राजीव गाँधी और गंगा सफाई अभियान

Submitted by Hindi on Thu, 05/12/2016 - 15:36
Source
योजना, जुलाई, 1994

‘‘गंगा जन-जन की प्रिय भारत की विशेष नदी है, जिसके इर्द-गिर्द सभ्यता की यादें, आशाएँ, भय, विजय-गीत, जीत-हार की कहानियाँ जुड़ी हैं। यह भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति की प्रतीक निरन्तर बहती गंगा है।’’ - जवाहर लाल नेहरू

प्रदूषित गंगागंगा हमारे देश की सबसे महत्त्वपूर्ण और हिन्दुओं के लिये सबसे पवित्र नदी है। भारत की नदियों का स्मरण करते समय पूजा-अनुष्ठान में सबसे पहले गंगा का नाम लिया जाता है। गंगा के बारे में अनेक किंवदन्तियाँ-कथाएँ प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि अपने श्रापग्रस्त पूर्वजों की मुक्ति के लिये भगीरथ गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाए थे। इसके लिये उन्हें कठोर साधना करनी पड़ी थी, इसलिये आज भी जब कोई व्यक्ति किसी कठिन काम को पूरा करता है तो कहा जाता है कि उसने अपने भगीरथ प्रयत्न से वह काम पूरा किया।

भरतीय सभ्यता, गंगा और उसकी सहायक नदी यमुना के मैदानों में पुष्पित और पल्लवित हुयी। गंगा के किनारे बैठ कर प्राचीन भारतीय मनीषियों ने उपनिषदों और ब्राह्मण ग्रंथों की रचना की। इसी के मैदानों में भगवान बुद्ध और भगवान महावीर का जन्म हुआ। गंगा के किनारे ही अनेकों गौरवशाली साम्राज्यों की स्थापना हुयी। गंगा-यमुना के मैदानों में अपनी सत्ता स्थापित करने के बाद ही मुसलमान सुल्तानों और मुगल सम्राटों ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

गंगा के मैदानों में आज भी हमारे देश की एक तिहाई जनसंख्या रहती है। गंगा हिमालय क्षेत्र में गंगोत्री में अपने उद्गम से निकल कर बंगाल की खाड़ी में गिरने तक 2,525 किलोमीटर की दूरी तय करती है। वह देश के तीन सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों, यानी उत्तर प्रदेश, बिहार, और पश्चिम बंगाल में होकर समुद्र में गिरती है। गंगा के किनारे 692 नगर बसे हैं। इनमें से 25 नगरों की जनसंख्या एक लाख या उससे अधिक है। इनमें से उत्तर प्रदेश में 6, बिहार में 4 और पश्चिम बंगाल में 15 हैं। वास्तव में गंगा में अधिकांश प्रदूषण इन नगरों का जलमल गिरने से होता है। गंगा के किनारे स्थित छोटेे-बड़े नगरों में अनेक कल-कारखाने हैं। इन कारखानों में से 68 कारखानों का काफी दूषित और जहरीला जल, कचरा और गंदगी गंगा में गिरती है।

गंगा के किनारे हिन्दुओं के अनेक प्रसिद्ध तीर्थ हैं। हरिद्वार, प्रयाग और काशी गंगा तट के सबसे प्रसिद्ध तीर्थ माने जाते हैं। प्रयाग और हरिद्वार में छह और बारह वर्ष बाद कुंभ भी आयोजित किया जाता है। कुंभ के दौरान इन नगरों में लाखों तीर्थयात्री एकत्र हो जाते हैं।

जनसंख्या विस्फोट, तटवर्ती नगरों का जलमल गिरने, कारखानों से निकले दूषित और जहरीले पानी के मिलने और अधजले मनुष्यों की लाश बहा देने से गंगा बहुत प्रदूषित होने लगी थी। स्थिति इतनी खराब हो गई कि लोग वाराणसी में गंगा तट पर खड़े होने या गंगा में स्नान करने से कतराने लगे थे।

