पानी मर गया है लातूर का

Submitted by Hindi on Tue, 04/19/2016 - 09:22
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डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट, 19 अप्रैल, 2016

latur_water_crisis_manojaakhadeकुछ पढ़े-लिखे लोगों ने शहर में पाँव पसारने शुरू किए हैं। विभिन्न संगठन, मंडल, मित्र मंडल आदि का निर्माण, जमीन की खरीद-फरोख्त आदि काम ये लोग करने लगे हैं। शहर एजुकेशन हब हैं, इसलिये यहाँ बहुत सारे शैक्षिक संस्थान हैं, साथ ही प्राइवेट कोचिंग क्लासेस भी भरे पड़े हैं। व्यापारी सदा से यह चाहते हैं कि शांति बनी रहे, ताकि ग्राहक माल खरीद सकें, इन सबको सिक्युरिटी के लिये इन संगठनों की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता की पूर्ति इन सफेदपोश लोगों द्वारा समय-समय पर होती रहती है। शहर का ज्यादातर हिस्सा बाहरी लोगों का होने के कारण स्थानीय लोगों की दबंगई जरूर दिखती है, लेकिन वह भी शहर की शांति के नाम पर सहनीय है। शायद यही राज है शहर की शांति का। ऐसे शांतिप्रिय शहर में अचानक धारा-144 कैसे लागू हुई। सवाल यह है कि क्या वाकई शहर पहले से शांत था या ये व्यापारियों द्वारा तैयार शांति थी। ऐसा क्या हुआ है, जो पानी को लेकर इस शहर में धारा-144 लगाई गई।

बहुत से लोगों के मन में यह सवाल है कि ऐसा क्यों। लातूर शहर धनी व्यापारियों का शहर है, जिसका भार यहाँ के प्रत्येक सामान्य व्यक्ति पर है। एक ओर से हैदराबाद की नजदीकी व्यापारियों को कम कीमत में माल उपलब्ध कराता है, वहीं दूसरी ओर उस माल के लिये यहाँ साक्षर और ग्रामीण ग्राहक तैयार हैं। शायद ही शहर का ऐसा कोई व्यक्ति होगा, जो मुंबई व पुणे में अपनी किस्मत आजमाने न गया हो। कामकाज ढूंढने न सही, शिक्षा के लिये तो जरूर ही वे लोग इन बड़े शहरों में चले गए होंगे। लेकिन यह भी सही है कि अगल-बगल के परभणी, उस्मानाबाद, बीड के ग्रामीण लोग रोजगार के लिये पिछले सत्ता परिवर्तन के पहले तक आते रहे थे, लेकिन आजकल उनका आना भी केवल आना है।

कई सारे मामले में लातूर इन बाकी तीन जिलों से बेहतर माना गया, जिसमें शिक्षा अहम थी, रोज बढ़ने वाला शहर मकान बनाने के लिये मजदूरों की माँग रखता था, इसलिये मुँहमाँगी मजदूरी मिल जाया करती थी, इसलिये भी बाकी जिलों के लोगों को यह शहर आकर्षित करता रहा। व्यापारी घरानों की परम्परा ने यहाँ उद्योग के लिये नई आशा का निर्माण किया, जिसके चलते मजदूरों की माँग भी बढ़ गई, हालाँकि यह उद्योग केवल रोजमर्रा के उपयोगी उत्पादन बनाने तक सीमित हैं। शहर के रामभाऊ बताते हैं कि हम कभी किताबों में पढ़ा करते थे कि एशिया का सबसे बड़ा शक्कर कारखाना लातूर में है तो हमारी छाती फूल जाती थी, किन्तु बाद के सालों में पता चला कि उसको नीलाम किया जा रहा है।

जब कोई मुझसे पूछता है कि आप के शहर में क्या है तो मैं कुछ नहीं बता सकता, हालाँकि यह सवाल इससे पहले कोई ज्यादातर नहीं पूछता था और अगर कोई पूछता तो जवाब में कोई न कोई कह देता कि विलासराव देशमुख का शहर या किलारी भूकम्प, ये दो चीजें थीं, जो शहर को वैश्विकता के साथ जोड़ने में मदद करती थीं। पहले वाले जवाब में सामने वाले के विचारों से जलन का आभास कर लिया जाता, जिससे हम शहरवाले गर्व महसूस कर लेते और दूसरे से करुणा झलकती थी। इसे भी हम हमारी प्रसिद्धि के साथ जोड़कर देखते, न की कमजोरी। परन्तु आजकल पानी की कमी ने हमें हमारी औकात दिखाई। इस सूखे ने हमें हमारी क्षमताओं को जानने का मौका दिया है। हालाँकि शहर का बुद्धिजीवी वर्ग अब भी इस समस्या की ओर आकर्षित नहीं हो पाया है। इसका यह भी कारण है कि लातूर के साक्षर लोग तुरन्त ही किसी समस्या को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते। हमारा कोपिंग मेकनिज्म गजब का है। ये तो सरकारी महकमे की करतूत है कि उसने धारा-144 लगाकर हमारी खामियों को उजागर कर रखा है। वरना इससे पहले भी हमने बड़े-बड़े सूखों को मुँहतोड़ जवाब दिया है।

