हरित आच्छादन कार्यक्रम के नये आयाम

Submitted by Hindi on Tue, 05/03/2016 - 11:41
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Source
योजना, जून 1994

भारतीय वन सामुदायिक संपत्ति है। इनका सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक महत्त्व है। इसलिए इनके प्रबंध को इसी संदर्भ में देखना है। वनों और वनों के आस-पास निवास करने वाले लाखों अन्य लोग अपनी जीविका के लिये प्रत्यक्ष रूप से वनों पर निर्भर हैं। अनुमान लगाया गया है कि वनों से प्रतिवर्ष 30,000 करोड़ रुपये की विभिन्न प्रकार की उपज और वन्य पदार्थ प्राप्त किए जाते हैं। यह वनों से प्राप्त एक प्रकार की प्रत्यक्ष सब्सिडी है जो ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब व्यक्तियों तथा वनों में निवास करने वालों के जीवन-स्तर को बनाए रखती है।

भारत में अनेक उद्योग कच्चे माल के लिये पूरी तरह या आंशिक रूप से लकड़ी पर निर्भर हैं। बढ़ती हुई जनसंख्या और अर्थव्यवस्था के विकास के कारण कागज, लुगदी और लकड़ी से संबद्ध सामान और सेवाओं की मांग लगातार बढ़ रही है। 1990 से पहले लकड़ी पर आधारित उद्योग इस विश्वास से प्रभावित थे कि कच्चे माल के स्रोत कभी भी समाप्त होने वाले नहीं हैं। यही कारण था कि लकड़ी पर आधारित उद्योगों के लिये कच्चे माल की उपलब्धता को लगभग सुनिश्चित मान लिया गया था।

जैव-कीटनाशक


हरियाली क्षेत्र में केवल वृद्धि करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि जैव विविधता को संरक्षण प्रदान करना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। छोटी से छोटी घास-पात और लगभग दृष्टिगोचर नहीं होने वाली फफूंद भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। विशाल बरगद के वृक्ष तथा केंचुआ या रेंगने वाला कीड़ा पारिस्थितिकीय संतुलन के लिये उतना ही आवश्यक है जितना हाथी और बाघ। यदि वनरोपण को केवल व्यावसायिक दृष्टि से देखा जाता है तो प्राकृृतिक वनों की कटाई तथा एक ही प्रकार के वृक्ष लगाने में अपनायी गई प्रक्रियाएं जीव भंडार को इतना अधिक कम कर देंगी कि उन्हें फिर पूरा नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही इनसे जैव-विविधता छिन्न-भिन्न हो जाएगी, जिसमें हमारा देश काफी संपन्न है।

नया कदम


वानिकी क्षेत्र में नये विचारों तथा नयी प्रवृत्तियों का तत्काल उपयोग करने की आवश्यकता है। वह प्रबंध, संगठन या वित्त का क्षेत्र हो सकता है। वनों पर आधारित उद्योगों को वैसे संसाधन पैदा करने में अपने को शामिल करना होगा जिन्हें वे कच्चे माल के रूप में उपयोग करते हैं। किसान कृषि वानिकी को बड़े पैमाने पर शुरू करें इसके लिये आवश्यक है कि उद्योग आधारभूत संरचना खड़ी करने में सहायता करें। इससे सबसे निचले स्तर पर अतिरिक्त रोजगार का अवसर पैदा होगा; फलस्वरूप ग्रामीण इलाकों के गरीब लोगों की आर्थिक दशा में सुधार होगा। वानिकी कार्यक्रम में आम लोगों को शामिल कर बहुत सी आर्थिक और पर्यावरण से सम्बन्धित समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

वानिकी क्षेत्र से प्राप्त वस्तुओं पर काफी अधिक सब्सिडी होने के कारण उद्योग इस क्षेत्र में पर्याप्त निवेश करने में रुचि नहीं लेते। ‘प्रतिस्थापन मूल्य और भूमि मूल्य’ की धारणा के आधार पर कच्चे माल के लिये एक व्यावहारिक मूल्य नीति तैयार करने की आवश्यकता है। यह न केवल उद्योगों को आवश्यक निवेश करने के लिये पोत्साहित करेगा, बल्कि किसानों और ग्राम समितियों को आकर्षक और लाभकारी मूल्य दिलायेगा।

राष्ट्रीय बंजरभूमि विकास बोर्ड को राष्ट्रीय वनरोपण तथा जैव विकास बोर्ड के रूप में पुनर्गठित किया गया है। गैर-सरकारी संगठनों के सक्रिय योगदान तथा राज्यों के वन विभागों के दृष्टिकोण में परिवर्तन के फलस्वरूप वनरोपण प्रयासों में संतोषजनक प्रगति हुई है। वन विभाग अब वनों को केवल आय के स्रोत नहीं मानते, बल्कि अब वनों के विकास पर भी ध्यान देने लगे हैं। वास्तव में पिछले वर्ष उपग्रह से प्राप्त चित्रों से पता चलता है कि आधुनिक इतिहास में पहली बार देश के कुल वन क्षेत्र में प्रतिवर्ष लगभग 30,000 हेक्टेयर की वृद्धि हुई है।

अधिक संसाधन


वानिकी के लिये संसाधनों का भारी अभाव है। कुल योजना राशि में वानिकी क्षेत्र का हिस्सा एक प्रतिशत भी नहीं है। 1991-92 में वानिकी क्षेत्र को लगभग 675 करोड़ रुपये उपलब्ध कराये गए तथा 17 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वनरोपण हुआ। जिसमें लगभग 210 लाख हेक्टेयर क्षेत्र वन भूमि है; शेष भूमि कृषि वानिकी और निजी वृक्षारोपण कार्यक्रम के अंतर्गत लाई गयी।

भारत में कुल वन भूमि लगभग 6 करोड़ चालीस लाख हेक्टेयर है जिसमें 2 करोड़ 50 लाख हेक्टेयर में कम हरे वन हैं यानी इनमें हरियाली का घनत्व 0.4 से भी कम है। यदि वन भूमि पर वनरोपण कार्यक्रम के कार्यान्वयन में वर्तमान निवेश जारी रहे और 60-65 प्रतिशत पौधे जीवित बच जाएँ तो भी देश की पूरी वन भूमि पर वनरोपण पूरा करने में 40 वर्ष लगेंगे। इसके बावजूद देश की कुल भूमि के केवल 20 प्रतिशत भाग पर ही वन होंगे जोकि निर्धारित लक्ष्य 33 प्रतिशत से बहुत कम होगा।

इसलिए संसाधन जुटाने और समाज के सभी वर्गों, विशेषतया आम आदमी को, इस कार्य में सभी तरह से शामिल करने के लिये दुगने प्रयास करने की आवश्यकता है। सामुदायिक संसाधन के रूप में वनों की अवधारणा और वनों को उद्योगों के लिये कच्चे माल का स्रोत मानने के बीच सामंजस्य स्थापित करना होगा। जीन-भंडार तथा प्राकृतिक वनों की वृहद जैव विविधता और पेड़-पौधों तथा जीव-जन्तुओं को संरक्षित करना पड़ेगा। यदि वनरोपण कार्यक्रम में उद्योग, साधारण जनता और गैर-सरकारी संगठन एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हैं तो इसमें कोई संदेह नहीं कि एक तर्कसंगत समय अवधि में देश की कुल भूमि के एक तिहाई क्षेत्र में वनों का विस्तार किया जा सकता है।

कमलनाथ, केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन राज्य मंत्री

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