अतः मार्च 1984 में राजीव गाँधी के सुझाव पर कला और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिये ‘‘इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एण्ड कल्चरल हेरिटेज’’, यानी ‘इनटेक’ (आई.एन.टी.ए.सी.एच.) की स्थापना की गई। इस संस्था के अध्यक्ष राजीव गाँधी बनाए गए। ‘इनटेक’ का कार्य करते हुए ही राजीव गाँधी ने गंगा सफाई अभियान की प्रबल आवश्यकता को अनुभव किया। बाद में श्रीमती गाँधी की हत्या के बाद जब उन्होंने देश का नेतृत्व संभाला तो अपने इसी विचार को कार्यान्वित करने के लिये उन्होंने केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण की स्थापना की।

राष्ट्र के नाम अपने 5 जनवरी 1986 के संदेश में उन्होंने कहा था:- ‘‘गंगा भारत की संस्कृति की प्रतीक है, हमारी किंवदंतियों और कविताओं का स्रोत है और लाखों लोगों का पालन करती है। आज वह सबसे अधिक प्रदूषित नदी है। हम गंगा की प्राचीन शुद्धता को फिर से प्रतिष्ठापित करेंगे। गंगा और उसकी सहायक नदियों में प्रदूषण रोकने की कार्य योजना को लागू करने के लिये एक केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण स्थापित किया जाएगा। देश के सभी भागों में शुद्ध वायु और जल उपलब्ध हों, यह सुनिश्चित करने के उपाय किए जाएँगे।’’

गंगा की सफाई की कार्य योजना का शुभारंभ 14 जून, 1986 को श्री राजीव गाँधी ने वाराणसी में किया। इसके लिये प्रारम्भ में 293 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई, लेकिन मार्च 1994 के अन्त तक इस परियोजना पर 450 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके थे। गंगा सफाई अभियान के प्रथम चरण का सारा खर्च केन्द्र सरकार कर रही है। इसकी शुरुआत राजीव गाँधी ने की थी और बाद में अन्य प्रधानमंत्रियों ने भी इस नीति को जारी रखा।

गंगा कार्य योजना



श्री राजीव गाँधी ने खतरे को समझा और इसके निवारण के लिये गंगा कार्य योजना की स्थापना की। गंगा कार्य योजना ने अपनी स्थापना के बाद इस दिशा में उपयोगी कार्य किया है। गंगा कार्य योजना की सफलता से प्रेरणा लेकर और उत्साहित होकर यमुना कार्य योजना भी शुरू की गई है।

गंगा कार्य योजना का मुख्य उद्देश्य गंगा नदी में हो रहे प्रदूषण को रोकना और उसकी गुणवत्ता में सुधार लाना था। इसके साथ ही इस योजना का उद्देश्य गंगा नदी में जैव विविधता की रक्षा करना और उसकी उत्पादकता बढ़ाने के लिये विकास और अनुसंधान का सहारा लेना भी था। योजना का एक उद्देश्य अन्य नदियों में हो रहे प्रदूषण को रोकने के लिये एक उदाहरण प्रस्तुत करना भी था। इसका अन्तिम उद्देश्य जैव और अजैव व्यवस्था के बीच पारस्परिक क्रिया के द्वारा नदी-नालों के विकास का दृष्टिकोण विकसित करना था।

इसके लिये गंदे नालों और घरेलू जल-मल को गंगा नदी में गिरने से रोकने की व्यापक योजना तैयार की गई। इस योजना के अन्तर्गत या ऐसे नालों का रास्ता बदल दिया गया या उनके दूषित पानी को शुद्ध करने के उपाय किए गए। गंगा को दूषित करने में कल-कारखानों से निकलने वाले कचरे और दूषित जल को शुद्ध करने के संयंत्र लगाने के लिये मजबूर किया गया।

गंगा का तीन चौथाई प्रदूषण उसके तट पर स्थित एक लाख से अधिक आबादी वाले 25 नगरों के कारण होता था। शेष एक चौथाई कारखानों के कारण होता था।