पिछले साल पानी की कमी ने हमारे खेतों का बुरा हाल किया, तब भी हम नहीं डरे, पिछले महीने एकड़ भर खेत से 8000 खर्च कर आधी बोरी सोयाबीन जो इस मौसम की पूरी फसल का हिस्सा था, उसे घर ले जाते समय मैं जरा भी आशंकित नहीं था कि इतने पैसे के बदले केवल इतना धान। क्योंकि हम खेती तो केवल बचाने के लिये करते हैं ताकि हमें भी लगे की हम भी किसान हैं। लातूर शहर का किसान होने में भी अजीब सा गर्व महसूस होता है। करोड़ों की कीमत पर बेची जाने वाली जमीन में हम हजार-बारह सौ का उत्पादन लेकर हम केवल यह जताना चाहते हैं कि हमने अभी अपनी जमीन बेची नहीं है।

ऐसे में पानी गिरने न गिरने से हमारा कुछ नहीं होने वाला। इससे ज्यादा फिक्र वाली बात यह है कि पड़ोसी की जमीन को मैं अपना कैसे बनाऊँ। शहर के अगल-बगल का शायद ही ऐसा कोई गाँव होगा, जिसकी जान पहचान कोर्ट में न हो। वो समय अब दूर नहीं जब यहाँ का कोई किसान नौसिखिए वकील को सलाह दे रहा होगा। मृदा परीक्षण जैसे आम काम यहाँ के किसान तब तक नहीं करवाते, जब तक कि इसके लिये कोई फंड न मिले। हम केवल उस जमीन के मालिक होने का फर्ज अदा करते हैं, साथ ही यह ध्यान रखते हैं कि कोई हमारे इस फर्ज के आड़े न आए।

चार साल पहले की बात है, शहर के नजदीक का एक गाँव शहर में समाविष्ट होने जा रहा था। पूरे गाँव में केवल इसी की चर्चा थी, लोगों ने अपने पैसे खर्च कर मुंबई में जाकर मंत्रियों से बातचीत कर मसला हल करवाया, तब जाकर वो जमीन बची है। लेकिन यह जमीन बचाने का असल कारण उस जमीन की कीमत ही थी, जो आसमान छू रही है। आज तक मुझे नहीं पता चला कि खबरों में वो बूढ़ा किसान उबड़-खाबड़ जमीन पर बैठ कर माथे से हाथ लगाकर आसमान की ओर देख रहा है, वह कहाँ है। यहाँ का किसान तो रॉयल एनफील्ड पर घूम रहा है। विट बनाने का कारखाना लगा रहा है। एक नहीं दो बीवियाँ रख रहा है। वो दबंग हैं और चौक-चौराहे पर बैठकर निम्नवर्गियों का मजाक उड़ा रहा है। उसके बच्चे भी उसी के कदमों पर चल रहे हैं।

मध्यकाल के जमींदारों से कम परिस्थिति इन दो-चार एकड़ वालों की नहीं है। ऐसा ही एक उदाहरण है रशीद चाचा। रशीद चाचा की शहर से नजदीक ही खुली जमीन है। इस बार सूखे का प्रभाव बढ़ने वाला है, इस बात की फिक्र यहाँ के व्यापारियों को ज्यादा थी, इसलिये उन्होंने रशीद चाचा को पहले ही पैसे दे रखे हैं बोरिंग के लिये, जिससे लगने वाला पानी वह उन्हें उसी दाम पर देगा, जो पहले से तय होगा। ऐसे में उसने अपने खेत में तीन बोरिंग करवाई लगभग 700 फीट के आस-पास। अब तो उनकी निकल पड़ी आजकल वो रोज पंद्रह-बीस हजार का पानी बेच रहे हैं। बताइए इतना पैसा कमाने के लिये एक किसान को कितने दिन लग जाएँगे। कौन करेगा किसानी अब रशीद चाचा तो चाहेंगे कि हर साल ऐसा ही सूखा पड़े, तब तो वह पैसा कमा पाएँगे।

दो फसलों में तो उनको कुछ न मिला, लेकिन इस सूखे में उनकी तीसरी फसल कामयाब रही। यह केवल किसानों का ही नहीं, शहर में जिस किसी के पास बोअर पानी है, वे लोग इस तीसरी फसल को ले रहे हैं। लागत बहुत कम है और मुनाफा तगड़ा मिल रहा है। जैसे बोअर लगातार दो ड्रम पानी निकालता है तो ग्राहक के आने की राह देखना नहीं है। एक हजार लीटर का एक टैंक लगवाना है, उसको एक प्लंबर से टोंटी फिटकर दे बस। अब दिनभर दो-दो घंटे में बोर चलाकर पानी टंकी में ऐसे जमा करते हैं, जैसे पैसे। माँ-बाप कहीं बाहर चले जाएँ तो बच्चों को बार-बार फोन करके याद दिलाते हैं कि दो घंटे हो गए हैं, चालू करो।

नौकरीपेशा आदमी भी इस ऊपरी कमाई के लिये घर में अपना योगदान छुट्टी लेकर दे रहा है तो बच्चे अपनी कोचिंग को त्यागकर माता-पिता के सामने अपना गौरव प्राप्त करने में लगे हैं। अनपढ़ सास की साक्षर बहुएँ अपना इक्का जमाने में लगी हैं, पता चलता है इनके लिये भी सूखा किसी सुख से कम नहीं है।

ईमेल - nileshzalte11@gmail.com

(लेखक महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में सीनियर रिसर्च फेलो हैं)

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