मध्य प्रदेश में सामाजिक वानिकी कार्यक्रम

Submitted by Hindi on Fri, 05/13/2016 - 13:15
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योजना, सितम्बर, 1994

औद्योगीकरण के विकास से एक तरफ अर्थव्यवस्था में अवश्य सुधार हुआ है लेकिन दूसरी तरफ औद्योगीकरण से उत्पन्न विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों ने नई-नई समस्याओं को जन्म दिया है, फलस्वरूप प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता गया और पर्यावरण प्रभावित हुआ। वनों की कमी से वर्षा भी कम होने लगी है जिसके कारण सूखे से काफी हानि उठानी पड़ रही है। सीमित वन संसाधनों पर तेजी से बढ़ती जा रही जनसंख्या, पशु संख्या, कृषि क्षेत्र, औद्योगिक विकास एवं शहरीकरण की वजह से हरियाली सिमटती जा रही है। वनों की कमी से सबसे बड़ी समस्या भू-क्षरण की हुई। भू-क्षरण की वजह से भूमि की उर्वरकता कम हो गई तथा कृषि उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ा।

हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में निजी क्षेत्रों के वृक्षों की बड़ी संख्या में कटाई हो जाने के कारण आज आम जनता को जलाने के लिये लकड़ी मिलना भी कठिन हो गया है अतः किसान उसकी जगह गोबर का उपयोग करने लगा है जो पहले खाद के उपयोग में आता था। गोबर को उपले के रूप में जलाकर एक किसान वर्षभर में लगभग 6 क्विंटल अनाज जला डालता है। इतना अनाज चार व्यक्तियों के एक परिवार के लिये पूरे साल भर का भोजन है। एक किसान के पास औसतन एक जोड़ी बैल तथा एक दुधारू पशु होता है। जिससे 90 क्विंटल गोबर वह ईंधन के रूप में जला डालता है यदि इस गोबर को बचाकर खाद के रूप में उपयोग किया जाए तो अनुमान है कि एक हेक्टेयर खेत में लगभग 5 क्विंटल अनाज अधिक उत्पन्न होगा। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में जलाने के लिये लकड़ी का प्रबंध हो जाए तो गोबर को बचाकर खाद के रूप में डाला जा सकता है, इससे अधिक उपज उपजाने में सहायता मिलेगी। इसी प्रकार हमारे ग्रामों के ग्रामवासी आए दिन बाढ़ एवं सूखे से भारी नुकसान उठाते आ रहे हैं। भूमिहीन ग्रामीण लोग अधिकांश समय बेकार रहते हैं।

आज हमारी मुख्य आवश्यकता केवल रोटी, कपड़ा तथा मकान तक ही सीमित नहीं है जबकि इसके अतिरिक्त हमारी बुनियादी जरूरत वायु, जल, मिट्टी तथा वृक्ष के साथ-साथ सभ्यता, संस्कृति पर्यावरण के बिना जीवन की कल्पना करना व्यर्थ है। वृक्ष हमारी सभ्यता, संस्कृति की प्रगति के प्रतीक हैं। पेड़-पौधे एवं वनस्पतियों के बिना इंसान का काम नहीं चल सकता है। जन्म से मृत्यु तक जंगल की लकड़ी हमारी साथी है। सोने-चाँदी के बिना तो एक बार हमारा काम चल सकता है लेकिन लकड़ी के बिना नहीं। हमें ईंधन, पशुओं के लिये चारा, मकान बनाने, कृषि यंत्र बनाने व फर्नीचर बनाने के लिये इमारती लकड़ी वनों से मिलती है। सांस लेने के लिये समस्त जीवधारियों को साफ सुथरी हवा चाहिए जो पेड़ पौधे से ही पैदा होती है। हम सभी जानते हैं कि वृक्ष जहरली वायु को शुद्ध वायु में बदल देते हैं। हरियाली सबको प्यारी एवं अच्छी लगती है और बिना पेड़-पौधों के हरियाली सम्भव नहीं है। वन तथा वृक्ष वर्षा करने में सहायक होते हैं। पानी के बहाव एवं मिट्टी को रोक कर भूमि का संरक्षण करते हैं। सभी व्यक्ति चाहते हैं कि भूमि उपजाऊ रहे, नदी-नालों में साफ पानी बारहों महीने बहता रहे लेकिन वनों के बिना यह सम्भव नहीं है क्योंकि वृक्ष भूमि और जल दोनों की रक्षा करते हैं।

