मध्य प्रदेश के भूजल संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव और उनका समाधान

Submitted by RuralWater on Fri, 04/15/2016 - 12:05
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.मध्य प्रदेश राज्य, भारत के मध्य भाग में बसा प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से समृद्ध प्रदेश है। इस प्रदेश की औसत बरसात 1160 मिलीमीटर है। उसके पूर्वी भाग में अधिक तो पश्चिमी भाग में अपेक्षाकृत कम पानी बरसता है। इसी प्रकार प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में दैनिक औसत तापमान में भी अन्तर है। बुन्देलखण्ड सहित प्रदेश का उत्तरी भाग अपेक्षाकृत अधिक गर्म है। मध्य प्रदेश से अनेक नदियाँ निकलती हैं। उनके कैचमेंट मध्य प्रदेश में भले ही स्थित हों पर शीघ्र ही उनका पानी अन्य प्रदेशों में पहुँच जाता है।

मध्य प्रदेश में रन-आफ के रूप में 81,719 घन हेक्टेयर मीटर और भूजल भण्डारों के रूप में 37.19 बिलियन घन हेक्टेयर मीटर पानी उपलब्ध है। मध्य प्रदेश, कृषि सांख्यिकी (2009-10) के अनुसार सतही और भूजल स्रोतों से शुद्ध सिंचित इलाका क्रमशः 21.37 और 43.69 लाख हेक्टेयर है।

मध्य प्रदेश के एनवायरनमेंटल प्लानिंग एंड कोऑर्डिनेशन (इप्को) संगठन ने यूएनडीपी के सहयोग से जलवायु परिवर्तन पर रिपोर्ट तैयार कराई है। इस रिपोर्ट और विशेषज्ञों के अनुमानों के अनुसार इक्कीसवीं सदी के अन्त तक प्रदेश में मुख्यतः दो बदलाव होंगे। पहला बदलाव औसत दैनिक न्यूनतम और औसत दैनिक अधिकतम तापमान में और दूसरा बदलाव बरसात की मात्रा और उसके चरित्र में होगा। सम्भावित बदलावों की संक्षेपिका को निम्न तालिका में दर्शाया गया है-

 

जलवायु में अनुमानित बदलाव

2021-2050

2071-2100

दैनिक अनुमानित अधिकतम तापमान

1.8 से 2.0 डिग्री सेंटीग्रेड तक अनुमानित वृद्धि सम्भावित

3.4 से 4.4 डिग्री सेंटीग्रेड तक वृद्धि सम्भावित

दैनिक अनुमानित न्यूनतम तापमान

2.0 से 2.4 डिग्री सेंटीग्रेड तक वृद्धि सम्भावित

4.4 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक वृद्धि सम्भावित

मानसूनी बरसात

मौजूदा मानसूनी बरसात में लगभग 1.25 गुना वृद्धि। मुरैना, शिवपुरी, ग्वालियर और भिंड की बरसात में कोई बदलाव नहीं। होशंगाबाद के पूर्वी भाग, बैतूल के उत्तरी भाग, उत्तर पूर्वी भाग और सीहोर के दक्षिणी भाग में वृद्धि। वर्षा दिवसों में कमी।

मौजूदा मानसूनी बरसात में लगभग 1.35 गुना वृद्धि। दमोह, मंडला और होशंगाबाद के अधिकांश भाग, बालाघाट के उत्तरी भाग में मौजूदा मानसूनी बरसात में लगभग 1.45 गुना वृद्धि। प्रदेश के सुदूर उत्तर और पश्चिमी भाग में अपेक्षाकृत कम वृद्धि।

शीतकालीन वर्षा

शीतकालीन वर्षा में कमी।

प्रदेश के दक्षिण-पश्चिमी तथा मध्य भाग में 1.45 से 1.85 गुना वृद्धि।

 

भूजल भण्डारों के पुनर्भरण और क्षमता पर प्रभाव


1. वर्षा दिवसों की कमी के कारण बरसात का अधिकांश पानी बह जाएगा। वर्षा दिवसों की कमी के कारण बरसात में बहुत कम भूजल रीचार्ज होगा। रीचार्ज कम होने तथा दोहन के लगातार बढ़ने के कारण संकटग्रस्त तथा अतिदोहित ब्लाकों में स्थिति गम्भीर होगी। सुरक्षित विकासखण्डों की संख्या तेजी के कम होगी।

2. रीचार्ज घटने के कारण एक्वीफर कम भरेंगे। उनके कम भरने के कारण कुओं और नलकूपों की पानी देने की क्षमता घटेगी। वे, पहले की तुलना में जल्दी सूखेंगे। उनके समय पूर्व या जल्दी सूखने के कारण, पेयजल, खेती और अन्य समान सेवाएँ प्रभावित होंगी। इसका सबसे अधिक असर कैचमेंट और वर्षा आश्रित इलाकों पर पड़ेगा। उन क्षेत्रों में समस्या और अधिक गम्भीर होगी। भूजल की कमी के कारण कुछ इलाकों से पलायन हो सकता है।

3. तापमान वृद्धि के कारण वाष्पीकरण बढ़ेगा। वाष्पीकरण के बढ़ने के कारण धरती की नमी घटेगी और वनस्पतियों की माँग बढ़ेगी। माँग बढ़ने के कारण सिंचाई आवृत्ति बढ़ेगी। आवृत्ति बढ़ने के कारण भूजल दोहन बढ़ेगा। भूजल दोहन बढ़ने के कारण, भूजल संकट बढ़ेगा। अतिदोहन की स्थितियाँ पनपेंगीं। मौजूदा व्यवस्थाओं पर अतिरिक्त भार बढ़ेगा।

