छात्र जी डी की विद्रोही स्मृतियाँ

Submitted by RuralWater on Sun, 05/01/2016 - 13:32


स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद - 16वाँ कथन आपके समक्ष पठन, पाठन और प्रतिक्रिया के लिये प्रस्तुत है :

 

तीन विषय में ऑनर्स


.बीएचयू में ऐसा नियम था कि जिस विषय में ऑनर्स करना हो, तो मेन पेपर और ऑनर्स पेपर..दोनों में 60-60 प्रतिशत हो, तब मिलती थी ऑनर्स की डिग्री। मैंने तीनों विषय में ऑनर्स लिया था। गणित में ऑनर्स के लिये स्टेटस्टिक्स, फिजिक्स में एयरोडॉयनमिक्स और केमिस्ट्री में थर्मोडायनमिक्स का अतिरिक्त पेपर देना पड़ता था। तीनों विषय में ऑनर्स लेने से मुझे रुड़की के कम्पटीशन में तथा इंजीनियरिंग की पढ़ाई में लाभ हुआ।

 

जनमत के साथ वाक आउट


बी.एससी. फाइनल में फिजिक्स का सेकेण्ड पेपर कठिन लगा। कई प्रश्न या तो आउट ऑफ कोर्स थे या पढ़ाए नहीं गए थे। नतीजा यह हुआ कि प्रश्न पत्र आने के 10 मिनट बाद ही परीक्षा हॉल में आपस में कुछ इशारेबाजी होने लगी और स्टुडेंट्स कक्षा से वाक आउट कर गए। 97 में से 75 स्टुडेंट्स वाक आउट कर चुके थे। मैं भी उन 75 में ही था; जबकि सच यह था कि मैं छह में से चार प्रश्न के उत्तर कर ही सकता था। हम मानकर चल रहे थे कि हमारे वाक आउट के कारण यूनिवर्सिटी को परीक्षा दोबारा करानी पड़ेगी। किन्तु यूनिवर्सिटी ने ऐसा नहीं किया। यूनिवर्सिटी ने तय किया कि जिन्होंने वाक आउट नहीं किया है, उन्हें प्राप्त शेष नम्बरों में दो प्रश्नों के नम्बर जोड़ दिये जाएँ। इस तरह फिजिक्स में जीरो मिला।

 

मैस मैनेजर भी अच्छा और कैमिस्ट भी


फोर्थ इयर में मुझे मैस का मैनेजर बना दिया गया। हमारा मैस कम चार्ज में अच्छा खाना देने के लिये प्रसिद्ध हो गया था।

मुझे एम.एससी. (केमिस्ट्री) में प्रवेश मिला था। हमारे प्रोफेसर मुझे रिसर्च में ले जाना चाहते थे। मामा और माँ इंजीनियर बनाना चाहते थे। सो, रुड़की में इंजीनियरिंग प्रवेश की परीक्षा दी; पास हुआ और रुड़की यूनिवर्सिटी ज्वाइन की। लेकिन एक बात बताना चाहता हूँ कि केमिस्ट्री हमेशा मेरी ताकत रही। अमेरिका में था, तो डॉ. पियरसन कहते थे - ‘तुम इंजीनियर कम, केमिस्ट ज्यादा हो।’

 

पहली बार पतलून कोट


खैर, अब रुड़की की सुनो। सुना था कि रुड़की यूनिवर्सिटी में रैगिंग होती है। बीएचयू तक तो मैं धोती या फिर कुर्ता-पायजामा ही पहनता था। बीएचयू में नियम था - ‘नो कोट, नो टाई।’ रुड़की में उल्टा था। सो, रुड़की के लिये मैंने पतलून सिलाई। अक्तूबर में पहले-पहल यूनिवर्सिटी गया, तो कोट और पतलून पहनकर। गेट पर जो लड़के मिले, वे बोले कि टाई लगाकर आओ। मेरी शर्ट, टाई कॉलर वाली नहीं थी। अब समस्या थी कि उसमें टाई कैसे लगे। रिश्तेदार से शर्ट उधार ली गई। इस तरह मैंने पहली बार पतलून, कोट और टाई पहने।

 