गंगा के किनारे स्थित नगरों के जल-मल से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिये 88 नालों की दिशा बदलने की कार्रवाई शुरू की गई। इनमें से 67 नालों की दिशा बदली जा चुकी है और शेष की बदली जा रही है। गंगा के किनारे स्थित नगरों के जल-मल को शुद्ध करने के लिये 35 संयंत्र लगाने की योजना थीं इनमें से 15 लगाए जा चुके हैं। लोग नदी में अधजली लाशें न फेंकें, इसके लिये 28 विद्युत शवदाह गृह स्थापित करने की योजना थी। इनमें से 26 की स्थापना की जा चुकी है। इसके अलावा शौचालय बनाने, नदी तट का समग्र विकास करने और लोगों में गंगा नदी को शुद्ध रखने की चेतना फैलाने की योजना भी हाथ में ली गई है।

वर्षों से हम गंगा की उपेक्षा करते आ रहे हैं। सभी किस्म की गंदगी, कूड़ा-कचरा साधुओं, सन्यासियों और बच्चों की लाशें, मृत जानवर, अधजली लाशें गंगा में बहाते रहे हैं। फिर प्रतिवर्ष लाखों व्यक्तियों की अस्थियाँ, फूल, पूजा की सामग्री, घी, तेल आदि गंगा में छोड़ा जाता है। आम मान्यता यह थी कि गंगा मैया सभी को शुद्ध कर देंगी। गंगा ने शक्ति भर यह कार्य किया भी, किन्तु अंततः जनसंख्या विस्फोट, लोगों की उदासीनता और कल-कारखानों से निकलने वाले कचरे के कारण समस्या काबू से बाहर होती गई।

श्री राजीव गाँधी ने खतरे को समझा और इसके निवारण के लिये गंगा कार्य योजना की स्थापना की। गंगा कार्य योजना ने अपनी स्थापना के बाद इस दिशा में उपयोगी कार्य किया है। गंगा कार्य योजना की सफलता से प्रेरणा लेकर और उत्साहित होकर यमुना कार्य योजना भी शुरू की गई है। यमुना गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है और काफी प्रदूषित है। अगर गंगा के प्रदूषण को नियंत्रित करना है तो यमुना, गोमती और दामोदर को भी प्रदूषण मुक्त करना होगा।

अतः फरवरी 1991 में गंगा कार्य योजना के चरण दो के रूप में यमुना और अन्य नदियों को प्रदूषण मुक्त करने का कार्य हाथ में लेने का निश्चय किया गया। इस पर 421 करोड़ रुपये खर्च आएगा जो केन्द्र और राज्य सरकारें आपस में बराबरी के आधार पर करेंगी।

गंगा कार्य योजना की सफलता को देख जनता की देश की अन्य प्रदूषित नदियों को साफ करने में भी दिलचस्पी हुई। इस विषय में जनता की इच्छाओं का आदर करते हुए सरकार ने राष्ट्रीय नदी कार्य योजना तैयार की है। यह कार्य योजना, गंगा कार्य योजना में प्राप्त सबक और अनुभवों से लाभ उठाएगी। यह योजना देश की प्रमुख 12 नदियों पर लागू की जाएगी। केन्द्र और राज्य सरकारें इसका खर्च बराबर वहन करेंगी। इस दिशा में विचार-विमर्श पूरा हो गया है और आशा है कि शीघ्र ही इस योजना को मूर्त रूप प्रदान कर दिया जाएगा।

इस प्रकार हम देखते हैं कि गंगा की सफाई का जो काम राजीव गाँधी ने शुरू किया था, वह धीरे-धीरे समूचे देश को आकृष्ट कर रहा है और एक विशाल योजना का रूप ले रहा है। अब जनता और स्वयंसेवी संस्थाएं भी गंगा की सफाई योजना में उत्साह से भाग ले रही हैं। धीरे-धीरे सर्वत्र लोग राजीव गाँधी के इस विचार का स्वागत करने लगे हैं कि नदियाँ हमारी अमूल्य थाती हैं और हमें हर तरह से उनकी रक्षा करनी चाहिए।

22, मैत्री एपार्टमेन्ट्स, ए/3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली

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