भारतीय वन


स्वस्थ पर्यावरण एवं संतुलित पारिस्थितिकी के लिये समस्त भू-भाग का एक तिहाई भाग वनों से आच्छादित होना चाहिए। अतः इसी दृष्टिकोण को देखते हुए हमारे देश की राष्ट्रीय वन नीति 1952 के अनुसार कम से कम 33.3 प्रतिशत भाग वनों से ढका होना चाहिए। इसमें से पहाड़ी क्षेत्रों में मिट्टी एवं जल संरक्षण के लिये कम से कम 60 प्रतिशत एवं मैदानों में 20 प्रतिशत भूमि पर वन होना चाहिए। इससे कम वन क्षेत्र होने पर पर्यावरण प्रदूषण जैसी अनेक विकट समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं तथा साथ ही दैनिक जीवन की आवश्यकता के लिये वन उपज प्राप्त होना भी कठिन हो जाता है।

यद्यपि भारत में वर्तमान समय में कुल 10 प्रतिशत क्षेत्र पर ही वन है जिसमें शिलाखंड, चट्टानें, हिमानियाँ, नदियाँ भी शामिल हैं तथापि इसमें से 11 प्रतिशत ही क्षेत्र ऐसा है जहाँ अच्छे स्वस्थ एवं उत्पादक वन हैं शेष 8 प्रतिशत क्षेत्र में जो वन विद्यमान हैं वह बिगड़ गये हैं। हमारे देश में प्रतिवर्ष 45-50 हजार हेक्टेयर क्षेत्र से लोंन समाप्त हो रहे हैं। यही कारण है कि 1900 में हमारे देश में वन क्षेत्र का प्रतिशत लगभग 40 था जो घटकर 19 रह गया है।

मध्य प्रदेश में वनों की स्थिति


मध्य प्रदेश देश के बीचों-बीच स्थित होने के कारण हृदय प्रदेश के रूप में जाना जाता है। देश की बहुत सी नदियों के जलगृह क्षेत्र मध्य प्रदेश में है। यहाँ बरसने वाले पानी की प्रत्येक बूँद छोटी बड़ी नदियों के माध्यम से सीधे अरब सागर या बंगाल की खाड़ी तक पहुँचती है। अतः पर्यावरण, जल एवं भूमि संरक्षण की दृष्टि से मध्य प्रदेश के वन विशेष महत्व रखते हैं।

राज्य का भौगोलिक क्षेत्रफल 4.42 लाख रुपये वर्ग किलोमीटर है। इसमें 1.55 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वनों से आच्छादित है। जिसमें से 83,242 वर्ग किलोमीटर पर्वतीय क्षेत्र में तथा 72,172 वर्ग किलोमीटर मैदानी क्षेत्र में वन है। इस प्रकार राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 35 प्रतिशत वन क्षेत्र है। मध्य प्रदेश के संपूर्ण वन ‘वन विभाग’ के अंतर्गत हैं। यह विभाग वनों की देखरेख नियंत्रण आदि करता है। मध्य प्रदेश के वनों का वर्गीकरण विशिष्ट वृक्ष समूहों के आधार पर किया जा सकता है। जैसे सागौन वन, साल वन तथा मिश्रित पर्णपाती वन। राज्य में सागौन के वन लगभग 27,70,344 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं जो कुल वन क्षेत्र का 17.88 प्रतिशत है। सागौन के सघन वन जबलपुर, होशंगाबाद, बैतूल, मंडला, छिंदवाड़ा बस्तर, जिलों में स्थित है। साल के वन लगभग 2573.93 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है जो कुल क्षेत्र का 16.54 प्रतिशत है। साल के वृक्ष मंडला, बालाघाट, रायपुर, दक्षिणी बस्तर, बिलासपुर, सरगुजा, उमरिया तथा सीधी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। मिश्रित पर्णपाती वन राज्य के 1,01,927 किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं जो कुल वन क्षेत्र का 65.58 है। इस वन क्षेत्र में साजा, बीजा, तेन्दू, महुआ, बांस, बबूल, सलई, अंजन, हर्रा वृक्ष आते हैं। ये वन रायपुर, बालाघाट, होशंगाबाद, मंडला, दुर्ग, छिन्दवाड़ा, शिवपुरी, सीधी आदि जिलों में पाये जाते हैं।