रैगिंग के विरुद्ध


एक महीने तक रैगिंग चलती रही, तो बैठक हुई कि रैगिंग का विरोध होना चाहिए। एक हॉस्टल में सात कमरे; हर कमरे में दो लड़के। मैं भी विरोध में शामिल हुआ। हम में इतनी समझ तो थी कि विरोध ऐसे हो कि हम निकाले न जाएँ। विरोध के बाद रैगिंग बन्द हुई। जब हमारा बैच अगले साल सेकेंड इयर में पहुँचा, तो हम में से कुछ ने तय किया कि हम रैगिंग करने वालों में शामिल नहीं होंगे। हालांकि हमारी संख्या छोटी थी, लेकिन हमने सोचा कि इसे रोकना है। कैसे रोकें? तो हमने सोचा कि अखबार को पत्र लिखें। मुझे जिम्मेदारी दी गई। उस वक्त लखनऊ से ‘नेशनल हेरॉल्ड’ अखबार निकलता था। मैंने उसे पत्र लिखा। रैगिंग के पिछले वर्ष के अपने अनुभवों को आधार बनाया। नेशनल हेरॉल्ड ने वह पत्र छापा। अखबार ने एक कॉपी मुझे भी भेजी थी। उन्होंने यह भी लिखा था कि यदि मेरे खिलाफ कोई एक्शन हो, तो मैं अखबार को लिखूँ। अखबार मामले को टेकअप करेगा। ऐसा अखबार के सम्पादक ने मुझे आश्वासन दिया था।

छपा हुआ पत्र, वैरीफिकेशन व नैससरी एक्शन के लिये यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर के पास भी आया। वाइस चांसलर थे कर्नल वी.सी. हार्ट। कर्नल हार्ट ने माना कि इससें विश्वविद्यालय की बदनामी हुई है। रुड़की यूनिवर्सिटी, एक पायनियर यूनिवर्सिटी थी। अब भला मैं क्यों चाहता कि इसकी बदनामी हो। खैर, वाइस चांसलर महोदय ने मुझे बुलाया। मैंने सोच रखा था कि अगर गलती हो, तो दंड भुगतने को हमेशा तैयार रहो। यह मेरे बाबाजी की सीख थी। वी सी महोदय ने कहा - ‘मुझे बताना चाहिए था।’ यह सच था कि जब हमारी रैगिंग हुई, तो वह वाइस चांसलर नहीं थे। मुझसे बातचीत के बाद उन्होंने हस्तक्षेप किया और रैगिंग खत्म हो गई। हमें सन्तोष हुआ।

 

हिन्दुस्तानी से अन्याय के विरुद्ध


आगे मैस का चुनाव हुआ। मिडिल क्लास के लड़के भी मुझे सपोर्ट करते थे। मैं सेक्रेटरी चुना गया। मैंने पूरी कोशिश की। परिणामस्वरूप, मैस का जो बिल 150 रुपए आता था, वह घटकर 120-125 रुपए आ गया। खाने की क्वालिटी में भी सुधार हुआ। उससे मेरी पापुलैरिटी भी बढ़ी और आत्मविश्वास भी।

रुड़की यूनिवर्सिटी में एक घटना और हुई। मिस्टर हार्ट की पत्नी काफी इन्टरेस्ट लेती थी। मेजर स्मिथ नामक एक अंग्रेज भी वहाँ आया। उसने मिसेज हार्ट को पटा लिया। उन दिनों यूनिवर्सिटी डेयरी से ही दूध-मक्खन आता था। एक हिन्दुस्तानी उस डेयरी का मैनेजर था। अच्छे से मैनेज कर रखा था। उसका व्यवहार भी अच्छा था। मेजर स्मिथ ने ऐसा खेल किया कि उसे डिग्रेड करके डिप्टी मैनेजर बना दिया और खुद मैनेजर बन बैठा।

यह बात हमारे पास तक आई। इस बीच हुआ यह कि कुछ दिनों मैस में जो मक्खन आया, वह खराब आया। मैंने मेजर स्मिथ को एक कड़ा सा पत्र लिख दिया। वह पत्र वाइस चांसलर के पास पहुँच गया। फिर वी सी के बंगले पर बुलाया गया। फिर डाँट पड़ी - ‘हाउ यू डेयर टु राइट आवर मैन?’ मैं डाँट खाकर आ गया। मुझे ऐसा हो गया कि जैसे मैं रिबेल (विद्रोही) हूँ।

 

कोर्ट मार्शल हुआ


उन दिनों मैस कमेटी का प्रेसिडेंट एक सीनियर अध्यापक होता था। वाइस प्रेसीडेंट, थर्ड ईयर का कोई स्टुडेंट होता था। मैं वाइस प्रेसीडेंट चुन लिया गया। वी सी की पत्नी को यह अच्छा नहीं लगा। उसी समय एनसीसी (नेशनल कैडिट कोर) कैंप की एक घटना है। एनसीसी, सभी के कम्पलसरी थी। दो सप्ताह के लिये कैम्प लगा। हमारा कैम्प, डोरीवाला और ऋषिकेश के बीच मिलट्री प्लाटून में लगा। जुलाई का महीना था। बारिश आते ही बाढ़ आ गई। टैंट में पानी आ गया। मैस का सामान खराब हो गया। बैरे व कुक के टैंट खराब हो गए। कमाण्डर ने मुझसे कहा - ‘तुम मैस इंचार्ज हो। तुम मैनेज करो।’ इस पर बहस हो गई। तय हुआ कि कैंप शिफ्ट करके रुड़की ले चलते हैं। जगदम्बा प्रसाद एडजुटेंट थे। तो बात यह हुई कि यह तो इनडिसीप्लीन है। तीन लड़कों के नाम आये। कहा कि मैं नेता था। रुड़की में हमारा कोर्ट मार्शल किया गया।

