मिट्टी-पानी और पर्यावरण बचाने का जतन

Submitted by RuralWater on Sun, 04/17/2016 - 09:52

 

.दयाबाई का नाम बरसों से सुन रहा था, लेकिन मुलाकात हाल ही में हुई। मामूली सी लगनी वाली इस वयोवृद्ध महिला से मिला तो उसे देखता ही रह गया। सूती गुलाबी साड़ी, पोलका, गले में चाँदी की हंसली, रंग-बिरंगी गुरियों की माला। किसी सामाजिक कार्यकर्ता की ऐसी वेश-भूषा शायद ही मैंने कभी इससे पहले देखी हो।

नाम के अनुरूप ही 75 वर्षीय दयाबाई का पूरा व्यक्तित्व ही दया और करुणा से भरा है। रचनात्मक कामों के साथ वे अन्याय से लड़ने के लिये हमेशा तत्पर रहती हैं। बिना रासायनिक की जैविक खेती, पानी बचाने और वृक्षारोपण, पर्यावरण के प्रति जागरुकता जगाने, मूर्तिकला, पशुपालन, नुक्कड़ नाटक कर अलग जीवनशैली जीती हैं। और जनता में चेतना जगाने की कोशिश करती हैं।

4 मार्च को मैं अपने एक केरल के मित्र शुबू राज के साथ दयाबाई से मिलने उनके गाँव गया था। नरसिंहपुर से बस से हर्रई और वहाँ से फिर बस बदलकर बटकाखापा जाने वाली सड़क पर बारूल गाँव पहुँचे। यह पूरा रास्ता पहाड़ और जंगल का बहुत ही मनोरम था। वे गाँव से दूर एक छोटी पहाड़ी की तलहटी में अपने खेत में ही रहती हैं। इसी पहाड़ पर उनके प्रयास से एक बाँध बना है, जिससे आसपास के प्यासे खेतों को पानी मिलता है।

दयाबाई हमें एक मिट्टी और बाँस से बने घर में ले गईं। जहाँ उन्हें मिले हुए सम्मान की ट्राफी रखी हुई थी। इस बाँस, मिट्टी से बने सुन्दर घर की दीवार संविधान की प्रस्तावना अंकित थी।

उनके साथ दो कुत्ते थे जिनसे उन्होंने हमारा परिचय कराया। एक का नाम चंदू और दूसरे का नाम आशुतोष था। चंदू ने हमसे नमस्ते की। कुछ देर बाद एक बिल्ली आई जिसका नाम गोरी था।

वे बताती हैं कि वे पहले चर्च से जुड़ी थी। मुम्बई से सामाजिक कार्य (एमएसडब्ल्यू) की पढ़ाई की है। कानून की डिग्री भी है। उन्होंने बताया कि वे पहली बार सामाजिक कार्य की पढ़ाई के दौरान मध्य प्रदेश आईं और फिर यहीं की होकर रह गई। वे चर्च की सीमाओं से आगे काम करना चाहती थीं इसलिये वे सीधे गोंड आदिवासियों के बीच काम करने लगीं। और उन्होंने अपने आपको डी-क्लास कर लिया। आदिवासियों की तरह रहीं, उन्हीं की तरह खाना खाना। उनके ही घर में रहीं और उनकी ही तरह मजदूरी भी कीं।

दयाबाई पहले 20 साल तक यहाँ के एक गाँव में रहीं और बाद में बारूल में 4 एकड़ जमीन खरीदी और वहीं घर बनाकर रहने लगीं। लेकिन इलाके की समस्याओं व देश-दुनिया के छोटे-बड़े आन्दोलन से जुड़ी रहती हैं। नर्मदा बचाओ से लेकर केरल के भूमि आन्दोलन तक भागीदार रही हैं। परमाणु बिजली से लेकर पर्यावरण आन्दोलन में शिरकत रही हैं।

पलास, इसे टेसू भी कहते हैं, फूल मोह रहे हैं। दयाबाई के खेत में भी हैं। अचार, सन्तरा, अमरूद, बेर जैसे फलदार पेड़ हैं तो सब्जियों की बहुतायत है। मसूर और चना की कटाई हो रही है। गोबर गैस भी है, लेकिन उसका इस्तेमाल कम होता है। चूल्हे में लकड़ियों से खाना पकता है।