वनों का वितरण


म.प्र. में 33 प्रतिशत से अधिक वन अवश्य है लेकिन उनका वितरण सभी क्षेत्रों में समान नहीं है मध्य प्रदेश के दो तिहाई भाग में आज जंगल जैसी चीज नजर नहीं आती है। जो भी वन है वह मुख्यतः दक्षिणी म.प्र. व पूर्वी म.प्र. तक ही सीमित है। राज्य के पश्चिमी क्षेत्र एवं उत्तरी क्षेत्रों में वन एकदम समाप्त हो चुके हैं। मालवा क्षेत्रो में भी यही स्थिति है। जिन जिलों में वन क्षेत्र अधिक है वहाँ पर भी उनका वितरण समान नहीं है। म.प्र. के 9 जिले ऐसे हैं जहाँ पर 15 प्रतिशत तक वन क्षेत्र हैं। इसी प्रकार 16 जिले ऐसे हैं जहाँ पर 15 से 32 प्रतिशत वन क्षेत्र हैं। शेष 20 जिले ऐसे हैं जहाँ पर भारतीय वन नीति के अनुसार 33 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र हैं। उपरोक्त आँकड़ों के अनुसार प्रदेश के 45 जिलों में से 25 जिलों में वन क्षेत्र कम है। इसके अतिरिक्त शेष 20 जिलों में यद्यपि वनों का प्रतिशत 33 से ऊपर अवश्य है फिर भी इन जिलों में भी ग्रामीणों की आवश्यकता की पूर्ति पूर्ण रूप से नहीं हो पा रही है। राज्य में वन क्षेत्रों की निरंतर कमी आती जा रही है।गाँवों में लगे निस्तारी वन एवं निजी भूमि के वृक्ष भी तेजी से कटते जा रहे हैं आबादी जिस रफ्तार से बढ़ रही है और हमारी जरूरत जिस तेजी से बढ़ रही है उसे देखते हुए अंदाज लगाया जा सकता है कि 20 साल बाद हमारे चूल्हे कैसे जलेंगे। ऐसी दशा में चारा, कृषि कार्यों तथा मकान बनाने के लिये आवश्यक लकड़ी जुटा पाना भी दिन प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है।

इस प्रकार लगातार हो रहे वन विनाश के कारण हमारा पर्यावरण भी संकट में है तथा साथ ही हम सामाजिक-आर्थिक कठिनाइयों के दौर से भी गुजर रहे हैं। अब इसे रोका जाना चाहिए और हमें वक्त रहते चेतना है ताकि पर्यावरण को संतुलित रखा जा सके तथा ईंधन लकड़ी, चारा, फल आदि के मामले में आत्मनिर्भर बन सकें। अतः अब हमें वृक्षारोपण एवं वनीकरण का काम एक जन आंदोलन के रूप में विकसित करना होगा।

वन विनाश को रोकने तथा वनों के विस्तार के लिये सरकार द्वारा 1950 में अधिक वृक्ष लगाओ का आंदोलन चालू किया गया। जिसे वन महोत्सव का नाम दिया गया। यह आंदोलन देश में अब भी चल रहा है तथा प्रतिवर्ष 1 जुलाई से 7 जुलाई तक वन महोत्सव कार्यक्रम मनाया जाता है। इस आंदोलन का उद्देश्य वन क्षेत्रों में वृद्धि तथा जनता में वृक्षारोपण की प्रवृत्ति पैदा करना था। इस आंदोलन के प्रणेता थे- तत्कालीन केन्द्रीय कृषि मंत्री कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी।

कुछ वर्षों पहले वन विभाग केवल आरक्षित एवं संरक्षित वनों में ही कार्य किया करता था लेकिन वर्तमान परिस्थिति में सामाजिक वानिकी का विचार उभर कर सामने आया जिसके तहत वन विस्तार की धारा सामुदायिक पड़ती भूमि और निजी भूमि की ओर मोड़ी गयी है ताकि ग्राम वासियों की निस्तार की आवश्यकता गाँव में ही पूरी हो सके।

