आतप के ताप में प्रकृति का उल्लास

Submitted by Hindi on Sun, 05/08/2016 - 09:15
Source
डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट, 08 मई, 2016

बुरांस के वनइस समय हमारा देश भी इंग्लैंड की प्रमुख पहचान को अपनी पहचान बनाने में लगा हुआ है। अंग्रेजों की तीन पक्की पहचान थी- छाता, अखबार और मौसम की चर्चा। वैसे अब स्मार्ट फोन का युग है तो हो सकता है कि छाते को छोड़कर दो पहचान लुप्तप्राय हो रही होंगी। वैसे मौसम वार्तालाप प्रारम्भ करने का सूत्र हुआ करता था। छाता और अखबार को अंग्रेज भारत छोड़ते समय विरासत के रूप में बंगाल में छोड़ गए और ये दोनों ही चीजें बंगालियों के अभिन्न अंग बन गए। यदि इंग्लैंड में आप सफर कर रहे हैं और पास में कोई अंग्रेज बैठा है तो बातचीत की शुरुआत सोचने-खोजने की आवश्यकता नहीं है, वेदर यानी मौसम की उंगली पकड़ लीजिए और आराम से यात्रा बगैर ऊब के समाप्त कर लीजिए। आजकल जैसे ही आपके प्रियजनों, रिश्तेदारों के फोन की घंटी बजती है, हैलो के बाद ही पहला प्रश्न लोग मौसम के बारे में करते हैं। समाचार पत्र और समाचार बुलेटिन में प्रतिदिन मौसम छपता और दिखाया जाता है। इसके बावजूद प्राय: हर दूसरे शहर में रहने वाले व्यक्ति को ऐसा क्यों लगता है कि इधर शहरों की अपेक्षा वह ज्यादा झुलस रहा है। बोनस में बिजली-पानी का रोना भी सुनने को मिल जाएगा। यही सोशल मीडिया का हाल है। यह तो बड़ा अच्छा है कि फिल्मी हस्तियों, चीप जोक्स, राहुल गांधी, रामदेव बाबा और अपने प्रधानमंत्री साहब बड़े भाग पर काबिज रहते हैं, वरना लोगों ने गर्मी, सूर्य, तपिश और न जाने कितनी हिदायतों, सलाहों से सोशल मीडिया को भर दिया होता। खैर, इन्हें यहीं छोड़ हम आगे बढ़ते हैं।

एक बार गर्मी को कोसते हुए मेरे भाई ने कहा कि उसे वे देश बहुत अच्छे लगते हैं, जहाँ गर्मी बहुत कम पड़ती है, ऐसे देश में रहना चाहिए। गनीमत है कि यह बात उसने वर्षों पहले कही थी। यदि वर्तमान में उसने यह कहा होता तो हो सकता है कि उसके ऊपर अनेकानेक धाराएँ और न जाने क्या-क्या दोषारोपण कर दिए जाते। मैंने उसकी बात को बीच में ही काटते हुए कहा कि मुझे तो गर्मी अच्छी लगती है। यह सुनते ही वह हँसते-हँसते सोफे पर लेट गया और उसकी हँसी रुक नहीं रही थी। मुझे पता था कि वह हम लोगों को चिढ़ाने या बोर करने के लिये बड़ी देर तक बनावटी हँसी को खींच सकता था। मैंने थोड़ा खीजकर पूछा कि आखिर मैंने ऐसा क्या कह दिया, जिसमें इतना हास्य उसने भर दिया। वह बोला, मुझे आज पता चला कि विश्व में कोई दूसरा भी है, जिसे ग्रीष्म ऋतु प्रिय है। मेरे माथे पर बल देखकर और मुँह पर प्रकट होते प्रश्न को पढ़ते हुए उसने पूछा- तुम्हें पता है पहला कौन है? इतने वर्षों में मुझे उसकी चालों का पता चल चुका था, फलस्वरूप मैंने कोई उत्तर नहीं दिया तो स्वयं ही हताश होकर बोला- बैसाख नंदन। यानी गदहा। एकाएक मैंने प्रश्न पूछ ही लिया- क्यों? बोला, गर्मी में जब सब सूख जाता है और बैसाख नंदन घास चरने जाता है तो चरते-चरते जब वह पीछे मुड़कर देखता है तो बड़ा प्रसन्न हो जाता है, क्योंकि कहीं घास दिखाई नहीं देती और वह सोचता है कि वाह, उसने इतना चर डाला। इसीलिए वह गर्मी में मोटा भी हो जाता है। अब इसमें कितना वैज्ञानिक सत्य है, यह तो मैं नहीं जानती किन्तु इतना जानती हूँ कि यदि इसी समय हमारी माता जी ने कमरे में प्रवेश न किया होता तो हमारा भयंकर वाक युद्ध अवश्य हो जाता। माता जी को देखते ही हम दोनों अपनी-अपनी पत्रिकाओं के पीछे छुप गए।