दोपहर भोजन का समय हो गया है। मैंने उनके हरे-भरे खेत पर नजर डाली। सन्तरा और नींबू से लदे थे। बेर पकी थी। चना और मसूर खेत में थे। मसूर की कटाई चल रही थी। तालाब में पानी भरा था। और सामने की पहाड़ी के पास से स्टापडेम से नहर से पानी बह रहा है। मौसम में ठंडक है।

न यहाँ बिजली है, न पंखा। न टेलीविजन की बकझक है और न कोई और तामझाम। सौर ऊर्जा से बत्तियाँ जलती हैं। दयाबाई ने बताया कि वे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के किसी भी सामान का उपयोग नहीं करतीं। साबुन भी बिना डिटरजेंट का इस्तेमाल करती हैं। उनकी जिन्दगी सादगी से भरी हुई है।

.वे पशुप्रेमी हैं। वे उनसे बातें करती हैं, उनके साथ सुख-दुख बाँटती हैं। वे उनके सहारा भी हैं। चंदू और आशुतोष कुत्ते के पहले उनके पास एथोस नाम का कुत्ता था, वह नहीं रहा, उसकी यादों को संजोए चंदू और आशुतोष पर प्यार लुटाती हैं।

बिना रासायनिक खेती करती हैं। वे कहती हैं यहाँ की मिट्टी पथरीली है। नीचे चट्टान-ही-चट्टान हैं। हमने मेहनत कर पानी-मिट्टी का संरक्षण किया तब जाकर अब फसलें हो रही हैं। फसलें अच्छी होने के लिये मिट्टी की सेहत बहुत जरूरी है। हमें मिट्टी से खाना मिलता है, उसे भी हमें जैव खाद के रूप भोजन देना है। वे कहती हैं जो हमें व जानवरों को नहीं चाहिए वह मिट्टी को जैव खाद के रूप में वापस दे देते हैं। केंचुआ खाद इस्तेमाल करती हैं, वह बिना स्वार्थ के पूरे समय जमीन को बखरते रहता है। पेड़ लगाएँ हैं और पानी संरक्षण के उपाय भी किये हैं। खेत में कोदो, कुटकी, मड़िया, मक्का लगाती हैं। कई तरह की दाल उगाती हैं जिनसे खेत को नाइट्रोजन मिलती है। सब्जियों में सेम (बल्लर), गोभी, चुकन्दर, गाजर, कुम्हड़ा, लौकी और कद्दू, टमाटर लगाती हैं। मैंने बरसों बाद कांच के कंचों की तरह छोटे टमाटर देखे जिसकी चटनी बहुत स्वादिष्ट लगती है।

उनका जीवन सादगीपूर्ण है। सार्थक और उद्देश्यपूर्ण है। वे साधारण महिला हैं जिन्होंने एक असाधारण जीवन का रास्ता चुना है। वे एक रोशनी हैं उन सबके लिये जो कुछ करना चाहते हैं। जो बदलाव चाहते हैं। उन्होंने उम्मीदों के बीज बोएँ हैं। अंधेरे में रोशनी दिखाई है। ऐसा नहीं है कि उन्होंने सभी समस्याओं के हल खोज लिये हैं। लेकिन उस दिशा में प्रयास जरूर किये हैं।

वे गाँधी को उद्धृत करती हुई कहती हैं कि धरती हर व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकती है, लेकिन किसी एक व्यक्ति के लालच की नहीं। इसलिये हमें प्राकृतिक संसाधनों के शोषण की नहीं बल्कि मिट्टी, पानी और पर्यावरण का संरक्षण करना है।
 

 

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बाबा मायारामबाबा मायारामबाबा मायाराम लोकनीति नेटवर्क के सदस्य हैं। वे स्वतंत्र पत्रकार व शोधकर्ता हैं। उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर से 1989 में बी.ए. स्नातक और वर्ष 2000 में एल.एल.बी.

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