वैसे सामाजिक वानिकी का इतिहास भारत वर्ष में लगभग 2500 वर्ष पुराना है। भगवान बुद्ध ने अपने संदेश में कहा था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन काल में कम से कम 5 पौधे अवश्य लगाने चाहिए। भगवान बुद्ध के इस संदेश को सम्राट अशोक ने पूरे देश में तथा सीमावर्ती देशों में भी प्रचारित किया था। जनता में भी वृक्ष लगाने की आदत गहराई से व्याप्त थी। मानव ने अपने घर के आस-पास वृक्ष लगाये तथा वृक्षों को अपने आंगन में लगाकर आनन्द का अनुभव लिया। प्राचीन काल में पौधे लगाना तथा उनकी रक्षा करना पूज्य काम माना जाता था तथा लोग वृक्षों की पूजा करते थे और सोचते थे कि अगर वे इन्हें काटेंगे या नष्ट करेंगे तो उसका दण्ड मिलेगा। इसी कारण से हमारी प्राचीन संस्कृति को ‘अरण्य संस्कृति’ कहा गया है।

‘सामाजिक वानिकी’ शब्द का प्रयोग वन वैज्ञानिक श्री वेस्टोबांध ने वर्ष 1968 में उनके द्वारा राष्ट्र मंडल वानिकी कांग्रेस के दिल्ली सम्मेलन में दिए गए भाषण में किया था। उसमें उन्होंने सामाजिक वानिकी की परिभाषा कुछ इस प्रकार की- सामाजिक वानिकी वह वानिकी है जिसका उद्देश्य सुरक्षा एवं मनोरंजन के लाभ जनता तक पहुँचाना है।

अतः लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए वनीकरण हेतु राज्य शासन द्वारा म.प्र. में 1976 में सामाजिक वानिकी कार्यक्रम की शुरुआत की। इसके बाद वर्ष 1981-82 में संयुक्त राष्ट्र अमरीका की विकास संस्था के सहयोग से 21 जिलों में यह कार्यक्रम वर्ष 1986-87 तक क्रियान्वित किया गया। इस अवधि में 47,665 हेक्टेयर क्षेत्र में वृक्षारोपण कार्य किया गया तथा ग्रामीणों को 3.15 करोड़ पौधे वितरित किए गए। अप्रैल 1987 से राज्य में नया सामाजिक वानिकी कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया, जोकि प्रदेश के समस्त 45 जिलों में सफलतापूर्वक चल रहा है।

कार्यक्रम का उद्देश्य


सामाजिक वानिकी कार्यक्रम की जानकारी गाँव-गाँव तक फैलाना आवश्यक है तभी यह सफलता की मंजिल तक पहुँच सकता है। जन सम्पर्क इस कार्यक्रम को लोकप्रिय बनाने का अच्छा माध्यम है। इस कार्यक्रम को प्रचारित करने का दायित्व जितना शासन का है इतनी ही अपेक्षा जनता से भी है।

सामाजिक वानिकी कार्यक्रम का उद्देश्य प्रमुखतः जन सामान्य सरकारी तथा गैर सरकारी संगठनों को प्रचार-प्रसार के माध्यम से वनीकरण हेतु जागृत एवं प्रेरित करना है। साथ ही साथ ग्राम पंचायतों में उपलब्ध सामुदायिक भूमि पर ग्राम वन निर्मित कर ग्रामवासियों की वनोपज की आवश्यकता जैसे जलाऊ लकड़ी, छोटी इमारती लकड़ी, बांस, चारा आदि की पूर्ति करना तथा आत्मनिर्भर बनाना है। कृषकों को निजी क्षेत्र में वृक्षारोपण के लिये प्रोत्साहन व सुविधा देना तथा गरीबी रेखा से निचले स्तर के निवासियों को प्राथमिकता के आधार पर रोजगार उपलब्ध कराना है। इसके लिये कई कार्यक्रम प्रारम्भ किए गए हैं।

कृषि वानिकी


कृषि फसल के अनुरूप तथा बहुपयोगी पौधों का रोपण करने के बाद समय-समय पर उसी क्षेत्र में कृषि फसल लेने के कार्यक्रम को कृषि वानिकी कहते हैं। कृषि वानिकी में एक निश्चित दूरी पर वृक्ष प्रजातियों का रोपण किया जाता है ताकि बीच में कृषि फसलें ली जा सकें। कृषिवानिकी में कृषक को भूमि प्रबंध करके पौधों का अन्तराल निश्चित करना चाहिए। ट्रैक्टर से जुताई करने पर पंक्तियों की दूरी अधिक तथा पौधों से पौधों की दूरी कम रखनी चाहिए।