यह सारा प्रसंग मुझे एकाएक तब याद आया, जब तपती धूप में ठीक दोपहर को मैं बाजार जा रही थी। एकाएक शिरीष के वृक्षों को फूलों से संपूरित हवा से हिलते हुए देखा और हवा के एक गर्म झोंके ने शिरीष सुमनों को धरा पर बिछा दिया। जब छोटे थे, तब इन फूलों को लेकर धीरे-धीरे अपने गाल पर छुआते थे, जिसका कोमल स्पर्श व भीनी महक सम्मोहित करने वाली होती थी। कभी-कभी इस पुष्प से दोस्तों को डराते भी थे, एकाएक पीछे से उनके गालों या ग्रीवा पर हल्का-सा स्पर्श करके। पृथ्वी पर शिरीष फूलों का बिखर जाना नेत्रसुख के साथ आत्मसुख भी था। याद आया, यह गर्मी ही तो है जो मोलसिरी को भी फूलने का मौका देती है और रात को सुगंधित कर देती है। वैसे गर्मी को पहली दस्तक पलाश पल्लवित-पुष्पित होकर देता है। हल्की सर्द की सुरसुरी के साथ गर्मी का हल्का-सा एहसास। इसका चटक लाल, अंगारे जैसा रंग, होली के रंगों में मिल जाता है। कुछ पलाश के वृक्ष अपने फूलों के साथ होली के एक-दो महीने बाद भी टिके रहते हैं- शायद सूर्य देवता की प्रचंडता को देखने के लिये। अप्रैल माह में ही सिल्क कॉटन यानी सेमल फूलने लगता है। यह किसी आततायी की तरह फूलता है और समस्त पत्रों को झाड़कर रख देता है, बस बच जाता है स्वयं। एक छत्र साम्राज्य के लिये। इसकी रक्त जैसी लाल और नुकीली फूलों की पंखुड़ियाँ अपनी विजय की घोषणा करती लगती हैं- लो आ गया, गर्मी की तपिश का सामना करने। अद्भुत दृश्य, पेड़।