4. रीचार्ज घटने के कारण नदियों के अविरल प्रवाह में कमी आएगी। छोटी नदियाँ मौसमी बन कर रह जाएँगी। पानी की मात्रा कम होने से प्रदूषण बढ़ेगा और निर्मलता कम होगी। रीचार्ज की कमी के कारण नदियों का अधःस्थली प्रवाह कम होगा। अधःस्थली प्रवाह में कमी आने के कारण उथली परतों में रसायनों का जमाव बढ़ेगा। भूमि प्रदूषण बढ़ेगा। नदी की भूमिका, प्रतिकूल तरीके से, प्रभावित होगी।

5. नदियाँ जल्दी सूखेंगीं। उनकी प्राकृतिक भूमिका प्रभावित होगी। प्रदूषण का स्तर बढ़ेगा। अनेक नदियाँ गटर या गन्दे नाले में परिवर्तित होंगी।
6. वाष्पीकरण बढ़ने से वन भूमि में नमी घटेगी। नदी-नाले जल्दी सूखेंगे। पानी की कमी बढ़ेगी। वनों की कतिपय प्रजातियों पर नमी तथा पानी की कमी के कारण संकट बढ़ेगा। वन नष्ट होंगे। बायोडायवर्सिटी पर खतरा बढ़ेगा।

7. जंगली जीव-जन्तुओं के लिये पानी की कमी अनुभव होगी। वनों से सटे इलाकों में उनके प्रकोप बढ़ेंगे। जानमाल और पशुधन की हानि बढ़ेगी। मुआवजा, सरकार का व्यय बढ़ाएगा।

8. अन्य स्थानीय प्रभाव।

 

क्या करना चाहिए


जलवायु परिवर्तन के सम्भावित खतरों और भूजल भण्डारों पर वाष्पीकरण के न्यूनतम असर को ध्यान में रख नीतिगत निर्णय लिये जाना चाहिए। नीतिगत निर्णयों के आधार पर, क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त संरचनाओं के निर्माण के लिये रोडमैप तथा बजट प्रावधान करना चाहिए। कुछ सुझाव निम्नानुसार हैं-

1. भूजल रीचार्ज हेतु रन-आफ का आरक्षण ताकि भूजलस्तर की गिरावट को निरापद सीमा में रखा जा सके। इससे कुओं और नलकूपों को सूखने से मुक्त रखा जा सकेगा। फिलहाल यह व्यवस्था नहीं है। इसे जलनीति में सम्मिलित किया जाना चाहिए।

2. कैचमेंट और वर्षा आश्रित क्षेत्रों में भूजल और पानी की गम्भीर कमी है। इस कमी को दूर करने के लिये कैचमेंट और वर्षा आश्रित क्षेत्रों में सतही जल और भूजल संचय की एक दूसरे पर निर्भर व्यवस्था कायम की जाना चाहिए। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य, हर इलाके में पानी की जीवन रक्षक व्यवस्था कायम करना होना चाहिए।

3. भूजल रीचार्ज प्रयासों को, पूरे प्रदेश में, लागू करना चाहिए। भूजल दोहन को लगभग 20 से 25 प्रतिशत के स्तर पर लाने से पानी की समस्या दूर होगी।

4. नदियों की अविरलता और निर्मलता बहाली के लिये भूजल के योगदान को सुनिश्चित कराना चाहिए। भूजल का योगदान ही नदी की अविरलता और निर्मलता को सुनिश्चित करता है।
5. भूजल गुणवत्ता सुधार हेतु सघन प्रयास ताकि फ्लोराइड, नाईट्रेट जैसे हानिकारक रसायन सुरक्षित सीमा में रहें। जीवधारियों के स्वास्थ्य के लिये यह प्रयास आवयक है।

6. सूखते कुओं और नलकूपों की क्षमता बहाली के लिये सघन प्रयास किये जाने चाहिए। भविष्य में भूजल पर आधारित योजनाओं में जल क्षमता बहाली प्रयासों को अनिवार्य रूप से जोड़ा जाये।

7. सिंचाई योजनाओं के कमांड में सतही जल के साथ-साथ भूजल का उपयोग अनिवार्य बनाया जाये। इस बारे में नीतिगत निर्णय लिया जाये।

8. जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भूजल की भूमिका का निर्धारण किया जाये। संरचनाओं की डिजाइन इत्यादि के लिये अध्ययन प्रारम्भ किये जाएँ।9. भूजल संगठनों को अनुसन्धान, डाटा कलेक्शन के साथ-साथ भूजल चुनौतियों के निराकरण हेतु नोडल एजेंसी घोषित कर, उन्हें जिम्मेदारी सौंपी जाये।

10. संविधान और देश की जलनीति, 2012 में भूजल को उचित महत्त्व दिलाना चाहिए। वर्तमान में संविधान में भूजल का उल्लेख तक नहीं है।

11. अन्य स्थानीय प्रयास।

 

सन्दर्भ


Climate change in Madhya Pradesh: A Compendium of Expert views –II, EPCO, GOMP

MADHYA PRADESH STATE ACTION PLAN ON CLIMATE CHANGE, EPCO, 2012

ईमेल : kgvyas_jbp@rediffmail.com

 

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About the author

.कृष्ण गोपाल व्यास जन्म – 1 मार्च 1940 होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)। शिक्षा – एम.एससी.

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