पहले इंसान बचाओ, शराब या पानी

Submitted by RuralWater on Sun, 04/24/2016 - 12:37
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दोपहर का सामना, 18 अप्रैल 2016
महाराष्ट्र सहित देश के कई राज्यों में सूखे तथा पानी का संकट बना हुआ है। महाराष्ट्र के हिस्सों में मोर, हिरण, बारहसिंघा आदि पानी के अभाव में मरने लगे हैं। किसानों का पशु धन भी पानी के लिये व्याकुल है। कलेजे का पानी होना भी थम जाये इतना भयंकर जल संकट बना हुआ है। इसीलिये मराठवाड़ा जैसे सूखे की खाई में स्थित उद्योगों को मिलने वाली पानी की आपूर्ति में कटौती करने का निर्णय लिया गया है। औद्योगिक बस्तियों में शराब के कारखानों का पानी बन्द करके आदमी तथा पशुओं को दिया जाये ऐसा विचार हमने सम्भाजी नगर में व्यक्त किया था। भयंकर सूखा और पानी की किल्लत के चलते ‘आईपीएल’ क्रिकेट मैच को अदालत ने महाराष्ट्र से बाहर कर दिया है। क्रिकेट के मैदान पर छिड़काव के लिये जो पानी लगता है वो कहाँ से लाएँ? ऐसा उच्च न्यायालय ने पूछा और 100 करोड़ का राजस्व डुबोकर ये सारे मैच राज्य के बाहर ले जाये गए। लेकिन अब महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री एकनाथ खडसे द्वारा सूखे के दौरे के दौरान हेलिपैड के लिये 10 हजार लीटर पानी बर्बाद किये जाने का मामला सामने आया है।

जिस लातूर में सबसे अधिक पानी का संकट है वहीं हेलीपैड बनाने के लिये पानी का बर्बादी की गई। अर्थात हेलीपैड के लिये इस्तेमाल किया गया पानी पीने का पानी नहीं था बल्कि जलशुद्धिकरण केन्द्र का प्रक्रिया किया हुआ पानी था, ऐसा मंत्री का कहना है। फिर क्रिकेट के मैदान पर हरियाली बरकरार रखने के लिये जिस पानी का इस्तेमाल किया जाने वाला था वह भी कहाँ पीने का पानी था? फिर भी इस समय सरकार चलाने वाली अदालत ने क्रिकेट के मैच को महाराष्ट्र से बाहर कर दिया।

इनमें के कुछ मुकाबले छत्तीसगढ़ के रायपुर में आयोजित किये गए हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में ‘सूखा’ और पानी की किल्लत महाराष्ट्र से भी भयंकर होने की खबर सामने आई है। लेकिन वहाँ की हाईकोर्ट ने अब तक तो पानी की बर्बादी को टालने के लिये रायपुर के आईपीएल क्रिकेट मैच को उनके राज्य से नहीं निकाला है। महाराष्ट्र सहित देश के कई राज्यों में सूखे तथा पानी का संकट बना हुआ है। महाराष्ट्र के हिस्सों में मोर, हिरण, बारहसिंघा आदि पानी के अभाव में मरने लगे हैं।

किसानों का पशु धन भी पानी के लिये व्याकुल है। कलेजे का पानी होना भी थम जाये इतना भयंकर जल संकट बना हुआ है। इसीलिये मराठवाड़ा जैसे सूखे की खाई में स्थित उद्योगों को मिलने वाली पानी की आपूर्ति में कटौती करने का निर्णय लिया गया है। औद्योगिक बस्तियों में शराब के कारखानों का पानी बन्द करके आदमी तथा पशुओं को दिया जाये ऐसा विचार हमने सम्भाजी नगर में व्यक्त किया था। मराठवाड़ा में बीयर का उत्पादन करने वाले दस बड़े कारखाने हैं। उनको दिये जाने वाले पानी में 20 प्रतिशत की कटौती की गई है।

मराठवाड़ा का उद्योग जगत भी जीना चाहिए क्योंकि हजारों लोगों को रोजगार तथा घर का चूल्हा उन्हीं उद्योगों पर निर्भर है। इसलिये मराठवाड़ा के जल समस्या के सवालों पर सरकार भले ही फजीहत हो रही है फिर भी कुछ बीच का रास्ता निकालना पड़ेगा और इसके लिये तत्काल निर्णय लेना जरूरी है। जायकवाड़ी सहित मराठवाड़ा के सभी जलस्रोत सूख गए हैं भूजल भी खत्म हो चुका है।

मानसून का इन्तजार करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। ऐसी स्थिति कई स्थानों पर बनी हुई है। इसलिये फिलहाल जो पानी है उसे इंसान को बचाने के लिये इस्तेमाल करना ही एकमात्र विकल्प है। यह बात को समझना होगा। पानी के बदले बीयर पीने की हमारी संस्कृति नहीं। बोतलबन्द पानी खरीदकर प्यास बुझाने की क्षमता भी सूखाग्रस्त किसानों की नहीं है। बीयर कम्पनियों को पानी मिलना ही चाहिए ऐसा आग्रह भाजपा के मराठवाड़ा के मंत्रियों ने किया है यह उनकी भूमिका हुई। पहले इंसानों को बचाओ यह जनभावना है। आज इसी की जरूरत है।

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