इसी के बाद गर्मी में सौन्दर्य बिखेरने गार्डन शावर यानी अमतास अपने खट्टे पीले कुसुमों के साथ लम्बी डंडियों पर हवा में हौले-हौले झूलते ऐसे लगते हैं, मानो ग्रीष्मदेव की अगवानी करने को तैयार हो रहे हैं। फिर बारी आ जाती है कृष्णा चूड़ा की, जिसे आम भाषा में कापर पाड भी सम्भवत: कहते हैं। हल्दी का रंग लिये ताम्रवर्णी पुष्प पूरे वृक्ष को मानो अपना चंदोवा पहना देते हैं। ये भी तीव्र वायु से पृथ्वी पर ऐसे बिछ जाते हैं, मानो गर्मी आने पर पुष्प वृष्टि कर रहे हों। ग्रीष्म ऋतु में कुछ ऐसे मनोहारी वृक्ष और उनके फूल देखने को मिलते हैं कि मैं अवाक रह जाती हूँ। सोचती हूँ, कैसी प्रकृति है कि इतनी भीषण गर्मी में बिना पानी के आखिर कैसे ये वृक्ष खड़े ही नहीं हैं, वरन फल-फूल रहे हैं। कुछ पेड़ों के नाम मुझे पता नहीं। इनमें से ही एक है हल्के और गहरे गुलाबी तथा श्वेत वर्ण मिश्रित फलों वाला वृक्ष, इसे जहाँ तक मालूम है क्रॉब एपल कहते हैं। फूल खिलने से पूर्व जो फल आते हैं, वे कम आकर्षक नहीं। ये फल बिल्कुल बड़ी-बड़ी रसीली चेरी की तरह दिखते हैं और यही फल जब प्रस्फुटिक होते हैं तो उनमें से ये त्रिवर्णी ऊर्ध्वमुखी पुष्प प्रकट हो जाते हैं। इसी से मिलता-जुलता एक वृक्ष है और वह भी गुलाबी रंगों के फूलों से ऐसे भरता है मानो किसी ने उसका ढेर लगा दिया हो। ये ऊपर उठे फूलों के गुच्छों के सौन्दर्य की अनुपम अनुभूति प्रदान करते हैं। मैंने कई बार गौर किया है कि मेरे जैसे प्रकृति प्रेमी लोग अपने वाहन रोककर थोड़ी देर इन वृक्षों को देखते हैं और प्रफुल्लित होकर आगे बढ़ जाते हैं।

क्वीन क्रेप को हिंदी में क्या कहते हैं, मुझे ज्ञात नहीं। इसके फूल भी गुलाबी रंग के और इसकी पंखुडियाँ सिकुड़ी-सी लगती हैं, जैसे क्रेप के कपड़े में सिकुड़न पड़ी होती है। इस सिकुड़न का क्या यह अर्थ लगाऊं कि ये पुष्प प्रचंड गर्मी से अपने अस्तित्व के लिये युद्ध कर रहे हैं? तो दूसरी तरफ एक गर्मी में फलने वाला वृक्ष जिसके पत्ते आम के पत्तों जैसा सदृश होते हैं लेकिन वे हताश से नीचे लटके-से प्रतीत होते हैं और उनके ऊपर श्वेत वर्णी पुष्प के बड़े-बड़े गुच्छे नैसर्गिक बुके का भ्रम उत्पन्न करते हैं। नीले रंग के फूलों से लदे जकरांडा को सभी जानते हैं। लेकिन यह जब अपने पूर्ण यौवन पर होता है तो इसमें गजब की सम्मोहनी शक्ति होती है। तपती गर्मी में नीले रंग के फूल आँखों को सहज ही शीतल कर देते हैं। लेकिन जो वृक्ष लगभग सम्पूर्ण भारत में पाया जाता है और अपने रक्तवर्णी या केसरिया रंग को चारों तरफ बिखेर देता है, वह है गुलमोहर। यह पूरी गर्मियों भर लगातार सूर्य से प्रतियोगिता करता रहता है। सूर्य के तेवर के सामने हँसता खड़ा ही रहता है। सूर्य देवता भी इस वृक्ष को हरा नहीं पाते। जैसे-जैसे सूर्यदेव का पारा चढ़ता है, गुलमोहर और भी फूलों से भरने लगता है। एक बड़ा ही विचित्र वृक्ष है, जिसके फूल गहरे नीले व बैंगनी आभा लिये होते हैं, इसे स्टार ऑफ इंडिया कह सकते हैं। इसका तना सफेदी लिये होता है और पत्तियाँ भी बड़ी होती हैं, लेकिन इसके फूल किसी का भी हृदय जीत लेंगे।