फार्म वानिकी


छोटे किसानों के पास अधिक जमीन न होने के कारण वे वृक्षारोपण करना तो चाहते हैं लेकिन वृक्षारोपण नहीं कर पाते हैं। कृषि फार्मों या खेती की मेढ़ों या खेतों में बिखरे हुए कुछ वृक्षों को लगाने के रूप में वानिकी के कार्य को फार्म वानिकी कहते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य छोटे आकार की इमारती लकड़ी, ईंधन एवं चारे की आवश्यकता पूरी करना तथा कृषि फसलों पर अनुकूल प्रभाव डालना है।

विस्तार वानिकी


स्थानीय संस्थाओं एवं समाज सेवी संगठनों द्वारा नदी, तालाब, नहरों, रेलवे लाइनों, सड़कों के किनारे की भूमि, स्कूल, पंचायत, औद्योगिक संस्थाओं आदि में किए गए वृक्षारोपण को विस्तार वानिकी कहते हैं।

वृक्षारोपण कहाँ करें


आज विश्व के सारे वैज्ञानिक वनों के विस्तार पर जोर दे रहे हैं, पर इसका विकास किया जाना जनसंख्या की दृष्टि से संभव नहीं है क्योंकि अच्छी भूमि पहले से ही कृषि के लिये ली जा चुकी है जिसको रबर की तरह खींचकर बढ़ाया जाना असंभव है अतः अच्छी भूमि वृक्षारोपण के लिये मिलने का प्रश्न ही नही उठता है। फिर भी प्रदेश में लाखों हेक्टेयर बंजर भूमि पड़ी है। यह बंजर भूमि अवश्य ही वृक्षारोपण के लिये उपलब्ध हो जाती है। जिन क्षेत्रों में सामाजिक वानिकी योजना लागू की जा सकती है वह निम्नानुसार है:-

सड़कों, नहरों तथा रेलवे लाईन की दोनों ओर की राजकीय पड़त भूमि पर रोपण।

स्कूल, तालाब, कुआँ, मंदिर, पंचायत घर औषधालय, शासकीय भवन आदि सार्वजनिक स्थानों की अहातों की भूमि पर रोपण। ग्रामीण सामुदायिक पड़त भूमि पर रोपण। इसके अतिरिक्त ग्रामवासियों के घरों के आस-पास भवनों के अहातों में खेतों की मेढ़ों पर तथा कुछ सीमा तक खेतों में फसल के साथ तथा फसल के लिये अनुपयोगी भूमि पर प्रदेश वानिकी के रूप में वृक्षारोपण कार्य किया जा सकता है। घरों में जहाँ बर्तन साफ किए जाते हैं तथा घरों की बाड़ियों में।

इस प्रकार सामाजिक वानिकी के अंतर्गत वृक्षारोपण कार्य राजकीय वन सीमाओं के बाहर राजकीय भूमि, ग्रामों की सामुदायिक भूमि, सार्वजनिक भूमि तथा व्यक्तिगत भूमि पर किया जा सकता है।

कौन सी प्रजातियाँ लगाएँ


नीलगिरी एक अच्छा ईंधन है अतः किसान इसे अपनी खेती को मेढ़ों पर लगा सकते हैं। इसके अतिरिक्त सिरिस, बबूल, भी ईंधन के रूप में उपयोग की जा सकती है। 5 वर्ष तक प्रति परिवार यदि 50 वृक्ष लगाए तो ईंधन की आवश्यकता पूरी हो सकती है। फलों में आम, महुआ, अमरूद, नींबू, कटहल के प्रति परिवार 5 वृक्ष लगाये जाएं। लघु काष्ठ के लिये काला सिरस, खमेर, शीशम उत्तम है। अतः प्रति परिवार पाँच वृक्ष लगाये जावें। पशुओं के चारे के लिये सुबबूल, अगस्त, मुनगा, सिरस, उत्तम है, अतः एक जोड़ी मवेशी के लिये 5 वर्ष तक, 60 वृक्ष प्रतिवर्ष लगाए जाएं तो चारे की आवश्यकता पूरी हो सकती है। पर्यावरण सुधार के लिये प्रत्येक गाँव में 25 वृक्ष नीम, बरगद, पीपल, अमलतास, अशोक के लगाने चाहिए।

खेतों की मेढ़ों पर बांस लगाना चाहिए।

सामाजिक वानिकी योजनाएं : सामाजिक वानिकी कार्यक्रम के अंतर्गत मध्य प्रदेश में कई योजनाएं चल रही हैं जो निम्नानुसार हैं-