 

एनसीसी से निकासी, एक्सपलेनेशन और वार्निंग


कोर्ट मार्शल करने वाली बेंच में हमारे वी सी कर्नल हार्ट के अलावा मिलिट्री सर्विस के दो रेगुलर ऑफीसर थे। सुनवाई हुई। गवाही हुई। मेरे लिये मेरे टीचर ने ही कहा कि मैंने उनको धमकी दी थी कि अगर हमारे अंगेस्ट एक्शन लिया, तो पूरी प्लाटून की विद्रोह कर देगी। मुझे अजीब सा लगा कि मेरा अध्यापक ही मेरे विरुद्ध हो गया! मैंने पूछा कि जब मैने यह कहा, तो और कोई न उस वक्त? अध्यापक ने कहा कि नहीं। इस पर मैंने कहा - ‘आप कहते हैं कि मैंने ऐसा कहा। मैं कहता हूँ कि मैंने ऐसा नहीं कहा। कोई गवाही है आपके पास?’

इस फिर अनुशासनहीनता करार दिया गया। निर्णय हुआ कि मुझे एनसीसी से निकाल दिया जाये। सर्टिफिकेेट न दिया जाये। सबके सामने बिल्ला उतार लिया जाये। बाकी दो की भी पट्टी उतारी गई। इस पर मेरे समर्थन में दो क्लासेस के स्टुडेंट्स ने एक दिन की हंगर स्ट्राइक कर दी। खाना बना, लेकिन किसी ने खाया नहीं। फिर एक दिन डाकिया आया। उसने रिसीव कराया और एक रजिस्ट्री मुझे दी। उसमें मुझसे एक्सपलेनेशन माँगा गया था और वार्निंग दी गई थी कि भविष्य में कोई हरकत की, तो मुझे यूनिवर्सिटी से निकाल दिया जाएगा।

 

किताब में दर्ज इतिहास


बाबा जी ने पूछा, तो मैंने कहा कि मुझे ट्रेनिंग पर जाना है। चाचा जी को अवश्य मैंने सारे अनुभव बताये। उनकी ससुराल में कांग्रेस के एक एमएलसी थे। चाचा जी ने उन्हें बता दिया। उन्होंने कहा - ‘अंग्रेज को तो मैं देख लूँगा।’ मैंने कहा - ‘आप परेशान न हों। मैं तो इसे एक अनुभव ही मानता हूँ। मिस्टर हार्ट आखिरकार हमारे वी सी हैं। आप यह न करें।’ मुझे यह भी लगता था कि विरोध करने से कुछ लाभ भी होगा या नहीं? मैंने चाचा जी से कहा कि क्या जरूरत थी नेताजी को बताने की। आगे कुदरती कुछ ऐसा हुआ कि मेरी थर्ड इयर की परीक्षा थी। उसी समय मिस्टर हार्ट के नेहरु से मतभेद हो गए। मिस्टर हार्ट को अपना टर्म पूरा होने से पहले ही वापस जाना पड़ा।

वी के मित्तल ने रुड़की यूनिवर्सिटी का इतिहास (1840 से 1948) लिखा है। उन्होंने विस्तार से इस पर चर्चा की है। पहले वह रुड़की कॉलेज था। दूसरा भाग 1975 तक के बारे में है। वह बताता है कि सरकारें किस प्रकार हमारे इंस्टीट्युशन्स को नष्ट करती हैं।

 

नहीं भूलता वह टेलीग्राम


खैर, एक बात जो मुझे आज भी याद है, वह यह हमारी परीक्षा शुरू होने से पहले यू.के. से मिस्टर हार्ट के दो टेलीग्राम आये। एक बाकी क्लास के नाम था और दूसरा अकेले मेरे नाम। उसमें मिस्टर हार्ट ने मुझे परीक्षा के लिये शुभकामनाएँ दी थी और लिखा कि उनसे कोई गलती हो गई हो, तो मैं उन्हें माफ करुँ।

अगले सप्ताह दिनांक 08 मई, 2016 दिन रविवार को पढ़िए स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद शृंखला का 17वाँ कथन

 

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