गर्मियों में फूलने वाले कुछ वृक्ष ज्यादा बड़े नहीं होते। लेकिन इनके सौंदर्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता। जैसे समर ट्रांपेट ट्री। इसके फूल हल्के और गहरे नारंगी रंग के होते हैं। इन्हें देखने से ऐसा प्रतीत होता है, मानो किसी ने छातों को खोलकर उल्टा टाँग दिया है, इसके विपरीत एक दूसरा पेड़ है, जिसके फूल हल्के मक्खनी और नारंगी रंग के ठीक दो भागों में बँटे से लगते हैं। ये बंद उल्टे टंगे छाते जैसे लगते हैं। प्रकृति भी क्या-क्या रंग दिखलाती है।

अफसोस इस बात का है कि विकास यानी सड़कें, पुल या बिल्डिंग के निर्माण के लिये शहरों में वृक्षों को हृदयहीनता से काट दिया जाता है। फलस्वरूप आम नागरिकों को इस प्रकार बदलती प्रकृति का रसास्वादन नहीं मिल पाता। यदि गर्मी का आनंद लेना है तो ऐसे शहरों में जाइए, जहाँ सड़कों के किनारे ही ये सारे ग्रीष्मकालीन वृक्ष दृष्टिगोचर हो जाएँ। पुणे शहर इस मामले में भाग्यशाली है, जहाँ आज भी ये सारे पेड़ इधर-उधर आते-जाते दिख जाते हैं। अतएव भयंकर गर्मी में भी कहींं भी आते-जाते मैं मुफ्त में प्रकृति के इस असीम व अमूल्य सौन्दर्य को देखते हुए निर्बाध चली जाती हूँ, तब गर्मी का अनुभव नहीं होता। वैसे गर्मी की ऋतु की तैयारी प्रकृति सबसे ज्यादा करती है। गर्मी से पहले पतझड़ आ जाता है और वृक्षों को पत्र विहीन कर चला जाता है। तपिश बढ़ने के साथ-साथ इन पत्र विहीन वृक्षों में नव पल्लवित पत्र-पुष्प आने शुरू हो जाते हैं। इस समय भंयकर गर्मी में पीपल के लगभग तेल लगाए-से चमकते पत्ते बड़े मोहक व शांतिदायक लगते हैं। इसी समय नीम भी हरिया रही है और जामुन भी नए पत्तों के कारण चमक रहा है। इसी तरह के न जाने कितने वृक्ष नए पत्तों से भर छतनारी छाया प्रदान करने लगे हैं।

वैसे लोग सर्दी के फूलों की आहें भरते हैं, लेकिन वे सब गमलों और क्यारियों में मौसमी फूल होते हैं। ये पौधे बढ़ने, फूलने-फलने के बाद पूर्णत: समाप्त हो जाते हैं, किन्तु गर्मी के ये वृक्ष सदियों चलते रहते हैं। दूसरे ये ठंड के पुष्पित पौधे लोगों के व्यक्तिगत बगीचों, गमलों तथा बाल्कनियों में लगे होते हैं। आम व्यक्ति को इनकी सतरंगी छटा देखने के लिये किसी उद्यान में जाना पड़ता है, परन्तु गर्मी के वृक्ष सड़क पर कतार बद्ध खड़े दृष्टि का उद्यान हैं, ये सबके लिये हैं। गर्मी का मौसम यदि कुछ छीनता है तो उससे कहीं ज्यादा फूलों की रंगीनी और जिह्वा का विभिन्न फलों के रूप में इफरात स्वाद दे देता है। ताप के आतप से परेशान होकर भी ग्रीष्मवृक्ष आश्चर्यजनक, विस्मयकारी, विलक्षण, उत्कृष्ट, भव्य, अविश्वसनीय, परम चटकीले तो कहीं हल्की आभा वाले निराले फूल- इन संतरंगी पुष्पों व अत्युत्तम महक का उपहार हम भारतीयों को देकर चले जाते हैं। बस, दृष्टि उठाइए तो ये वृक्ष किसी कलाकार की पैलइट यानी रंग पट्टिका जैसे लगेंगे। गर्मी जाती है और जबतक वर्षा आती है, सब रंग मिट चुके होते हैं या पावस की शीतल फुहार उन्हें धो देती है और तब मात्र रह जाती है-हरीतिमा।

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