नदी जोड़ो परियोजना फिर चढ़ेगी परवान

Submitted by RuralWater on Mon, 04/18/2016 - 15:51
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राजस्थान पत्रिका, 18 अप्रैल 2016

एक बार फिर आदिवासियों ने अपने श्रम की ताकत और कमाल से सबको अचम्भित कर दिया। पानी के लिये पसीना बहाते इन लोगों का आत्मविश्वास देखते ही बनता था। इनकी आँखों में हरी–भरी पहाड़ी का सपना झिलमिला रहा था। जूनून ऐसा कि गैंती–फावड़े भी खुद अपने घरों से लेकर आये। औरतें भी कहाँ पीछे रहने वाली थी। वे भी तगारी उठाए चल पड़ीं साथ–साथ। यह नजारा मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य झाबुआ अंचल में झाबुआ शहर के पास हाथीपावा पहाड़ी पर दिखाई दिया। यहाँ आदिवासियों ने हलमा किया। हलमा यानी एक दूसरे के साथ मिलकर सामूहिक श्रमदान करना।नदी जोड़ो योजना के जन्मदाता के तौर पर आमतौर पर एनडीए सरकार को कहा जाता है। लेकिन वास्तव में नदियों को जोड़ने की परिकल्पना साढ़े चार दशक पूर्व 1971 में तत्कालीन केन्द्रीय सिंचाईमंत्री के. एल. राव ने की थी। तब उन्होंने एक नहर के माध्यम से गंगा और कावेरी को जोड़ने का प्रस्ताव कैबिनेट में रखा था। इसके बाद 1980 में राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी ने इंटरलिंकिंग ऑफ रीवर्स प्लान यानी नदियों को आपस में जोड़ने का खाका तैयार किया था। लेकिन तबकी सरकार ने इस योजना को विवादों में फँसने के डर से ठंडे बस्ते में डाल दिया था।केन्द्र सरकार की महत्त्वपूर्ण नदी जोड़ो परियोजना एक बार फिर से परवान चढ़ने की तैयारी में है। केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने इस महती परियोजना के सम्बन्ध में एक नई कार्य योजना का खाका तैयार किया है। इस समय जब देश भर में तेरह राज्य सूखे की चपेट में हैं, ऐसे हालात में जल संसाधन मंत्रालय की यह नई कार्य योजना वास्तव में उम्मीद की किरण लेकर आई है।

मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि इस नई कार्य योजना का प्रस्ताव इसी हफ्ते केबिनेट की बैठक में रखने की उम्मीद है। केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार नदी जोड़ो योजना का प्रस्ताव वास्तव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन (एनडीए) सरकार ने ही 2002 में रखा था लेकिन बाद में एनडीए सरकार के बाद सत्ता में आई यूपीए सरकार ने इस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया। लेकिन मंत्रालय के आला अधिकारियों का दावा है कि यदि तब इस योजना को क्रियान्वित कर दिया जाता तो देश आज सूखे की भयंकर मार से बच सकता था।

पूर्व में केवल महानदी शामिल


नई कार्य योजना के अन्तर्गत छत्तीसगढ़ की दो और नदियों को भी इस परियोजना में शामिल किया गया है। पूर्व में केवल महानदी ही योजना का हिस्सा थी। अब इसमें अरपा और शिवनाथ नदी भी शामिल है। नई कार्ययोजना की सबसे प्रमुख बात है कि इसमें हिमालय से निकलने वाली नदियों और मैदानी नदियों को जोड़ने के लिये अलग से योजना तैयार की गई है। कारण कि हिमालय और मैदानी नदियों की भौगोलिक अवस्था अलग-अलग होती है।

इसी बात को ध्यान में रखते हुए नई कार्य योजना में दोनों प्रकार की नदियों के लिये अलग से योजना का खाका तैयार किया गया है। नई कार्य योजना में बताया गया है कि इस परियोजना के पूरा हो जाने के बाद इससे 44 हजार मेगावाट, बिजली तैयार की जा सकेगी और देश भर में साढ़े तीन करोड़ हेक्टेयर भूमि सिंचित की जा सकेगी।

साढ़े चार दशक पुरानी परिकल्पना


नदी जोड़ो योजना के जन्मदाता के तौर पर आमतौर पर एनडीए सरकार को कहा जाता है। लेकिन वास्तव में नदियों को जोड़ने की परिकल्पना साढ़े चार दशक पूर्व 1971 में तत्कालीन केन्द्रीय सिंचाईमंत्री के. एल. राव ने की थी। तब उन्होंने एक नहर के माध्यम से गंगा और कावेरी को जोड़ने का प्रस्ताव कैबिनेट में रखा था। इसके बाद 1980 में राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी ने इंटरलिंकिंग ऑफ रीवर्स प्लान यानी नदियों को आपस में जोड़ने का खाका तैयार किया था। लेकिन तबकी सरकार ने इस योजना को विवादों में फँसने के डर से ठंडे बस्ते में डाल दिया था।

नदियों को नहरों से जोड़ा जाएगा


मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार तत्कालीन एनडीए सरकार ने इस महत्त्वकांक्षी योजना की शुरुआत तेरह अक्टूबर 2002 को की थी। केन्द्र सरकार ने अमृत क्रान्ति के रूप में नदी सम्पर्क योजना का प्रस्ताव पारित किया था और इसमें कुल 37 नदियाँ शामिल की गई थीं। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि नदी जोड़ो योजना केवल आपस में नदियों को जोड़ने भर की प्रक्रिया नहीं है। इसके अन्तर्गत नदियों को नहरों से जोड़ा जाएगा और जगह-जगह बाँध और जल संरक्षण के लिये जल भण्डार बनाए जाएँगे।

मानसून के दिनों में जरूरत से अधिक पानी को इन बाँधों या जल भण्डारों में एकत्रित कर लिया जाएगा। बाद में जिस राज्य को जरूरत होगी उसे नहरों के माध्यम से पहुँचा दिया जाएगा। यही नहीं बाँधों और जल भण्डार बनाए जाने से बाढ़ के प्रकोप को भी कम किया जा सकेगा। कार्य योजना में उन नदियों पर शोध कार्य भी किया जाएगा, जहाँ मानसून के समय तो पानी का मात्रा इतनी बढ़ जाती है कि बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है जबकि बाद में पानी का स्तर बहुत नीचे चला जाता है।

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