बीसीसीआइ को महाराष्ट्र में आइपीएल का आयोजन कराना चाहिए या नहीं। ये वास्तव में बहुत हतप्रभ करने वाली बात है कि जब सूबा सूखे और पानी के घनघोर संकट की चपेट में है, तब वहाँ पानी की बर्बादी कर ऐसे आयोजन कराने का क्या औचित्य। यूँ भी आइपीएल को तमाशा क्रिकेट के रूप में ज्यादा जाना जाता है।

महाराष्ट्र में आइपीएल के मैचों का आयोजन तीन शहरों मुंबई, पुणे और नागपुर में हो रहा था। तीनों जगहों पर डेढ़ महीनों के दौरान कुल 20 मैच होने की बात थी। अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद केवल सात मैच ही इन केन्द्रों पर 30 अप्रैल तक हो सकेंगे। उसके बाद होने वाले 13 मैच बाहर चले जाएँगे। इसमें फाइनल मैच भी शामिल है। जब आइपीएल मैचों का कार्यक्रम फाइनल किया जा रहा था, तभी ये खबरें आनी शुरू हो चुकी थीं कि महाराष्ट्र समेत कई राज्य सूखे के घोर संकट की ओर बढ़ रहे हैं। इसके बाद भी बीसीसीआइ ने इस पहलू की ओर ध्यान नहीं दिया और न ही राज्यों की सरकारी मशीनरी चेती। बीसीसीआइ के रुख से लगा कि उसे राज्यों के संकट की बजाय अपने हितों की चिन्ता ज्यादा है। सूखे की बजाय उसे आइपीएल के जरिए करोड़ों रुपये का व्यवसाय ज्यादा नजर आ रहा है। बेहतर होता कि बीसीसीआइ पहले ही पहल करके इस हालत पर संज्ञान ले लेती।

अगर ऐसा होता तो एक अलग संदेश जाता। इससे झलकता कि खेल की ये धनी संस्था अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति भी सचेत है। ये काम वो तब भी कर सकती थी जब बांबे हाईकोर्ट में ये मामला पहुँचा, लेकिन इसके उलट बीसीसीआइ का प्रयास यही रहा कि किस तरह मैचों को महाराष्ट्र में ही कराया जाए। इसके लिये उसने तमाम दलीलें दीं और हाईकोर्ट इशारे करता रहा कि बेहतर हो कि मैच अन्यत्र स्थानों पर कराने पर विचार किया जाए। हाईकोर्ट का रुख भाँप कर राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने तुरन्त इन मैचों से हाथ खींच लिया। उन्होंने कहा कि अगर पानी संकट के मद्देनजर मैच राज्य से बाहर जाते हैं तो जाएं। हालाँकि तब भी बीसीसीआई का रुख हतप्रभ करने वाला ही था। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के सचिव अनुराग ठाकुर, जो भारतीय जनता पार्टी के सांसद भी हैं, ने कहा कि महाराष्ट्र तय कर ले कि उसे सौ करोड़ रुपये चाहिए या पानी। उनका आशय शायद ये रहा होगा कि अगर मैच महाराष्ट्र से बाहर गए तो राज्य को सौ करोड़ का नुकसान होगा, लेकिन जिस तरह ये बात कही गई उससे बीसीसीआइ का संवेदनहीन पहलू ज्यादा सामने आया। उससे भी ज्यादा सामने आया बीसीसीआइ के घोर व्यावसायिक सरोकार का।

एक ऐसा प्रदेश, जहाँ हालात दिक्कत भरे हों, जहाँ पानी की एक-एक बूँद वाकई अमूल्य और जीवनदायिनी हो, वहाँ कोई कैसे इसका मोल करोड़ रुपये से लगा सकता है। हालाँकि बाद में बीसीसीआइ ने बात को संभालते हुए हाईकोर्ट में दलील दी कि वो सीवर के पानी को शोधित कर उसका इस्तेमाल करेंगे। जहाँ तक देश के संसाधनों की बात है तो आइपीएल पर पहले भी व्यापक पैमाने पर बिजली की फिजूलखर्ची के आरोप लगते रहे हैं। हमारे देश में बिजली का क्या हाल है, इससे हर कोई अवगत है। ऐसे में लीग के करीब 60 मैचों का फ्लड लाइट्स में होना किसी लग्जरी जैसा लगता है। जिस देश के लाखों गाँव अब भी बिजली के लिये तरसते हैं और शहरों में घंटों बिजली की कटौती होती है, वहाँ आइपीएल को भारी पैमाने पर अबाध बिजली सप्लाई भी एक सवाल की तरह है। खासकर तब और ज्यादा जब गर्मियों में बिजली संकट पूरे देश में जबरदस्त हो जाता है। बड़ी अजीब बात है कि एक ओर बीसीसीआइ सुप्रीम कोर्ट में कठघरे में खड़ा है और उस पर पारदर्शिता और संरचना में बदलाव के लिये दबाव है, तो दूसरी ओर बांबे हाईकोर्ट में उसका विशुद्ध कारोबारी चरित्र सामने आ रहा है।

आइपीएल का हर सत्र एक बड़ा विवाद लेकर आता रहा है। आइपीएल-6 में फिक्सिंग कांड का असर भारतीय क्रिकेट में अब तक है। इसी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जाँच के लिये दो आयोग बनाए। हरियाणा हाईकोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस मुकुल मुद्गल की अगुवाई में पहले फिक्सिंग और सट्टेबाजी की जाँच के लिये जाँच आयोग बना। उसके बाद बीसीसीआइ के कामकाज में सुधार और संरचना में पारदर्शिता के लिये सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अगुवाई में दूसरा आयोग गठित किया गया। लोढ़ा आयोग की सिफारिशों के आधार पर ही चेन्नई और राजस्थान फ्रेंचाइजी पर निलंबन की कार्रवाई हुई। अब उन्हीं की सिफारिशों के आधार पर बीसीसीआइ को सुप्रीम कोर्ट के सामने ये जबाव देना बारी पड़ रहा है कि अपनी प्रक्रिया में सुधार के लिये वो कोई कदम क्यों नहीं उठा रहा?

अभी तो केवल बांबे हाईकोर्ट महाराष्ट्र में आइपीएल मैचों को लेकर हरकत में आया है, लेकिन सूखे के समोवेश ऐसे ही हालात देश के करीब दस राज्यों में हैं, जिसमें कई वो राज्य भी हैं जहाँ आइपीएल के मैच होने हैं, इसमें कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, ओडिशा शामिल हैं। छत्तीसगढ़ में भी आवाज उठने लगी है कि रायपुर में मैच नहीं कराया जाना चाहिए। सबसे आखिर में सवाल राज्य की सरकारी मशीनरियों पर। मैचों को अंतिम तौर पर हरी झंडी देने का काम जिला प्रशासन करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि उन्होंने किसा आधार पर आइपीएल के आयोजन की अनुमति अपने यहाँ दी। अब जबकि आइपीएल मैचों की तैयारी पूरी हो चुकी है। टिकट बिक चुके हैं। होटल बुक हो चुके हैं। ऐसे में मैचों को रद करना न तो आसान है और न ही उचित। लगता है कि बड़े आयोजनों को लेकर हमारी नीतियों में पुनर्विचार की जरूरत है और मानदंडों में बदलाव की भी, जिसके आधार पर उन्हें हरी झंडी दे दी जाती है।

(लेखक खेल मामलों के जानकार हैं)

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