सामुदायिक पड़त भूमि पर वृक्षारोपण


सामाजिक वानिकी के अंतर्गत सामुदायिक पड़त भूमि पर वृक्षारोपण के लिये निम्न प्रक्रिया अपनायी जाती है-

1. ग्राम पंचायत प्रस्ताव पास करके वृक्षारोपण हेतु जमीन सामाजिक वानिकी को हस्तांतरित करेगी, ग्राम की आवश्यकताओं को देखते हुए तथा ग्राम पंचायत के सुझावों पर विचार करते हुए सामाजिक वानिकी वृक्षारोपण का कार्य उपरोक्त भूमि पर कराएगा, प्रारम्भ के वर्षों में वृक्षारोपण की सुरक्षा एवं रख-रखाव का कार्य सामाजिक वानिकी करेगा लेकिन इसमें ग्रामीणों का सहयोग होना आवश्यक है। बाद में उक्त वृक्षारोपण ग्राम पंचायत को वापिस कर दिया जाता है। उत्पादित वनोपज का उपयोग ग्रामीण स्वयं अपने कार्य हेतु कर सकेंगे। वन उपज आदि को ग्रामीणों में वितरण हेतु ग्राम पंचायत स्तर पर सरपंच की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया जावेगा और वृक्षारोपण से शासन राजस्व प्राप्त नहीं करेगा और न ही इस पर किये गये व्यय की वसूली करेगा।

पौधशालाओं की स्थापना


सामाजिक वानिकी कार्यक्रम के अंतर्गत कृषकों को एवं स्कूलों में आय का अतिरिक्त साधन पैदा करने के लिये वन विभाग की सहायता से विकेन्द्रीकरण निजी रोपणी स्थापित करने की योजना म.प्र. में 1986 से चल रही है। इस योजना के अंतर्गत हितग्राही को वन विभाग द्वारा निःशुल्क पॉलीथीन थैली बीज आदि सामग्री दी जाती है तथा तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया जाता है। तत्पश्चात स्वस्थ तथा उपयोगी दस हजार पौधे होने पर अनुदान के रूप में 5300 रुपये की नगद राशि हित ग्राही को दी जाती है इस प्रकार सामग्री सहित 1000 रुपये का अनुदान हितग्राही को दिया जाता है।

समस्त श्रम कार्य किसानों एवं विद्यार्थियों द्वारा ही किया जाता है। विकेन्द्रीकृत निजी रोपणियों के माध्यम से पिछड़े हुए दूर दराज के क्षेत्रों में वृक्षारोपण के प्रति प्रेम पैदा हुआ है तथा लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार भी हुआ है।

निजी भूमि पर वृक्षारोपण


ग्रामीण क्षेत्रों में दिन प्रतिदिन जटिल होती जा रही ईंधन की समस्या का हल निकालने के लिये स्वयं की निजी बेकार भूमि पर तथा खेतों की मेढ़ों पर नीलगिरी, बबूल, सुबबूल, बांस, खमार आदि बहुउपयोगी पौधों का रोपण किया जाना चाहिए। जिससे प्रत्येक कृषक परिवार ईंधन एवं कृषि कार्यों के लिये लकड़ी हेतु आत्मनिर्भर बन सके।

इस प्रकार अपनी स्वयं की भूमि पर वृक्षारोपण करने वाले व्यक्तियों को शासन द्वारा नियमानुसार अनुदान राशि भी दी जाती है तथा रोपण की तकनीकी जानकारी भी समय-समय पर उपलब्ध करवायी जाती है। म.प्र. शासन वन विभाग निम्न प्रयोजनों पर अनुदान की राशि किसानों को देता है।

पूरे खण्ड में वृक्षारोपण अर्थात प्रक्षेत्र वानिकी फसल के साथ वृक्षारोपण अर्थात कृषि वानिकी व खेतों की मेढ़ों पर वृक्षारोपण अर्थात मेढ़ वानिकी।

जल स्रोतों पर वृक्षारोपण


सार्वजनिक जल स्रोतों के स्थान पर आम, महुआ, पीपल एवं बरगद के पौधे जनता द्वारा लगाने एवं उनकी सुरक्षा करने पर प्रोत्साहन राशि विभाग द्वारा दी जाती है। आम, महुआ, के पौधे लगाने पर दस रुपये प्रति पौधा तथा पीपल, बरगद के पौधे लगाने पर पाँच रुपये प्रति पौधा प्रोत्साहन राशि विभिन्न चरणों में पंचायत के माध्यम से प्रदान की जाती है। इसके अंतर्गत एक वर्ष में एक व्यक्ति को अधिकतम 25 पौधे लगाने पर राशि दी जाती है।

ग्राम निकुंज योजना : ग्राम की एक या दो हेक्टेयर सामुदायिक भूमि पर ग्रामवासियों द्वारा 625 फलदार पौधा प्रति हेक्टेयर लगाकर अमराई निकुंज निर्मित करने पर दो वर्षों में तीन किश्तों में खन्ती निर्माण करने पर 7,000 अथवा बागड़ लगाने पर 3500 रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से अनुदान दिया जाता है।

ऊर्जा बचत उपकरणों का वितरण : सामाजिक वानिकी कार्यक्रम का उद्देश्य वनोपज की आवश्यकता की पूर्ति करने के साथ-साथ जलाऊ लकड़ी की मांग में कमी लाना है। जलाऊ लकड़ी की कमी को हम दो प्रकार से दूर कर सकते हैं- यथा संभव जलाने के उपयुक्त शीघ्र बढ़ने वाली वृक्ष प्रजातियों का रोपण किया जाए और वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों का उपयोग किया जाए, ताकि जलाऊ लकड़ी की खपत को कम किया जा सके।

पारम्परिक चूल्हों से भोजन पकाने में अधिक ईंधन और समय लगता है तथा इससे कई नुकसान भी हैं इन्हीं बातों को दृष्टिगत रखते हुए विभिन्न किस्म के ऊर्जा बचत उपकरण तैयार किये गये हैं जो निम्नानुसार हैं।

1. सोलर कुकर, 2. उन्नत चूल्हा, 3. धुआँ रहित चूल्हा, 4. गोबर गैस संयंत्र और 5. शवदाह यंत्र।

उपरोक्त उपकरणों के व्यापक उपयोग के लिये सामाजिक वानिकी द्वारा ग्रामीणों को प्रेरित किया जाता है तथा उपकरणों का वितरण किया जाता है।

प्रचार-प्रसार


सामाजिक वानिकी कार्यक्रम की जानकारी गाँव-गाँव तक फैलाना आवश्यक है तभी यह सफलता की मंजिल तक पहुँच सकता है। जन सम्पर्क इस कार्यक्रम को लोकप्रिय बनाने का अच्छा माध्यम है। इस कार्यक्रम को प्रचारित करने का दायित्व जितना शासन का है इतनी ही अपेक्षा जनता से भी है। सामाजिक वानिकी कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार हेतु वृक्ष लगाने के महत्व को दर्शाते हुए सामाजिक, फोल्डर्स, पोस्टर ग्रामीणों में वितरित किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त जन सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है। जहाँ ग्रामीणों को सामाजिक वानिकी कार्यक्रम के सम्बंध में जानकारी दी जाती है। साथ ही साथ विभाग के कर्मचारी पंचायतों में जाकर ग्रामीणों से चर्चा कर उन्हें सामाजिक वानिकी कार्यक्रम के सम्बंध में विस्तार से जानकारी बताते हैं। इसी कड़ी में सामाजिक वानिकी का संदेश जन-जन तक पहुँचाने के लिये प्रति मंगलवार आकाशवाणी के द्वारा विविध भारती पर रात्रि 9.30 बजे ‘‘हरियाली और खुशहाली’’ कार्यक्रम का प्रसारण किया जाता है।

अतः आज हमने जो कृषि उत्पादन में आशातीत सफलता पाई है उसे कायम रखते हुए उपलब्ध भौतिक साधनों के द्वारा अधिक से अधिक वृक्ष रोपित कर अपने दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु हम सब को वन संपदा की उपयोगी एवं बहुमूल्य सेवाओं की जानकारी प्राप्त कर जन-जन तक पहुँचाना है। वन संरक्षण तथा वन विकास की आवाज उठानी है तभी पर्यावरण की शुद्धता बनी रहेगी और राष्ट्र को सुदृढ़ आर्थिक आधार मिलेगा।

शील भद्र
सहायक वन संरक्षक, सामाजिक वानिकी वन मंडल रायपुर

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